राबिया का जूता Omprakash Kshatriya द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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राबिया का जूता

राबिया का जूता

ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश'

राबिया अपने भाई के पुराने जूते पहन—पहन कर परेशान हो गई थी. उस ने कई कोशिश की मगर, उसे नए जूते नहीं मिले. इस बार उस ने पापा से कह दिया, '' पापाजी, यदि मुझे नीलम जैसे जूते नहीं मिले तो मैं स्कूल नहीं जाऊंगी.''

पापाजी ने उसे समझाया, '' इस बार घर में इतना पैसा नहीं है. फिर कभी नए जूते ले आऊंगा. '' मगर, राबिया नहीं मानी.

'' आप कई बार मुझे बहला चुके हैं. मैं इस बार नए जूते लिए बिना स्कूल नहीं जाऊंगी,'' राबिया ने जिद पकड़ ली.

आखिर पापाजी ने हार मान ली. उसे नए जूते दिला दिए.

राबिया नए जूते पहन कर बहुत खुश हुई. उस की कई साल से पाली हुई मुराद पूरी हो गई थी. वह जूतें को हाथ में ले कर नाचने लगी. कई बार उसे देखती रहती. ये वही जूते थे जिसे वह कई साल से पहनने का सपना देख रही थी.

उस ने मन ही मन खुश हो कर कहा, '' मैं कल स्कूल जाऊंगी तब नीलम को नए जूते बताऊंगी. देख नीलम तेरे जैसे जूते.''

इस खुशी में वह रात को जल्दी सो गई. उस ने जूते अपने पास रखे थे. मम्मी ने जूते अलग रखने के लिए कहा, '' राबिया ! जूते बिस्तर पर ले कर नहीं सोते. इसे अलग रख दो.''

इस पर राबिया ने कहा, '' मम्मी ! जूते नए है. इन्हें बिस्तर में रखने पर कोई दिक्कत नहीं है.''

मम्मी ने उसे समझाया, '' जूते बिस्तर पर नहीं रखते.'' तब जा कर राबिया ने उसे सिरहाने के पास रखा. जूते को हाथ से पकड़ा और सो गई. वे अपने सपनों के जूते को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी.

ये जूते उसे बहुत दिनों के बाद मिले थे. वह नहीं चाहती थी कि जूते से राबिया तनिक भी दूर हो. हो सकता है कोई उस के जूते चुरा ले. या कोई उठा कर ले जाए. यदि ऐसा होगा तो वह नीलम को कौनसे जूते दिखाएगी. यह सोच कर वह जूते ले कर सो गई.

सुबह जब वह उठी तो पापा उसी के पास सो रहे थे. वे आज काम पर नहीं गए थे. जब कि रोज इस समय वे काम पर चले जाते थे. यह देख कर उस ने मम्मी को आवाज दी, '' मम्मीजी ! पापा आज काम पर नहीं गए ?''

मम्मी टाल गए, '' तू मुंह-हाथ धो लें. पापाजी आज काम पर नहीं जाएंगे.''

यह सुन कर राबिया का अजीब लगा. मम्मी की आंखें नम थी. वे चिंतित दिखाई दे रही थी. यह देख कर राबिया ने कहा, '' नहीं मम्मीजी ! आप पहले बताइए क्या बात हैं ?''

मगर, मम्मी ने कुछ नहीं बताया. तब राबिया पापाजी के पास चली गई. उस ने पापाजी को जगाने के लिए उन के गाल पर हाथ लगाया. वह चौंक उठी,'' मम्मी ! पापाजी को जोर का बुखार है.''

मम्मी यह बात जानती थी. उन्हों ने कुछ नहीं बोला. तब राबिया ने दोबारा कहा, '' मम्मी ! पापाजी को बुखार है. इन्हें दवाई नहीं दी.''

इस पर भी मम्मी चुप रही. केवल इतना बोल पाई, '' मुझे पता है. मगर, '' वे कुछ छूपा रही थी.

'' मगर, क्या मम्मी ! पापाजी को दवाई देना चाहिए थी ना ?'' राबिया के आंख में आंसू आ गए.

इधर मम्मी चुप थी. मगर, उन की आंखें बहुत कुछ कह रही थी. यह जान कर राबिया ने दोबारा कहा, '' मम्मी ! क्या बात है. आप बोलती क्यों नहीं. पापाजी को दवा क्यों नही दे रही है.''

इस पर मम्मी ने कहा,'' राबिया ! दवा के लिए पैसे चाहिए.''

यह सुनते ही राबिया सब समझ गई. दवा के पैसे से पापाजी उस के लिए जूते ले आए थे. जूतें के लिए पैसे कम पड़ रहे थे. उन्हों ने राबिया को समझाया था. पैसे कम है, बाद में जूते ले आएंगे. मगर, वह जिद पर अड़ी हुई थी.

पापाजी ने उस की जिद के आगे हार मान ली थी. वे अपनी दवा के पैसे मिला कर जूते ले आए थे. उसी की वजह से पापाजी की दवा नहीं आई थी. इसी वजह से वे बुखार में लेटे हुए थे. यह जान कर राबिया दुखी हो गई.

जिन जूतों को ले कर वह खुश थी, वे जूते उसे काले सांप की तरह लगने लगे. उस ने झट से जूते उठाए. मम्मी को दे कर बोली, '' मम्मी ! मुझे जूते नहीं चाहिए. आप इसे वापस दे कर पापाजी की दवा ले आइए. जूते तो फिर आ सकते हैं.''

यह सुनते ही मम्मी ने राबिया को गले लगा लिया, '' राबिया ! तुम तो बहुत समझदार हो गई हो,'' यह कहते हुए मम्मी जूतें ले कर बाजार की ओर चल दी. ताकि वह जूते वापस कर के राबिया के पापाजी के लिए दवाई ला सकें.

राबिया अब बहुत खुश थी. उसे जूते का मोह नहीं रहा था.

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01/04/2019

ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश'

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