दहलीज़ के पार - 6

दहलीज़ के पार

डॉ. कविता त्यागी

(6)

अपनी मौसी के साथ रहते हुए गरिमा को तीन महीने का समय बीत चुका था। उस दिन उसके पिता उससे मिलने के लिए वहाँ पर आये थे। वही पर उसने अपने पिता को मौसी से बात करते हुए सुना था कि वे गरिमा के लिए एक लड़का देखने के लिए गये थे, वही से लौट कर आ रहे है। वे कह रहे थे कि प्रत्यक्षतः तो लड़का ठीक ही है। अब उसकी छानबीन करना शेष है। यदि वे सभी जानकारियाँ, जो उन्होने दी है, सही मिली, तो तुरन्त गरिमा का विवाह कर देगे। दो महीने मे बिटिया का घर बस जायेगा, यदि सब कुछ हमारे विचारो के अनुरूप होता रहा और ऊपर वाले की कृपा हम सब पर बनी रही।

अपने पिता से यह सब सुनकर, कि वे उसका विवाह करना चाहते है, गरिमा ने अपने पर से अपना नियत्रण खो दिया। वह तुरन्त उनके समक्ष आकर बोली— आखिर इतनी जल्दी क्या है कि दो महीने मे आप मेरा विवाह कर देगे? पिताजी! मै अभी विवाह नही करना चाहती हूँ! आपने मुझे मौसी जी के यहाँ रहने का आदेश दिया था, मैने मान लिया। अभी तक अपने साथ घटी उस दुर्घटना से मेरा मन—मस्तिश्क पूरी तरह मुक्त नही हुआ है, आप कह रहे है कि दो महीने बाद मेरा विवाह कर देगे। इस दशा मे कोई लड़की अपना दाम्पत्य—जीवन कैसे सँवार पायेगी, इस विषय मे सोचा है आपने?

बेटी, विवाह हो जायेगा, तो सब कुछ ठीक हो जायेगा! इसका मतलब तो यह हुआ कि मै अपने साथ घटित पहली

दुर्घटना को भूल जाऊँगी, जब मेरे साथ एक दूसरी घटना घटेगी! बेटी, तुम नकारात्मक विचार अपने मस्तिश्क से निकालोगी, तो तुम्हे समझ मे आ जायेगा कि हम तुम्हारे हित मे ही सोच रहे है और कर रहे है!

आप मेरे हित मे तब तक कुछ भी नही सोच सकते है, जब तक एक लड़की की जगह स्वय को रखकर नही सोेेच सकते, आप एक पिता है, पिता की तरह ही सोच सकते है, बेटी की तरह नही! यह कह कर गरिमा फफक—फफक कर रोती हुई वहाँ से लौटकर अपने कमरे मे आ गयी। उसके वहाँ से जाने के पश्चात्‌ मौसी भी इस आशय का सकेत करके उठी कि वे गरिमा को समझाने—सभालने जा रही है, जो इस समय अत्यावश्यक है। कमरे मे आकर उन्होने उसके सिर पर सस्नेह हाथ रखा और वात्सल्यपूर्ण वाणी मे समझाकर उसे चुप कर दिया। उस समय गरिमा ने रोना बन्द कर दिया और अपनी मौसी के आग्रह पर मुस्कुरा दी थी। मौसी भी अपने प्रयत्न मे सफल होकर प्रसन्न थी। किन्तु, वे जानती थी कि तूफान अभी रुका नही है, न ही शीघ्र रुकने की सम्भावना है। गरिमा को चुप कराने के बाद मौसी ने उसे शाबाशी दी। तत्पश्चात्‌ उठकर वे बाहर जाने लगी। बाहर जाते—जाते वे मुस्कुराते हुए वापिस मुड़ी और एक बार पुनः गरिमा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

बिटिया, तू अभी छोटी है। तू अभी इस बात को नही समझ सकती कि माँ के लिए बेटी—धन की रक्षा करना कितना कठिन काम है। इससे भी बड़ी आफत है जवान और कुँवारी बेटी! अन्तिम शब्दो पर अपेक्षाकृत अधिक बल देते हुए मौसी ने कहा, और पलटकर कमरे से बाहर चली गयी। बाहर निकलते हुए स्वतः ही बड़बड़ाने लगी— धीरे—धीरे दुनियादारी की सब बातो को समझने लगेगी ! अभी उम्र ही क्या है इसकी!

मौसी के कमरे से बाहर जाने के बाद गरिमा के मन—मस्तिष्क मे विचारो का तूफान तेज हो गया। वह मौसी के कहे हुए शब्दो पर विचार करने लगी— एक ओर तो मौसी जी बेटी को धन बताती है, दूसरी ओर आफत बताती है। . सभी माता—पिता अपने बेटी—धन को किसी दूसरे व्यक्ति को सौपकर अपनी आफत दूसरो के सिर डालना चाहते है ! एक बेटी की रक्षा उसके माता—पिता नही कर सकते, जो उसको जन्म देते है, उसका पालन—पोषण करते है, तो वे किसी अन्य से उसकी रक्षा करने की अपेक्षा कैसे कर सकते है। उसकी रक्षा केवल वह व्यक्ति कर सकता है, जो उसको निःस्वार्थ प्रेम करता है; जो उसे अनमोल समझता है, जैसे माता—पिता अपने बच्चो को समझते है। लेकिन, बेटी—धन ? बेटी तो ऐसा धन है, जिसे माता—पिता अनमोल तो मानते है, पर अपना नही मानते, बल्कि दूसरो की ़धरोहर मानकर उस दिन का इन्तजार करते रहते है, जब वे उस अनमोल धन— धरोहर को उसके स्वामी को सौप कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाएँगे ! और उस धन को स्वीकार करने वाला स्वामी बेटी के माता—पिता को भार—मुक्त करके उन्हे कृतार्थ कर देता है। उसके बाद वह उस धन का स्वामी बन जाता है। वह बेटी—धन अब मात्र धन, एक वस्तु बनकर रह जाती है। उसका स्वामी अपने अधिकार मे आयी हुई उस वस्तु का सदुपयोग या दुरुपयोग करने के लिए स्वतन्त्र होता है, क्योकि उस वस्तु पर अब केवल उसका अधिकार है। अब माता—पिता उसके व्यक्तिगत जीवन मे हस्तक्षेप के अधिकारी भी नही होते ! मै.....? मै, जो आज तक अपने पिताजी की लाड़ली थी, माँ के कलेजे का टुकड़ा थी ; अपने परिवार मे लक्ष्मी का रूप थी ; जिसके सुख की चिन्ता मे उसके बिना उसके परिवार मे न तो कोई भोजन करता था और न किसी को नीद आती थी। जब तक प्रत्येक सदस्य अपनी आँखो से यह नही देख लेता था कि मै स्वस्थ और प्रसन्न हूँ, तब तक परिवार का प्रत्येक सदस्य व्याकुल रहता था। आज मेरा वही परिवार मुझे भार मान रहा है और शीघ्रातिशीघ्र मेरा विवाह करके भार—मुक्त होना चाहता है। अब मै एक वस्तु—भर बनकर रह जाऊँगी, जिसकी न कोई आशा हो सकती है और न अभिलाषा ! मै क्या करुँ ?. मै ही क्यो, कोई भी लड़की क्या कर सकती है ? इस पीड़ा का अनुभव करके वह मुँह पर हाथ रखकर अपनी रुलाई को रोकने का प्रयास करने लगी, किन्तु अपने प्रयास मे सफल नही हो सकी और रोने लगी। वह बहुत देर तक आँसू बहाती रही। राते हुए वह बार—बार एक ही बात सोच रही थी और अनायास ही उसके होठ बार—बार बड़बड़ाते रहे थे— ईश्वर ने मुझे लड़की क्यो बनाया ! लड़की होना ही सब कष्टो की जड़ है। मै लड़की नही होती, तो ये समस्याएँ भी नही होती, जो आज हो रही है।

गरिमा अपने बिस्तर पर औधी लेटी हुई घटो तक रोती रही। बहुत समय तक रोते रहने के बाद अचानक उसके मस्तिष्क मे सारी समस्याओ के समाधानस्वरूप एक विचार कौध गया। वह तुरन्त ही एक झटके मे उठी और स्वगत—सम्भाषण क्रने लगी— हाँ, यही एक रास्ता है, जो मुझे सारी समस्याओ से मुक्ति दिला सकता है। मेरी मौत ही मुझे लड़की हाने के अभिशाप से मुक्त कर सकती है, अन्य कोई नही। अपना स्वगत—सम्भाषण करती हुई गरिमा ने उठकर अलमारी से एक नोटबुक निकाली और एक पैन लेकर उस नोटबुक के पन्ने उलटने—पलटने लगी। एक मिनट तक इस उपक्रम को करते रहने के पश्चात्‌ गरिमा ने एक पन्ना फाड़ लिया। वह पैन लेकर उस पन्ने पर लिखने की मुद्रा मे बैठ गयी, किन्तु यह निश्चय नही कर पा रही थी कि उस पन्ने पर क्या लिखे ? कुछ क्षणो तक वह इसी प्रकार विचार—मग्नावस्था मे बैठी रही। उसको एक—एक करके अनेक दुर्घटनाएँ याद आने लगी, जिनके विषय मे उसने कभी समाचार—पत्रो मे पढ़ा था कि अमुक स्त्री ने, अमुक पुरुष ने अथवा अमुक बच्चे ने आत्महत्या करके अपनी जीवन—लीला समाप्त कर ली। मृतक के पास से ‘सुसाइड नोट' मिला है। उसमे वे अपने परिवार वालो को पूरी तरह निर्दोष सिद्ध करते हुए आत्महत्या का कारण स्पष्ट करते है। समाचार—पत्रो मे पढे़ हुए समाचारो के अनुभव से उसने उस कागज पर लिखना आरम्भ किया—

मेरी मृत्यु के बाद मेरे परिवार के किसी सदस्य को तग न किया जाए। मै अपनी इच्छा से आत्महत्या कर रही हूँ। मै इस जीवन से तग आ गयी हूँ, क्योकि मै एक लड़की हूँ ! लड़की होना ही मेरे लिए अभिशाप है। मै इस अभिशाप के साथ अब और नही जी सकती!. माँ, पिताजी, भैया, भाभी मुझे क्षमा कर देना !

पत्र लिखकर गरिमा ने अपना दुपट्‌टा उठाया और स्टूल पर खड़ी होकर छत पर लगे पखे पर बाँधकर फाँसी का फन्दा तैयार करने लगी। कुछ ही मिनट मे फँदा तैयार हो गया। गरिमा ने अशक्त—सी दृष्टि से उस कमरे मे रखी हुई प्रत्येक वस्तु को देखा। उसने अनुभव किया कि सारी दुनिया उस कमरे की दीवारो के अन्दर सिमट गयी है, जिसमे कही किसी प्रकार का आकर्षण नही है। सम्पूर्ण जगत को आकर्षण—विहीन देखते हुए उसने निर्णायक मुद्रा मे पखे से लटकते हुए दुपट्‌टे की ओर देखा और दुपट्‌टे का फदा गर्दन मे डालते हुए बड़बड़ायी— इस दुनिया मे जीना व्यर्थ है ! इस जीवन से तो मृत्यु अच्छी है— लाख गुना अच्छी है !

जीवन की अपेक्षा मृत्यु को श्रेष्ठतर अनुभव करके मृत्यु का वरण करने की ओर अग्रसर हुई गरिमा की विचार—श्रखला अचानक तब टूट गयी, जब उसके कानो मे दरवाजे से मौसी का स्वर पड़ा। उसने अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक पखे से बँधा हुआ अपना दुपट्‌टा खोलते हुए कहा— अभी आती हूँ मौसी जी !

पखे के नीचे से स्टूल हटाकर अपने दुपट्‌टे को ओढ़ते हुए जब गरिमा ने दरवाजा खोला, मौसी प्रसन्नता से चहकती हुई—सी स्नेह—पूर्वक कह रही थी— क्या कर रही थी मेरी लाड़ली बिटिया कि मौसी को इतनी देर इन्तजार करना पड़ा ?

कु — कु — कुछ नही, बस....!

चल छोड़ ये सब ! देख तेरे मौसा जी मेरे लिए क्या लाये है! गरिमा ने देखा, मौसी जी ने अपने हाथो मे स्वर्णकगन पहने हुए है और काँच की चूड़ियो के साथ उन्हे खनखनाते हुए प्रसन्नता से झूम रही है। मौसी को प्रसन्नचित्त होकर गरिमा एक क्षण के लिए निःशब्द और भावशून्य खड़ी रही। अगले ही क्षण वह बोल उठी—

मौसी जी, दो—तीन दिन पहले की ही तो बात है, जब मौसा जी ने आपको कुछ कह दिया था और आप सारे दिन रोती रही थी। आप रोते—रोते कह रही थी कि इस आदमी ने मेरा सारा जीवन नरक बना दिया। मौत आ जाए तो इस नरक से छुटकारा मिल जाय।

हाँ, कह रही थी। मेरी लाडो, गुस्से मे कही हुई बाते सच थोड़े ही होती है। पर देख, उस दिन से मैने तेरे मौसाजी से सीधे—मुँह बात नही की थी, तभी तो आज ये कगन लेकर आये है। मुझे पता है, ये अपनी गलती मानकर ही मुझे खुश करने के लिए ये कगन लाए है !

तो क्या, आप अब मान गयी ? आपने मौसाजी को क्षमा कर दिया ?

पति—पत्नी मे ऐसी नोक—झोक होती ही रहती है, तभी तो प्यार बढ़ता है। इसमे क्षमा—वमा कैसी ! इतना कहकर मौसी स्वय मे ही खो गयी, जैसे उन्हे अपनी खोयी हुई वस्तु वापिस मिल गयी हो। गरिमा ने अनुभव किया कि इस समय उसकी मौसी को स्वर्णनिर्मित कगन की अपेक्षा अपने पति को पुनः प्राप्त करने की अधिक प्रसन्नता थी। उन्हे इस बात की अधिक प्रसन्नता थी कि उनका पति उन्हे प्रसन्न करने के लिए उपहार लेकर आया है। अपनी मौसी के हृदयगत भावो का अनुभव करके उसकी प्रसन्नता मे शामिल होना गरिमा ने अपना कर्तव्य समझा। कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए गरिमा कुछ समय के लिए अपनी व्यथा को भूलना चाहती थी और उनकी प्रसन्नता को जीना चाहती थी। वह नही चाहती थी कि उसके चेहरे पर उदासी देखकर मौसी अपने जीवन मे आये हुए उस सुखद क्षण को जीना भूल जाये। वह थोड़ी देर तक मौसी के साथ बाते करती रही। उसने प्रसन्नता से चहकती हुई मुद्रा मे कहा— आज मै आप सबके के लिए चाय बनाकर लाती हूँ !

खाली चाय !

नही, चाय के साथ पकौड़े भी बनाऊँगी ! ठीक है ?

हाँ, अब लग रहा है कि तू मेरी बेटी है ! अपने प्रति मौसी की आशामयी—वात्सल्यपूर्ण—दृष्टि देखकर गरिमा के अन्तःकरण मे आशा और निराशा का द्वन्द छिड़ गया था। वह रसोई के अन्दर चली गयी और उस अन्तर्द्वन्द से बाहर निकलने का असफल प्रयास करने लगी।

चाय—नाश्ता करने के पश्चात्‌ गरिमा पुनः अपने कमरे मे आयी और अपनी दशा पर विचार—विश्लेषण करना आरम्भ कर दिया ताकि अपने अन्तर्द्वन्द से मुक्ति पा सके। वह कुछ ही समय पूर्व लिए गये अपने निर्णय और आत्महत्या के लिए उठाये गये अपने कदम पर पुनर्विर्चार करने की मुद्रा मे बैठ गयी और आत्महत्या के निर्णय के उत्तरदायी कारणो और उसके परिणामो के विषय मे सोचने लगी—

आखिर मै क्यो मरना चाहती हूँ? इसलिए कि मै एक लड़की हूँ ? पर क्या लड़कियो को जीने का अधिकार नही है ? यदि सब लड़कियाँ मरना ही अपना लक्ष्य बना लेगी, तब क्या होगा ? आत्महत्या सघर्ष से पलायन है ! प्रतिकूल परिस्थितियो से सघर्ष करने वाला ही विजयी हो सकता है, उनसे भागने वाला नही ! जो लड़ने से पहले ही हार मान ले, उसका प्रतिपक्षी तो स्वतः ही शक्तिशाली हो जाता है। पर, मेरा प्रतिपक्षी कौन है ? वही, जो मेरी पराजय पर प्रसन्न होगा ! कौन है, जो मेरी आत्महत्या से प्रसन्न होगा ? मेरा परिवार और मेरे सभी सम्बन्धी तो बहुत दुखी होगे ! उन्हे एक ओर अपनी बेटी को खोने़ का कष्ट सालता रहेगा, दूसरी ओर समाज के ताने और उपहास ! तरह—तरह के व्यग—बाण समाज के तरकश से निकलकर मेरे परिवार को घायल करेगे ! मेरी कारण उन्हे कष्ट भोगना पड़ेगा ! मै कायर नही हूँ ! मै आत्महत्या नही करूँगी ! अपने समाज की विकृतियो से सघर्ष करने की मानसिक शक्ति मेरे परिवार मे नही है, लेकिन मुझे अपने अन्दर उस शक्ति का विकास करना होगा। मुझे समाज के अन्दर उस शक्ति का विकास करना होगा!

पर कैसे ? गरिमा के अन्तःकरण से पुनः एक प्रश्न उठा। सामाजिक विकृतियो से, प्रतिकूल परिस्थितियो से सघर्ष करके ! अपने जीवन को मूल्यवान मानकर, जिसे मै नष्ट करने जा रही थी! अपनी शक्ति का साक्षात्कार करके ! मातृ—शक्ति का साक्षात्कार करके, गरिमा ! जिस स्त्री—शक्ति की पुरुष को हर कदम पर अपेक्षा होती है आगे बढ़ने के लिए, शक्तिशाली बनने के लिए, अपने जीवन को सुखमय—शान्तिमय और रसमय बनाने के लिए ; जिस स्त्री के सम्बल की आकाक्षा प्रत्येक पुरुष को प्रतिक्षण रहती है, उसी मातृ—शक्ति का साक्षात्कार करके स्त्री के प्रति समाज की विकृत—मानसिकता मे परिवर्तन सम्भव है। गरिमा के अन्तःकरण से उत्तर मिला।

“तुम अकेली इतने बड़े समाज की मानसिकता बदल पाओगी? गरिमा का अबला—स्वरूप उभरकर उसके उत्साह मे बाधक बना।

किसी शुभ—कर्म की पहल किसी एक को ही करनी पड़ती है। शुभ—कार्य मे कभी कोई अकेला नही रहता है। हाँ, उस कार्य को सम्पन्न करने मे अनेक बाधाएँ अवश्य आती है , यह मै जानती हूँ। किन्तु मै यह भी जानती हूँ कि अपने सकल्प पर अटल रहकर दृृृढ़तापूर्वक अपने पथ पर चलने वालो की कभी पराजय नही होती। ईश्वर उनका साथ देता है और तब एक के साथ दूसरा भी आ खड़ा होता है, जो उस एक की शक्ति को द्विगुणित नही करता, बल्कि सहस्त्रगुणित कर देता है। उस समय वह दूसरा व्यक्ति एक व्यक्ति का प्रतीक नही होता है, बल्कि वह पहले व्यक्ति की उस विचार— शक्ति, दृढ़ता, और साहस के समर्थन का आरम्भ होता है, जो देखते ही देखते अदम्य—अकल्पनीय शक्ति का रूप धारण कर लेती है। लक्ष्य की ओर अग्रसर होती हुई उस शक्ति के समक्ष सभी प्रकार की विकृत मानसिकताएँ नतमस्तक हो जाती है। मुझे जीना है और उस शक्ति का सम्भल लेकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना है, जो मुझे प्रकृति ने प्रदान की है।

स्वय से तर्क—वितर्क करने के पश्चात्‌ गरिमा को अनुभव हुआ कि उसमे एक अभूतपूर्व — सकारात्मक — शक्ति का सचार होने लगा है। सकारात्मक शक्ति के सचरण से उसकी विचार—शृखला आगे बढ़ी। अब गरिमा मे अपनी प्रकृति प्रदत्त शक्ति से साक्षात्कार करके उसे विस्तार देने के लिए छटपटाहट—सी जन्म ले रही थी। तत्क्षण उसे अनुभव हुआ कि उसका प्रतिपक्ष विकृत—मानसिकता का समाज है, पुरुष मात्र नही है। यदि पुरुष और स्त्री की शक्तियाँ एक साथ मिलकर विकृतियो के विरुद्ध सघर्ष करे, तो लक्ष्य प्राप्त करना अत्यन्त सुलभ हो जायेगा। उसी समय गरिमा को उस वार्तालाप का स्मरण हुआ जब मौसी जी उससे कह रही थी— बेटी, मै तेरे मौसा जी से नाराज तो थी, पर मै...!

पर मै क्या मौसी जी ?

पर मैने गुस्से मे जो बाते कही, वे सच नही थी बेटी ! औरत और मर्द दोनो ही एक—दूसरे के बिना अधूरे है। एक—दूसरे के बिना किसी एक का कोई वजूद नही रह जाता है और दोनो एक—दूसरे के साथ रहते है, तो दुनिया की कोई भी ताकत उनके सामने टिक नही सकती है, बेटी ! मौसी द्वारा कही गयी बात का स्मरण करके गरिमा के विचार और अधिक सकारात्मक होने लगे। उसने निश्चय किया कि वह पुरुष की शक्ति का सहयोग लेकर स्त्री को शक्ति—सम्पन्न बनायेगी और उस शक्ति का उपयोग समाज की विकृतियो को समूल नष्ट करने मे सुनिश्चित करेगी। यही उसके जीवन का लक्ष्य होगा। यही उसकी प्राथमिकता होगी। अपने लक्ष्य की प्राप्ति मे आने वाली बाधाओ से घबराकर पीछे लौटना या जीवन से पलायन करना उसे स्वीकार नही है !

उज्ज्वल कल्याणमय लक्ष्य को लेकर भाँति—भाँति की सुखद कल्पनाओ से गरिमा के हृदय मे उत्साह की उमगे उठने लगी। उसके उत्साह की लहरो से निराशा का तिरोभाव हो चुका था। अब उसके मनोमस्तिष्क मे अपने विचारो को कार्य रूप मे परिणत करने की चिन्ता और लगन बढ़ रही थी। उसने घर मे रखी हुई पत्र—पत्रिकाओ और पुस्तको मे ऐसी सामग्री ढूँढना आरम्भ कर दिया, जो उसको अपने लक्ष्य—प्राप्ति का मार्ग—दर्शन कर सके और लक्ष्य को सुगम बना सके। निरतर कई दिनो तक प्रयास करके उसे अपनी अभीप्सित सामग्री मिल ही गयी। उसने सामग्री को एकत्र करके अध्ययन करना आरम्भ कर दिया।

अपने अध्ययन मे गरिमा ने एक पुस्तक मे ‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' के विचारो को पढ़ा, जिनसे वह अत्यन्त प्रभावित हुई। ‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' ने लिखा था कि स्त्री जाति को दी जाने वाली सम्पूर्ण शिक्षा (जिसमे परम्परागत उपदेश, सामाजिक नियम और मान्यताएँ भी सम्मिलित है) वह पुरुषवादी है। अपने मूलरूप मे ही भेदभाव होने के कारण यह शिक्षा स्त्री के चरित्र तथा देह को कोमल बनाती है। अपने इस उद्‌देश्य को पूरा करने के लिए स्त्री जाति को पुरुष के समान रखरखाव तथा कठोर कर्मो मे क्रियाशील होने का अवसर नही दिया जाता। ‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' ने यौनिक आधार पर पुरुष की अपेक्षा स्त्री को कमतर सिद्ध करनेवाली प्रचलित अवधारणाएँ को चुनौती देते हुए लिखा था कि आधुनिक जीव विज्ञान के अनुसार कोई मादा प्रकृति की ओर से कमजोर नही होती। उन्होने पुरुष—सोच की शिकार बनकर पुरुष—दास्ता स्वीकार करने वाली या अपने दैहिक सम्मोहन और हाव—भावो से पुरुष को दास बनाने वाली सामान्य स्त्रियो के साथ—साथ पुरुष—श्रेष्ठता को स्वीकार करने वाली विदुषी स्त्रियो की आलोचना करते हुए— मै स्पष्ट करना चाहती हूँ कि रमणीयता सदगुणो के समक्ष एक हीन वस्तु है और लिग—भेद से ऊपर उठकर मानव चरित्र का निर्माण किया जा सकता है।

‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' के विचारो को पढ़ते हुए गरिमा के चित्‌ मे अपने पारिवारिक तथा समाजिक परिवेश की वह एक—एक घटना आकार ग्रहण करने लगी, जिसमे उसने लिग—भेद के आधार पर पक्षपात का अनुभव सवेदना की गहराई तक किया था। ‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' के विचारो से गरिमा शत—प्रतिशत सहमत थी। वह अपने जीवन के लिए जिन विचारो को प्रेरणा—स्रोत के रूप मे ग्रहण कर रही थी, उनमे सर्वाधिक प्रभावशाली वह कठोर भर्त्सना थी, जिसमे ‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' अज्ञान मे डूबी हुई महिलाओ का आह्‌वान करती हुई कहती है कि जब मस्तिष्क चिन्तन—मनन अर्थात्‌ विराट सामाजिक सदर्भो को सोचने मे सक्षम नही होगा, तो निश्चित ही एक स्त्री अपनी देह को सजाने मे और गोदना गुदवाने मे अपने मूल्यवान समय का इस्तेमाल करेगी। वोल्टसन शृगार की प्रवृत्ति को, जिसे स्त्रियाँ सामान्यतः स्वाभाविक समझती है, उनके मस्तिष्क के अवरुद्ध हो जाने का कारण समझती है।

स्त्रियो की शृगार करने की प्रवृत्ति के सम्बन्ध मे वोल्टसन के विचारो को जानकर गरिमा को स्वय पर गर्व का अनुभव हो रहा था। उसके साथ की सभी लड़कियाँ सजने—सँवरने मे अपने समय तथा धन का एक बड़ा भाग खर्च करती है, लेकिन गरिमा ने कभी भी ऐसा नही किया था। उसका मनोमस्तिष्क अपनी देह को सजाने—सँवारने मे न रमता था, बल्कि स्वय को समाज का एक शक्तिशाली और हितकारी अग बनाने के प्रयास मे रुचता था। आज उसे अपनी सोच और प्रकृति पर स्वतः गर्व हो उठा। परन्तु मैरी वोल्टसन के विचार से वह स्वय को भ्रमपूर्ण स्थिति मे अनुभव कर रही थी। वोल्टसन ने लिखा था कि विवाह स्त्रियो के लिए एक कानूनी वेश्यावृत्ति है। गरिमा वोल्टसन के इस कथन को समझ नही पा रही थी कि आखिर उन्होने ऐसा क्यो कहा ? आज तक गरिमा पति—पत्नी के सम्बन्ध को सुख—दुख मे सदैव एक दूसरे को एक सूत्र मे बाँधने वाले पवित्र बन्धन के रूप मे अनुभव करती रही थी, परन्तु आज मैरी वोल्टसन ने उसके विचारो को झकझोर दिया था।

‘मैरी वोल्टसन क्राफ्ट' के विचारो से गरिमा प्रभावित और प्रेरित थी, इसलिए उनकी सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगाना कठिन हो रहा था। अपने माता—पिता तथा भाई—भाभी के विषय मे उसने कभी ऐसा नही सोचा था। परन्तु आज ?...आज वह इस विषय मे सोचने लगी थी। वह सोचने लगी कि क्या उसे विवाह नही करना चाहिए ? अपने प्रश्न से गरिमा स्वय को अत्यन्त विवश अनुभव करने लगी। अभी तक मात्र उसने यह कहा था कि वह विवाह नही करना चाहती है। उसे याद है कि परिवार के किसी भी सदस्य ने उसकी बात की अनुकूल प्रतिक्रिया नही दी थी। जब वह विवाह न करने का अपना प्रस्ताव परिवार के समक्ष रखेगी, तब क्या प्रतिक्रिया होगी उसके परिवार की ? इसकी कल्पना से ही गरिमा के हृदय की धड़कने बढ़ने लगी। वह इससे आगे कुछ सोच पाती, तभी उसके अन्दर की स्त्री का उत्तर मिला— यह कैसे सम्भव हो सकता है ? आज तक तेरे घर—परिवार मे, तेरी किसी रिश्तेदारी मे या तेरे समाज मे कोई लड़की अविवाहित रही है, जो तेरा परिवार तुझे अविवाहित रहने की अनुमति देगा ?

यही तो समस्या है ! माँ तो मुझे कब से दुल्हन के रूप मे देखने के लिए तड़प रही है। मेरे जन्म लेते ही मेरे विवाह की तैयारियाँ आरम्भ कर दी गयी थी। अपनी दुल्हन—बिटिया के लिए गहने बनवाने से लेकर दान—दहेज के लिए अनेक सामान जुटाकर घर मे सग्रह करने लगी थी। अब बेटी का विवाह न करने का निर्णय उनके प्राणा को ही ले लेगा।

माँ के विषय मे सोचते—सोचते गरिमा को अपने भाई का वह सवाद स्मरण हो आया, जो उसने उस समय कहा था, जब गरिमा अपने भाई के समक्ष अपनी अभिलाषा अभिव्यक्त कर रही थी कि वह अपने विवाह से पहले अपना कैरियर सँवारना चाहती है। उस समय गरिमा के भाई ने बड़ी विवशतापूर्ण शैली मे कहा था—

गरिमा, कैरियर सँवारने मे तो तेरे विवाह की उम्र ही निकल जायेगी ! हम इतने समय तक तेरा विवाह नही रोक सकते !

भैया, मुझे अपने विवाह से अधिक चिन्ता अपने जीवन मे कुछ ऐसा करने की है, जो समाज की उन्नति और कल्याण के लिए मील का पत्थर साबित हो। बस, इसीलिए मुझे अभी विवाह नही करना है। मेरी उम्र अब कितनी है और कैरियर बनाने मे कितनी हो जायेगी, मुझे इसकी कोई चिन्ता नही है ! गरिमा ने सहज और दृढ़ भाव से कहा।

तुझे नही है, पर हमे तो है ! तू अट्‌ठारह साल की हो चुकी है और कैरियर सँवारते—सँवारते पच्चीस—तीस साल की हो जायेगी। अरी समाज हमारे मुँह पर थूकेगा कि जवान लड़की घर मे कुँवारी बैठी है और बाप—भाई निश्चिन्त होकर उसके बूढ़े होने का इन्तजार कर रहे है। तू नही चाहती कि तेरे परिवार वाले समाज मे मान—सम्मान से सिर उठाकर जीये ! बता ! क्या ऐसा नही चाहती तू !

अपने भाई का विरोध करने की सामर्थ्य गरिमा मे न उस दिन थी, न आज है। विरोध करे भी, तो एक लड़की कैसे करे ? किसके सहारे करे ? जिस घर मे जन्म लिया, उस घर मे कोई भी उसका समर्थन करने वाला नही है। सभी उसकी बात को अनुचित सिद्ध करने वाले है ! अपने परिवार के अतिरिक्त उसके पास ऐसी कोई शक्ति भी नही है, जिससे वह अपनी बात पर अडिग रह सके ! वह आर्थिक रूप से भी तो आत्मनिर्भर नही है, अपना पेट भरने के लिए आज अपने पिता और भाई पर निर्भर है तथा कल पति पर निर्भर हो जायेगी ! पेट के अतिरिक्त समाज मे सुरक्षा का भी प्रश्न महत्वपूर्ण है ! समाज मे कदम—कदम पर नर भेड़िये बैठे है, उनसे सुरक्षा के लिए भी परिवार का साथ आवश्यक है ! सुरक्षा की समस्या के समाधान के लिए विवाह करना ही बेहतर और एकमात्र विकल्प है, क्योकि पिता उसे जीवन—भर सुरक्षा प्रदान नही कर सकते ; भाई इस दायित्व को लेने के लिए तैयार नही है। ऐसी परिस्थिति मे एक लड़की के पास विवाह करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प बचता है ? ... नही ! जीने के लिए, सुरक्षा के लिए और अपने अर्थहीन सपनो के साकार करने के लिए उसे विवाह करना ही पड़ता है ! उसे भी करना पड़ेगा, किन्तु अर्थहीन सपनो को साकार करने के लिए नही, अपितु अपने सार्थक और उच्च लक्ष्य को पूरा करने के लिए।

एक लड़की की विवाह—सम्बन्धी अनेक समस्याओ—विवशताओ तथा विकल्पो के विषय मे चिन्तन—मनन करती हुई गरिमा अन्त मे इसी निष्कर्ष पर पहुँची कि अपनी परिस्थितियो को ध्यान मे रखते हुए उसके लिए वही उचित है, जो उसके पिता चाहते है। ऐसा करके वह न केवल अपने परिवार को प्रसन्न और सन्तुष्ट रख सकती है, बल्कि भविष्य के लिए अपनी शक्ति—सामर्थ्य मे वृद्धि भी कर सकती है। इसके विपरीत ऐसा न करने पर उसके परिवार का सुख—सन्तोष खतरे मे पड़ सकता है। साथ ही वह स्वय भी दुर्गम समस्याओ मे घिर जाएगी और अपने लक्ष्य से छिटक जाएगी।

पर्याप्त समय तक गरिमा ने सोच—विचारकर निश्चय किया कि वह अपने पिता की इच्छानुरूप उनके चयनित वर के साथ विवाह करेगी और अपने जीवन को सार्थक बनाने की दिशा मे प्रयत्नशील रहेगी। उसने यह भी निश्चय किया कि भले ही उसकी औपचारिक शिक्षा सम्पन्न न हो सकी, परन्तु वह अनौपचारिक रूप से ज्ञानार्जन के लिए निरन्तर अध्ययन करती रहेगी। उसने अपने निश्चय को शब्द—रूप मे ढालते हुए एक बार पुनः सकल्प किया— ज्ञानार्जन की कोई आयु—सीमा नही होती और अपने अनुभवो तथा स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान किसी शिक्षण—सस्था के औपचारिक प्रमाण—पत्र का मोहताज नही होता और न ही औपचारिक शिक्षा से कमतर होता है।

अपने सकल्प के साथ ही गरिमा पूर्णतः प्रकृतिस्थ हो गयी। वह घर के काम मे मौसी का हाथ बँटाने लगी। गरिमा को इस नये रूप मे देखकर उसकी मौसी आश्चर्यचकित थी। उन्होने प्रकटतः कुछ नही कहा, किन्तु घर मे बने मन्दिर मे जाकर तुरन्त ही ईश्वर का धन्यवाद करने लगी— हे प्रभु ! तेरी शक्ति अपरमपार है ! ऐसा चमत्कार तू ही कर सकता है। हे ईश्वर ! तेरी लीला को आज तक कोई नही समझ सका ! बस, ऐसे ही हमारे बच्चो पर अपनी कृपा—दृष्टि बनाए रखना !

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Jyoti 4 महीना पहले

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Shobhna 5 महीना पहले

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Amita Saxena 5 महीना पहले

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Brijesh mendapara 5 महीना पहले

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Jaishree Dayani 6 महीना पहले