दस दरवाज़े - 18

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर – अट्ठारह)

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छठा दरवाज़ा (कड़ी -3)

ऊषा : कौन हरामजादा नॉक करता है...

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

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ऊषा के जाने के बाद घर जैसे खाली खाली सा हो गया हो। इतना खाली तो यह पहली पत्नी जगीरो के जाने के बाद भी नहीं हुआ था। ऊषा के गीत अचानक मेरे कानों मे गूँजने लगते हैं। उसका बनाया खाना मुझे याद आने लगता है। मेरा दिल होता है कि फोन करके उसका पता तो करूँ, पर फिर सोचता हूँ कि उसको अपनी ससुराल में टिकी रहने दूँ। तीसरे दिन उसका फोन आ जाता है। वह कहती है -

“मेरा यहाँ दिल नहीं लगता।”

“तुझे कोई कुछ कहता है?”

“कहता तो कोई नहीं, पर कोई सीधे मुँह बात भी नहीं करता।”

“ऊषा मेरी बात सुन ग़ौर से। मैं इस अनुभव में से निकला हूँ। ऐसे अवसरों पर हमें रिश्तों में बोलते-बुलाते रहना चाहिए... एक-दूसरे को बुलाते रहो तो रिश्ता बिगड़कर भी नहीं बिगड़ता। अगर तेरे साथ कोई नहीं बोलता तो कोई बात नहीं, तू उन्हें बुलाती रहा कर। अपने हसबैंड के आसपास रह, उसको अपने शरीर का स्पर्श दे।”

“वो हरामी तो मेरे पास आता ही नहीं।”

“तू कोशिश करती रह, प्लीज़, मेरे कहने पर।”

“ठीक है।”

करीब चार दिन बाद उसका फोन आ जाता है। कहती है -

“मुझसे नहीं रहा जाता यहाँ, मेरी सास ऐसे बातें किए जाती है जैसे बकरी पत्ते चबा रही हो।“

“तू थोड़ा समय निकाल, सब ठीक हो जाएगा। कुछ समय और टिकी रह... किसी के साथ बनानी बहुत कठिन होती है, बिगाड़ तो जब मरज़ी लो।”

एक दिन फिर फोन आता है -

“ये लोग तो कुछ ज्यादा ही ऊपर थूकते हैं... मैंने तो सोचा था कि घोड़ी सदा तबेले में नहीं खड़ी रहती, पतंग हमेशा आसमान में नहीं चढ़ी रहती।”

कुछ दिन बाद ऊषा लौट आती है। इतने दिनों में ही वह कमज़ोर हो गई प्रतीत होती है। लेकिन वापस आकर बहुत खुश है। घर में हर काम दौड़ दौड़कर कर रही है। उसके लौट आने में मुझे अपनी पराजय नज़र आ रही है, पर साथ ही साथ उसके आ जाने की तसल्ली भी है। शाम को वह मेरे लिए पैग बनाती हुई गाने लगती है -

मैंनूं तां कहिंदा सी कड्ढ़णा नहीं आउंदा

कड्ढ़णा नहीं आउंदा

मैं कड्ढ लई फुलकारी वे...

पर तूं हूंगर क्यों मारी वे...

सोहणियां, तू हूंगर क्यों मारी वे ...!

उसके लौट आने पर मेरे घर की रौनकें जैसे लौट आई हों।

एकबार फिर मेरे हालात बदलने लगते हैं। मेरा काम टूट जाता है और मैं छोटा-सा स्टोर खरीद लेता हूँ। मैं सुबह से रात तक स्टोर में व्यस्त रहता हूँ। ऊषा के गीत सुनने का अब मेरे पास वक्त नहीं है। मैं करमजीत से कहता हूँ -

“अब इसका कहीं और इंतज़ाम कर यार, मैं तो अब घर भी कम आ पाता हूँ। ऐनिया की तरफ चला जाता हूँ या स्टोर में ही सो जाता हूँ।”

करमजीत उसके साथ बात करता है तो वह मुझे खोजती-तलाशती मेरे स्टोर पर ही आ जाती है। मुझसे कहने लगती है -

“तू मेरी इतनी तारीफें करता फिरता है और ऊपर से मुझे घर से निकालने को भी उतावला है, क्यों?”

“ऊषा, मैं उतावला नहीं, मैं तो यह सोचता हूँ कि तू ज्यादा समय घर पर अकेली रहती है... और अब वक्त है जब तुझे अपना फ्लैट मिल सकता है।”

“मुझे नहीं चाहिए अपना फ्लैट, मैं यहीं खुश हूँ। अगर मेरे यहाँ रहने में तुझे एतराज़ है तो बता।”

वह मेरी ओर हाथ बढ़ाती हुई कहती है। उसकी बजाय उसकी आँखें अधिक बोल रही हैं। मैं बोलता हूँ -

“ऊषा, दो बातें मेरी ध्यान से सुन ले, एक तो यह कि मेरे पास ऐनिया है।”

“यह तो मुझे पहले दिन से ही पता है, पर मुझे एक बात का और भी पता है।”

“वह कौन-सी?”

“कहते हैं न कि घोड़ा फिरे गांव गांव, जिसका घोड़ा उसकी के नाम। यह घोड़ा मेरा ही है।”

कहती हुई वह हँसने लगती है। मैं उसके दोनों हाथ पकड़कर कहने लगता हूँ -

“भोली ऊषा!... मेरा लक्ष्य अपने माँ-बाप की मरज़ी से विवाह करवाना है और दुबारा ज़िन्दगी में सैटल होना है। मैं तेरे साथ किसी भी तरह शादी नहीं कर सकता।”

मेरी बात सुनकर उसकी बड़ी-बड़ी आँखों के कोयों में आँसू झलकने लगते हैं और वह कहती है -

“यह तो मैं जानती हूँ, पर मैं तेरे साथ ऐसे भी रहने को तैयार हूँ।”

“क्यों? तू नहीं चाहती कि तेरा पति हो, घर हो, और बच्चे हों?”

“मैं सबकुछ देख चुकी हूँ। कहते हैं न कि आदमी को कुछ न कुछ ईश्वर पर भी छोड़ देना चाहिए, वो हराम का ऊपर किस काम के लिए बैठा है।”

मैं उसकी बात का कोई उत्तर नहीं देता।

एक दिन उसका फोन आता है। वह गुस्से में बोलती है -

“अपने भाई को तूने यहाँ भेजा था?”

“नहीं, मैंने नहीं भेजा। वैसे मैंने उसको बता रखा था कि कमरा किराये पर दिया हुआ है।”

“इसका मतलब यह हरामी करमजीत का काम है।”

“कब आया था वह?”

“आज।”

“क्या कहता था?”

“जो कुछ हरामी मर्द कहा करता है।”

“ऊषा, तू मेरे भाई को गाली न दे।”

“मैंने तो मर्द को गाली है, तेरा भाई भी मर्द ही है, तू भी और करमजीत भी, सब हरामजादे!”

ऊषा क्रोध में है। मुझे करमजीत पर गुस्सा आने लगता है। करमजीत के मेरे भाई के साथ भी दोस्ताना संबंध है। मैं ऊषा से पूछता हूँ -

“कोई सीरियस बात तो नहीं हुई?”

“तुझे मैं क्यों बताऊँ कि क्या हुआ...अब तू सीधी बात कर कि मुझे नोटिस कब दे रहा है ताकि मैं फ्लैट के लिए अप्लाई कर सकूँ।” कहती हुई वह ज़ोर से फोन पटक देती है।

कुछ देर की भागदौड़ के बाद उसको काउंसिल की ओर से फ्लैट मिल जाता है। मैं उसका सामान उसके फ्लैट में छोड़ आता हूँ। टैंटलो एवेन्यू पर यह फ्लैट बहुत सुन्दर है। मैं फ्लैट में कुछ सामान डलवाने में भी उसकी मदद कर देता हूँ। एक सैटी और एक टेलीविज़न लेकर देता हूँ। वह कहती है -

“तूने मुझे अपनी ज़िन्दगी में से निकालकर दूर फेंक दिया, पर मुझे लेकर सोचा ज़रूर करेगा। मेरे जैसी औरत ढूँढ़कर दिखाए तो जानूँ।”

फिर वह मेरा हाथ पकड़कर गाने लगती है -

मैंनूं कहिंदा पेके नहीं जांदी

पेके नहीं जांदी

जद तुर गई मैं पेके

जैं वड्डी दा कुलक्षणा

ढेरां ते चढ़ चढ़ वेखे !

उसकी बात में सच्चाई है। उसके जाने के बाद मुझे उसकी याद भी बहुत आती है और एक प्रतीक्षा-सी भी बनी रहती है कि शायद वह फिर आ जाए।

समय बीतने लगता है। मैं कभी-कभी ऊषा के यहाँ चक्कर लगा आता हूँ। फिर मेरे चक्कर कम होने लगते हैं। बस, फोन पर ही हाल-चाल पूछ लिया करता हूँ। उसका बेटा अब नर्सरी में जाने लगता है। उसका भी अपने फ्लैट में दिल लगने लगता है। आसपास के लोगों के साथ जान-पहचान बढ़ने लगती है। नई सहेलियाँ बन जाती हैं। अब उसको मेरी अधिक ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

एक दिन अचानक उसका फोन आता है। वह गुस्से में पूछती है -

“मेरे घर में हरामी आदमी को तू भेजता है?”

“नहीं तो... क्या हुआ?”

“अनजान से आदमी मेरी डोर नॉक किए जाते हैं। मुझे लगता है कि यह करमजीत हरामजादे का काम है। कोई बात नहीं, मैं उसको फोन करके सिखाती हूँ सबक।”

कहकर वह फोन रख देती है। मैं करमजीत को फोन करके कहता हूँ -

“यार, ऊषा अपनी दोस्त है, उसकी सेफ्टी का ध्यान भी रखना चाहिए हमें।”

“ठीक है यार, दोस्त तो है, पर मुझे एक आदमी को खुश करना था, पर अब साली के पर निकल आए हैं! मैं तुझे एक बात बताऊँ, तुझे भी औरत रखनी नहीं आई। तूने इसकी तारीफ़ ही इतनी कर दी कि अपने आप को हूर की परी समझने लग पड़ी है।”

वह गुस्से में भरकर कहता है।

मैं प्रायः ऊषा को फोन कर लिया करता हूँ। नहीं तो उसका फोन आ जाता है। वह मजाक में पूछती है -

“कैसे फिर? कब करा रहा है मेरे साथ शादी?”

कई बार वह यह सवाल गंभीर होकर भी पूछने लगती है।

वक्त करवट लेता है। मैं विवाह करवा लेता हूँ। ऊषा को मालूम होता तो फोन करके कहती है -

“कौन-सी पद्मनी लेकर आया है?”

“मुझे पद्मनियाँ लेकर क्या करनी हैं! यह तो बेचारी साधारण-सी लड़की है।”

“इतनी जल्दी बेचारी भी हो गई!”

“किसी दिन घर आ जाना, मिलवा दूँगा।”

“मैं तेरे घर अब उसके पाद सूँघने आऊँगी?”

“ऊषा, तू भी अब विवाह करवा ले। कोई लड़का इंडिया से ही ले आ। अभी तू जवान है, सुन्दर है।”

“तू अपनी सलाहें अपने पास ही रख, मुझे पता है, मुझे क्या करना है।”

वह खीझती हुई कहती है। मैं पूछता हूँ -

“किसी दिन मिलने आऊँ?”

“अब तूने मुझसे क्या लेना है? अब चिपटा रह इस घुसपैठनी के साथ ही।”

“ऊषा, तू तू ही है, सच तेरा कोई मुकाबला नहीं! तेरा गीत सुनना चाहता हूँ और तेरा बनाया पैग पीना चाहता हूँ, सिर्फ़ एकबार, प्लीज़!”

वह जैसे कुछ सोचने लगती है और पूछती है -

“सिर्फ़ एकबार ही न?”

“हाँ, सिर्फ़ एकबार तू मुझे अपने हाथों पिला।”

“आ जा किसी दिन, पर जल्दी लौटना होगा तुझे। आखि़र मैं भी लोगों के बीच रहती हूँ, मेरा भी पड़ोस है।”

वह किसी जिम्मेदार औरत की तरह कहती है।

उस दिन अंजू के गुसल जाने के बहाने काफी देर बाद मैं उसके फ्लैट में जाता हूँ। मेरी पत्नी को देखकर वह खुश हो जाती है। उसके साथ बहुत प्रेमपूर्वक पेश आती है। मैं उसको अपने घर आने का निमंत्रण देता हूँ, पर वह नहीं आती।

कई वर्ष बीत जाते हैं। अब तो मेरे बच्चे स्कूल भी जाने लगे हैं। इन वर्षों में मुझे ऊषा की कोई ख़बर नहीं है। मैंने कभी उसके बारे में जानने की कोशिश भी नहीं की। मैं अपने परिवार में फंसा बैठा हूँ। करमजीत कभी मिले या फोन पर बात हो तो हम ऊषा का जिक्र अवश्य कर लेते हैं। उसको भी ऊषा के बारे में कुछ नहीं पता। वह मिडलैंड में जाकर रेस्टोरेंट खोल लेता है इसलिए लंदन की तरफ उसका चक्कर भी नहीं लगता। एक दिन मैं और मेरी पत्नी टैस्को में शॉपिंग कर रहे हैं। अचानक अंजू कहती है-

“वो देखो, एक औरत अपनी ही तरफ देखे जा रही है।”

मैं उसकी ओर देखता हूँ। बड़ी-बड़ी आँखों से मैं एकदम पहचान लेता हूँ कि यह तो ऊषा है। उसके संग एक आदमी भी है। हम उनकी तरफ चल पड़ते हैं और वे हमारी ओर। एक-दूसरे से ‘हैलो’ कहते हैं। वह कहने लगती है -

“मैंने सोचा, लगते तो भाई साहब ही है... यह मेरे हसबैंड हैं, मदन लाल।”

“नाइस टू सी यू!... ऊषा, विवाह कब करवाया?”

“बहुत साल हो गए। हमारे तो दो बच्चे भी हैं। लड़का-लड़की।”

“यह तो बहुत अच्छा हुआ।” मैं कहता हूँ।

ऊषा अपने बच्चों के विषय में बताने लगती है। अंजू हमें बातें करते छोड़कर दुबारा शॉपिंग करने लगती है। मदन लाल ज़रा दूर खेल रहे बच्चों को लेने चला जाता है। मैं ऊषा को हौले-से कहता हूँ -

“बहुत बड़ा रांझा ढूँढ़ा तूने! इसके बग़ैर ठीक नहीं थी तू! और फिर मेरा भी मौका लग जाता था कभी कभी।”

“जा रे जा! अपना काम कर... तेरी बीवी से यह लाख दर्जे अच्छा है।”

“नहीं ऊषा, सच बता, तेरी आँखें कुछ और ही कह रही हैं। इनमें वो चमक नहीं जो होनी चाहिए...कैसा है तेरा लल्लू प्रसाद?”

“सब हरामी एक से हैं!”

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‘सातवें बंद दरवाज़े’ के पीछे की अंतरंग कथा पढ़ने के लिए आप बेताब होंगे। तो अगली किस्त में हम खोलेंगे आपके लिए यह ‘सातवां बंद दरवाज़ा’ और आप रू-ब-रू होंगे ‘सातवें बंद दरवाज़े’ के पीछे की दिलचस्प अंतरंग कथा से… पर यह जानने के लिए पढ़नी होगी आपको अगली किस्त…

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Naveen 3 सप्ताह पहले

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Sunhera Noorani 4 सप्ताह पहले

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Balkrishna patel 1 महीना पहले

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Manjula Makvana 1 महीना पहले

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Manish Kuwadiya 1 महीना पहले