काश में माँ न होती Neerja Dewedy द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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काश में माँ न होती

काश! मैं माँ न होती

आकाश में घने बादल छाये थे. रह-रह कर बिजली कड़कती थी. जनवरी की ठंड में सरसराती हवा के साथ खिड़की से आती वर्षा की फुहारों से प्राची कँपकँपा उठी. शाल को कंधे से उठाकर सर पर लपेटते हुए वह खिड़की के दरवाज़े बंद करने को आगे बढ़ी तो बादलों की तेज गड़ग‌ड़ाहट के साथ चमकती हुई बिजली कड़कड़ाते हुए समीप ही नीचे धरती में समा गई. उसके तीव्र प्रकाश में अपने घर के मुख्य द्वार के पास रक्खे नगर निगम के डस्टबिन के समीप बने चबूतरे पर बैठी एक छाया को देख कर वह चौंक पड़ी—इस भयानक मौसम में इतनी रात में कौन है वहाँ? वह सोच रही थी कि बिजली फिर ज़ोर से चमकी और प्राची ने देखा कि एक स्त्री एक पत्तल हाथ में लेकर विचारमग्न सी बैठी है. स्त्री की मुखाकृति देखकर तो प्राची जैसे आकाश से पाताल में गिरी—“श्रीमती शालिनी मेहरोत्रा—यह यहाँ क्या कर रही हैं? जहाँ तक मुझे मालूम है यह तो कालिंदी अपार्टमेंट्स के वैभवशाली फ्लैट में रहती हैं.‘’--- प्राची सोच में पड़ गई. पंद्रह दिन पहले श्री अंकित मेहरोत्रा का कार दुर्घटना में देहावसान हो गया था. लगता है कि शालिनी डिप्रेशन में घर से बाहर आकर बैठ गई हैं. पर हाथ में पत्तल क्यों लिये हैं?’’ प्राची कुछ समझ न सकी. मनुष्यता के नाते वह कोट पहन कर अपने फ्लैट से बाहर निकली. शालिनी को किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में पत्तल थामे देखकर प्राची विस्मय में पड़ गई. इससे अधिक पत्तल में रक्खे भोज्य सामग्री को देखकर वह चकित रह गई. पत्तल में कुछ टुकड़े पूड़ी के और मिली-जुली सब्जी थी—लगता है किसी कामवाली ने अपना बचा-खुचा खाना दे दिया है. डस्टबिन से तो इन्होंने उठाया नहीं होगा—कूड़े में पड़े भोजन को खाने के विचार से वह घृणा से गिजगिजा उठी. शालिनी मूर्तिवत, बिना कोई प्रतिक्रिया दिये बैठी थी. प्राची ने उसे हिलाकर आवाज़ दी—

“मिसेज़ मेहरोत्रा आप यहाँ क्या कर रही हैं?’’ शालिनी की पुतली धीरे से हिली पर मुखाकृति भावशून्य ही बनी रही. प्राची ने फिर उसका कंधा हिलाकर आवाज़ दी—“शालिनी! शालिनी! आपको क्या हुआ है? यहाँ इस खराब मौसम में क्या कर रही हैं?’’

“और क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?’’---आवाज़ घुटी-घुटी सी जैसे कहीं गड्ढे से आ रही थी.”

“ क्यों आपका घर तो है. चलिये मैं नलिन को बुलाती हूँ. हम लोग आपको अपने साथ लेकर आपके फ्लैट पर चलते हैं.’’

“कैसे इनको ले जायेंगी घर, प्राची मैम? शालिनी मैम के घर पर तो इनके बेटे और बहू ने कब्ज़ा कर लिया है. उन्होंने इन्हें मार-पीट कर, धक्का देकर भूखे–प्यासे घर से बाहर फेंक दिया था. मैं इनके घर में खाना बनाने जाती हूँ. आज छुट्टी पर थी. बगल वाली कामवाली ने मुझे बताया तो इनको खोजती दौड़ी चली आ रही हूँ.’’---पीछे से आती रीना ने कहा.

“क्या कह रही हो तुम?’’—प्राची अचकचा कर बोली.

“ मैं सच कह रही हूँ मैम. कल भी इनके बेटे-बहू इन्हें भला बुरा कह रहे थे. बहू तो बहुत मुँहफट है. मैं यह नहीं समझती थी कि बात यहां तक बढ़ जायेगी. अभी मुझे दूसरी कामवाली ने बताया कि शालिनी मैम को इनके बेटा-बहू ने धमकाया और भूखे-प्यासे घर से निकाल दिया है. उसने बीच-बचाव की कोशिश की थी तो उसको भी मारा. वही भंडारे से अपने लिये जो भोजन लाई थी उसमें से थोड़ा मैम को देकर मुझे बताने चली आई थी. उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं अतः घर पर रुक गई.’’—रीना ने साँस भर कर कहा.

“ठीक है तुम जाओ. मैं शालिनी को अपने यहाँ ले जाती हूँ.”—प्राची ने कहा और शालिनी को फिर से हिलाया और बोली— “शालिनी आप सीधे मेरे घर आ जातीं. ऐसे बाहर क्यों बैठ गईं? चलिये उठिये, मेरे साथ चलिये’’ तो उसकी तंद्रा भंग हुई, जैसे वह विचारों की दुनिया से वापस आई. प्राची की स्नेहिल दृष्टि को देखकर वह स्वयं को रोक न सकी और फफक कर रो उठी. प्राची ने शालिनी को रीना की सहायता से ज़बरदस्ती उठाया और अपने साथ अंदर बैठक में ले आई.

आवाज़ सुनकर नलिन भी बैठक में आ गये. शालिनी लगातार रोये जा रही थीं. रीना ने ही बताया—“साहब की तेरहवीं परसों थीं तब तक तो समर भैया और भाभी मेहमानों के सामने चुप रहे पर उनके जाते ही कोहराम मचाने लगे. कहने लगे कि हम सब लोग आकर इसी घर में रहेंगे. मैम उन लोगों की आदत से खुश नहीं थीं अतः उन्हें मना कर रही थीं. कल वे लोग मेरे सामने धमकी देकर गये थे कि –‘हम तो आकर यहीं रहेंगे. देखें हमें कौन रोकता है?’ आज मैं थी नहीं. अभी दूसरी बाई ने बताया तो आई हूँ. प्राची मैम! आपकी सबकी मदद करने की आदत हम सब जानते हैं इसी कारण वह बाई इनको यहाँ बैठा कर चली गई थी.”

रीना प्राची के यहाँ पहले काम कर चुकी थी अतः तीन प्याले चाय बना कर सबके सामने रखते हुए बोली—“मैम मैं अब जाऊँ, मेरे घर में मेहमान आये हुए हैं.’’

“ठीक है’’—कह कर प्राची शालिनी की ओर उन्मुख हुई. रूमाल से शालिनी के आँसू पोंछते हुए उसने धीरे से पूछा—“ क्या बात है? आपके बेटे-बहू इतने उद्दंड क्यों हो गये?’’

नलिन समझाते हुए बोले—“शालिनी जी! टेंशन के कारण आप लोगों में बात बेमतलब बढ़ गई होगी. आपके बेटे ने सोचा होगा कि मम्मी अकेली रहेंगी तो उनको परेशानी होगी. इसी कारण—“

“ वे लोग मेरी परेशानी दूर करेंगे, अरे छोड़िये भाई साहब. आप शोभिता की बातें सुन लीजिये तो कभी उसकी शकल न देखें.’’ बात बीच में काटते हुए शालिनी तीव्रता से फनफनाते स्वर में बोली.—“ आप लोग मेरे बेटे-बहू के विषय में जानते नहीं हैं—एक नाग है तो दूसरी नागफनी. पाँच वर्ष पूर्व मेरे पति ने इनकी आदत से आज़िज़ आकर इन लोगों को घर से बाहर निकाल दिया था. उन्होंने लाख कोशिश की कि ये लोग सुधर जायें पर कुत्ते की दुम कितना भी सीधी करो भला कभी सीधी हो सकती है.’’

“आज क्या बात हो गई? आप घर से बाहर क्यों चली आईं?’’—प्राची ने प्रश्न किया?

कल दोपहर में जब सब मेहमान विदा हो गये तब मैंने समर से अपना आधार कार्ड और मेहरोत्रा साहब का मृत्यु प्रमाणपत्र मांगा तो समर बोला—“मैंने जाने कहाँ रख दिये, मिल नहीं रहे हैं.” आज बेटी शुचि आधार कार्ड और मृत्यु प्रमाणपत्र की प्रतिलिपि बनवाने गई थी. इसके बाद वह अपने ससुराल चली गई. इसी बीच मिस्टर मेहरोत्रा के दफ्तर की सेक्रेटरी आई और बोली—

“आंटी! मुझे समर साहब ने निकाल कर अपना आदमी रख दिया है. आप चलकर सब सामान देख लीजिये नहीं तो मेरे ऊपर चोरी का अपराध साबित कर दिया जायेगा.’’

“प्रीति! मैं तुम्हारी वफादारी जानती हूँ, भला ऐसा कैसे हो सकता है. तुम कहीं नहीं जाओगी.—‘’

“नहीं यह अब दफ्तर में काम नहीं करेगी. अभी तक पापा जो कहते थे वह होता था, अब जो मैं कहूँगा वह होगा.’’—चीखते हुए समर बोला.

“तुम्हारे पापा ने तुम्हारा सब कारोबार अलग कर दिया था. तुम्हारी आदतों से तंग आकर उन्होंने मेरे लिये अलग व्यवस्था कर दी है. मेरे कामों में अड़ंगा मत लगाओ. अब तुम अपना अलग रहो और मुझे चैन से रहने दो.’’ मैंने कहा तो समर तैश में आकर बोला—

“मैं जो मन में आयेगा करूँगा, देखें मुझे कौन रोकता है? आप मोदी से शिकायत करेंगी जाइये करिये. योगी के पास जायेंगी तो जाकर देख लीजिये. अब तो हम यहीं पर रहेंगे.’’—समर बत्तमीज़ी से बोला. “आप कहें या न कहें हम लोग अब यहीं रहेंगे.’’—बहू भी जोर से चिल्लाकर बोली.

मैंने कहा—“ मुझे शांति से रहने दो. मैं तुम्हारे साथ रही तो मर जाऊँगी.”

बेटा बोला—“रोकता कौन है? मर जाइये.’’

बहू चीखी—“आप मरना चाहती हैं.-- सूसाइड करेंगी. करिये न---. क्या खायेंगी? बताइये मैं ले आती हूँ.”

मैंने कहा—मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती तो इस पर समर मुझे धक्का देते हुए बोला---“तो चली जाइये अपनी बेटी के पास. पापा के बाद अब सब मेरी मर्ज़ी से होगा.’’

“बेटे- बहू ने मुझे घर से धक्का देकर बाहर निकाल दिया और पड़ोसी चुपचाप मुँह झुकाकर चले गये और नज़रें चुराकर तमाशाई बने रहे.” किसी ने चूँ नहीं की.”—रोते, सिसकते शालिनी ने अपनी कहानी अटक-अटक कर सुनाई. सब विवरण सुनकर प्राची तैश में आकर बोली—

‘’इस खराब मौसम में घर से बाहर कोई अजनबी को भी नहीं निकालता. ऐसी नालायक संतान से तो भगवान संतान ही न दे. जवान बेटा मर जाये तो आदमी बर्दाश्त कर सकता है पर यह तो दारुण दुख है. बाप को मरे पंद्रह दिन नहीं हुए और तांडव शुरू कर दिया. बहू तो दूसरे घर की है बेटा तो पेटजाया है. लानत है ऐसी संतान पर.’’---प्राची तिलमिला कर बोलती चली गई.

“आपने 100 या 1090 पर पुलिस बुलाकर उन्हें जेल भिजवा दिया होता.’’---नलिन ने कहा

“कैसे करती?’’ कहते हुए उसके आँचल में द्रवित ममता अश्रुधार बन बह चली. अश्रुभरी पलकें ऊपर उठाकर शालिनी तड़प कर बोली—

“काश! मैं उसकी माँ न होती.’’