व्हाट्सएप ग्रुप

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आर0 के0 लाल


     उनके आंख में तो आंसू ही आ गए थे। उन्होंने कहा मुझे पता ही नहीं था कि लोग मेरा कितना ख्याल रखते हैं । ये मेरे मौसा जी थे। वे कहते सब कुछ बेटी तुम्हारे कारण संभव हुआ है। तुमने सभी को एक साथ जोड़ दिया है। हमेशा मेरी तारीफ व्हाट्सएप पर भी करते।

    पिछले साल जब मैं यहां आई थी तो एक सुबह नाश्ते की टेबल पर मौसा जी अखबार पढ़ते हुए कह रहे थे कि आज डॉक्टरों की फीस इतनी हो गई कि आदमी बीमारी से बाद में मरे, फीस देते देते पहले ही मर जाए। मेरी मौसी ने भी कहा - “यह बात तो सच है, डॉक्टर एक बीमारी के लिए सौ- सौ टेस्ट करा देते हैं। नहीं कराएंगे तो उनकी फीस कैसे बनेगी, पैसा कैसे कमाएंगे और इतना बड़ा अस्पताल कैसे चलाएंगे।” उनकी बात काटते हुए  महेश ने कहा था कि बात तो ठीक है पापा लेकिन आप अपना ट्रीटमेंट बीच में नहीं छोड़ेंगे और जितना भी टेस्ट की जरूरत हो सब कराएंगे। कोई भी लापरवाही उचित नहीं है। आप बिना मतलब चिंता करते रहते हैं। आज आप की बर्थडे भी है आप एंजॉय करिए और नाश्ता कीजिए।”

      मौसाजी ने बड़े चिंतित स्वर में अपनी व्यथा व्यक्त की थी,- “महेश कह तो ठीक रहा है लेकिन मैं तो जानता हूं कि उसके पास कितनी कमाई है । पूरे घर का खर्च भी तो वह उठा रहा है। मैं तो सिर्फ खर्च करवा रहा हूं”। तभी महेश के मोबाइल की घंटी बजती है। वह बताता है कि उसे किसी जरूरी काम के लिए ऑफिस जाना पड़ेगा। यह ऑफिस वाले तो संडे को भी नहीं छोड़ते हैं। मौसी ने कहा-  “ठीक है बेटा, क्या करोगे, जाना तो पड़ेगा ही। बहुत काम कराते हैं। पूरा खून चूस लेते हैं। ठीक है तुम जाओ। टिफिन लेते जाना।”

        महेश अंदर तैयार होने गया उसकी पत्नी कनिका भी उसके पीछे पीछे गई। मैंने उनकी बातें सुनी थी। भाभी ने पूछा कि उसकी बेटी अंकिता को डांस क्लास ज्वाइन करवाना है या नहीं? महेश ने कहा - “हां बाबा जल्दी ही ज्वाइन करा देंगे। पहले बाबूजी का इलाज पूरा करा दूं।” कनिका ने गुस्से में कहा-  “तुम तो हमेशा ही कहते हो कि जल्दी करा देंगे । पता नहीं तुम्हारा जल्दी कब आएगा। महेश ने समझाया- अरे सब हो जाएगा, कौन सा उसे डांसर बनाना है। मगर भाभी ने तो आफत ही कर दी थी कि अंकिता के सारे फ्रेंड में से कोई इंटीरियर डेकोरेशन क्लास जाता है तो कोई संगीत क्लास। बोली- “देखो जी, मुझे अपने बच्चे को किसी से पीछे नहीं रखना।” महेश खीझते हुए चिल्लाया था-  तो क्या करूं? बेस्ट ट्यूशन करवाता हूं, शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ा रहा हूं। अपनी हैसियत से ज्यादा खर्चा करता हूं। क्यों सुबह-सुबह किचकिच कर रही हो? इस समय पैसे की तंगी है, बाबूजी की बीमारी है। उनके पास कोई कमाई भी तो नहीं है। मुझे ही तो करना है फिर तुम्हें क्यों खराब लगता है?”

आंसू बहाते हुए कनिका बोली - “तुम्हें तो मेरी हर बात काटती है। संडे का इंतजार करती हूं कि दो पल साथ रहेंगे, मगर मेरे और मेरे बिटिया के लिए तुम्हारे पास समय ही कहां है। शादी के सात साल हो गए हैं मगर हम लोग कभी शहर से बाहर गए ? कहा था कि नेक्स्ट मंथ महाबलेश्वर जाएंगे। तुमने तो आज तक कोई एक गहना भी नहीं बनवाया है। बेटी बड़ी होगी, उसकी शादी भी करनी होगी। सारा पैसा अपने घर वालों पर ही खर्च कर देते हो फिर कहां से आएंगे। मेरी तो समझ में ही नहीं आता।” फिर पूछा कि शाम को पार्टी पर आओगे या पार्टी खत्म होने पर । पता नहीं इस बुढ़ापे में बाबूजी के बर्थडे मनाने की क्या पड़ी है?” बाबा 6:00 बजे तक आ जाऊंगा यह कहते हुए महेश टिफिन उठा कर के घर से निकल गया था।

जाते-जाते महेश ने मुझसे कहा था मुझे समझ में नहीं आता कि आखिरी पत्नी क्या चीज होती है। मेरी इतनी कम कमाई भी नहीं है कि किसी का इलाज ना करा सकूं। सारा पैसा तो उसे ही दे देता हूं । जो कुछ कहती है वही करता हूं फिर उसका ऐसा व्यवहार क्यों? कनिका मुझसे ज्यादा पढ़ी लिखी है, सोशलॉजी में  पीएचडी है। पढ़ते समय उसने कई दफे ब्लड डोनेट किए थे और आज भी आवारा पशु जानवरों के संरक्षण के लिए कुछ न कुछ करती रहती है। शादी के बाद बाबूजी ने ही उसे नौकरी करने से रोक दिया था- “हमारी बहू पढ़ी-लिखी है नौकरी तो कर सकती है मगर हमारे घर की परंपरा नहीं है कि बेटियों से काम कराया जाए। वह घर की लक्ष्मी होती है इसलिए हम सब मेहनत करेंगे और वह घर संभालेगी। हम सभी का ख्याल रखेगी।” वे भी कनिका का बहुत ख्याल रखते थे। हमेशा उसके लिए गिफ्ट या साड़ियां लाते ही रहते थे।

         आज की घटना तो बहुत साधारण थी मगर ना जाने क्यों मेरा मन उन लोगों की बातों में ही लगा रहा और दिन भर सोचती रही थी कि ऐसा क्यों है। मुझे लग रहा था जी शायद अभी तो यह शुरुआत है कहीं बात बिगड़ ना जाए, आपस में लड़ाई होने और  परिवार के सभी सदस्यों के बीच मनमुटाव होने का ख्याल आ रहा था। मुझे कुछ करना चाहिए।

       याद आया कि जब कनिका की डिलीवरी होनी थी तो उसे बहुत तकलीफ थी और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। डॉक्टर ने कह दिया था कि तुरंत ऑपरेशन कराओ वरना जान का खतरा है। तब मौसी कितनी परेशान हुई थीं। कई दिनों तक वह अस्पताल में उसके साथ दिन रात रहती थीं और उसकी देखभाल करती थीं । खाना भी ठीक से नहीं खाती थीं। कहती कि जब सही तरीके से जच्चा बच्चा घर आ जाएंगे तभी ठीक से खाऊंगी । कनिका भी इस बात को समझती है कि मां की सेवा के कारण ही वह स्वस्थ हुई थी। मगर आज पैसे को लेकर क्यों उसके मन में खटास आ गई है। मैं सोचने लगी कि मैं क्या कर सकती हूं। मैंने अपने       

      मन को समझाने की कोशिश की, यह इनके घर का मामला है। इसमें मैं क्या कर सकती हूं । हां अगर कभी कुछ कहेंगे तो मैं कुछ पैसे की मदद कर सकती हूं। मगर मुझे लगा कि ऐसी परिस्थिति में कोई किसी से पैसा तो मांगता नहीं और कोई देता भी नहीं। केवल उधार ही लेकर लोग काम चलाते हैं। कैसे इस परिवार की मदद करूं मैं? यह समझ में नहीं आ रहा था। जरूर उनके खर्चे बढ़ गए होंगे।

     याद आया कि मेरी सहेली की मम्मी एक बार गिर गई थी और उनका पैर टूट गया था। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था । मेरी सहेली और उसके पति बहुत दुखी रहते थे । मां के इलाज के लिए नहीं, मगर इस बात से ज्यादा दुखी थे कि उनके यहां मम्मी को देखने बहुत ढेर सारे मेहमान एक-एक करके आ रहे थे। उनके रहने खाने-पीने की व्यवस्था करनी पड़ रही थी। कई को तो स्टेशन पर ही रिसीव करना पड़ रहा था और उन्हें वापस गाड़ी भी पकड़वाने जाना होता था। अस्पताल के खर्च के अलावा घर का खर्च काफी बढ़ गया था। अगर किसी की खातिरदारी ठीक से नहीं की गई तो बिरादरी में उनकी नाक ही कट जाती। उसके जीजू तो सारे बच्चों के साथ आए थे और उसकी कार भी  दो दिन तक लेकर घूमते रहे। अस्पताल जाने के लिए कैब बुलाना पड़ा था। वह ससुराल में आए थे इसलिए वापस जाते समय उनको विदाई अलग से देनी पड़ी। ऐसे में मां की कोई सेवा नहीं हो पा रही थी। कोई आर्थिक मदद भी नहीं करने वाला था।

      मैं सोचती रही कि इस तरह की सामाजिक प्रचलन क्यों है? किसी की बीमारी में तो उसे लोगों के मदद की जरूरत होती है ना की मुसीबत बढ़ाने वालों की। अक्सर लोग अस्पताल में अनावश्यक भीड़ लगाकर डॉक्टर और मरीज दोनों की परेशानी बढ़ाते हैं।

      मै सोच रही थी कि जब किसी के यहां शादी ब्याह या बर्थडे पार्टी में जाते हैं तो लोग कोई उपहार की जगह नगद रखकर लिफाफा देते हैं। इस रकम से बहुत मदद मिलती है।  फिर हमारे समाज वाले किसी की बीमारी में ऐसा क्यों नहीं करते? मेरे दिमाग में उथल-पुथल मची थी कि क्या मैं कुछ इस तरह का कार्य कर सकती हूं। मैंने कुछ करने की ठानी।

   मैंने व्हाट्सएप का अपना एक अलग ग्रुप बना रखा था जिसकी मैं एडमिनिस्ट्रेटर हूं। इस ग्रुप में मेरे लगभग 50 से ज्यादा रिश्तेदार एवं दोस्त हैं और प्रतिदिन सभी से कुछ ना कुछ चैटिंग होती रहती है। मैंने इस ग्रुप की मदद लेने की सोची। लेकिन सवाल था कि क्या वे लोग मेरी बात पर ध्यान देंगे। मुझे तो लगा कि सभी मेरे ऊपर हंसेंगे। फिर भी मैंने हिम्मत करके व्हाट्सएप पर मैसेज भेजा कि हम अपने ग्रुप के सदस्यों की बीमारी में व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से थोड़ी बहुत आर्थिक मदद करना चाहते हैं। ऐसे समय में सभी को पैसे की जरूरत होती है, भले वह मांगे या ना मांगे, सदस्यों को भी अच्छा लगेगा। आज बिजी लाइफ में किसी के पास बीमार दोस्त या रिश्तेदार को देखने जाने का समय नहीं है इसलिए सामूहिक रूप में हममें से कोई एक व्यक्ति हम सब  की तरफ से बेस्ट विशेज देने जाएगा और उन्हें एक छोटी सहयोग राशि देगा। ठीक उसी प्रकार जैसा कि लोग बर्थडे अथवा शादी विवाह के फंक्शन में देते हैं। मैंने व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्यों की प्रतिक्रिया जाननी चाही। यह भी लिखा कि यदि वें सहमत हों तो कृपया बताएं कि क्या वे इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग देंगे?

मुझे यकीन ही नहीं हुआ जब मैसेज भेजते ही मुझे पांच छह ऐसे उत्तर मिले जिसमें इस सोच के लिए मुझे सराहा गया था। उन्होंने अपनी सहमति के साथ कहा कि ऐसा करना ग्रुप के हित में होगा। देखा देखी काफी सदस्य तैयार हो गए। मैंने पुनः सभी को धन्यवाद देते हुए मैसेज भेजा कि हम लोग मात्र ₹100 प्रति व्यक्ति देंगे जब कोई सदस्य अस्पताल में होगा। मैंने अपने मौसा जी, जो हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्य थे  की परिस्थिति के बारे में सबको अवगत कराया। चमत्कारिक रूप से काफी सदस्य तैयार हो जाए गए। करीब 40 लोगों ने पेटीएम करके हर एक ने ₹100 भेज दिए। यह अविश्वसनीय ही लग रहा था परन्तु मुझे लोगों का सहयोग मिला।

       मुझे पता है कि ग्रुप के पांच दस सदस्यों ने मेरे इस प्रयास की भरपूर आलोचना भी की थी और तरह तरह के सवाल भी उठाए थे। पिछले एक वर्ष में हमने इस तरह के कई प्रयास किए हैं। लोगों का सहयोग मिला है। हम में से कोई एक बीमार सदस्य के पास जाता है और उसकी पूरी खबर हमें मिल जाती है।

बाद में कनिका को भी अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने घरवालों से अनुमति लेकर  कहीं नौकरी ज्वाइन कर ली। आज उसके बाद अच्छी कमाई है।

      सभी लोग व्हाट्सएप ग्रुप की कुछ ना कुछ बुराई करते रहते हैं। लोग इसका दुरुपयोग करते हैं तरह-तरह की अफवाहें फैलाने में हिस्सा लेते हैं। मगर मुझे लगा था कि इससे कुछ अच्छे सामाजिक कार्य भी किए जा सकते हैं। सच! केवल सामाजिक बदलाव और सोच की जरूरत है।

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रेट व् टिपण्णी करें

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Ankita prajapati 4 महीना पहले

very good thoughts

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ansit 5 महीना पहले

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r k lal Verified icon 5 महीना पहले

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Mrinal 5 महीना पहले

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Raghav 5 महीना पहले