दस दरवाज़े - 6

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर - छह)

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दूसरा दरवाज़ा (कड़ी – 3)

नसोरा : ग़र तेरे काम आ सकूँ

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

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नसोरा को लेकर नवतेज तथा अन्य मित्र मुझ पर फब्तियाँ कसने लगते हैं, पर मैं उनकी परवाह नहीं करता। नसोरा के साथ मेरी मित्रता चल निकलती है। अब हम अवकाश के दिन कहीं न कहीं घूमने चले जाया करते हैं। कई बार वह मेरे किराये के कमरे में भी आ जाया करती है। हम खुलकर एक-दूसरे से बात कर सकते हैं। वह अब मेरे इतना करीब हो चुकी है कि मोहन लाल वाली बात करना इस मित्रता के लिए अपमानजनक बात दिखाई देती है।

एक दिन जब नसोरा मुझे मिलने आती है तो मोहन लाल भी उससे मिलता है। हमारी इतनी निकटता देखकर उसकी सारी फरमाइसें धरी की धरी रह जाती हैं।

एक दिन मैं नसोरा को लेने उसके घर जाता हूँ। शाम को हमारा डिस्को पर जाने का प्रोग्राम है। अब उसने अपना ठिकाना बदल लिया है। वह कहती है कि नये लैंडलॉर्ड जाम्बिया से ही हैं और अच्छे आदमी हैं। उससे प्यार करते हैं। इसलिए मैं उसको उसके घर से लेने जाने का हौसला कर लेता हूँ। मैं उसके बताये पते पर पहुँचकर घंटी बजाता हूँ। एक लम्बा-सा लड़का दरवाज़ा खोलता है और मुझे देखकर गुस्से में पूछता है - “कौन है तू?“

“मैं नसोरा से मिलने आया हूँ।“

“क्यों?“ वह रौबदार आवाज़ में पूछता है। मैं ज़रा हैरान होता हूँ और डर भी जाता हूँ। मैं कहता हूँ -

“मैं उसका दोस्त हूँ।“

“मुझे लगता है, तू मजाक कर रहा है।“

“उसको बुला दे, एक मिनट के लिए।“

तब तक नसोरा उसके बराबर आ खड़ी होती है। वह लड़का एक तरफ हो जाता है। नसोरा कहती है -

“सॉरी लवी, अन्दर आ जा। तू कुछ देर अंकल के पास बैठ, मैं अभी तैयार होकर आई।“

वह मुझे सिटिंग रूम में ले जाती है, जहाँ टेलीविज़न चल रहा है और सामने सैटी पर भारी-भरकम अफ्रीकन व्यक्ति बैठा है। उसके साथ ही कुर्सी पर बैठी एक औरत सब्ज़ी काट रही है। नसोरा उस व्यक्ति से कहती है -

“अंकल, ये मेरा दोस्त है। यह कुछ देर तुम्हारे पास बैठेगा, मैं तैयार हो रही हूँ।“

नसोरा मुझे बैठने का इशारा करके चली जाती है, पर वह आदमी कुछ नहीं बोलता और न ही वह औरत। जिस लड़के ने दरवाज़ा खोला था, वह भी मेरे सामने आकर बैठ जाता है और मेरी ओर क़हर भरी नज़रों से देखने लगता है। मुझे लगता है कि कोई मुसीबत आने वाली है। सोचता हूँ कि क्यों न बाहर कार में बैठकर नसोरा का इंतज़ार करूँ, पर मेरे से उठा नहीं जा रहा। टेलीविज़न पर फुटबाल का मैच चल रहा है। आर्सनल बनाम लिवरपूल का मैच। आर्सनल मेरी टीम है। मैं मैच देखने लगता हूँ। आर्सनल की टीम हावी है। उसका सेंटर फारवर्ड ग्रैह्म बॉल लेकर दौड़ रहा है। मैं दांत पीस रहा हूँ कि इतनी दूर से बॉल लेकर आया है तो गोल कर ही दे, पर गोल करना कठिन हो रहा है। वह साथ वाले अपने खिलाड़ी को पास दे देता है और आगे निकल जाता है। वह खिलाड़ी वापस उसको पास देता है और ग्रैह्म ठांय से गोल दाग देता है। मैं खुशी में चीखने लगता हूँ और मेरे पास बैठा वह आदमी भी। वह मेरी ओर देखकर प्यार से पूछता है -

“तेरी टीम भी आर्सनल है?“

“बिल्कुल, इस गोल की हमें सख़्त ज़रूरत थी।“

“तेरी बात ठीक है। ये मैच हमें अवश्य जीतना चाहिए, नहीं तो हम चैंपियन बनने की दौड़ से बाहर हो जाएँगे।“

“इस बार प्लेयर भी तो बहुत मंहगे खरीदे हुए हैं।“

“तू बिल्कुल ठीक कह रहा है। हमारे पास मैनेजर भी दुनिया का सबसे बढ़िया मैनेजर है। इस बार हमें हर हालत में चैंपियन बनना होगा।“

“मुझे तो पूरी आस है।“

“जीसस ने चाहा तो ऐसा ही होगा।“ वह कहता है।

हम दोनों बातें करने लगते हैं। फुटबाल हमारे मध्य पुल बन जाता है। माहौल बिल्कुल सुखद हो जाता है। तब तक नसोरा भी आ जाती है। मैं उनसे विदा लेकर चल पड़ता हूँ। कार में बैठती नसोरा बताती है -

“इनका बेटा मेरे से इस बात पर खफ़ा रहता है कि मैंने एक इंडियन बॉय-फ्रेंड रखा हुआ है। मैंने तो कह दिया था कि तुझे इससे क्या?“

“मुझे देखकर भी वे पहले बहुत खुश नहीं थे।“

“आज सवेरे मेरे साथ किसी बात पर गुस्सा हो गए थे।“

“कौन सी बात?“

“आंटी कहती थी कि मेरे भतीजे से विवाह करवाकर उसे यहाँ पक्का करवा। मैंने कहा कि क्यों करवाऊँ? बस इसी बात से।“

“सब तरफ यही समस्या है।“

मेरे मुँह से निकल जाता है। नसोरा एकदम मेरा हाथ पकड़कर पूछती है-

“कहीं तेरी भी तो नहीं ये समस्या?“

“नहीं नहीं। मेरे पास तो ब्रिटिश पासपोर्ट है।“

“सच बता, अगर ज़रूरत है तो मैं तुझे पक्का करवा सकती हूँ, वह भी मुफ्त में।“ कहते हुए वह हँसने लगती है। वह फिर कहती है -

“कुछ बरस पहले मैंने एक आदमी को पक्का करवाया था, दो हज़ार पौंड लिए थे।“

मैं हैरान होकर उसकी तरफ देखता हूँ। वह कहती है -

“मैं ऐसी कहाँ हूँ, यह तो मेरी खास सहेली का भाई था। वह बहुत ही पीछे पड़ गई थी। मैंने सखीपने में ही यह काम किया था। मैंने वो दो हजार एक तरफ रख लिए कि जब कभी मुझे काउंसिल का फ्लैट मिला तो उसको खूब सजाऊँगी।“

मैं उसकी बात सुनता रहता हूँ। मुझे चुप देखकर वह पूछती है -

“क्यों? अच्छी नहीं लगी यह बात?“

“नहीं, यह बात नहीं। मेरा एक दोस्त है, उसकी भी यही समस्या है, पक्का नहीं हो पा रहा।“

“देख ले, अगर खास दोस्त है तो मैं मदद कर देती हूँ। लवी, तेरी मदद करके मुझे खुशी होगी।“

“नहीं नसोरा, ऐसी कोई बात नहीं। अगर ज़रूरत हुई तो ज़रूर बताऊँगा।“ मैं कहता हूँ और बात आई-गई हो जाती है।

एक दिन हम उसकी बहन मागला से मिलने जाते हैं। मागला पूछती है -

“विवाह कब करवा रहे हो?“

“तेरा दिमाग खराब है। विवाह तो पागल करवाते हैं और मैं अभी पागल नहीं हुई।“ नसोरा हँसते हुए जवाब देती है। वह अगले ही पल फिर कहती है -

“हम तो अभी एक दूसरे को प्यार भी नहीं करते। सिर्फ़ दोस्त हैं, क्यों लवी?“

“हाँ नसोरा, हमारे बीच कोई प्यार-व्यार नहीं, दोस्ती है। विवाह का तो सपना भी नहीं लिया जा सकता।“

हम मागला से मिलकर वापस लौट रहे हैं। नसोरा कहने लगती है -

“लवी, मुझे पता है, इंडियन सोसाइटी कुछ अलग है। तेरे माँ-बाप को तुझसे बहुत सारी उम्मीदें होंगी... तुझे बच्चों की ज़रूरत होगी। तुझे विवाह करवा लेना चाहिए।“

“नसोरा, अभी मेरा तलाक नहीं हुआ। हो गया तो मैं झट इंडिया के लिए फ्लाइट पकड़ लूँगा।“

“वैसे एक सलाह दूँगी कि कुछ देर ऐश कर, तू अभी-अभी विवाह जैसी मनहूस संस्था की जकड़ से बाहर निकला है। थोड़ा ठहरकर कुछ करना।“ वह सयानों की तरह बात कर रही है।

हम नित्य तो नहीं मिलते, पर हमारे मिलने में कुछ रुकावटें पड़ने लगी हैं। उसको काले लोग इंडियन आदमी के साथ घूमने के कारण धमकियाँ देने लगे हैं। यही वजह है कि उसको एक बार फिर अपना ठिकाना बदलना पड़ता है। अब मैं उसके घर नहीं जाता बल्कि हम राह में ही कहीं मिल लेते हैं। मुझे भी कई बार लोग नसोरा को लेकर मजाक करने लगते हैं कि यही औरत मिली दोस्ती के लिए। नवतेज या काम पर कुछ अन्य दोस्त तो फब्तियाँ कसते रहते हैं। मेरा बड़ा भाई तो यहाँ तक कह देता है कि मेरा स्तर ऐसी औरत का ही है, नहीं तो जगीरो(पहली पत्नी) क्यों छोड़कर जाती। मेरा बहनोई मेरे साथ फोन पर कई दिन अपनी पी हुई खरी करता रहता है। मैं भी नसोरा को अब कभी अपने कमरे में नहीं लेकर आता और न ही उसके साथ ऐसे इलाके में जाता हूँ जहाँ किसी परिचित से भेंट होने की आशंका हो।

एक दिन पब में बैठते हैं कि मोहन लाल आ जाता है। मैं उसको नसोरा के मिलवाते हुए बताता हूँ -

“यह मोहन लाल मेरा सबसे खास दोस्त है।“

“हाँ, मिली हूँ इसको मैं पहले भी... यही है जिसको मदद की ज़रूरत है?“

“हाँ।“ मेरे मुँह से निकल जाता है। मोहन लाल मुझे इस सवाल का कारण पूछता है तो मैं उसको सारी बात बता देता हूँ। वह पंजाबी में मुझसे कहता है -

“इसे कह कि मेरी मदद कर दे, मैं दो की बजाय पाँच हजार दे दूँगा।“

नसोरा मोहन लाल की मदद कर देती है। उसके साथ विवाह रजिस्टर करा लेती है। इसी विवाह पर मोहन लाल स्थायी होने के लिए अपना पार्सपोर्ट होम-ऑफिस को भेज देता है। मोहन लाल मुझे दो हजार पौंड नसोरा के लिए देता है। मैं नसोरा को बताता हूँ। वह झिड़कते हुए कहती है -

“लवी, तुझे लगता है कि मैं ऐसी हूँ!... मैंने तो तेरी खातिर कर दिया है। मुझे पता है कि मैं तो कभी विवाह करवाऊँगी नहीं, फिर अगर किसी के काम आ गई तो कौन-सी ऐसी बात है।“

“नसोरा, मुझे तो मोहन लाल ने ये पैसे दे दिए हैं। अब मैं उसको वापस नहीं कर सकता।“

“तू इस्तेमाल कर ले इनको।“

“नहीं, तू अपने फ्लैट के लिए रख ले।“

मेरे कहने पर वह सोच में पड़ जाती है और फिर कहती है -

“अभी तू इन्हें अपने पास ही रख। अभी वह पक्का भी तो नहीं हुआ। और साथ ही मेरा पासपोर्ट भी अपने पास रख ले, जब मुझे ज़रूरत पड़ी, तेरे से ले लूँगी।“

एक दिन नसोरा काम पर नहीं आती। दूसरे दिन भी नहीं आती और तीसरे दिन भी नहीं। सप्ताह गुज़र जाता है। सोचता हूँ कि कहीं बीमार ही न हो। मेरे पास उसका नया फोन नंबर नहीं है। न ही उसके नए ठिकाने का पता है। मुझे यह पता है कि मागला कहाँ रहती है, पर उसका फोन नंबर मेरे पास नहीं है। मैं नसोरा के फोरमैन से पूछता हूँ, पर उसको भी कुछ नहीं पता। चार हफ़्ते हो जाते हैं। मैं मोहन लाल से कहता हूँ -

“यार, कहीं वह किसी मुसीबत में न हो। कई लोग उसको मेरे साथ दोस्ती की वजह से तंग किया करते थे।“

“चल, हम उसकी बहन के घर चलते हैं, उसको कुछ पता होगा।“

हम मागला से मिलने जाते हैं। मागला बताती है -

“मुझे भी उसके बारे में कुछ नहीं पता, पर फिक्र करने की कोई आवश्यकता नहीं। ऐसा पहले भी होता रहा है कि वह अचानक सम्पर्क से बाहर हो जाती है, पर खुद ही मिल भी जाती है। देखना, एक दिन खुद ही फोन कर लेगी।“

“पर वह ऐसी नहीं कि इतने दिन फोन न करे।“

“वह ऐसी ही है। मैं उसको बचपन से जानती हूँ। हो सकता है, वह पैट्रिक की ओर चली गई हो।“

“पर वो तो ओल्ड पीपल होम में रहता है।“

“हो सकता है, वह ठीक होकर घर आ गया हो।“

“उसका कोई अता-पता?“

“नहीं, कोई नहीं। पर मैं इसके बारे में तुझे फोन कर दूँगी।“

वह मेरे से मेरा फोन नंबर ले लेती है और अपना दे देती है।

कई महीने और फिर पूरा एक साल गुज़र जाता है। नसोरा का कुछ भी पता नहीं लगता। मैं मागला को फोन करके पूछता रहता हूँ, उसको भी कोई ख़बर नहीं है। काम पर से उसको ग़ैर-हाज़िर रहने के कारण निकाल दिया जाता है। मुझे उसकी बहुत चिन्ता रहने लगती है। उसका पासपोर्ट भी मेरे पास पड़ा है और दो हज़ार पौंड भी। एक दिन मागला का फोन आता है। वह बताती है कि नसोरा ने उसको अपने ठीक होने के बारे में फोन किया है, पर अपना पता नहीं बताया। यह भी बताती है कि किसी दिन नसोरा मुझे फोन करेगी। मुझे कुछ-कुछ तसल्ली हो जाती है। थोड़ा चिन्ता कम होती है। मैं सोचता हूँ कि एक बार मिले तो सही, उसको उसके पैसे और पासपोर्ट देकर मुक्त हो जाऊँ।

उस दिन मागला द्वारा दी गई सूचना के मुताबिक ही मैं हाईंड हाउस पहुँचता हूँ और इसके बहत्तर नंबर के सामने खड़ा होकर मैं उस आदमी से बहस करता हूँ। अचानक वह मेरी ओर मुक्का बढ़ाता है। लोहे की चमकती मूठ से लगता है कि यह मेरे जबाड़े को तोड़कर रख देगी। मैं तुरंत नीचे बैठ जाता हूँ। अन्दर से कोई औरत चीखती हुई बाहर आती है -

“जेसन, इसको कुछ न कह। इससे दूर हो जा।“

यह नसोरा है। वह जेसन को पकड़कर अन्दर खींचने लगती है और फिर तेज़ी से मुझे कहती है -

“लवी, प्लीज़, तू यहाँ से एकदम चला जा, अभी... यह जगह खतरे से खाली नहीं। प्लीज़...।“

अब तो बहुत वर्ष बीत चुके हैं। मैं बदल चुका हूँ। दुनिया बदल चुकी है। नसोरा कहाँ है, कैसी है, है भी कि नहीं, कुछ नहीं पता। अब तो मैंने सोचना ही बंद कर दिया है। यह मेरे मन के अन्दर का दूसरा दरवाज़ा है जो बंद है। मैं चाहता हूँ कि यह बंद ही रहे।

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‘तीसरा बंद दरवाज़ा’ अगली किस्त में खुलेगा। क्या है उस तीसरे बंद दरवाज़े के पीछे? जानने के लिए अवश्य पढ़िये अगली किस्त…

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Savita Davi 1 सप्ताह पहले

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Pinkal Pokar 2 सप्ताह पहले

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Sharmila 2 महीना पहले

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Balkrishna patel 2 महीना पहले

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Suresh Prajapat 2 महीना पहले