दहलीज़ के पार - 9

दहलीज़ के पार

डॉ. कविता त्यागी

(9)

सास की मृदु वाणी मे प्रभा के परिवार का इतिहास सुनकर गरिमा की जिज्ञासा और अधिक बढ़ गयी थी। वह प्रभा के परिवार क इतिहास विस्तार से सुनना चाहती थी ताकि अपने समाज की विकृत व्यवस्था को समझ सके। अतः आशुतोष के घर लौटने पर उसने प्रभा का प्रसग आरम्भ किया। गरिमा से प्रभा के परिवार के विषय मे गरिमा की जिज्ञासा से आशुतोष हत्‌चेतन—सा हो गया था, परन्तु शीघ्र ही उसने स्वय को सम्हाल लिया। उसने प्रभा के परिवार का इतिहास बताने के लिए गरिमा के आग्रह को टालने का अनेक बार प्रयास किया। वह इतिहास की उन बातो को नही दोहराना चाहता था, जो उसके पूर्वजो के चरित्र पर प्रश्नचिह्‌न लगाती थी। परन्तु, गरिमा आग्रह पर अटल थी। अन्त मे गरिमा के पति आशुतोष ने उसका आग्रह मानकर इतिहास के उस छोटे से अश का वृत्तान्त सुनाना स्वीकार कर लिया, जो प्रभा के तथा स्वय आशुतोष के परिवार मे समानताओ—असमानताओ का साक्षी था और जो विकृत सामाजिक व्यवस्था के चलते किसी भी प्रकार से स्वर्णिम नही कहा जा सकता था। आशुतोष ने गरिमा को बताया—

बनवारी का पिता गाँव का एक छोटा—सा किसान था। जब बनवारी पाँच वर्ष का था, तभी उसकी माँ का देहान्त हो गया। माँ की कमी को पिता ने पूरा करने का पर्याप्त प्रयास किया था, किन्तु घर मे एक स्त्री का अभाव उसके पिता तथा बड़े भाईयो सहित उसको भी खलता था। पिता उनकी मूलभूत आवश्यकताओ को तो पूरा कर देते थे, लेकिन जब किसी उत्सव—पर्व के अवसर पर पड़ोसियो के घर से मिष्ठान—पकवान की सुगन्ध आती थी, तभी उनका मन—मस्तिष्क चचल हो उठता था— काश ! हमारे घर मे भी एक स्त्री होती, तो प्रतिदिन घर के सारे काम करके घर को व्यवस्थित भी रखती और हर दिन नये—नये स्वादिष्ट व्यजन भी बनाकर खिलाया करती ! इस विचार से प्रेरित होकर बनवारी के पिता ने बनवारी के बड़े भाई का विवाह कर दिया। जिस समय बनवारी के बड़े भाई का विवाह हुआ था, उस समय बनवारी लगभग दस वर्ष का था। घर मे लक्ष्मी का आगमन होते ही आँगन मे चहल—पहल रहने लगी। सबको स्वादिष्ट भोजन मिलने लगा और घर मे साफ—सफाई का वातावरण बन गया। बनवारी अपनी भाभी को माँ का—सा सम्मान देता था। हर समय इस बात का ध्यान रखता था कि घर मे उसकी भाभी को किसी प्रकार का अभाव या तनाव न हो। घर मे आवश्यकता के अनुसार प्रत्येक वस्तु यथोचित समय पर उपलब्ध करायी जा सके, इसके लिए वह दिन—रात चिन्ता किया करता था।

घर मे लक्ष्मी को आये हुए मात्र छः महीने बीते थे, तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी। एक दिन बनवारी के परिवार की आवश्यकता के विषय मे सोच—विचार किये बिना लक्ष्मी के भाई आये और अपनी बहन को अपने साथ लेकर चले गये। बनवारी के पिता तथा भाई ने बहू को रोकने का भरसक प्रयास किया, किन्तु रोक नही पाये। उसके भाईयो का आरोप था कि बेटे का विवाह करने से पहले बनवारी के पिता ने वचन दिया था कि वे अपनी बेटी का विवाह बहू के भाई के साथ करेगे। अपने बेटे का विवाह सम्पन्न करके अब वे अपने दिये हुए वचन को भूल गये है और बदला देने से मुकर रहे है। बनवारी के पिता ने उन्हे समझाने का बहुत प्रयास किया कि वे अपने दिये हुए वचन से पीछे नही हट रहे है ; बल्कि अभी उनकी बेटी अल्पायु के कारण अपरिपक्व है, इसलिए विवाह मे विलम्ब कर रहे है। एक वर्ष पश्चात बेटी तन—मन से परिपक्व हो जायेगी, तब वे बहू के भाई के साथ उसका विवाह सम्पन्न करा देगे। बहू के भाई उनकी इस दलील पर विश्वास करने के पक्ष मे नही थे। उनका तर्क था कि यदि आज वे अपनी बहन को छोड़कर चले गये, तो ऐसा करके वे स्वय अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मार लेगे। क्योकि यदि एक बार उनकी बहन गर्भवती हो गयी, तब ससुराल मे रहना उसकी विवशता हो जाएगी। ऐसी स्थिति मे उसकी ससुराल वाले अपने वचन पर खरे उतरेगे और अपनी बेटी का विवाह बहू के भाई के साथ करायेगे, यह विश्वास करना बुद्धिमानी नही है। इसलिए जब तक उनकी बेटी विवाह योग्य नही हो जाती, तब तक वे अपनी बहू को घर मे नही रख सकते। अपने निर्णय को कड़क आवाज मे दोहराकर चलते—चलते बहू के भाईयो ने कहा था— मौस्सा ! जब थारी बेट्‌टी जुवाण हो जावै, जब आ जाय्यो अर ब्याह की तारीख पक्की करकै अपणे घर की लछमी कू लियायो !

घर की बहू पति के घर से विदा होकर अपने पिता के घर चली गयी। बनवारी के घर मे पुनः वही स्थिति उत्पन्न हो गयी— समय—बेसमय बेस्वाद भोजन, घर मे साफ—सफाई की कमी। एक वर्ष तक पूरा परिवार उस दिन की प्रतीक्षा करता रहा, जिस शुभ घड़ी मे उनके घर की लक्ष्मी का उस घर मे प्रवेश होगा। शीघ्र ही प्रतीक्षा का एक वर्ष पूरा हो गया। इस वर्ष बनवारी की बहन ने अपने जीवन के तेरह वर्ष पूरे करके चौदहवे वर्ष मे पदार्पण किया था और उसी दिन पिता ने घर मे बहू लाने के लिए अपना वचन पालन करने की दिशा मे पहला कदम उठाया था। बनवारी के पिता ने पडित को बुलाकर शुभ लग्न—मुहुर्त निकलवाया, अपने कुटुम्ब—परिवार पास—पड़ोस के चार—छः लोगो को बुलवाया और उनको साक्षी बनाकर अपना बड़ा बेटा बहन के सन्देश के साथ बहू को लेने के लिए भेज दिया।

विवाह का सन्देश पाकर बहू के पीहर मे प्रसन्नता की लहर आ गयी। अपनी बेटी को उसके पति के साथ ससुराल भेजने मे अब किसी प्रकार का शक—सन्देह नही रह गया था, इसलिए शुभआशीष देकर उन्होने अपनी बेटी को विदा कर दिया और बनवारी को पुनः एक बार फिर भाभी के रूप मे माँ मिल गयी थी। दूसरी ओर घर मे उसकी बहन के विवाह की तैयारी होने लगी और मगलगीत गाये जाने लगे। शीघ्र ही वह दिन आ गया, जब बनवारी की गुड़िया जैसी बहन विदा होकर अपनी ससुराल चली गयी।

बनवारी के घर मे एक बार फिर सुख—सम्पन्नता की देवी का वास हो गया था। ग्यारह वर्ष का बनवारी घर के सुख—साधनो की चिन्ता करने मे वयोवृद्ध की भूमिका निवाहने मे रुचि लेता था, तो घर मे सबसे छोटा होने के कारण सबके स्नेह का केन्द्र था। छः वर्ष तक बनवारी के घर मे सुख—शान्ति अपने भव्य रूप मे विराजमान रही और उस समयान्तराल मे बनवारी को ससार के कष्टो का कुछ ज्ञान न हो पाया था। परन्तु यह सुखमयी दशा लम्बे समय तक स्थिर न रह सकी। बनवारी के पिता मात्र छः वर्ष ही पुत्रवधू की सेवा का सुख भोगकर अचानक एक दिन स्वर्ग सिधार गये। गाँव मे किसी प्रशिक्षित डॉक्टर के अभाव से लोगो को मृत्यु का वास्तविक कारण भी ज्ञात न हो सका। गाँव मे रहने वाले एक वयोवृद्ध व्यक्ति ने बनवारी के पिता की कलाई अपने हाथ मे पकडकर मात्र इतना बताया था कि नाड़ी के रुक जाने से मृत्यु हुई है।

पिता की मृत्यु हो जाने के पश्चात्‌ बनवारी और उसका बड़ा भाई मानो अनाथ और बेघर हो गये। उसके बड़े विवाहित भाई ने उन दोनो अविवाहित भाइयो से जमीन—जायदाद का बँटवारा करके उन्हे अपने अस्तित्व से अलग कर दिया। जिस कमी को पूरा करने के लिए पिता ने बेटे का विवाह किया था, वही कमी उसके जीवन मे फिर आ गयी। जब तक बनवारी की आयु सत्रह वर्ष की तथा दूसरे भाई की आयु बाइस वर्ष की हो चुकी थी, किन्तु पिता तथा बड़े भाई की छत्रछाया मे आज तक उन्होने अपने अस्तित्व का अनुभव ही नही किया था। किन्तु आज समय के प्रवाह ने उनके अस्तित्व की आवश्यकता का अनुभव करा दिया था। पिता की मृत्यु तथा बड़े भाई के अलगाव ने उन्हे सिखाया था कि ससार मे जीने के लिए अपना अस्तित्व तथा उसकी पहचान बहुत जरुरी है। दोनो भाईयाेे की जीवन शैली अब उसी रूप को ग्रहण कर चुकी थी, जिस रूप मे सात वर्ष पहले वे पिता के साथ जीवन—यापन करते थे। आज अन्तर केवल इतना था कि उस समय चारो बहन—भाईयो के ऊपर उसके पिता का स्नेह—छत्र होता था और आज बनवारी अकेला था, जिसके ऊपर उसके बड़े अविवाहित भाई का स्नेह था। वह हर सम्भव प्रयास करता था कि बनवारी को पिता का अभाव कष्टकारक न लगे। तीन—चार वर्ष इसी प्रकार बीत गये। इन वर्षो मे दोनो भाईयो ने अपनी सामर्थ्य—भर प्रयास किया कि बड़े भाई का विवाह हो जाए, किन्तु यह सम्भव न हो सका। दोनो भाईयो के भाग मे इतनी जमीन—जायदाद न आयी थी कि उनकी गणना गाँव के सपन्न किसानो मे की जा सकती। उनकी खेती—किसानी से इतनी ही आमदनी हो पाती थी कि खाने—पहनने—भर का गुजारा हो सके। इस दशा मे कोई भी पिता अपनी बेटी उन्हे देने के लिए कैसे तैयार हो सकता था ? इन दोनो भाईयो की क्या कहे, उस परिवार मे तो उस समय भी कोई पिता अपनी बेटी देने को तैयार नही था, जब बनवारी के पिता जीवित थे और सपत्ति का बँटवारा नही हुआ था। इसीलिए उसके पिता को अपने बड़े बेटे का विवाह करने के लिए बदले मे अपनी बेटी का विवाह बहू के भाई के साथ करना पड़ा था। अब तो उनकी स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक बिगड़ गयी थी। आज उनके पास कोई बहन भी नही थी, जिसके बदले मे भाई का घर बसाया जा सके, न ही इतनी धन—सम्पदा थी, जिसके बलबूते पर घर मे दूल्हन का प्रवेश सम्भव हो सके।

समस्या विकट थी, किन्तु उसका समाधान नही सूझ रहा था। अपने बड़े भाई को चिन्ता मे डूबा हुआ देखकर बनवारी को कष्ट होता था। एक दिन बनवारी की भेट पड़ोस के गाँव मे रहने वाले एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जो कई वर्ष पूर्व सेना मे भर्ती हो गया था। सेना मे उसका कार्य एक चालक का था, जो सेना तथा उसके उपयोग की सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने वाली गाडियो को चलाता था। बनवारी ने आग्रह किया कि वह उसको भी गाड़ी चलाना सिखा दे और अपने अधिकारी से प्रार्थना करके सेना मे भर्ती करा दे।

पड़ोसी गाँव के व्यक्ति ने बनवारी का आग्रह स्वीकार कर लिया और कुछ दिन मे ही उसको एक कुशल चालक बना दिया। अपने इसी गुण के आधार पर बनवारी सेना मे भर्ती होने मे सफल हो गया। बनवारी कर्मठ था, ईमानदार था, अपनो के प्रति प्रेम—त्याग जैसे उदात्त भावो से परिपूर्ण था, चाहे वे अपने मित्र हो या परिवार के सदस्य हो। वह सभी के साथ विनम्रतापूर्वक मधुर व्यवहार करता था। अपने इन गुणो से वह शीघ्र ही सबका विश्वासपात्र और प्रिय बन गया था। वह मितव्ययी था, किन्तु दूसरो की आवश्यकता के समय वह तन—मन—धन से सदैव तैयार रहता था। यही उसका स्वभाव था और सेना मे लगभग ढाई वर्ष नौकरी करने के पश्चात्‌ उसके इस स्वभाव की परीक्षा का समय आ गया। इस समय मे उसके सभी गुणो की सीमा और सामर्थ्य की परीक्षा का सुफल भी छुपा हुआ था, जिसका अनुमान कोई नही कर सकता था।

उस दिन बनवारी के सहचालक को सीने मे अचानक तीव्र पीड़ा होने लगी। उसका सहचालक छज्जूसिह पीड़ा के कारण बोल भी नही पा रहा था। बनवारी को निश्चित रूप से यह ज्ञात नही था कि छज्जूसिह को क्या कष्ट है। वह मात्र अनुमान लगा सकता था कि छज्जूसिह के सीने मे पीड़ा है, क्योकि छज्जूसिह बार—बार सीने पर हाथ रखकर सीने को दबा रहा था। उसको पसीना बह रहा था और लम्बी—लम्बी साँस ले रहा था। उस समय बनवारी कुछ क्षणो तक सोचता रहा कि क्या किया जाए। कुछ क्षणोपरान्त उसने समय की आवश्यकता को समझते हुए छजजूसिह को अस्पताल मे ले जाकर भर्ती करा दिया। वहाँ पर उसकी जाँच करने पर पता चला कि उसको हृदयाघात हुआ है और शीघ्र चिकित्सा—सुविधा मिलने के कारण उसके प्राण बच सके है, वरना, अब तक उसका स्वर्गवास हो चुका होता। छज्जू के प्राण तो बच गये थे, किन्तु उसकी नौकरी उसी समय चली गयी थी, जिस समय उसको हृदयाघात हुआ था। डॉक्टर ने उसको पूर्ण अवकाश लेने का परामर्श दिया था।

नौकरी चले जाने से छज्जूसिह की आय का स्रोत बिलकुल बन्द हो गया था, जबकि, बीमारी के चलते व्यय बढ़ गया था। जब तक वह बीमारी की अवस्था मे अस्पताल मे रहा था, बनवारी काम से छुट्‌टी मिलने के पश्चात्‌ नित्य ही उसके पास जाता था और पूरे मन से उसकी सेवा सुश्रूषा करता था। अस्पताल से छुट्‌टी मिलने के पश्चात्‌ बनवारी उसे अपने निवास पर ले आया और उसकी दवाई और खाने पीने का भली—भाँति ध्यान रखता था। अब तक छज्जूसिह का धन समाप्त हो चुका था। बनवारी अपने कमाये हुए धन से उसकी देखरेख कर रहा था। अपनी इस स्थिति से छज्जूसिह बहुत तनाव मे रहने लगा था। उसको अपनी चिन्ता अधिक नही थी। चिन्ता थी, तो अपनी बेटी की तथा अपनी माँ की।

छज्जू सिह की एक बेटी थी सिया। सिया को जन्म देते ही उसकी माँ का स्वर्गवास हो गया था। तभी से उस बच्ची सिया का पालन—पोषण करने का दायित्व उसकी दादी पर आ पड़ा था। छज्जूसिह अपनी बेटी को बहुत स्नेह करता था, इसलिए उसने अपना शेष जीवन अकेले ही व्यतीत करने का निश्चय किया और सेना मे भर्ती हो गया था। वह नही चाहता था कि अपनी भूख को तृप्त करने के लिए अपनी बेटी को सौतेली माँ का दुख दे। क्योकि अपनी माँ से उसने अपने बचपन मे अनेक ऐसी लोककथाएँ सुनी थी, जो सौतेली माँ के अत्याचारो का पटाक्षेप करती थी। उन कथाओ को सुनकर छज्जूसिह का हृदय हिल जाता था। तभी से ‘सौतेली माँ' शब्द से उसको घृणा—सी हो गयी थी। उस घृणित शब्द से वह अपनी बेटी का सम्बन्ध जोड़ना कैसे स्वीकार कर सकता है ? अपनी बेटी के प्रति छज्जूसिह का स्नेह इतना प्रबल था कि अपनी नौकरी से प्राप्त धन का एक बड़ा भाग घर भिजवाता रहा था, ताकि उसकी बेटी का पालन—पोषण भली प्रकार से हो सके और वह पढ़—लिख सके। वह स्वय उस धन के अल्पाश से अपनी जीविका चलाता था। वह इसी चिन्ता से तनावग्रस्त रहने लगा था कि उसकी बेटी और माँ का गुजारा कैसे हो पायेगा ? वह बेटी का विवाह कैसे कर पायेगा ? जबकि उसकी आय का स्रोत ही बन्द हो चुका है।

कुछ समय पश्चात्‌ डॉक्टर ने बताया कि कि वह स्वस्थ हो गया है, लेकिन कुछ दवाईयाँ निरन्तर लेते रहना होगा, ताकि भविष्य मे होने वाले खतरे की सम्भावनाओ को किसी सीमा तक कम किया जा सके। डॉक्टर के परामर्श से बनवारी ने अधिकारपूर्वक छज्जूसिह के लिए दवाईयाँ खरीदी और उसे उसके गाँव भेज दिया।

छज्जूसिह को उसके गाँव भेजने के पश्चात्‌ बनवारी पुनः अपना सारा ध्यान अपने काम मे लगाने लगा, किन्तु उसका मन—मस्तिष्क प्रायः छज्जूसिह की याद मे भटकता रहता था। एक दिन उसने निश्चय किया कि वह अपने अधिकारी से छुट्‌टी लेने के लिए प्रार्थना करेगा और छज्जूसिह के गाँव जाकर उसकी कुशल—क्षेम लेगा। अधिकारी उसकी कर्मठता से तथा उसके व्यवहारो से अति प्रसन्न रहता था। उसने बनवारी का निवेदन तत्काल मानते हुए उसको पन्द्रह दिन की छुट्‌टी दे दी। छुट्‌टी की प्रार्थना स्वीकार हो जाने पर बनवारी बहुत प्रसन्न था। उसने उसी समय छज्जूसिह के गाँव के लिए प्रस्थान कर दिया और अपना कमाया हुआ सारा धन अपने साथ ले लिया, जो कुछ अब तक की बचत करके सग्रहित हो सका था।

बनवारी जब छज्जूसिह के घर उसके गाँव पहुँचा, उसका परिवार बनवारी को देखकर प्रसन्नता से झूम उठा। छज्जूसिह ने और उसके परिवार ने बनवारी का स्वागत ऐसा किया, जैसे की उसने कभी कल्पना भी नही की थी। सिया ने स्वादिष्ट व्यजन बनाये तथा उसकी दादी ने अपने निकट बिठाकर खिलाये, तो बनवारी भाव—विह्‌वल हो गया। अब तक वह माँ के स्नेह को भूल—सा गया था, किन्तु छज्जूसिह की माँ ने उसके हृदय मे माँ के लिए उसकी तड़प को फिर से जाग्रत कर दिया था। उसकी इच्छा होने लगी थी कि जीवन—भर छज्जूसिह की माँ को अपनी माँ बनाकर अपने साथ रखे। उसको ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जो माँ उसको बचपन मे पिता को सौपकर स्वर्ग सिधार गयी थी, आज वही माँ नये रूप मे उसे छज्जूसिह के घर मिल गयी है। परन्तु अपनी इच्छा को वह प्रकट नही कर सका। उसके मस्तिष्क मे बार—बार एक प्रश्न उठने लगा— क्या यह सम्भव है कि छज्जूसिह की माँ का स्नेह मुझे भविष्य मे भी मिलता रहे ? पर कैसे?

दिन—भर छज्जूसिह की माँ बनवारी से बाते करती रही और बार—बार उसका आभार प्रकट करती रही कि उसने समय पर उनके बेटे को अस्पताल मे पहुँचाकर उसके प्राणो की रक्षा की, इसलिए वह उस परिवार के लिए भगवान—स्वरूप है। बातो—ही—बातो मे उन्होने बनवारी के घर की जानकारी प्राप्त भी कर ली थी, यथा— घर मे कौन—कौन है ? घर की आर्थिक स्थिति कैसी है ? अभी तक उसका विवाह हो चुका है या नही ? उसके परिवार के सम्बन्ध मे सभी बाते ज्ञात करने के पश्चात्‌ रात का खाना खाते समय छज्जूसिह और उसकी माँ ने बनवारी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह उनकी बेटी सिया के साथ विवाह करना स्वीकार कर ले, तो दोनो परिवारो की समस्या का समाधान हो जाएगा। सकोचवश बनवारी उस प्रस्ताव पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नही दे सका। उसके सकोच को छज्जूसिह और उसकी माँ नकारात्मक उत्तर का सकेत मानकर उसके पैरो पर गिर पड़े और प्रार्थना करने लगे कि उनकी बेटी सिया को स्वीकार करके वह उन्हे नया जीवन प्रदान कर सकता है। यदि वह सिया का जीवन—साथी बनेगा, तो वे चिन्तामुक्त हो सकते है, क्योकि उनकी बेटी के लिए योग्य वर बनवारी के अतिरिक्त अन्य कोई हो ही नही सकता।

छज्जूसिह और उसकी माँ के निवेदन और आग्रह से गद्‌गद्‌ होकर बनवारी मे अपने भाव प्रकट करने का थोड़ा—सा साहस आ गया। उसने दोनो हाथ जोड़कर उनका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए निवेदन किया कि अब उसके विवाह के विषय मे शेष सभी बाते उसके भाई के साथ कर ली जाएँगी, तो अपेक्षाकृत अधिक व्यवहारिक रहेगा। छज्जूसिह तथा उसकी माँ बनवारी की इस बात से सहमत हो गये। अगले दिन बनवारी को अपने साथ लेकर छज्जूसिह ने उसके गाँव के लिए प्रस्थान किया और एक सप्ताह मे उसे तथा उसके भाई को लेकर वापिस अपने गाँव लौट आया। उसी सप्ताह मे छज्जूसिह की माँ ने सिया और बनवारी के विवाह की तैयारियाँ कर ली थी। वहाँ से लौटते ही छजजूसिह ने समाज के समक्ष बेटी के विवाह की औपचारिकता पूरी करके अपनी बेटी को उसकी ससुराल के लिए विदा कर दिया। अभी बनवारी की छः दिन की छुटि्‌टयाँ शेष थी। छः दिन पश्चात्‌ उसको पुनः नौकरी पर जाना था।

पन्द्रह दिन की छुटि्‌टयो मे से छः दिन बनवारी ने अपने घर मे बिताये। ये छः दिन उसके जीवन के वे स्वर्णिम दिन थे, जिन्हे वह अपने जीवन मे कभी नही भुला सकता था। छः दिन कब गुजर गये किसी को पता ही नही चला और वह क्षण आ गया, जब उसे अपनी प्रिय पत्नी सिया को तथा भाई को छोड़कर पुनः नौकरी पर जाना था। भाई से दूर तो वह पहले भी जा चुका था, परन्तु सिया का प्रेम उसको बार—बार रोक रहा था कि वह उसे छोड़कर न जाए ! अन्त मे जब बनवारी जाने लगा, तब उसके भाई ने उससे कहा—

बन्ने ! तेरे बिना बहू घर मे अकेल्ली कैसे रहवेगी ? समाज—बिरादरी मे यू किसी कू जाणती नी अर मै दिन—भर जगल मै रह्‌वाँ ! मै सोच रा ऊँ इसै इसके घर भेज देवै ! जब तुझे दो—चार दिन की छुट्‌टी मिलै, वही मिल—मिलाके चला जाया कर्‌यो !

भाई, यू य्‌हाँ रहवेगी, तो थारी रोट्‌टी तो सेक देवेगी ! अरै, मै रोट्‌टी—वोट्‌टी अपणे—आप सेक ल्यूवाँ ! छः—सात

साल से मै अपणे आप न सेकरा ऊँ !

ठीक है ! मै छज्जूसिह कू खत लिखकै कह द्‌यूवाँ, इसे ले जावैगे !

खत—वत लिखकै कहणे की कुछ जरुरत ना है। बहू कू कह दे, तैयार हो जावै, मै अभी छोड़याऊँवाँ !

अपने भाई की आज्ञा से बनवारी ने सिया को तैयार करा दिया और उसी दिन सिया अपने पिता के घर तथा बनवारी अपनी नौकरी पर चला गया। तीन महीने के पश्चात्‌ बनवारी को छजजूसिह का पत्र मिला, जिसमे उसको सूचना दी गयी थी कि सिया माँ बनने वाली है। इस सूचना को पढ़कर बनवारी की प्रसन्नता की कोई सीमा नही थी। अपनी प्रसन्नता को वह अपने परिवार के साथ बाँटना चाहता था, इसलिए उसने अपने अधिकारी से पुनः दो महीने की छुट्‌टी माँगी। पहले तो अधिकारी ने उसको छुट्‌टी देने से मना कर दिया था किन्तु बनवारी के बार—बार निवेदन करने पर तथा यह बताने पर कि पिछले तीन वर्षो मे उसने एक दिन की भी छुट्‌टी नही ली थी, यहाँ तक कि उसने अपने विवाह के लिए भी अतिरिक्त छुटि्‌टयाँ नही माँगी थी, अधिकारी का हृदय पिघल गया और उसके लिए दो महीने की छुटि्‌टयाँ स्वीकार कर ली।

छुटि्‌टयाँ स्वीकृत होते ही बनवारी सीधा ससुराल पहुँचा। दो दिन वह वही पर रुका, तीसरे दिन अपनी पत्नी सिया को लेकर अपने घर के लिए चल पड़ा था। अचानक बनवारी को सिया के साथ आया देखकर उसके भाई को अपनी आँखो पर विश्वास नही हो रहा था और जब बनवारी ने भाई को यह शुभ—समाचार सुनाया कि सिया माँ बनने वाली है, तब तो उसका भाई नाच—नाचकर चिल्लाने लगा कि वह ताऊ बनने वाला है। इस शुभ—सूचना को वह घर—घर जाकर देने लगा, किन्तु अपने समाज—बिरादरी से अपने मन के अनुरूप प्रतिक्रिया न पा सका, क्योकि बिरादरी तो उनसे तभी से कुपित थी, जब वे गैर—बिरादरी की लड़की को ब्याहकर अपने घर मे लाये थे। तभी समाज—बिरादरी के स्त्री—पुरुषो ने उनसे नाता तोड़ लिया था। किन्तु, उन दानो भाईयो ने उस समय इस विषय पर अधिक ध्यान नही दिया था। उस समय उन्होने केवल सिया पर ध्यान दिया था, जो उनके घर की लक्ष्मी थी, सुशील थी, सुन्दर थी और पढ़ी—लिखी थी। समाज उनके लिए तभी महत्वहीन हो गया था, जब सिया का उनके घर मे प्रवेश हुआ था। बनवारी के भाई ने समाज द्वारा उसके विवाह का विरोध करने पर उत्तर दिया था— जब कहाँ हा यू समाज जब दोन्नो भैया चुल्हे मै अपणी डाढ़ी—मूँछ फुँकवारे हे ? इसका ब्याह समाज अपणी बिरादरी मै सै करवा देत्ता, तो हम दूसरी बिरादरी मै सै क्यूँ ब्याह कै ल्यात्ते ?

अब, जबकि बनवारी के घर मे एक नन्हा—सा मेहमान आने वाला था ; उसके परिवार का विस्तार होने जा रहा था और उसकी गृहस्थी को स्थायित्व मिल चुका था, उन दोनो भाईयो को समाज की महत्ता का अनुभव हो रहा था। अब वे समाज मे घुल—मिलकर रहने के लिए तड़प रहे थे, परन्तु निष्ठुर सवेदनाहीन समाज—बिरादरी उनको इस सुख से वचित करके आनद—उल्लास मे मग्न था। यहाँ तक कि उनका अपना भाई भी उनके विरुद्ध खड़ा होकर दुष्प्रचार कर रहा था। वह स्वय को अपने कुल का नाम चमकाने वाला सच्चरित्र घोषित करके पूरे समाज मे कहता—फिरता था कि बनवारी ने खानदान की इज्जत मिट्‌टी मे मिला दी है और समाज मे बड़े भाई की नाक कटवा दी है। बनवारी को पूरे समाज के विरोध से इतना दुख नही हुआ था, जितना अपने ही भाई के विरोध से हुआ था। अपनी इस व्यथा को लेकर वह कई बार भाई के पास गया था कि यदि वह कुछ सहायता नही करना चाहता है, तो ना करे, कम—से—कम विरोध तो न करे। बनवारी ने अपने भाई को चेताया भी था कि यदि वह अपने भाईयो के साथ पूरे समाज तथा बिरादरी जैसा व्यवहार करेगा, तो अपने भाई और शेष समाज मे अन्तर नही रह जाएगा। किन्तु उसने बनवारी को स्पष्ट शब्दो मे कह दिया कि वह उसको इस कुकृत्य के लिए कभी क्षमा नही करेगा, क्योकि गैर—बिरादरी की लड़की को घर मे बिठाकर उसने अपने भतीजो का हक मारा है। यदि वह उस लड़की के साथ विवाह न करता, तो उनकी जमीन—जायदाद पर उनके भतीजो का अधिकार होता। साथ ही उनका अपनी बिरादरी मे ही विवाह—सम्बन्ध बनना सम्भव था, किन्तु चाचा का विवाह गैर—बिरादरी मे होने से उनका विवाह बिरादरी की लड़की के साथ करना कठिन हो जाएगा।

बनवारी की पत्नी को जब पता चला कि समाज के साथ—साथ उसके पति का भाई भी उनके विवाह के विरुद्ध है और उसके पति पर अनेकानेक आरोप लगा रहा है, तब उसने मोर्चा सम्हाला और जिठानी को एक—एक आरोप का करारा उत्तर देकर उसका मुँह बन्द करा दिया। सिया ने अपनी जिठानी से कहा कि बनवारी ने किसी का हक छीनने के लिए विवाह नही किया है, बल्कि अपने हक को बचाने के लिए विवाह किया है। अपने जीवन को सुखी बनाने का तथा अपने पिता की सम्पत्ति मे से अपने भाग का उपयोग करने का उसे पूरा हक है। इसके विपरीत स्वय उसका बड़ा भाई अपने दोनो छोटे भाईयो का हक हड़पना चाहता था, इसीलिए वह अपने छोटे भाई का विरोध कर रहा है। अपने तर्को से सिया ने जिठानी का मुँह तो बन्द कर दिया था, किन्तु समाज और बिरादरी मे घुलना—मिलना टेढ़ी—खीर हो गयी थी। सामाजिक व्यवस्था इतनी रूढ़ और कठोर थी कि उसके नियमो मे परिवर्तन करना भी आसान नही था। समाज की व्यवस्था के अनुसार बनवारी के पास केवल दो ही विकल्प थे— अपने बिरादरी—समाज को चुन ले अथवा गैर—बिरादरी की लड़की सिया को चुनकर अपने बिरादरी—समाज से बहिष्कृत होकर जीवन—यापन करे।

बनवारी ने समाज से बहिष्कृत होकर सिया के साथ सम्पूर्ण—जीवन व्यतीत करने का विकल्प चुना। उसने चीख—चीखकर कहा कि उसकी बिरादरी और समाज की आँखे उस समय बन्द क्यो हो गयी थी, जब उनके पिता की मृत्यु के पश्चात्‌ स्वय उनके भाई ने उन्हे अलग कर दिया था और वे सात वर्ष तक अनाथो के समान जीवन व्यतीत करते रहे थे। आज जबकि वह अपने घर को सम्हालने के लिए एक सुशील, सुशिक्षित लड़की से विवाह कर चुका है, समाज के रूढ़ नियमो का पालन करने के लिए वह उसे नही छोड़ेगा। वह समाज से बहिष्कृत होकर जीवित रह सकता है, लेकिन अपनी पतिव्रता पत्नी को जीवन—यात्रा के भँवर मे अकेली छोड़कर मानवता का हनन करके जीवित नही रह सकता है।

बनवारी ने समाज को अपना निर्णय तो सुना दिया, सिया ने भी अपने तर्को से अपनी जिठानी का मुँह बन्द कर दिया, परन्तु समाज से बहिश्कष्त होकर जीवन—यापन करना अत्यन्त कठिन था। यह कष्टकारक स्थिति उन्हे प्रतिक्षण सालती रहती थी। इस कष्ट से मुक्ति का कोई उपाय उनको नही सूझ रहा था। सिया का प्रसवकाल भी धीरे—धीरे निकट आ रहा था। ऐसे सवेदनशील अवसर पर समाज की आवश्यकता अधिक हो गयी थी। सवेदनाहीन—निर्दयी समाज को सिया तथा उसके बच्चे के प्रति अपने कर्तव्य का ज्ञान नही था, न किसी प्रकार का लगाव अथवा दया का भाव था। इस दशा मे सिया के प्रति अपने कर्तव्य—बोध से बनवारी ने दो माह की छुट्‌टी समाप्त होने के पश्चात्‌ नौकरी पर जाना स्थगित कर दिया था। बनवारी के भाई ने उसको समझाया था कि ऐसे नाजुक समय मे बहू को अकेला छोड़ना उचित नही है। बनवारी को भी अनुभव हो रहा था कि ऐसी दशा मे सिया की देखरेख करने के लिए किसी अनुभवी स्त्री का घर मे होना अत्यावश्यक है। अतः इस विषय पर उसने अपने भाई के साथ विचार—विमर्श किया और अनुमति लेकर सिया की दादी को उसकी देखरेख करने के लिए ले आया। सिया की दादी अनुभवी महिला थी। वह समाज के महत्व को तथा एक व्यक्ति की स्वतत्रता के मूल्य को भली—भाँति समझती थी। वह जानती थी कि समाज से कटकर जीना कितना कठिन है, परन्तु किसी व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओ के प्रति कोई समाज अथवा बिरादरी सवेदनहीन होकर नकारात्मक दृष्टिकोण रखे, यह उन्हे ग्राह्‌य नही था। अपनी पोती तथा उसके परिवार को समाज से बहिष्कृत होकर कष्टपूर्ण जीवन—यापन करते देखकर उन्हे अत्यधिक ग्लानि होती थी। कई बार वे अकेले मे बैठकर बनवारी की इस दशा की दोषी स्वय को मानने लगती थी। उन्हे लगता था कि सिया का विवाह बनवारी के साथ करने का प्रस्ताव रखकर उन्होने बहुत बड़ा अपराध किया है।

बनवारी तथा उसके परिवार की विषम परिस्थति की दोषी स्वय को मानकर सिया की दादी ने निश्चिय किया कि वे अपने दामाद तथा बेटी को समाज से जोड़ने का प्रयास अवश्य करेगी। अपने प्रयास को साकार करने के लिए वे गाँव के सरपच के घर पर गयी और उनसे प्रार्थना की कि उनकी पोती को वे जो चाहे दड दे दे, परन्तु बिरादरी से हुक्का—पानी न गिराएँ। दादी की बात सुनकर सरपच ने पहले तो बहुत कठोरता पूर्वक उन्हे धिक्कारा, परन्तु कुछ समय पश्चात्‌ वह दादी की वाक्‌पटुता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने सिया की दादी को यह आश्वासन देकर घर से विदा किया कि वे पचायत से आग्रह करके बनवारी को इस गलती के लिए क्षमा कराने का प्रयास करेगेे। सिया की दादी आश्वस्त होकर घर लौट आयी और उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगी, जब उनकी पोती सिया और बनवारी के सम्बन्ध को बिरादरी स्वीकार करके उन्हे क्षमा करेगी। बनवारी और सिया भी दादी के इस प्रयास से प्रसन्न थे और आशामयी दृष्टिकोण लेकर वे भी उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगेे, जिस क्षण पचायत का निर्णय उनके पक्ष मे आयेगा और वे समाज के साथ घुल—मिलकर रहने लगेगे। इसके विपरीत बनवारी के भाई को यह आशा नही थी कि पचायत उनके पक्ष मे निर्णय सुनायेगी।

आशा और निराशा के बीच पचायत के निर्णय की प्रतीक्षा करते—करते सिया ने एक पुत्र को जन्म दे दिया, किन्तु अब तक पचायत का निर्णय नही आया था। न ही अभी तक पचायत के निर्णय के बिना समाज के साथ उनके सम्बन्ध ही पुनर्जीवित हो सके। उसी अन्तराल मे एक अन्य दुर्घटना घटित हो गयी, जिसने सिया की परिस्थिति को अधिक बद्‌तर बना दिया। बनवारी अचानक बीमार पड़ गया। निकट के गाँव मे रहने वाले एक वैद्य से उसने औषधि भी ली थी, लेकिन कुछ सुधार नही हुआ, बल्कि उसका स्वास्थ्य निरन्तर गिरता ही जा रहा था। दो माह तक वह चारपाई पर पड़ा रहा और इन दो माह मे उसका स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया था कि स्वय उठकर वह पानी भी नही पी सकता था। बनवारी की बीमारी से चिन्तित

होकर छज्जूसिह वहाँ आया और उसको शहर ले जाकर अस्पताल मे भर्ती कराया। वहाँ पर डॉक्टर ने बताया कि बनवारी क्षय रोग से पीड़ित है और अब रोग इतना बढ़ चुका है कि बनवारी का बचना कठिन ही नही असम्भव है। कुछ दिन तक अस्पताल मे भर्ती रहने के पश्चात्‌ बनवारी ने छज्जूसिह से कहा कि यदि मरना ही बीमारी का अन्तिम उपाय है, तो वह अस्पताल मे नही, बल्कि अपने घर पर ही मरना चाहता है। छजजूसिह भी बनवारी की बात से सहमत होकर उसको घर ले आया। अस्पताल छुट्‌टी लेकर घर लौटने के कुछ दिन पश्चात्‌ ही बनवारी का देहान्त हो गया। अब सिया की समस्याएँ और बढ़ गयी थी। नया गाँव, बिरादरी तथा समाज से बहिष्कार, साथ मे छोटा बच्चा और निर्धनता। इतनी समस्याओ मे घिरकर जीवन—यापन कैसे कर पायेगी, यह गम्भीर चिन्ता का विषय बन गया था। केवल सिया ही नही, उसकी दादी, उसके पिता तथा बनवारी का भाई भी इस नयी विपत्ति से चिन्तित थे।

सिया के पिता की तथा दादी को इस समस्या से मुक्त होने की कुछ सभावना दिखायी दे रही थी, परन्तु कुछ कहने मे वे सकोच कर रहे थे। बनवारी के देहान्त के पश्चात्‌ वे चाहते थे कि सिया तथा उसके बच्चे की देखरेख करने के लिए अपने घर ले जाएँ ,परतु अनिर्णय और असमजस मे महीनो गुजर गया। परिवार मे सिया तथा उसके बच्चे का देखरेख करने वाले का अभाव होने के कारण वे उसको वहाँ छोड़ने के इच्छुक नही थे और वृद्धा दादी तथा हृदय के रोगी पिता का जीवन कितना शेष है ? इस प्रश्न मे उलझकर वे सिया को अपने साथ लेकर जाने से डरते थे। इन सभी परिस्थितियो पर विचार करके छज्जूसिह तथा उसकी माँ ने यह निश्चय कर लिया था कि सिया का दूसरा विवाह कर दिया जाए, किन्तु एक बेटे की माँ को कौन स्वीकार करेगा, यह प्रश्न बहुत जटिल था। इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने मे पाँच—छः माह का समय लग गया।

सिया तथा उसके बच्चे के भविष्य से जुड़े प्रश्न यूँ तो परिवार के प्रत्येक सदस्य के मस्तिष्क मे हलचल उत्पन्न कर रहे थे, किन्तु इन प्रश्नो पर खुलकर चर्चा करने मे सभी को सकोच हो रहा था। बनवारी के भाई मे इसलिए सकोच था कही सिया तथा उसके पिता यह न समझ ले कि बनवारी के भाई मे चरित्रिक दृढ़ता नही है, वह अपने ही छोटे भाई की पत्नी के प्रति अपनी नीयत बिगाड़ रहा है।

दूसरी ओर छज्जूसिह बनवारी के भाई के दृढ़ चरित्र तथा निश्छल स्वभाव से भली—भाँति परिचित थे। उन्हे लगता था कि सिया के भविष्य से सम्बन्धित कोई भी प्रश्न करने पर बनवारी के भाई को बुरा न लग जाए। बनवारी के भाई को छज्जूसिह मन—ही—मन सिया तथा उसके बच्चे का सरक्षक मान चुका था, इसलिए किसी भी प्रकार से बेटी के सरक्षक को कष्ट देना वह नीतिसगत न मानता था।

एक दिन उपयुक्त अवसर पाकर सिया की दादी ने पूरे परिवार के समक्ष यह प्रश्न रख ही दिया। दादी ने बनवारी के भाई को सम्बोधित करते हुए कहा— भैया, सिया और इसके बालक की आगे की जिन्दगी कैसे कटेगी, कुछ सोचा है ?

मै तो थारे बालक बरोब्बर ऊँ, जैसे तम कहोगे, मै वैसे—ई कर ल्युवाँ!

बनवारी के भाई का उत्तर सुनकर छज्जूसिह को परिस्थिति सकारात्मक तथा अपने पक्ष मे प्रतीत हो रही थी। उसने हवा का बहाव पहचाना और तुरन्त बोला— देख हरिया, इस बालक से सिया कू अलग करेगे, तो यू बिचारी अपने बालक सै अलग होके बिना मौत मर जावेगी ! इस बालक की साथ सिया कू कोई कबूलेगा नही ! इस बालक मे तेरा भी तो बहुत मोह है ! तू इसके बिना जी पावेगा ? अपने भाई के अश कू अपने सै अलग कर सकेगा तू ? म्हारी मान, सिया की साथ ब्याह कर ले तू ! तेरे भाई का अश भी तेरे साथ रहवेगा और तेरे घर—आँगन की लछमी भी घर मे रह जावेगी !

तम मेरे बड़े हो जी ! अब थारा हुकम बजाणा ई मेरा धरम है! मै तो थारे बेट्‌टे जैसा हूँ, जब गलत रास्ते पै चलूँ, मेरा कान पकड़के ठीक रास्ता दिखाणा थारा धरम है। न्यू मान ल्यो, थारा मेरे ऊप्पर उतणा ई हक है, जितणा बणवारी पै हा अर सिया पै है ! सिया के पिता और बनवारी के भाई हरिया के बीच स्पष्ट बातचीत हो गयी थी। सिया की दादी ने सिया की इच्छा जानना भी आवश्यक समझा—

सिया, अभी तो तू अपने घर है, अपनी मरजी खुलके बता दे अपने बाप से !

मेरी मरजी तुम सब से अलग थोड़े ही होगी ! जैसा तुम सब को ठीक लगे, मै मान लूँगी ! तुम सब मेरा भला ही सोचोगे, मेरे दुश्मन तो हो नही, जो मेरा बुरा सोचोगे और मै उसे नही मानूँगी !

सिया की सहमति मिलने के बाद यह तो निश्चित हो गया कि हरिया के साथ सिया का विवाह होना परिस्थिति की माँग है। अगले दिन हरिया ने अपने समाज—बिरादरी मे घोषणा कर दी कि वह अपने भाई बनवारी की ब्याहता पत्नी सिया के भरण—पोषण की जिम्मेदारी उठाने के लिए उसे पत्नी के रूप मे स्वीकार कर रहा है और बनवारी के बच्चे को पिता का नाम देकर उसके पालन—पोषण का भार भी एक पिता के रूप मे उठायेगा, एक ताऊ के रूप मे नही। हरिया की इस घोषणा से छज्जूसिह और उसकी माँ अपनी बेटी तथा उसके बच्चे के भविष्य की चिन्ता से उसी समय मुक्त हो गये और अपने घर वापिस जाने की इच्छा प्रकट की। हरिया ने अधिकारपूर्वक उन्हे जाने से रोककर जीवन—भर अपने साथ रखने का आग्रह किया। छज्जूसिह चाहते हुए भी हरिया का आग्रह अस्वीकार न कर सका। वह कुछ दिन के लिए अपनी माँ के साथ बेटी के घर रुकने के लिए तैयार हो गया।

हरिया की घोषणा के अगले दिन उसकी बिरादरी के आठ गावो की पचायत बैठ गयी। पचायत का विषय था हरिया के कुकृत्य का दण्ड—निर्धारण और उस निर्धारित दण्ड की तत्काल घोषणा करके लागू करना। पचायत मे हरिया और सिया की उपस्थिति निश्चित की गयी। तत्पश्चात्‌ पचायत—स्थल पर बैठे सरपच ने हरिया से पूछा कि बिरादरी का आरोप है कि हरिया ने अपने खानदान की तथा समाज की मान—मर्यादा का उल्लघन किया है, क्या वह अपने इस अपराध को स्वीकार करता है अथवा नही ? सरपच के प्रश्न पर हरिया क्षण—भर चुप रहा। एक क्षणोपरान्त उसने विनम्रतापूर्वक सहज शैली मे अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा—

सरपच साब, गरीब की का माण अर का मरजाद ? गरीब की दो बखत की रोट्‌टी मे उसका माण है, अर अपणे बालक—नन्नो मै अपणी सारी जिन्दगी काट दे, यू ई गरीब की मरजाद है। सरपच साब, मैन्नै अपणी सोच सै नेक काम कर्‌या है, आग्गे पचो का फैसला मेरे सिर मात्थे पै ! हरिया के चेहरे पर उदासी छा गयी और कहते—कहते उसका गला रुँध गया। पचायत मे बैठे महानुभावो को हरिया का दृष्टिकोण रास नही आया। एक महानुभाव ने खड़े होकर हरिया के दृष्टिकोण पर टिप्पणी की—

वाह ! वाह ! हरिया ! अरे, ऐसा जोरदार भाषण तो सरपच साब बी न देत्ते, जैसा जोरदार तैन्नै दिया है। तैन्नै सारी बिरादरी की मरजाद तोड़कै अपणे पूरे खानदान की नाक काट्‌टी ऐ, अर सुरग मै बैठ्‌ठे अपणे पुरखो की आत्मा कू बिकट दुख दिया ऐ, फेर बी तेरा सिर निच्चा नी हो रा ! कैसा आदमी ऐ तू ! तेरे जैसे आदमी कू तो गाँव सै भार काढ़ देणा चहियै !

जब मैन्नै मरजाद ई न तोड़ी, तो मेरा सिर निच्चा क्यूँ होवै? हरिया ने अपने दृष्टिकोण को उचित बताते हुए आत्मविश्वास के साथ कहा। पचो को हरिया का आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर अपना पक्ष रखना अच्छा नही लगा। उसके विरोध मे एक साथ कई स्वर उठे— एक तो गलत काम कर रा ऐ, अर ऊप्पर सै मुठमर्दी भी दिखा रा ऐ ! सारे गाँव का महौल बिगाड़ रख्या ऐ तैन्नै, फेर बी कह

रा ऐ, मैन्नै बिरादरी की मरजाद ना तोड़ी ऐ !

पचो के समवेत स्वर के पश्चात्‌ कुछ क्षणो के लिए पचायत—स्थल पर निःशब्दता छा गयी। अपनी विरोधी हवा देखकर हरिया ने मन—ही—मन पचायत के निर्णय का अनुमान करके उसे सहज स्वीकार कर लिया था। जब उसको ज्ञात हुआ था कि सिया के साथ उसके विवाह—सम्बन्ध पर विचार करने के लिए आठ गाँवो की बिरादरी की पचायत बैठ रही है। फिर भी, पचायत मे आकर पचायत का निर्णय स्वीकार करना उसने उचित समझा, क्योकि वह अपने किए गए निर्णय पर मुँह छिपाकर रहना कायरता मानता था। बिरादरी की दृष्टि मे उसका निर्णय भले ही मर्यादा का उल्लघन हो, किन्तु उसकी दृष्टि मे, बनवारी का भाई होने के नाते उसकी धर्मपत्नी सिया की सहायता करना उसका पहला कर्तव्य था। सिया की सहायता करना अपना पहला कर्तव्य मानने के कारण उसके लिए वह सब कुछ उचित था, जिससे सिया को अपने परिवार मे वही मान—सम्मान और अधिकार मिल जाएँ, जिनकी अधिकारी वह बनवारी के जीवित रहते हुए थी। सिया के साथ उसका विवाह का निर्णय सिया तथा उसके बच्चे के हित मे था, इसलिए अपने निर्णय के औचित्य पर प्रश्न उठाने वाले समाज—बिरादरी तथा पचो के निर्णय की उसे कोई चिन्ता नही थी।

पचो की भर्त्सना के बाद भी तनकर सीधे खड़े हुए हरिया के भाव—विहीन चेहरे को देखकर सरपच का अह जाग उठा—

देख हरिया, बिरादरी की मरजाद तो तैन्नै तोड़ी ऐ ! छोट्‌टे भईया की घरवाली अपणी बेट्‌टी बरोब्बर होवै—ऐ, अर तैन्ने ऊ ई अपणी घरवाली बणाकै अपने घर मे राख ली ! अब तू ई बता दे तेरे इस कुकरम से बिरादरी की मरजाद ना टुट्‌टी—ऐ, तो बिरादरी की नाक लम्बी हुई—ऐ ?

सरपच साब, म्हारे घर की मरजाद बण्ण् ो की घरवाली ऐ ! उसे बचाणा म्हारा फरज है ! अर उसी फरज कू हम पूरा कर रे है! अब बिरादरी कू म्हारा फर्ज म्हारा ऐब दिखायी देवै है, तो इसमे म्हारी का गलती है ? अपने पक्ष मे हरिया ने जो तर्क दिया, उससे पचायत मे बैठे बिरादरी के सभी लोग भड़क उठे—

सरपच साब, यू नीच आदमी मरजाद कू का समझेगा, जो बिरादरी मे ई ऐब काढ़ रा है ! इसै इसी बखत बिरादरी सै ब्हार करणे मै ई फायदा ऐ ! एक आदमी ने कहा।

सारी बिरादरी—समाज और पचायत का विचार भाँपकर सरपच ने हरिया को बहिष्कृत करने की घोषणा कर दी और उसी दिन से हरिया के परिवार को दसे का नाम मिल गया। उस दिन के बाद से उसके वशज पीढ़ी—दर—पीढ़ी दसो के या ओछो के नाम से पहचाने जाने लगे और यह नाम उनके वश की पहचान बनकर समाज मे परम्परा के रूप मे हस्तान्तरित होता रहा है।

इस वश मे डिप्टी साहब कौन थे ? सुना है, उन्होने बिरादरी मे मिलने का बहुत प्रयास किया, पर उनकी बात बिरादरी ने नही मानी !

तुझे किसने बताया कि हरिया के वशज डिप्टी साहब थे। बस, ऐसे ही चलते—जाते माँ जी के मुँह से सुन लिया था ! गरिमा ने आशुतोष को सन्तुष्ट करने की मुद्रा मे कहा। गरिमा की जिज्ञासा और आग्रह के समक्ष आशुतोष अपनी बात को निरन्तर आगे

बढ़ाने के लिए विवश हो गया। उसने बताया—

सिया के साथ विवाह करने के अपराध मे हरिया को बिरादरी की पचायत ने दसा बना दिया और बिरादरी मे उसका हुक्का बन्द कर दिया। इस तिरस्कार के बावजूद हरिया और सिया अपना परिवार बसाकर सुखी थे। सिया पढ़ी—लिखी स्त्री थी। वह साहस के साथ विषम परिस्थितियो से सघर्ष करते हुए अपने बेटे का भविष्य सँवारने लगी। उसके बेटे का ध्यान समाज द्वारा किये जा रहे तिरस्कार से व्यथित होकर भटक न जाए, इसलिए सिया अपने बेटे को दिन—भर पुस्तको का अध्ययन कराने मे व्यस्त रखती थी। प्राथमिक शिक्षा सिया ने अपने बेटे को घर पर स्वय दी और उसके बाद उसकी शिक्षा पूरी

कराने के लिए उसको लेकर शहर चली गयी। सिया को शहर मे जाकर अपनी पढ़ाई—लिखाई का भी लाभ मिला। उसको वहाँ पर एक स्कूल मे नौकरी मिल गयी थी, जिससे शहर मे रहकर बेटे को पढ़ाने मे उसको कोई कष्ट नही हुआ। कुछ वषोर् तक सिया अपने बेटे के साथ शहर मे रही थी, किन्तु जब उसका बेटा इस योग्य हो गया कि वह अकेला रहकर अपनी शिक्षा पूरी कर सके, तब सिया हरिया के पास वापिस गाँव लौट आयी। सिया और बनवारी का वही लड़का पढ़—लिखकर जब गाँव मे वापिस आया, तब लोगो को पता चला कि हरिया का बेटा डिप्टी बनकर गाँव मे लौटा है। बेटे के डिप्टी बनते ही गाँव के लोगो ने और पूरे समाज—बिरादरी ने हरिया को सम्मान देना आरम्भ कर दिया, परन्तु बिरादरी मे मिलाने की बात किसी ने नही की। हरिया को आशा थी कि उसके बेटे की पद—प्रतिष्ठा उनका खोया हुआ मान—सम्मान वापिस दिला देगी, परन्तु जीते—जी हरिया का यह सपना साकार नही हो सका। अपनी बिरादरी मे मिलकर रहने की टीस उसको जीवन—भर सालती रही। अन्त मे एक दिन अपनी इसी अधूरी इच्छा को लेकर हरिया इस दुनिया, समाज, बिरादरी सबसे मुक्त होकर उस दुनिया मे चला गया, जहाँ पुण्यात्माओ का निवास होता है और पापात्माओ का प्रवेश निषिद्ध होता है।

हरिया के स्वर्गवास के बाद सिया का दायित्व बढ़ गया था। पति के जीते—जी उसको बेटे के विवाह की कोई चिन्ता नही थी, परन्तु अब उसको बेटे के विवाह की चिन्ता सताने लगी। सिया चाहती थी कि उसके बेटे का विवाह किसी सुशिक्षित लड़की के साथ हो। अपनी इस चाहत को पूरा करने के लिए यह भी सम्भव था कि पुत्र—वधू के रूप मे उन्हे गैर—बिरादरी की लड़की को स्वीकार करना पड़े। परन्तु, डिप्टी साहब ने अपने पिता के अन्तःकरण मे उठने वाली अपनी बिरादरी मे मिलने वाली तड़प देखी थी, इसलिए वे बिरादरी मे मिलने के एक प्रयास के रूप मे बिरादरी की लड़की के साथ विवाह करना चाहते थे। पिता के प्रति डिप्टी साहब की श्रद्धा देखकर उनकी माँ सिया का रोम—रोम पुत्र—स्नेह से पुलकित हो उठा और उन्होने बिरादरी मे ही सुशील और सुशिक्षित लड़की की खोज आरम्भ कर दी।

डिप्टी साहब पढ़े—लिखे बुद्धिमान व्यक्ति थे। सुना है, अपने जीवन—काल मे वे एक जानी—मानी हस्ती के रूप मे पहचाने जाने लगे थे। उन्होने गाँव के आस—पास अट्‌ठारह—सौ बीघा जमीन भी खरीद ली थी। उस समय जब गाँव मे अधिकाश लोगो के घर कच्चे होते थे, डिप्टी साहब ने हजारो वर्ग मीटर मे पक्की हवेली बनवायी थी और अग्रेज सरकार से परमिशन लेकर अपनी हवेली मे कचहरी लगाते थे। आस—पास के सभी गाँवो के मुकदमे डिप्टी साहब ही देखते थे। किन्तु, अपनी बिरादरी की कुलीन लड़की को अपने जीवन—साथी के रूप मे प्राप्त करना उनके भाग्य मे नही था। बिरादरी मे जो सपन्न तथा कुलीन परिवार थे, वे अपनी सुशिक्षित बेटी का विवाह डिप्टी साहब के साथ करने को तैयार नही थे।

अन्त मे डिप्टी साहब की माँ ने उनका विवाह बिरादरी के एक विपन्न परिवार की लड़की के साथ तिगड्‌डे बदले मे करा दिया।

तिगड्‌डे बदले मे ? गरिमा ने आशुतोष से बीच मे ही प्रश्न पूछा, तो वह एक बारगी झुझलाया और फिर तिगड्‌डे बदले का मतलब समझाने लगा—

जो परिवार कुलीन और सपन्न होते थे, उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए हर कोई आतुर रहता था और वैवाहिक सम्बन्ध बनाकर अपने भाग्य को सराहता था। लेकिन विपन्न लोगो को अपने बेटो का विवाह करने के लिए बदले की व्यवस्था करनी पड़ती थी। बनवारी के भाई का विवाह जिस प्रकार आमने—सामने बदले देकर हुआ था, उसको समाज के लोग सम्मान की दृष्टि से नही देखते थे। इसलिए अपने सम्मान को बचाये रखने के लिए इस बिरादरी के अधिकाश लोग अक्सर तिगड्‌डे या चौगड्‌डे विवाह की योजना बनाते थे। इस प्रकार की वैवाहिक व्यवस्था मे ऐसे तीन या चार पक्ष, जिनके बेटा—बेटी विवाह योग्य होते थे, एक समझौते के अतर्गत परस्पर मिलते थे। वे तीनो—चारो पक्ष समझौता करके एक ऐसी शृखला का निर्माण करते थे कि अपनी बेटी का विवाह उनमे से किसी को भी सीधे तौर पर बहू के भाई के साथ न करना पड़े और उस समझौते मे सम्मिलित सभी परिवारो के बेटो का विवाह सपन्न हो जाए।

तो, क्या डिप्टी साहब की कोई बहन भी थी ? गरिमा ने पूछा।

नही, उनकी कोई बहन नही थी। उनकी माँ ने बिरादरी के ही एक ऐसे विपन्न परिवार को ढूँढ लिया था, जिसने धन लेकर अपनी बेटी का विवाह डिप्टी सहाब के बदले मे करना स्वीकार कर लिया था। धन देकर खरीदी गयी उस लड़की का तिगड्‌डा बदला देकर डिप्टी साहब का विवाह बिरादरी मे हो गया था, परन्तु डिप्टी साहब की धर्मपत्नी पढ़ी—लिखी नही थी। डिप्टी साहब तथा उनकी माँ इस बात से दुखी थे कि उनकी बहू शिक्षित नही है। अपनी इस व्यथा को दूर करने के लिए डिप्टी साहब की माँ ने दिन—रात कठोर परिश्रम करके बहू को पढ़ना—लिखना सिखाया।

पत्नी के पढ़ने—लिखने से एक ओर डिप्टी साहब का अपने शिक्षित समाज मे मान—सम्मान बढ़ गया था, तो दूसरी ओर अगली पीढ़ी के सस्कारशील होने की सम्भावना बढ़ गयी थी। डिप्टी साहब सुखपूर्वक अपनी पत्नी के साथ गृहस्थ—जीवन का भोग करने लगे। गृहस्थ जीवन का उपभोग करते हुए, जब डिप्टी साहब पाँच बेटो के पिता बन चुके थे, उनके मस्तिष्क मे पुनः बिरादरी मे हुक्का मिलाने का विचार प्रबल होने लगा। उन्हे आभास होने लगा था कि यदि उन्होने अब शीघ्र ही बिरादरी मे मिलने के लिए कोई ठोस कदम नही उठाया, तो पर्याप्त धन—सम्पदा तथा शिक्षा से सम्पन्न होने पर भी उनके बेटो का विवाह—सम्बन्ध अपनी बिरादरी के कुलीन घरो मे कराना बहुत कठिन होगा। अपने इसी विचार से प्रेरित होकर डिप्टी—साहब ने पूरी बिरादरी के आठो गाँवो के लिए प्रीति—भोज का आयोजन किया। डिप्टी साहब ने प्रीति—भोज के आयोजन मे खाने—पीने की व्यवस्था से लेकर अतिथियो के उठने—बैठने का प्रबध इतने भव्य तरीके से किया था कि बिरादरी के सब लोग आश्चर्यचकित रह गये। उनकी व्यवस्था को जिसने देखा, वह उनकी प्रशसा किये बिना नही रह सका। लोगो के चेहरे पर ऐसे सन्तुष्टि के भाव देखने के लिए तथा उनकी वाणी से अनायास निसृत अपनी प्रशसा सुनने के लिए डिप्टी साहब ने उस आयोजन मे दिल खोलकर धन—व्यय किया था। समाज के सभी लोगो को सन्तुष्ट देखकर डिप्टी साहब को आशा थी कि अब उन्हे बिरादरी मे अपने पूर्वजो का खोया हुआ सम्मान वापिस मिल सकेगा। अपनी आशा के अनुरूप उन्होने प्रीति—भोज सम्पन्न होने के उपरान्त सम्पूर्ण बिरादरी की पचायत बुलायी और उसमे निवेदन किया कि उनका हुक्का बिरादरी मे मिला लिया जाए !

डिप्टी साहब के निवेदन को पचायत के अधिकाश लोग स्वीकार करने के पक्ष मे थे, परन्तु बिरादरी के पड़ोसी गाँवो के कुछ पच इस पक्ष मे नही थे कि डिप्टी साहब के खानदान पर लगे दसे के ठप्पे को इतनी आसानी से हटा लिया जाए। उन्होने विरोध का स्वर मुखर करते हुए कहा कि बिरादरी के सभी गाँवो मे एक—एक दो—दो परिवार बिरादरी के नियमो के अनुसार उनके चारित्रिक पतन के कारण दसे बनाये गये है और उनका हुक्का अलग किया गया है। यदि डिप्टी साहब का हुक्का बिरादरी मे मिलाया जा सकता है, तो बाकी लोगो का क्यो नही मिलाया जाना चाहिए। उनमे से प्रत्येक पड़ोसी गाँव के मुखिया ने अपनी माँग उठायी कि डिप्टी साहब का हुक्का बिरादरी मे मिलाया गया, तो गाँव—गाँव के अमुक—अमुक लोगो को भी बिरादरी मे बैठने की घोषणा करनी पड़ेगी। यह तर्क न्यायसगत था, किन्तु पचायत इस बात को मानने के लिए तैयार नही थी। एक पक्ष चाहता था कि डिप्टी साहब को बिरादरी मे मिलाकर उनके परिवार को बीसा घोषित कर दिया जाए। दूसरा पक्ष इस बात से सहमत नही था, इसलिए विपक्ष ने अड़चन के रूप मे शर्त रख दी थी कि यदि डिप्टी साहब को बीसा घोषित किया जाता है, तो बिरादरी के सभी गाँवो के दसे परिवारो के लिए ऐसी ही घोषणा की जायेगी ! विपक्ष के इसी प्रबल विरोध से डिप्टी साहब के पक्ष मे निर्णय नही हो सका और पचायत उठ गयी। उस दिन के पश्चात्‌ भी डिप्टी साहब ने कई बार ऐसे प्रयास किये— प्रीति—भोज का आयोजन किया, बिरादरी की पचायत बिठायी, परन्तु उन्हे अपने प्रयास मे सफलता नही मिली। वे भी अपने पिता की भाँति अधूरी आकाक्षा के साथ जीते रहे और अन्त मे उसी अधूरी इच्छा के साथ स्वर्ग सिधार गये।

डिपटी साहब के पाँच बेटे थे, परन्तु वे अपने किसी भी बेटे से यह आशा नही कर सकते थे कि उनका कोई बेटा इस अधूरे कार्य को पूरा करने का दायित्व—भार उठा पायेगा। उनके सभी बेटे निकम्मे, अहकारी तथा वाचाल थे। अपने पुरुषार्थ के बल पर आगे बढ़ने उनमे न योग्यता थी, न कोई ऐसी लालसा थी। कर्मठता के अभाव मे भी वे अपनी जीवन—शैली उसी प्रकार की बनाये रखना चाहते थे, जैसी उनके पिता के जीवनकाल मे थी। अपनी इसी प्रवृत्ति के वे पाँचो भाई अपनी चल—अचल सम्पत्ति को बेच—बेचकर विलासितापूर्ण जीवन—यापन करते रहे। इस क्रम मे शीघ्र ही एक दिन आ गया, जब वे कगाल हो गये और अपने परिवार को दो वक्त भर—पेट भोजन भी देना उनके लिए कठिन हो गया। बिरादरी वाले बताते है कि उन पाँचो भाईयो मे सबसे छोटा भाई समझदार था, परन्तु जब तक वह इस योग्य हुआ कि अपने पिता द्वारा अर्जित की गयी धन—सम्पदा और मान—प्रतिष्ठा की रक्षा कर सकता, तब तक उसके बड़े भाई उसका बड़ा भाग गँवा चुके थे। उस परिस्थिति मे यही एक विकल्प बचता था कि वह भाईयो से अपना हिस्सा लेकर अलग हो जाए। उसने यही विकल्प चुना और अपना हिस्सा लेकर अपनी माँ के साथ अलग रहने लगा। भाईयो से अलग होने के पश्चात्‌ उसने अपने हिस्से मे मिली सम्पत्ति को सहेज कर रखा और परिश्रम करके अपने परिवार का पालन—पोषण किया। इन्ही का बेटा प्रहलाद— प्रभा का पिता था।

प्रहलाद मे अपने दादा डिप्टी साहब के समान आगे बढ़ने की ललक थी। उसकी दादी उसको बचपन मे कहानी सुनाकर बताया करती थी कि कैसे उसके पूर्वजो का पतन—उत्थान और फिर पतन हो गया। दादी की कहानियो ने प्रहलाद के मनोमस्तिष्क मे अपने दादा के समान अपनी कर्मठता के बल पर उन्नति की आकाक्षा का बीजारोपण कर दिया। अपनी इसी आकाक्षा से प्रेरित होकर उसने निरन्तर परिश्रम करके शिक्षा प्राप्त की। वह चाहता था कि उच्चशिक्षा प्राप्त करके किसी उच्च पद पर आसीन हो जाए, किन्तु उच्चशिक्षा मे प्रवेश करते ही उसका विवाह कर दिया गया। उसकी दादी की अन्तिम इच्छा थी कि अपने पोते के विवाह के मगलगीत गाकर ही भगवान के घर जाए। दादी की अन्तिम इच्छा का मान रखते हुए वह विवाह का विरोध नही कर सका। और लक्ष्य प्राप्त करने से पहले ही पारिवारिक दायित्व का भार उसके कधो पर आ पड़ा। अपने विवाह के पश्चात्‌ भी उसने अपनी शिक्षा को बीच मे नही छोड़ा। जब तक उसकी शिक्षा पूरी नही हुई, वह विषम परिस्थितियो मे सघर्ष करता रहा। जिस समय प्रहलाद की शिक्षा पूरी हुई थी, उस समय तक वह दो बेटो तथा एक बेटी प्रभा का पिता बन चुका था। अब तक उसके पिता का देहान्त हो चुका था, इसलिए परिवार का सारा दायित्व—भार प्रहलाद के कधो पर आ पड़ा था। ऐसी परिस्थिति मे यह सभव नही था कि वह अपने परिवार को गाँव मे छोड़कर शहर मे जाकर अपनी अर्जित शिक्षा से अपने सपनो के अनुरूप पद—प्रतिष्ठा वाली नौकरी ढूँढने चला जाए। न ही यह सम्भव था कि वह अपने परिवार को अपने साथ शहर मे ले जाए और परिवार को अपने साथ रखकर नौकरी ढूँढने का प्रयास करे, क्योकि जब तक नौकरी नही मिल जाती, तब तक परिवार के भरण—पोषण के लिए धन की व्यवस्था करना एक विकट चुनौती थी। सभी परिस्थितियो पर विचार—मथन करके प्रहलाद ने निश्चय किया कि वह गाँव मे रहकर ही अपने परिवार का भरण—पोषण करेगा और जिस लक्ष्य को वह स्वय प्राप्त नही कर सका, उसके लिए वह अपने बेटो को सक्षम बनाएगा। प्रहलाद की दादी ने कर्मपथ पर चलते हुए उन्नति की आकाक्षा का जो बीजारोपण उसके मन—मस्तिष्क मे किया था, वह बीज प्रहलाद की दृढ़ इच्छा—शक्ति से अकुरित होकर उसके निरतर कठोर परिश्रम का पोषण पाते हुए आज वृक्ष का रूप धारण कर चुका था, परन्तु उसके फलीभूत होने का मौसम कब आयेगा ? इस विषय मे कुछ भी कहना अत्यधिक था। यह भी निश्चित करना कठिन था कि प्रहलाद की आकाक्षा के फलीभूत होने की पूरी—पूरी सभावना थी !

अपनी आकाक्षाओ को अपने बेटो के माध्यम से साकार करने के लिए प्रहलाद ने अपनी सारी शक्ति लगा दी। उसने सोचा था कि जब उसका बड़ा बेटा अक्षय अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे सफल हो जायेगा, तब छोटे बेटे अथर्व तथा बेटी प्रभा को अपने बड़े भाई की सहायता से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे कोई कठिनाई नही होगी। इसी विचार से प्रेरित होकर अक्षय के पिता ने उसको शहर मे छात्रावास मे रखकर पढ़ाया। वे चाहते थे कि अक्षय की शिक्षा मे किसी प्रकार की बाधा न आये। इस उद्‌देश्य को पूरा करने के लिए उन्होने अपनी जमीन का कुछ भाग गिरवी रख दिया था और कुछ दिन पश्चात्‌ उन्हे वह जमीन बेचनी पड़ी। इसी प्रकार अक्षय की शिक्षा पूरी कराने मे धीरे—धीरे उनकी अधिकाश जमीन—जायदाद हाथ से निकल गयी। अक्षय के पिता को अपने पूर्वजो की जमीन—जायदाद गँवाने का लेशमात्र भी दुख नही था, क्योकि उस सम्पत्ति के बदले मे उन्होने वह अनमोल वस्तु प्राप्त की थी, जिसके लिए वे बचपन से अब तक आकाक्षा सजोए हुए थे— उनका बेटा अक्षय प्रशासनिक अधिकारी बन गया था। अक्षय ने आज पिता के उस सपने को साकार कर दिखाया था, जहाँ से होकर उस परिवार के लिए मान—सम्मान प्राप्त करने का मार्ग जाता था।

अक्षय के प्रशासनिक अधिकारी बन जाने के पश्चात्‌ उसके पिता की सारी चिन्ताएँ समाप्त हो चुकी थी। अब पिता को चिन्ता करने के लिए कोई विषय शेष नही रह गया था, क्योकि उन्होने सोचा था कि अपने छोटे भाई—बहन की शिक्षा पूरी करने का दायित्व अब अक्षय अपने ऊपर लेकर पिता को चिन्ता—मुक्त कर देगा। परन्तु, उनकी यह सोच उस समय मिथ्या सिद्ध हो गयी, जब अक्षय ने अथर्व और प्रभा की शिक्षा पूर्ण करने का दायित्व लेने से इन्कार कर दिया। अब तक उनकी अधिकाश सम्पत्ति अक्षय की शिक्षा पूर्ण कराने के लिए बिक चुकी थी, जो कुछ शेष बची थी, वह बैक के पास गिरवी रखी हुई थी। बैक की ओर से निरन्तर दबाव बढ़ता जा रहा था कि वे लिया हुआ कर्ज ब्याज सहित शीघ्र चुका दे, अन्यथा बैक कड़ी कार्यवाही करने के लिए मजबूर हो जाएगा। बैक की ऐसी चेतावनी से प्रह्‌लाद का तनाव बढ़ जाता था, क्योकि कर्ज न चुकाने के कारण वे एक बार पहले भी दो दिन तक हवालात मे बन्द रह चुके थे। अब तो तनाव ने उनकी जिजीविषा को समाप्तप्राय ही कर दिया था। बैक का कर्ज चुकाने का दबाव, पूर्वजो की सम्पत्ति गँवाने की व्यथा, बेटे के दूर जाने का दुख तथा अथर्व और प्रभा पूरी कराने के साथ—साथ परिवार के भरण—पोषण की चिन्ता से वे पूर्णतः टूट चुके थे। और एक दिन वे अपने कमरे मे सोने के लिए गये, तो प्रातः उठकर बाहर ही नही आये। अथर्व ने पिता के कमरे का दरवाजा खोला, तो वहाँ का दृश्य देखकर उसकी चीख निकल गयी। उसके पिता का मृत शरीर छत के एक कुदे से बँधी रस्सी से लटक रहा था, जिसका एक छोर उसके पिता की गर्दन मे बँधा हुआ था।

जीवन मे आने वाली बाधाओ से तथा विषम परिस्थितियो से हारकर प्रह्‌लाद ने आत्महत्या कर ली। अथर्व, प्रभा तथा इनकी माँ पर सकट का पहाड़ गिर पड़ा, परन्तु ऐसे विषम समय मे भी घर का चिराग कहलाने वाले अक्षय का हृदय न पिघला। वह अपने परिवार के इस सकट मे औपचारिक सहानुभूति प्रकट करने के अतिरिक्त कुछ सहायता न कर सका। किन्तु प्रभा तथा अथर्व प्रतिकूल समय मे भी धैर्य धारण करके आगे बढ़ते रहे है। पिता की मृत्यु को चार वर्ष बीत जाने पर उनके मन मे पिता लक्ष्य जीवित है। वे अपनी शिक्षा के साथ—साथ परिवार के भरण—पोषण का दायित्व उठाते हुए प्रसन्नतापूर्वक समय व्यतीत कर रहे है। अथर्व बी.एस. सी. की शिक्षा प्राप्त करते हुए भी अपने घर की आय बढ़ाने के लिए छात्रो को ट्‌यूशन पढ़ाता है। शायद प्रभा बी.ए उत्तीर्ण करने के पश्चात्‌ एम. ए. की शिक्षा लेते हुए किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही है।

सचमुच प्रभा और उसका भाई बहुत कर्मठ तथा सघर्षशील प्रकृति वाले है! गरिमा ने प्रभा के परिवार का पूरा इतिहास सुनकर कहा। गरिमा की बात का कोई उत्तर दिये बिना आशुतोष कुछ क्षणो तक मौन रहकर उसकी ओर देखता रहा। तत्पश्चात्‌ नीद आने की मुद्रा बनाकर बोला—

अब तो जिज्ञासा शान्त हो गयी ? सारी रात दूसरो के घर का इतिहास कहने—सुनने मे बेकार कर दी ! चल, अब सो जा और मुझे भी सोने दे !

एक बात और !

अब एक बात और कौन—सी है? कह जल्दी, क्या कहना है? यदि मै प्रभा को अपने घर बुलाकर उसके साथ बाते करूँ, तो आपको कोई आपत्ति तो नही होगी ? गरिमा ने विनम्रता पूर्वक निवेदन किया।

नही, मुझे आपत्ति क्यो होगी ? प्रभा पढ़ी—लिखी, समझदार और सज्जन लड़की है। तुम जब चाहो उसे बुला सकती हो और उसके साथ बाते कर सकती हो ! आशुतोष ने गरिमा को सन्तुष्ट करने के भाव से उसकी ओर सप्रेम दृष्िट से देखते हुए कहा। आशुतोष के उत्तर की विश्वसनीयता को परखने के लिए गरिमा ने पुनः अपना सन्देह प्रकट किया—

वो—वो मुझे लगता था कि प्रभा दसो के परिवार से है, इसलिए कही आपको उसका घर पर आना अच्छा न लगे !

दसो—बिसो का युग बहुत पीछे छूट गया है। आज व्यक्ति की योग्यता का महत्व है। आज वह व्यक्ति सम्मान का पात्र है, जो योग्य है और जिसके पास सुख पूर्वक जीवन—व्यतीत करने के लिए साधन है ; सुख—साधनो पर खर्च करने के लिए अकूत धन है ! जिसके पास यह सब कुछ है, उसकी जाति कोई नही पूछता है आज ! और तुम दसो—बिसो की बातो मे चिपकी पड़ी हो !

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Jaimini Parmar 4 महीना पहले

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Shobhna 5 महीना पहले

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Amita Saxena 5 महीना पहले

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Brijesh mendapara 5 महीना पहले

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Girjesh Pal 5 महीना पहले