दस दरवाज़े - 13

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर - तेरह)

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पाँचवा दरवाज़ा (कड़ी -1)

ओनो : मुझे भूलकर दिखा

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

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हैमस्टड का अमीर इलाका। मैं ‘मिडल्टन बिल्डर्ज़’ कंपनी की पिकअप चलाता रूकी-लेन पर घूम रहा हूँ, पर मुझे बावन नंबर नहीं मिल रहा। यहाँ मकान की मरम्मत चल रही है और मुझे इसके लिए माल डिलीवर करना है। इस रोड के अधिकांश घरों के नंबर नहीं हैं, सिर्फ़ नाम हैं। सड़क पर कोई व्यक्ति भी दिखलाई नहीं दे रहा जिससे मैं यह पता पूछ सकूँ। कुछ देर घूमने के बाद मुझे एक लड़की जाती हुई दिखाई देती है। मेरे मुँह से अनायास निकलता है, “चिंकी !“ चीने लोगों की पहचान उनकी चाल से ही हो जाती है। वह टांगों पर अधिक वजन देते हुए चलते हैं। उनकी पहचान उनके बालों से भी होती है। मुझे चीनी स्त्रियों के घने काले बाल बहुत पसंद हैं। मैं उस लड़की के बराबर जाकर पिकअप धीमी करता हुआ ज़ोर से कहता हूँ -

“हैलो मिस ! बावन नंबर घर किधर होगा ?”

“आए दौंत नो।”

वह कंधे उचकाकर कहती है। एक पल के लिए रुककर वह फिर चल पड़ती है। मैं उसकी तरफ गौर से देखता हूँ। वह बहुत सुन्दर है। स्कर्ट में उसकी ठोस टांगें मेरे मन को खींचने लगती हैं, पर मैं इस वक्त काम पर हूँ। थोड़ा और आगे चलकर मुझे बावन नंबर घर मिल जाता है। मैं पिकअप की क्रेन से ईंटें और रेता उतारने लगता हूँ। घर का मालिक जॉर्ज रैडलैंड मेरे लिए चैक लिख रहा है। ठीक उसी समय वही चीनी लड़की गेट से अन्दर दाखि़ल होती है। जॉर्ज रैडलैंड उसकी ओर देखते हुए पूछता है -

“तू ओनो है ? ”

“हाँ।“

“मुझे मैरी ने बताया था कि तू आ रही है, पर उसको कहीं बहुत ज़रूरी काम आ पड़ा है। उसने तुझे फोन करने की बहुत कोशिश की, पर तूने उठाया नहीं।”

“क्योंकि मैं घर में नहीं थी।”

“सॉरी ओनो... अब तुझे दुबारा मैरी को फोन करके अपाइंटमेंट लेना होगा।”

जॉर्ज रैडलैंड कहता है, पर ओनो जवाब नहीं देती। साफ़ है कि वह गुस्से में है। वह जॉर्ज की पत्नी के पास किसी ख़ास काम से आई होगी और वह घर पर नहीं है। उसे व्यर्थ में चक्कर पड़ गया है। यह इलाका भी ऐसा है कि नज़दीक में कोई बस-स्टॉप या रेलवे स्टेशन भी नहीं है। अब बेचारी मील भर पैदल चलकर वापस जाएगी। वह गेट से बाहर निकलकर पुनः अपने रास्ते हो जाती है। मैं भी खाली होकर चल पड़ता हूँ। एकबार फिर उसके बराबर होकर पिकअप रोकते हुए कहता हूँ -

“मिस, बस स्टॉप बहुत दूर है। आ जा वहाँ तक लिफ्ट दे दूँ। सच, कोई पैसा नहीं लूँगा।”

वह मेरी ओर देखे बिना चलती रहती है। मैं एकबार और कोशिश करते हुए कहता हूँ -

“विश्वास कर, मैं तेरी मदद के लिए ही कह रहा हूँ क्योंकि बस-स्टॉप यहाँ से एक मील दूर है और यह भी विश्वास कर कि मैं बुरा आदमी नहीं हूँ।”

वह मेरी तरफ देखती है। एक पल सोचती हुई वह मेरी तरफ चल पड़ती है। मैं पिकअप का दरवाज़ा खोल देता हूँ। वह पहले अपना बैग अन्दर रखती है और फिर खुद आकर बैठ जाती है और धीमे से कहती है -

“थैंक्यू ! ”

“मेंशन नॉट... मैं तो तेरा वक्त बचाने के लिए ही ज़ोर डाल रहा था।”

वह कुछ नहीं बोलती। मैं पिकअप तेज़ कर लेता हूँ। कुछ देर बाद मैं पूछता हूँ -

“मैं समझ सकता हूँ कि तू बहुत मुसीबत में किसी काम से आई थी।”

“हाँ, मुझे मिसेज रैदलैंद से मिलना था पर...।”

“कहाँ रहती हो ? मेरा मतलब लोकल ही कि कहीं दूर ? ”

“मैं ईस्त लंदन में रहती हूँ।”

“वो तो बहुत दूर है ! कहे तो किसी अंडर-ग्राउंड पर छोड़ दूँ ?”

“नहीं, नज़दीकी बस-स्तॉप पर ही उतार दे। शायद वहाँ मेरा पति मेरी प्रतीक्षा कर रहा हो।“

“तू शादीशुदा है ? लगता नहीं।”

“मेरे तीन बच्चे भी हैं।”

वह बताती है और मैं हैरान रह जाता हूँ। उसका चेहरा तो बहुत ही ताज़गी से भरा हुआ है। बच्चों की माँ तो यह लगती ही नहीं। मैं कहता हूँ -

“मुझे यकीन नहीं होता कि तू तीन बच्चों की माँ है। तेरा चेहरा तो किसी अल्हड़ लड़की की तरह मासूम है।”

“मैं अपने चेहरे का ध्यान रखती हूँ।”

“क्या काम करती है ?”

“मैं मसाज स्पेशलिस्त हूँ। मसाज देती हूँ।”

उसका यह कहना मुझे झटका-सा देता है। अभी कुछ दिन पूर्व ही हमारे साथ वाली रोड पर एक मसाज पार्लर से वेश्यावृत्ति का अड्डा पकड़ा गया है। इसका अर्थ यह भी किसी गलत काम में ही होगी। मैं सोचने लगता हूँ कि इसको लिफ्ट नहीं देनी चाहिए थी। मेरे मन में उसके विषय में और अधिक जानने की जिज्ञासा जागने लगती है। मैं पूछता हूँ -

“कितने पैसे चार्ज़ करती हो ?”

“मेरा बस-स्तॉप आ गया, मुझे यहीं उतार दे।”

वह मेरे प्रश्न का उत्तर दिए बग़ैर कहती है। मैं उसको उतारकर गाड़ी दौड़ा लेता हूँ। मुझे अजीब-सा लग रहा है, इस गलत धंधे में इतनी मासूम लड़की भी हो सकती है। मैं करीब दो दिन उसके बारे में सोचता रहता हूँ, पर शीघ्र ही वह बिसरने लगती है।

‘मिडल्टन बिल्डर्ज़’ नाम की कंपनी के साथ मैं अस्थायी रूप में काम कर रहा हूँ। गर्मी के मौसम में इन्हें ड्राइवरों तथा अन्य कामगारों की आवश्यकता होती है और सर्दियाँ शुरू हो जाने पर काम कम हो जाता है जिसकी वजह से इन कामगारों की छुट्टी हो जाती है। मैं स्टोर बेचने के बाद खाली हूँ। कुछ भी करने को न होने के कारण इस नौकरी को स्वीकार कर लेता हूँ। जब तक इस काम से छुट्टी होगी, तब तक मैं इंडिया जाने लायक तैयार हो जाऊँगा।

एक दिन कंपनी का मैनेजर अपने कुछ कर्मचारियों को एक एक पत्र थमा देता है। यह हमारा कंपनी के साथ कंट्रेक्ट समाप्त हो जाने का नोटिस है। इस नोटिस को पाकर कई कर्मचारी बहुत निराश हैं, विशेषकर जॉन। वह अपने दुःख का इज़हार करता है -

“मैं तो सोचता था कि परमानेंट कर देंगे पर...। इस जॉब के बिना मेरी ज़िन्दगी तो बहुत ही कठिन हो जाएगी। सर्दियों में मेरी पत्नी का काम भी नहीं चला करता। लगता है कि मुझे फिर से सोशियल सिक्युरिटी का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा।”

“तेरी पत्नी क्या काम करती है ?”

मैं यूँ ही पूछ लेता हूँ। वह बताता है -

“उसका मसाज पार्लर है।”

“मसाज पार्लर ?”

“क्यों ? हैरान क्यों हो रहा है ?”

“मसाज का नाम ज़रा...।”

बात करते-करते मैं रुक जाता हूँ। वह हँसते हुए कहता है -

“मैं जानता हूँ, तू क्या कहना चाहता है। मेरी पत्नी घर से ही काम करती है और सिर्फ़ स्त्रियों को ही मसाज देती है। ये जो मसाज पार्लर हाई स्ट्रीट्स पर खुले हैं, वे भी सभी गलत नहीं, पर लोगों ने मसाज का नाम बहुत बदनाम कर रखा है।”

मुझे चिंकी की याद आने लगती है। वह भी तो मिसेज रैडलैंड का मसाज करने ही गई होगी। मैं कहता हूँ -

“सॉरी जॉन, मेरी बात के गलत अर्थ न निकाल लेना, मुझे इस धंधे के बारे में अधिक पता नहीं। मैं तो अख़बारों में छपी ख़बरों के अनुसार ही सोचने लग पड़ा था।”

“मसाज देने का काम तो बड़ा ही हुनर का है, जिस्म की ख़ास-ख़ास मांसपेशियों की मालिश करके जिस्म को आराम देना होता है। आम आदमी को तो इन मांसपेशियों का पता ही नहीं होता।”

“सॉरी जॉन, मैं तो एक दिन एक चीनी लड़की को किसी के घर मसाज करने जाता देखकर पता नहीं उसके बारे में क्या क्या सोचता रहा।”

“बहुत-सी औरतें घर घर जाकर भी मसाज करती हैं, पर इसका हमेशा कोई गलत अर्थ नहीं होता। ऐंजला यह काम घर पर ही करती है। यदि कोई क्लाइंट उसके पास न आ सके तो वह ऐसे क्लाइंट ओनो को दे देती है।”

“ओनो कौन ? चीनी लड़की ?”

“हाँ, वही यंग-सी लड़की। कई बार ऐंजला को मिलने आया करती है।”

“जॉन, वह इतनी यंग भी नहीं। उसके तो तीन बच्चे भी हैं।”

“तीन बच्चे !”

कहते हुए जॉन हँसने लगता है। फिर कहता है -

“मुझे नहीं लगता है कि वह विवाहित है या उसके कोई बच्चा भी है। वह तो कई बार पूरा दिन ऐंजला के पास बैठी रहती है। यदि पति या बच्चे होते तो इतना समय नहीं निकाल सकती। कहीं यह तो नहीं कि तू उसके पीछे घूमता हो और उसने तुझसे पीछा छुड़ाने के लिए यह कह दिया हो।“

मैं समझ जाता हूँ कि उस दिन ओनो मुझे मूर्ख बना गई। मुझे अपने मूर्ख बनने पर रंज-सा होता है और ओनो पर हँसी भी आती है। जॉन यह भी बताता है कि वह पूर्वी लंदन में नहीं रहती, यहीं उत्तरी लंदन में कहीं रहती है।

अब मुझे ओनो अक्सर याद आने लगती है। असल में, इन दिनों मैं किसी गर्ल-फ्रेंड की तलाश में हूँ। ऐनिया के साथ मेरी मित्रता अभी चल रही है, पर एडविना के बाद ऐनिया में मुझे वह आकर्षण नहीं दिखता। ऊषा जो कुछ समय के लिए मेरे घर किरायेदार बनकर आई, भी जा चुकी है। गत दो वर्षों में स्त्रियों से इतनी निकटता ने मेरी आदत बिगाड़ दी है। अब मुझे हर समय किसी का साथ चाहिए। जब कभी अकेला होता हूँ, खुब को बेहद अकेलापन महसूस करने लगता हूँ।

जब तक मैं जगीरो के साथ विवाहित जीवन व्यतीत करता रहा, मैंने कभी भी किसी अन्य स्त्री के बारे में नहीं सोचा। परंतु अब यह अकेलापन मेरे लिए बोझिल होने लगता है। यद्यपि ऐनिया अब ढली-सी प्रतीत होती है, पर फिर भी मैं कई बार ऐनिया की तरफ चला जाया करता हूँ। ऐनिया अधिक न मिलने के कारण रूठ-राठकर जल्द ही मान जाया करती है। कई बार वह मुझे ‘वीक एंड डैडी’ कहकर छेड़ने लगती है।

एक दिन आर्च-वे रोड पर से गुज़रते हुए मैं देखता हूँ कि ओनो बस-स्टॉप पर खड़ी है। मैं कार रोकता हूँ और उतर कर उसके पास चला जाता हूँ। कहता हूँ -

“माय डियर, आ जा तुझे लिफ्ट दे देता हूँ, जहाँ तक तुझे जाना है।”

“थैंक्यू, मैं ठीक हूँ।”

“तू ठीक नहीं। देख मौसम कितना खराब है। किसी वजह से पीछे बसें रुकी पड़ी हैं, आ जा, कहीं नज़दीक जाना है तो मैं छोड़ देता हूँ।”

वह सोच-विचार में पड़ जाती है। मैं एकबार फिर कहता हूँ तो वह मेरे संग चल पड़ती है। मैं कार का दरवाज़ा खोलते हुए पूछता हूँ -

“कहाँ तक जाना है ?”

“तू मुझे जंक्शन रोद पर छोड़ दे।”

वह कार में बैठती है। एक नई खुशबू कार में फैल जाती है। कुछ देर चलकर मैं पूछता हूँ-

“मसाज करने के कितने पैसे चार्ज़ करती है ?”

“मैं मर्दों का मसाज नहीं करती, सिर्फ़ औरतें ही क्लाइंत हैं मेरी।”

“ठीक है, कोई रेट तो होगा ही।”

“अलग अलग रेत होते हैं - हैड मसाज, लैग्ज़ मसाज, फुल बॉडी मसाज।”

“बदकिस्मती से मेरे आसपास कोई औरत नहीं है, मैं बिल्कुल अकेला हूँ। नहीं तो मैं तुझे ज़रूर बिजनेस दिला देता।”

“थैंक्यू !”

“तेरा नाम क्या है ?”

“तुम्हें क्या लेना है मेरे नाम से ?”

“देख डार्लिंग, आज हम दूसरी बार मिले हैं। जब तीसरी बार मिलेंगे तो मैं तुझे क्या कहकर बुलाऊँगा ?”

“इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, मेरा हसबैंद ली ऐसी बातें पसंद नहीं करता।”

“तेरे तीन बच्चे भी पसंद नहीं करते होंगे, क्यों ओनो ?”

वह हैरान होती हुई मेरी ओर देखने लगती है और कहती है -

“बस, तुम मुझे यहीं उतार दो।”

“यह तो जंक्शन रोड नहीं।”

“यहाँ से मैं पैदल चली जाऊँगी।”

“ओनो, घबरा मत। मुझे तेरे में दिलचस्पी अवश्य है पर...।”

मैं अपनी बात अधूरी छोड़ देता हूँ। जब वह उतरने लगती है तो मैं पूछता हूँ -

“ओनो, क्या कभी मैं तेरे साथ बैठकर चाय का कप पी सकता हूँ ?”

“क्यों ?”

“देख तो, ठंड कितनी है। ऐसे मौसम में चाय पीनी अच्छी होती है।”

वह कुछ नहीं बोलती और चल पड़ती है। मुझे गुस्सा आ रहा है कि यह तो बहुत अकड़बाज है।

सप्ताहभर बाद वह मुझे हाई-स्ट्रीट पर मिल जाती है। मुझे देखकर वह ज़रा-सा मुस्कराती है। करीब आकर कहती है -

“तू मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ रहा है ?”

“ओनो, कॉफ़ी पिला दे, छोड़ दूँगा।”

“सच कह रहा है ?”

“तेरी कसम।”

हम दोनों ही स्टेशन वाले कैफेटेरिया में जा बैठते हैं। वह ब्लैक कॉफ़ी लेती है और मैं मिल्क वाली। वह पूछती है -

“तू मेरा इतना पीछा क्यों कर रहा है ?”

“मैं तेरा पीछा नहीं कर रहा, बस इत्तेफाक है, पर वैसे मैं तुझे बहुत पसंद करता हूँ।”

“मेरे में पसंद करने वाली कौन सी बात है ?”

“यह तो मुझे नहीं पता, पर मुझे तेरे में कोई ऐसा आकर्षण ज़रूर दिखता है जो मुझे तेरी ओर खींचता है।”

“हर औरत के लिए तेरा यही दायलॉग होता होगा।”

वह हँसते हुए कहती है। मैं भी थोड़ा-सा हँसता हूँ और कहता हूँ -

“हाँ, यह डायलॉग कई औरतों को बोला, पर ज्यादातर यकीन नहीं करतीं। मगर तू सच मान, तेरे में कोई ख़ास आकर्षण अवश्य है।”

“सब फिजूल और बनाई हुई बातें हैं। आकर्षण-प्यार को मैं अधिक अहमियत नहीं देती, ये बहुत छोटी चीजे़ं हैं।”

“हो सकता है, पर मैं इसके बारे में अधिक नहीं सोचता। मैं तो जैसा महसूस कर रहा हूँ, बता दिया।”

“तेरे पास अभी तक कोई गर्ल-फ्रेंद नहीं आई ? ”

“नहीं।”

“तेरी उम्र के लड़के तो शादीशुदा होते हैं।”

“मेरा भी विवाह हुआ था, संक्षिप्त-सा बस।”

“फिर ? ”

“फिर क्या ? विवाह टूट गया और सब खत्म। अब मैं अकेला, बहुत अकेला हूँ।”

“अकेला है तो कोई गर्ल-फ्रेंद ढूँढ़ ले।”

“इसी तलाश में निकला था कि सामने तू आ गई।”

मैं कहता हूँ। वह चुपचाप बाहर आते-जाते लोगों को देखने लगती है। फिर कहती है -

“देख, मैं तेरे साथ कोई संबंध नहीं बनाना चाहती... मैं बॉय-फ्रेंद नहीं रख सकती।”

“क्यों, तुझे मिरगी पड़ती है ?”

मैं कहता हूँ। वह ज़ोर से हँस पड़ती है। कहती है -

“ऐसी बात नहीं।... क्या नाम है तेरा ?”

“जॉय।“

“यह क्या हुआ, जॉय ! यह तो कोई इंदियन नहीं। मैं तो बहुत सारे इंदियन लोगों को जानती हूँ। तू हिंदू है कि मुसलमान ?”

“सिख।“

“फिर तो तेरा यह नाम बिल्कुल नहीं हो सकता।”

“ओनो नाम में क्या रखा है !”

“हाँ, यह भी ठीक है। तेरी पत्नी क्यों छोड़ गई ?”

“उसकी ब्रेस्ट-बोन खराब हो गई थी। कहती थी कि अब वह किसी आदमी के साथ नहीं रह सकती।”

“ब्रेस्त बोन ? क्या मतलब तेरा ?... कहीं तू ब्रेस्त कैंसर तो नहीं कहना चाहता ?”

“नहीं नहीं, वह कहती थी कि उसे ब्रेस्ट के अन्दर की हड्डी निकलवानी पड़ेगी, इसलिए वह अब मेरे साथ नहीं रह सकती।”

“जॉय, तू इतना भोला है या जानबूझकर बन रहा है ?”

“ओनो, इसमें भोला होने वाली कौन-सी बात है? जो कुछ उसने कहा, मैंने तुझे बता दिया।”

“तू उसका हसबैंद था, उसके संग रहता था, तुझे इतना भी नहीं पता कि...।”

वह बात करते करते चुप हो जाती है। अपनी कॉफ़ी का आखि़री घूंट भरते हुए कहती है -

“ओके जॉय, मैं अब चलती हूँ। साथ देने के लिए शुक्रिया। तेरे साथ बातें करना अच्छा लगा।”

“अगर ठीक लगा तो अपना फोन नंबर दे जा।”

“क्यों ?”

“ताकि दुबारा फिर बातें कर सकें।”

“इसकी कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी, मैं तुझसे अब नहीं मिलूँगी।”

“ऐसा न कह ओनो, ईश्वर बड़ा दयालु है। हम अवश्य मिलेंगे, तू अपना फोन नंबर दे जा।”

“इसमें ईश्वर वाली कोई बात नहीं, अगर हुआ तो यूँ ही फिर कभी मिल लेंगे।”

कहती हुई वह चली जाती है। मैं हाथ मलता रह जाता हूँ, पर उसके साथ इस तरह बैठना मुझे अच्छा लगता है। अंग्रेजी शब्दों में उसका ‘डी’ को ‘दी’ बोलना और ‘टी’ को ‘ती’ मुझे बहुत पसंद आता है।

उस दिन के बाद मुझे लगता है कि मेरी तो मंज़िल ओनो ही है। मैं हाई-स्ट्रीट के अक्सर चक्कर लगाने लगता हूँ। मुझे लगता है कि वह यहीं से घर की शॉपिंग करती होगी। उस दिन भी उसके हाथ में रसोई के सामान से भरा बैग था। कई चक्कर लगाता हूँ, पर ओनो से मुलाकात नहीं होती। मैं सोचता हूँ कि यदि मुझे उसके ठौर-ठिकाने का पता होता तो जाकर ही मिल आता। मेरे पास अपने पुराने सहकर्मी जॉन का फोन नंबर भी नहीं है, नहीं तो उसी से पूछ लेता।

(जारी…)

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Sunhera Noorani 4 सप्ताह पहले

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Manjula Makvana 2 महीना पहले

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Balkrishna patel 2 महीना पहले

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Manish Kuwadiya 2 महीना पहले