दिल की ज़मीन पर ठुकी कीलें - 6 Pranava Bharti द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

दिल की ज़मीन पर ठुकी कीलें - 6

दिल की ज़मीन पर ठुकी कीलें

(लघु कथा-संग्रह )

6-कम्मो बूआ

कम्मो बूआ यानि कामिनी ! सच में ही नाज़ुक फूल सी कोमल व खूबसूरत !| जीवन जैसे खेल खिलाता है वैसे ही उसे खेलना पड़ता है, हम सब इस तथ्य से वाकिफ़ हैं | कम्मो बूआ का जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ था और माया एक दिल्ली के बहुत नामचीन ब्राह्मण परिवार की कन्या ! किन्तु जिस घर में उसका विवाह हुआ, वह औसत से भी गया -बीता ! वो ज़माना था जब अधिक शिक्षा लड़कियों को तो नहीं ही दी जाती थी | भई ! क्या करेंगी पढ़-लिखकर ! फिर जितना पढेंगी, उससे कहीं अधिक शिक्षित वर भी तो तलाशना होता | शिक्षित वर  के लिए माया के पिता को एक साधारण घर के लड़के से अपनी सुपुत्री का विवाह करना पड़ा |

जब माया विवाह करके आई तब जिस कायस्थ परिवार में उसे उतारा गया वह  शिक्षित और सभ्य था | उसकी अपनी ससुराल में उसे केवल बड़े घर की बेटी समझकर धन की चकाचौंध ने उसका स्वागत करवाया था लेकिन चार दिन में ही वहाँ माया का दम घुटने लगा | तब इस कायस्थ परिवार की पुत्री कामिनी ने माया का साथ दिया, वह उसकी संवेदनाओं को समझ पाई | जल्दी ही कामिनी माया की नन्द व माया उसकी प्यारी भाभी बन चुके थे |

माया के पति शिक्षण विभाग में थे, सुबह निकल जाते तो गई रात तक आते |कामिनी के घर की स्थिति बड़ी नाज़ुक थी| ये तीन भाई-बहन थे, कामिनी का एक बड़ा भाई किसी बड़ी बीमारी में बिना इलाज के अपनी जान खो बैठा था और ये तीनों बहन-भाई अभी स्कूल में थे | भाई के जाने के बाद कामिनी सबसे बड़ी थी और बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी | इस परिवार का भरपूर प्यार माया को मिला | एक पड़ौसी परिवार से इतना सम्मानपूर्ण अपनत्व पाकर माया उनकी ही हो गई थी |

बेटे के दुःख में भरी आँखों वाली अम्मा जी माया को देखते ही अपने आँसू पल्लू में समेट लेतीं और उसके आगे जो कुछ भी घर में होता परोस देतीं | कम्मो के पिता एक छोटी सी जगह पर छोटी-मोटी चीज़ें बेचते और अम्मा जी अपने घर पर ही दूसरों का नाश्ता ऑर्डर पर बनातीं | कम्मो बड़ी हो रही थी, स्वाभाविक था माता-पिता उसके लिए सुयोग्य वर की इच्छा रखते |

साल भर में माया ने एक पुत्री को जन्म दिया, दिल्ली से माया के पिता के यहाँ से सामान आता ही रहता जो माया किसी न किसी प्रकार कम्मो के भाई-बहनों में बाँट देती | माया के पिता की इच्छा थी कि उनकी बेटी और दामाद उनके साथ दिल्ली में रहें जो उन पति-पत्नी को स्वीकार नहीं था | स्कूल से आकर कम्मो माँ की सहायता के साथ छोटी गुड़िया का ध्यान रखती |

माया ने अपने पड़ौस के बच्चों को इक्क्ठा कर लिया और उन्हें ट्यूशन पढ़ाने लगी |पहले माह के खत्म होते ही उसके हाथ में पैसे आए वह सीधी अम्मा जी के पास गई और उनके पैर छूकर उनके हाथ में पैसे रख दिए |

"ये क्या कर रही हो माया बहू ?अपने पास रखो ये पैसे, गुड़िया के काम आएँगे | "

"नहीं अम्मा जी, ये पैसे इस घर के काम आएँगे, आप मना नहीं कर सकतीं | एक तरफ़ बहू कह रही हैं, दूसरी तरफ़ मुझे अलग कर रही हैं ---"

इन रिश्तों में न जाति थी, न बिरादरी ---एक नाज़ुक अहसास  था, कुछ दिनों में कामिनी भी माया के साथ पढ़ाने लगी | कुछ ही वर्षों में एक छोटा स्कूल खोलकर माया ने अम्मा जी के घर का बहुत सा भार संभाल लिया था |पता नहीं उनमें कौन ब्राह्मण था और कौन कायस्थ !

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Chhotu

Chhotu 2 साल पहले

pradeep Kumar Tripathi

pradeep Kumar Tripathi मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

Manju Mahima

Manju Mahima मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

V. Nice.. सच्ची इंसानियत की कहानी, बिना किसी जातिगत भेदभाव के... लेखिका को साधुवाद 👏👏