छूटी गलियाँ - 15

  • छूटी गलियाँ
  • कविता वर्मा
  • (15)

    "नेहा जी मुझे पता नहीं है आपको क्या परेशानी है और पता नहीं मैं इसमें कोई मदद भी कर सकता हूँ या नहीं लेकिन एक बार कह कर तो देखिये आपका मन कुछ हल्का हो जायेगा" मैंने फिर कोशिश की।

    उसने तो जैसे कुछ सुना ही नहीं लेकिन फिर बड़बड़ाने लगी,"अब क्या ठीक होगा लगता है अब तो सब कुछ ही बिगड़ जायेगा, राहुल को सब पता चल जायेगा पता नहीं फिर वह कैसे रिएक्ट करेगा। कैसे उसे संभालूँगी, कैसे उसके सवालों के जवाब दूँगी।" फिर उसने मेरी तरफ देखा सीधे मेरी आँखों में और घबराये से स्वर में बोली "मैं क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा है।"

    "नेहा जी घबराइये नहीं हर समस्या का समाधान होता है आप हिम्मत रखिये पहले बताइये तो क्या परेशानी है?" मैं इधर उधर देखने लगा तभी पार्क का चौकीदार दिखा मैंने इशारे से उसे बुलाकर बीस रुपये का नोट दिया और पानी की एक बॉटल लाने को कहा।

    "सोच सोच कर मेरा सर फटने लगा है मुझे कोई हल नहीं सूझ रहा।" वह फिर चुप हो गई।

    पानी पीकर उसने गहरी सांस ली फिर कहने लगी "मेरे बड़े भैया के नए मकान का उद्घाटन है उसके निमंत्रण के लिए उन्होंने विजय को फोन किया था लेकिन उन्होंने फोन काट दिया। भैया ने कई बार कोशिश की फिर मुझे फोन किया। मैंने कहा कि शायद क्लीनिक में व्यस्त होंगे। जब भी भैया विजय के बारे में पूछते हैं मैं यही कह कर बात ताल देती हूँ लेकिन इस बार वे मेरे जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।

    उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी विजय से कब बात हुई थी?

    भैया की पूछताछ से मैं पहले ही घबरा गई थी मेरे मुँह से यही निकला यही कोई एक महिने पहले। इससे उन्हें शक हो गया कि कुछ गड़बड़ है फिर तो उन्होंने सवालों की झड़ी ही लगा दी। मैं उनके सवालों के जवाब देने में अकबका गई और अब दोनों भैया यहाँ आ रहे हैं, अब उनके सामने सारी बात खुलेगी उनसे तो झूठ नहीं बोल सकती ना? दोनों भाइयों के अलावा अब मेरा है ही कौन? उन्हें बताना ही होगा कि विजय ने वहाँ दूसरी शादी कर ली है और अब वे यहाँ कभी नहीं लौटेंगे। यह बात अब तक छुपाने के लिए मुझे उनके गुस्से का सामना करना पड़ेगा।अब राहुल को सारी बातें पता चलेंगी शायद ये भी पता चलेगा कि अब तक उससे फोन पर जो शख्स बात कर रहा है वह उसके पापा नहीं हैं। तब उस पर क्या गुजरेगी? और जब भैया को यह बात पता चलेगी  बारे में क्या सोचेंगे ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है मैं क्या करूँ?"

    समस्या वाकई विकट थी। अगर राहुल को ये पता चला कि उसका पापा बन कर कोई और उससे बात कर रहा है तो उसका अपनी मम्मी पर से विश्वास डगमगा जायेगा।पिछले छह सात महीनों से वह जिस व्यक्ति को अपना पिता समझ कर उस पर भरोसा करता है वह कोई फ़र्ज़ी व्यक्ति है।कहीं वह ये न सोचने लगे कि उसकी मम्मी का किसी और के साथ ... छी ये मैं क्या सोच रहा हूँ मैं अंदर तक काँप गया। उसे कैसे विश्वास दिलाया जा सकता है कि कोई सिर्फ उसकी और उसकी मम्मी की मदद करने के लिए उससे बात कर रहा है।

    "आप अपने भाइयों को फोन पर ही सबकुछ क्यों नहीं बता देतीं? फिर शायद वे यहाँ आएं ही नहीं और राहुल के सामने ये बातें न खुलें।"

    "बड़े भैया बहुत गुस्से में हैं। मैंने उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई बात नहीं सुनी, कहते हैं तूने हमें इतना पराया कर दिया और अभी भी हमसे झूठ ही बोल रही है। अब मुझे तुझसे कुछ नहीं सुनना है मैं खुद पता करूँगा मामला क्या है। मुझे लगता है वे विजय के बारे में सारी खोजबीन करवा रहे हैं। अब उन्हें विजय की शादी बच्चे सब के बारे में पता चल जायेगा। अब तो उनका सामना करने की हिम्मत भी मुझमे नहीं है।"

    "पिछले तीन सालों में उन्होंने कभी विजय के बारे में नहीं पूछा उससे बात करने की कोशिश नहीं की?"

    "पूछा तो उन्होंने कई बार, कई बार फोन भी किया बात नहीं हुई तो मुझसे भी कहा पर हर बार मैंने कभी मीटिंग कभी कॉन्फ्रेंस का बहाना बना दिया या अपनी तरफ से कोई झूठा मैसेज दे दिया। पहले विजय बर्थ डे या एनीवर्सरी पर भेजे मेल्स और ग्रीटिंग्स का जवाब दे देते थे इसलिए बात न हो पाना भैया को खटका नहीं। इस बार जब बार बार और कई दिन तक फोन काटा गया तो उन्हें शक हो गया।"

    "आपकी बात बड़े भैया से हुई और छोटे भाई वे कहाँ हैं, आप उनसे बात करिये शायद वे आपकी बात समझ जाएँ।"

    "वे दोनों ही बुरी तरह नाराज़ हैं बस एक ही बात कह रहे हैं कि यहाँ आकर आमने सामने बात करेंगे और सच्चाई का पता खुद लगाएँगे। "

    "एक न एक दिन तो ये बात सबको पता चलना ही थी आपके भाइयों को भी फिर आप क्यों घबरा रहीं हैं? वे भी तो विजय से उसके किये की कैफियत माँगेंगे।"

    "उससे क्या होगा? विजय तो वापस आने से रहे। मैं तो भाइयों का और राहुल का खुद पर से विश्वास टूटने से डर रही हूँ। राहुल इस सच्चाई को कैसे सहन करेगा इस बात की सबसे ज्यादा चिंता है।"

    "राहुल को भी एक दिन इस सच को जानना ही है। वैसे मुझे लगता है कुछ कुछ अंदाज़ा तो उसे हो ही गया होगा जब मैंने उससे पाँच साल तक वापस ना आने की बात की थी।"

    "क्या पता हुआ भी हो या ना भी हुआ हो। अगर दूसरी शादी का अंदाज़ा हुआ होता तो वह नाराज़गी ज़ाहिर करता, मुझसे इस बारे में बात करता। वह तो गुमसुम हो गया था ये जान कर कि विजय पाँच साल तक वापस नहीं आ रहे हैं।"

    "कहीं ऐसा तो नहीं कि इस स्थिति में वह खुद को खुद के और मेरे लिए ज्यादा जिम्मेदार मानने लगा है इसलिए उसने अपना बचपना छोड़ गंभीरता ओढ़ ली है। मेरा छोटा सा बच्चा जाने उसे क्या क्या झेलना है?" नेहा ने ठंडी सांस ली। मुझे सनी का गीता और सोना की मौत के लिए खुद को जिम्मेदार मानना याद आ गया।

    "अगर ऐसा भी है तो चिंता मत करो वह बहुत समझदार है इस बात को स्वीकार तो उसे करना ही है और वह कर लेगा। लेकिन यह बात उस पर कैसे जाहिर करना है इस बारे में सोचते हैं।"

    अँधेरा घिरने लगा था पार्क खाली होने लगा था मैंने आस पास देखा, नेहा भी सजग हुई और उठ खड़ी हुई, "अब चलना चाहिए राहुल घर में अकेला है।"

    "उसकी परीक्षाएं ख़त्म हो गई ना? अभी कहाँ है वह?"

    "आज आखरी पेपर था अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था। मुझे सोच सोच कर घबराहट हो रही थी इसलिए यहाँ चली आई। अच्छा हुआ आप मिल गये आपसे बात करके मन हल्का हुआ।"

    "आप इतनी परेशान थीं लेकिन फिर भी आपने एक फोन करके अपनी परेशानी बाँटने की नहीं सोची, अकेले ये बोझ उठाती रहीं।" मैं नाराज़ तो क्या होता लेकिन हाँ एक छोटी सी शिकायत करने से खुद को रोक ना पाया।

    "आप प्लीज़ इसे अन्यथा ना लें, सच तो ये है कि आपसे बात करके मन हल्का हो गया है।" नेहा के स्वर में संकोच था। "आपका ख्याल तो आया था लेकिन फिर सोचा सनी अभी घर वापस आया है उसकी भी परीक्षाएं हैं ऐसे समय में आपको क्यों परेशान करूँ?"

    मैं हँस दिया।

    उस रात देर तक मैं राहुल के बारे में सोचता रहा क्या किया जाए कि वह इस कड़वे सच को आसानी से बर्दाश्त कर ले। मैं राहुल में सनी को देखने लगा था उस सनी को जिसे मैं यहाँ अकेला छोड़ गया था। उससे बातें करते हुए मैं उस उम्र के बच्चे के पिता की अनुभूति करता था। उन्ही दिनों की वे जिम्मेदारियाँ जिनसे मैं मुँह मोड़कर चला गया था। मैं भी तो अपने पितृत्व के उस भाग से वंचित रह गया था चाहे मेरे ही निर्णय के कारण लेकिन अब उस समय और उन जिम्मेदारियों को पूरी शिद्दत से फिर जीना चाहता था। और अब अपनी गलतियों से सीख लेते हुए बिना किसी गलती के ताकि राहुल को संभाल सकूँ। उससे बाते करते मैं भूल जाता था कि सच में मैं उसका पिता नहीं हूँ। लेकिन आज ये एहसास हो रहा था कि इस तरह झूठी आस से मैं उसका अहित ही कर रहा हूँ। प्रकट में भले ये सही लगे लेकिन जिस दिन सच का पता चलेगा और वह दिन शायद बहुत जल्दी आने वाला है उस दिन उसे जो धक्का पहुँचेगा उससे उबरना उस बच्चे के लिए कठिन होगा। नींद में सपने में भी यही सब विचार चलते रहे।

    सुबह आँख खुलते ही मानो कुछ कौंध सा गया दिमाग में। जब किसी परेशानी का हल ढूँढना इंसानी सोच के लिए बहुत मुश्किल होता है तब अवचेतन मन उसका समाधान सामने रख देता है। ऐसा ही कुछ मुझे महसूस हुआ। मैं नेहा से बात करना चाहता था लेकिन वह तो अभी स्कूल गई होगी मैं शाम होने का इंतज़ार करने लगा।

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    Right 2 सप्ताह पहले

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    jagruti rathod 3 महीना पहले

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    Indu Talati 3 महीना पहले

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    Swati 3 महीना पहले

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    Harbalaben Dave 3 महीना पहले