दस दरवाज़े - 12

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर – बारह)

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चौथा दरवाज़ा (कड़ी -3)

एडविना : मैं चुड़ैल, मेरे से बच

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

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मेरे स्टोर के करीब ही एक पब है। पब जाने वाले सभी लोग मेरे ग्राहक भी हैं। छोटी-मोटी वस्तु लेने आए ही रहते हैं। मैं कभी-कभी इस पब में जा बैठता हूँ। कई बार एडविना भी मेरे साथ होती है। पब के ऊपरी चैबारे में रहने के लिए पीटर नाम का एक व्यक्ति आ जाता है। पीटर फोटोग्राफर है। चैबारे में अपना स्टुडियो खोल लेता है। एक कमरे में स्टुडियो और एक कमरे में वह स्वयं रहता है। पब में बैठते ही मेरी उससे दोस्ती बढ़ने लगती है। वह घूमा-फिरा व्यक्ति है। दुनियाभर की जानकारी रखता है। मैं कई बार उसके स्टुडियो में ही चले जाया करता हूँ। वह रौनकदार बंदा है। उसके साथ बातें करने का अपना मज़ा है। पीटर का स्वभाव ऐसा है कि हरेक से दोस्ती कर लेता है। एडविना के संग भी उसकी दोस्ती होने लगती है। वे दोनों कितनी कितनी देर तक बैठे बातें करते रहते हैं। एक दिन पीटर कहता है -

“जॉय, तेरी एडविना तो बहुत तेज़ औरत है।“

“अच्छा! कैसे?“

“मैंने इसकी बातों से अंदाजा लगाया है। बड़ी ऊँची-ऊँची बातें करती है। मैं सोचता हूँ कि तेरी इसके साथ कैसे निभ रही है।“

“क्या मतलब?“

“मतलब यह कि ये नस्लवादी भी है, तेरे रंग के लोगों को पसंद नहीं करती।“

“पीटर, मुझे तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ।“

“नहीं हुआ तो हो जाएगा।“ पीटर कहता है।

मुझे पता है कि हर गोरे के मन में कहीं न कहीं नस्लवाद तो छुपा बैठा ही होता है। स्टोर चलाते हुए और आम लोगों से व्यवहार करते हुए मेरे ऐसे अनुभव प्रायः हो जाते हैं। तुम्हारा अच्छा-भला दोस्त होगा और एक दिन अचानक नस्लवादी साँप-सा फन उठा डंक मार देगा। एडविना को भी तो अपने अंग्रेज होने का बहुत गर्व है। वह भी नस्लवादी हो सकती है। मैं ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार भी हूँ। मैं पीटर की बात पर अधिक ध्यान नहीं देता।

एक दिन वह कहती है -

“जॉय, सच बता कि तू मेरे से कितना खुश है?“

“मैं बहुत खुश हूँ, मेरी वेव-लैंग्थ तेरे से मिलती है। जितनी बातें मैं तेरे साथ सकता हूँ, किसी अन्य से नहीं कर सकता।“

मैं उसे दिल की बात बताता हूँ। वह कहती है -

“जॉय, तुझे याद है कि बैटरसी वाले फ्लैट में और एक बार बाद में भी मैंने तुझसे एक बात कही थी।“

मैं सोचने लग जाता हूँ कि कौन-सी बात कही होगी। वह फिर बोलती है -

“नहीं याद तो मैं याद करवा देती हूँ। मैंने कहा था कि क्यों न हम एक साथ रहने लग जाएँ, एक जोड़े की तरह, पर तूने कहा था कि हम अभी एक-दूजे को जानते नहीं।“

“हाँ, मुझे याद है।“

“अब तो हमें आपस में मिलते इतना समय बीत गया, अब तक हम एक-दूजे को जान गए हैं, क्यों न एक ही जगह रहें, सारा खर्च आधा-आधा।“

वह हुक्म देने की तरह बात कर रही है। मैं हैरान होकर सोचने लगता हूँ कि अपने भाई को अभी मैं पहली गोरी छोड़ देने का यकीन नहीं दिला सका और अब यह नई मुसीबत गले पड़ रही है। मैं कहता हूँ -

“एडविना, किसी से मिलना और बात होती है और किसी के साथ रहना और।“

“ऐसा करते हैं कि एक्सपीरियेंस लेने के लिए छह महीने एक साथ रहकर देखते हैं। अगर दोनों को अच्छा लगा तो और रह लेंगे।“

“नहीं एडविना, मैं अभी किसी भी औरत के साथ नहीं रहना चाहता। जब भी रहा तो किसी से विवाह करवाने के मकसद के साथ ही रहूँगा।“

मेरे कहने पर उसके चेहरे के तेवर बदल जाते हैं। वह कहने लगती है -

“जॉय, तू मुझे यानी एडविना को इन्कार कर रहा है! मेरे साथ रहने के लिए तो मेरे से ऊपर वाले अफ़सर भी मिन्नतें करते फिरते हैं, उनके मुकाबले तू है क्या चीज़?“

“बुरा न मना एडविना। मैंने कभी भी किसी के साथ रहने के बारे में नहीं सोचा। हाँ, विवाह के बारे में कभी-कभी सोचने लगता हूँ और बच्चों के बारे में भी।“

“हम जब इकट्ठे रहेंगे तो इस तरफ भी सोच सकते हैं, यदि एक-दूसरे से खुश हुए तो।“

“नहीं, यह नहीं हो सकता।“

मेरे द्वारा स्पष्ट इन्कार करने पर वह गुस्से में आ जाती है और दाँत भींचती हुई कहती है -

“पिछड़े हुए ज़हन का मालिक!... तू रहा न पाकि का पाकि!“ कहते हुए वह वहाँ से उठकर चल देती है। मैं छटपटाकर रह जाता हूँ।

कई दिन बीत जाते हैं, पर एडविना दोबारा दुकान पर नहीं आती। मुझे एक-दो दिन तो लगता रहता है कि शायद अपने शब्दों पर पश्चाताप करने आएगी, पर वह नहीं आती। एक दिन एक ग्राहक आकर बताता है -

“तेरी गर्ल फ्रेंड आजकल पीटर के साथ होती है।“

“फिर वह मेरी गर्ल फ्रेंड कहाँ हुई, पीटर की ही हुई।“

मैं हँसता हुआ कहता हूँ।

एडविना के जाने का मुझे अधिक दुःख नहीं है जितना उसके द्वारा मुझे नस्लवादी गाली देने का है। मैं जानता हूँ कि जब दो मित्र आपस में लड़ते हैं तो सबसे पहले वह गाली एक दूजे की जात को ही देते हैं या फिर रंग को जो कि जाति से पहले दिखाई देता है। मैं चाहता हूँ कि उसके संग बैठकर उसे खरी-खरी सुनाऊँ कि इतने दिनों की दोस्ती की कितनी घटिया कद्र की है उसने, पर इसका अवसर ही नहीं मिलता।

एक दिन पीटर दुकान में आता है। मैं उसको मजाक के लहजे में पूछता हूँ -

“तेरी एडविना का क्या हाल है?“

“जीसस क्राइस्ट!... तू कैसे काबू में रखता था इस औरत को? यह तो मेरे वश से बाहर की चीज़ है! मेरे क्या किसी भी आदमी के वश से बाहर की चीज़!“ वह सिर दायें-बायें घुमाता हुआ कहता है। मैं कहता हूँ -

“तभी वो अपने आप को चुड़ैल कहती है।“

“यह सच में चुड़ैल है।“

“गुड लक पीटर!“

“कैसी गुडलक जॉय!... मेरे तो नाक में दम कर दिया इस औरत ने। तू तो मेरे से बहुत यंग है, देख मैं पैंतालीस का हो गया, मेरे में वो फुर्ती नहीं अब जिसकी वह आस रखती है।“

“पीटर, कोई दवाई खानी प्रारंभ कर दे।“

“मैं दवाई क्यों खाऊँ? इस चुड़ैल को चलती क्यों न करूँ!“

मेरे मजाक का जवाब देते हुए पीटर कहता है।

तीन-चार सप्ताह के बाद एडविना मेरे पास आती है। वह पूरे नशे में हैं। वह कहती है -

“सॉरी जॉय, आय एम रियली सॉरी!... मैं जल्दबाजी में गलत शब्द बोल गई थी, पर मेरा मतलब यह नहीं था, मुझे माफ़ कर दे।“

“डन एडविना, जो हो गया, अब भूल जा।“

“जॉय, कसम से, मैं नस्लवादी बिल्कुल नहीं हूँ।“

“एडविना, खत्म कर इस कहानी को।“

उसको नशे में देखकर मैं उसके साथ किसी बहस में नहीं उलझना चाहता। वह अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाते हुए कहती है -

“इसका मतलब हम फिर से दोस्त हैं।“

मैं उसके साथ हाथ मिलाता हूँ। वह मेरा दूसरा हाथ भी पकड़ लेती है और फिर अपनी कही बात का पश्चाताप करने लगती है। मैं कहता हूँ-

“हाँ एडविना, हम दोस्त हैं, मेरे मन में कोई बुरी सोच नहीं रही अब।“

मैं उससे पीछा छुड़वाना चाहता हूँ।

एक दिन पीटर मुझे विशेष तौर पर मिलने आता है। बताता है -

“मैंने तेरा पंछी छोड़ दिया है, संभाल ले वापस।“

“पीटर, मैं उड़े हुए पंछी को दुबारा नहीं पकड़ा करता। अब तो वह तेरा ही पंछी है।“

“जो भी हो, मैंने एडविना को छोड़ दिया है। नो हार्ड फीलिंग्स।“

“पीटर, पहले तो बहुत चौड़ा होकर घूमता फिरता था।“

“जॉय, इस औरत की क्लास ऊँची है, इसलिए मैं खुश था, पर ऊँची क्लास की चुड़ैल भी ज्यादा बुरी होती है। प्लीज़! तू इसे वापस ले ले और मेरा पीछा छुड़वा।“

“पीटर, तुझे लगता है कि मैं इतना मूर्ख हूँ? गले से उतरी चुड़ैल फिर से गले में डालूँगा।“

मैं हँसते हुए कहता हूँ।

एक सुबह एडविना सूफी हालत में मेरे पास आती है और एक बार फिर अपने किए पर पछतावा प्रकट करने लगती है। उसी शाम वह फिर मेरे पास आकर साधारण-सी बातें करने लगती है और पूछती है -

“जॉय, आज रात तू मेरे कमरे में आ सकता है? स्टीवन कहीं गया हुआ है।“

“नहीं एडविना, मैं नहीं आ सकूँगा। मेरे दूसरे कमिटमेंट्स हैं।“

“इसका अर्थ तू अभी तक उस बात को नहीं भूला।“

“ऐसी बात नहीं एडविना, मैं आज बिजी हूँ।“

“जॉय, मैं तुझे ऑफर कर रही हूँ, मैं एडविना…।“

“एडविना, तू मेरे लिए कोई नई नहीं, हम एक दूसरे को पहले से जानते हैं, पर मेरी मज़बूरी है।“

वह निराश-सी होकर चली जाती है।

कुछ दिन बाद वह पुनः मेरे साथ रात गुज़ारने की अपनी इच्छा प्रकट करती है। मैं फिर इन्कार कर देता हूँ। वह ज़रा गुस्से में आकर बोलती है -

“उस अनपढ़ ऐनिया में ऐसी कौन-सी बात है जो मेरे में नहीं?“

“उसमें धैर्य है, वह सहज रहती है।“

“जॉय, तू मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता। तू मुझे अकेली नहीं छोड़ सकता।“

“छोड़ने का फ़ैसला एडविना तूने किया है, पीटर के पास जाकर।“

“उस बूढ़े खूसट के पास मुझे क्या करने जाना था। यह तो तू मेरे साथ गुस्सा था, मैं इसलिए गई थी।“

“एडविना, सच बात तो यह है कि मैं तेरे साथ और अधिक नहीं निभा सकता।“

“जॉय, मैंने तो तुझे पहले ही कहा था कि मैं चुड़ैल हूँ, मेरे करीब न आ, पर तूने सुनी मेरी बात?… बिल्कुल नहीं सुनी।“ वह क्रोध में बोलती है और फिर बाहर की ओर जाते हुए कहने लगती है -

“जॉय, तू भी दूसरे मर्दों की तरह ही है। घटिया, खुदगर्ज़, अपने आसपास ही घूमता हुआ।“

वह बाहर जाते हुए अपना पैर फर्श पर ज़ोर से पटकती है।

फिर एडविना मुझे कई दिन नहीं मिलती। मैं सोचता हूँ कि ऐसे ही नशे में किसी दिन फिर आ खड़ी होगी, पर वह नहीं आती। मुझे उसकी प्रतीक्षा रहने लगती है। दुकान के सामने से गुज़रती स्त्रियों में से उसका भ्रम होने लगता है। कभी-कभी मैं खुद को कोसने भी लगता हूँ कि उसको यूँ दुत्कारा क्यों? जब उसने अपनी गलती मान ही ली थी तो मुझे भी सबकुछ भूल जाना चाहिए था। शीघ्र ही, मुझे उसकी बहुत याद आने लगती है। उसके बग़ैर मुझे एक कमी-सी महसूस होने लगती है। मैं सोचता हूँ कि एकबार एडविना आए तो उससे कहूँ, चल आज रात एक साथ खाना खाते हैं। एक दिन मैं पीटर से मिलने उसके चैबारे पर जाता हूँ। पूछता हूँ -

“पीटर, तेरा पंछी नहीं देखा कहीं! कहाँ छिपाये बैठा है?“

“जॉय, मैंने तो सोचा, तुझे बताकर गई होगी और तू जानता होगा। मुझे तो उसके बारे में कुछ भी नहीं पता। पब में भी उसकी बातें करते कि कितने ही दिन हो गए। एडविना पब में नहीं आई।“

“शायद काम में व्यस्त होगी।“

“नहीं जॉय, यह बात नहीं। एडविना तो इस इलाके में ही नहीं है।“

“क्या मतलब?“

“कल मुझे स्टीवन मिला था। वह बताता था कि एडविना वहाँ से कमरा छोड़कर कहीं ओर चली गई है। कहाँ, यह बताकर नहीं गई।“

एडविना फिर कभी दिखाई नहीं देती। उसका यूँ चले जाना मेरे लिए रहस्य बन जाता है। कई बार मुझे लगता है कि वह अभी आ जाएगी और हमेशा की तरह बोलेगी, “हैलो, यंग मैन, हाउ आर यू?“ परंतु ये शब्द सुनने के लिए मेरे कान तरसते रहते हैं। उसके बारे में कुछ जानने के लिए मैं स्वयं स्टीवन से मिलता हूँ, पर वह भी मेरे जितना ही अनजान है। एडविना लौटकर उससे भी नहीं मिलती। कई महीने निकल जाते हैं। मैं दुकान बेचकर चला जाता हूँ। मैं पीटर को प्रायः फोन करता रहता हूँ। उसको भी एडविना की कोई ख़बर नहीं मिलती।

बरस के बरस बीत चुके हैं। उस चुड़ैल का मुझे अभी तक कुछ पता नहीं चला। उसके नाम की इस बंद गुफा का दरवाज़ा भी आज मैंने बहुत वर्षों बाद खोला है।

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‘पाँचवे बंद दरवाज़े’ के पीछे क्या है… जानना चाहेंगे? यह जानने के लिए अवश्य पढ़िये अगली किस्त… और जाने ‘पाँचवे बंद दरवाज़े’ के पीछे की दिलचस्प अंतरंग कथा…

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Savita Davi 1 सप्ताह पहले

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Sunhera Noorani 4 सप्ताह पहले

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Balkrishna patel 2 महीना पहले

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Prakash Bhatt 2 महीना पहले

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Aashik Ali 2 महीना पहले