रात के ११बजे भाग ६

संस्कारों का क्या होगा। यमराज भी इस बात से सहमत हो गए और उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि भारत के नेताओं को जब बहुत ही आवश्यक परिस्थितियां हो तभी यमलोक लाया जाए।

इसीलिये हमारे देश में आंधी, तूफान, सूखा, बाढ़, आतंकवाद आदि में निरपराध नागरिक ही मारे जाते हैं पर कोई भी नेता नहीं मरता, क्योकि यमराज का यही आदेश है। इसलिये तुम अभी बहुत सालों तक जिन्दा रहोगे और डार्लिंग इसी प्रकार अपनी गतिविधियां चलाते रहोगे।

यह सुनकर आनन्द का मन थोड़ा ठीक हुआ। टैक्सी लगातार अपने गन्तव्य की ओर बढ़ी चली जा रही थी। उसने पल्लवी को अपनी ओर खींचते हुए कहा- मैं इसीलिये तो तुम पर फिदा हूँ क्यों कि कठिन समय में तुम ही मेरा सहारा हो। सच कहूं तो आज तुम कल रात से भी अधिक हसीन लग रही हो। तब पल्लवी ने कहा था कि आप मुझे बहुत देर बाद मिले। अगर आप उस समय मिले होते जब मैं एक बार डांसर थी तो मैं आज कहीं की कहीं होती। पेट की भूख मिटाने के लिये ही मैं बार डांसर बनी थी। जिस समय मैंने यह काम प्रारम्भ किया था उस समय मेरी मजबूरी थी। लेकिन कुछ दिनों के बाद मैं उस काम में डूब गई। मुझे समझ में आ गया था कि यदि इस शरीर को बचाना और बनाना है तो कुछ न कुछ कमाना जरुरी है। कमाने के लिये भी इसी शरीर का उपयोग करना पड़ता है। शराफत से कमाउंगी तो इतना नहीं कमा पाउंगी जिससे पूरी जिन्दगी चल जाए। जब जीना ही है तो ठाठ से जियो। खुद भी मौज करो और दूसरों को भी मौज करने दो। जवानी तो एक दिन ढल ही जाना है। इसलिये मैंने खुलकर जीना सीख लिया। आप मिल गये होते तो अपने आप को आपको ही पूरी तरह समर्पित कर देती। मेरी एक बारबाला सहेली थी। बड़ी धार्मिक थी। उसके एक प्रेमी ने उसकी दिनचर्या पर एक बार लिखा था।

वह प्रतिदिन सुबह नहा-धोकर पूजन पाठ करती है और प्रतिदिन शाम को एक बार में जाकर जाम भर-भर कर मयकशो को पिलाती है। सुबह वह इतनी तल्लीनता से भजन गाती है कि लगता है जैसे कोई गोपी नाच रही हो। सुनने वाले प्रभु की भक्ति में लीन हो जाते हैं। शाम को वही जब बारबाला के रुप में नाचती है तो उसके अंग-अंग से जो मादकता छलकती थी। उसके नशे में लोग होशो-हवाश खो कर अपना सब कुछ उस पर न्यौछावर करने लगते थे। नारी के कितने रुप हैं। जब वह एक माँ या एक बहिन के रुप में होती है तो वह समाज का सबसे सम्माननीय अंग बन जाती है और जब वही नारी वासना की मूर्ति के रुप में सामने आती है तो समाज का हर वर्ग उसे कामुकता की नजर से देखता है। यह उसकी मजबूरी है कि उसे रोटी, कपड़ा और मकान के लिये अनेक रुप रखना पड़ते हैं। कभी वह मन्दिर में पवित्रता की मूर्ति बनती है तो कभी मदिरालय में वासना की मूर्ति।

पल्लवी बोली- बीती बातों को भूल जाएं। दोपहर का एक बज गया है। दिस इज द राइट टाइम फार बियर। आनन्द ने गौरव से कहा- जाओ बियर ले आओ! लेकिन गौरव अपनी जगह पर कसमसाया तो जरुर पर उठा नहीं। आनन्द समझ गया। उसने अपना पर्स निकाला और पैसे निकाल कर गौरव की ओर बढ़ाये। गौरव उतरा और जाकर छैः बोतल बियर की ले आया। बियर का दौर चल पड़ा। चार घूंट बियर हलक में जाते-जाते ही पल्लवी गुनगुनाने लगी-

 

कोई पीता है पीने के लिये

कोई पीता है जीने के लिये

जब पिलाती है साकी कोई

पीने का मजा कुछ और ही होता है

मदिरा पीकर जीवन हो जाता है कम

पर हम और अधिक पीते जाते हैं

पीकर बहकने वाले को

उठाकर फेक दिया जाता है

जो नहीं बहकता

वह नृत्य और संगीत की थाप पर

बारबाला का प्यार पाता है।

मदिरा होती है गरम

और जेब भी रहती है गरम

बोतल है चुम्बक सी

नोटों को खींच लेती है

पीने वाला अपने घर और परिवार को

भूल जाता है और

मदिरा में डूब कर ही

सारी खुशियां पाता है।

जब जेब होती है खाली

तो घर याद आता है

मदिरा की असली कीमत

तो अब वह चुकाता है।

जब घर वाले उसे छोड़

कहीं और चले जाते हैं

और वह उन्हें पाने की लालसा में

भटकता रह जाता है।

 

गौरव यह सुनकर बोल उठा- तुम तो बहुत अच्छी काव्य रचना भी कर लेती हो।

पल्लवी अपने दोनों हाथ उसके गले में डालकर बोली- जानी अभी तुमने देखा ही क्या है? तुम्हारे तो दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं। गौरव पर बियर का असर हो रहा था। उसका बहकना चालू हो गया।

यू डोन्ट नो. आई एम ए इन्टरनेशनल आर्टिस्ट. आई हैव विज़िटेड सेवेरल कन्ट्रीज़ फार माइ एग्जीवीशन्स. गाड हैव गिविन मी आल दोज़ थिंग्स़. प्राइम मिनिस्टर हैड एवार्डेड मी फार माई ग्रेट पेन्टिंग्स. यू एण्ड योर दिस लवर कैन नाट अण्डर स्टैंण्ड देम. इफ आई स्टे इन न्यू  देलही, माय फ्रैन्डस विल श्योरली अरेन्ज ए सीट आफ पार्लियामेण्ट फार मी. आई कैन स्पैण्ट ए लाट आफ मनी विदाउट एनी ट्रबल. माई सन इज सेटेल्ड इन यू एस ए एण्ड फिफ्टीन हण्ड्रेड एम्प्लाइज़ वर्क्स अण्डर हिम.

पल्लवी ने आनन्द की ओर देखा और पूछा- ये क्या कह रहे हैं? आनन्द बोला- इसे और बियर चाहिए है। वही मांग रहा है। पल्लवी ने एक बोतल खोलकर उसकी ओर बढ़ा दी। उसने आनन्द से पूछा- तुम कहते थे कि तुम्हें मुझसे प्यार है, परन्तु नागपुर में तुम्हारे व्यवहार ने बता दिया कि तुम भी मुझे अपना स्वार्थ सिद्ध करने का साधन मानते हो। आनन्द स्वार्थी तो था किन्तु एक भावुक व्यक्ति भी था। पल्लवी की बात उसे लग गई। उसे अपनी गलती का भी एहसास हुआ और स्वयं के व्यवहार पर शर्म भी आई। वह पल्लवी के सामने अपनी सफाई देने के स्वर में बोला- मैं अपने पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन में बिलकुल तन्हा हूँ। मेरा न तो कोई दोस्त है और न ही कोई हितैषी। मैं जो सपने देखता हूँ वे हमेशा सपने ही रहते हैं। वास्तविकता को मैं पहचानता नहीं, कल्पना लोक में ही जीवन काट रहा हूँ। मैं तुम्हारा दर्द समझता हूँ। लोग तुम्हारे शरीर और तुम्हारी आत्मा को इसलिये तो रौंद सके क्योंकि तुम्हारे पास धन नहीं था। नागपुर में मैंने यदि कुछ गलती की है तो उसका कारण भी तो धन ही है। मैं तुम्हें धन की ओर से इतना सुखी कर देना चाहता हूँ कि सारे सुख तुम्हारी झोली में आ जाएं। फिर कोई तुम्हें रौंद न सके।

तुम स्वयं जानती हो यहां किसको किससे कितनी प्रीति है। यह दुनियां धन के बल पर चलती है। जब आदमी के पास धन होता है तो उसके सारे सपने पूरे होते हैं। सब उसके अपने होते हें। धनवान का सभी गुणगान करते हैं। इसके कारण वह भ्रम में पड़ जाता है और अपने आप को महान समझने लगता है। जिस दिन धन समाप्त हो जाता है उस दिन अपने तो क्या अपनी किस्मत भी हमसे रुठ जाती है। जो हमेशा हमारे साथ रहते थे वे ही हमारा उपहास करने लगते हैं। उस समय कोई साथ नहीं देता, सभी छोड़कर दूर चले जाते हैं।

पल्लवी आनन्द से पूछती है कि यदि ऐसा है तो अभी पिछले सप्ताह तुम मानसी को लेकर कहाँ-कहाँ घूमते रहे। एक दिन नहीं दो-तीन दिन तक लगातार। फिर तुमने मानसी से यह भी तो कहा था कि तुम गधे थे जो उसे नहीं पहचान पाये। उसकी और उसकी सुन्दरता की कीमत नहीं समझ पाये। इस मामले में राकेश तुमसे अधिक समझदार निकला जो उसने उसे दस हजार रूपयों की मदद की। अगर वह राकेश को छोड़कर तुम्हें अपना ले और तुम्हारे साथ आ जाए तो तुम राकेश द्वारा जितना भी धन उसे दिया गया है उसे लौटाने के लिये तुम उसे उतना धन देने के लिये तैयार हो और भविष्य में भी उसे जो भी जरुरत होगी तुम वे सब पूरी करोगे और उसे कोई कमी नहीं होने दोगे। मेरी समझ में नहीं आता तुम किस तरह के आदमी हो? मुझसे और मानसी से तुम्हें राकेश ने ही तो मिलवाया था। मुझे यह भी पता चला है कि राकेश ने तुम्हारे व्यापार में तुम्हारा साथ निभाया और उसके कारण तुम्हें करोड़ों को फायदा भी हुआ था। जिस आदमी ने तुम्हारा हर कदम पर साथ निभाया तुम उसी की पीठ में खंजर घोंपने का काम कर रहे थे। इतना सब जानकर मैं यह कैसे यकीन कर लूं कि तुम मेरा सारा रस चूसकर मुझे चूसे हुए आम की तरह एक दिन नहीं फेक दोगे।

गौरव ने बताया कि उस समय उसने भी कहा था कि आनन्द को ऐसा नहीं करना चाहिए था। राकेश उसका सच्चा मित्र है। लेकिन यह एक धोखेबाजी है। यह सुनकर आनन्द गौरव पर भड़क पड़ा था। बात बढ़ने से पहले पल्लवी बीच में बोल पड़ी- तुम मानसी को नहीं जानते। वह राकेश को सच्चे मन से प्यार करती है। वह उसे छोड़कर कभी भी आनन्द के साथ नहीं जा सकती। वह राकेश को कैसा चाहती है यह आनन्द नहीं समझता है।

इसी प्रकार की बातें करते हुए हम लोग नगर के करीब पहुंच चुके थे। रात प्रारम्भ हो चुकी थी। नगर के टिमटिमाती हुई रोशनी दूर से ही दिखने लगी थी। सभी दिन भर के सफर से थक चुके थे। पहले हम लोग पल्लवी के घर पहुँचे और उसे छोड़ा। फिर आनन्द मुझे मेरे घर छोड़कर अपने घर चला गया।

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गौरव की जुबानी नागपुर की कहानी सुनकर मानसी और राकेश स्तब्ध रह गये। मानसी ने कहा कि मुझे इस बारे में इतनी जानकारी नहीं थी। मैं आनन्द और पल्लवी के चरित्र से आश्चर्यचकित हूँ।

राकेश बोला- इसमें आश्चर्य की क्या बात है। दोनों की दोस्ती एक समझौता है। दोनों ही अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति में लिप्त हैं। पचमढ़ी का मौसम और खराब होता जा रहा था। बरसात और तेज हो गई थी। अब वहां पर रूकने का कोई मतलब नहीं था। इसलिये वे पचमढ़ी छोड़कर ट्रेन से वापिस रवाना हो गए। रास्ते में मानसी ने राकेश को पचमढ़ी में आनन्द से हुई बातें और गौरव के उसे आनन्द के प्रति आकर्षित करने के लिये किये गये प्रयास के संबंध में भी बतलाया। राकेश ने सारी बातें गम्भीरता पूर्वक सुनी किन्तु कोई उत्तर नहीं दिया। इस प्रकार अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ पचमढ़ी यात्रा का समापन हुआ।

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पचमढ़ी से लौटकर आज तीन दिन बाद राकेश घर पर बिस्तर पर पड़ा था। उसकी पत्नी आज बहुत प्रसन्न थी और सो चुकी थी। राकेश की आंखों से नींद गायब थी। उसका मन अशान्त था। आनन्द उसका पुराना मित्र था। उसके दोहरे चरित्र के संबंध में जानकारी प्राप्त होने पर उसे आश्चर्य हो रहा था। उसकी नजर में आनन्द अभी तक अत्यधिक भावुक, सीधा, सरल,ईमानदार और परोपकारी व्यक्ति था। उसने कुछ दिन पहले ही गौरव को बम्बई ले जाकर उसका एक मेजर आपरेशन करवाया था। उसकी पूरी सेवा भी स्वयं की थी और सारे खर्च भी वहन किये थे। उसका अपने मित्र के प्रति समर्पण एवं लगाव देखकर राकेश अभीभूत था। वह एक खानदानी धनाढ्य था जिसे धन की कोई कमी नहीं थी। कहीं-कहीं वह बहुत उदार हो जाता था तो कहीं-कहीं वह बहुत अधिक कंजूस भी हो जाता था। जैसे यदि वह चाहता तो मानसी की बेटियों आरती और भारती की पढ़ाई-लिखाई की पूरी व्यवस्था कर सकता था किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। मानसी को लेकर उसने जो कुछ किया था वह चौका देने वाला था। राकेश के कारण ही वह मानसी और पल्लवी के संपर्क में आनन्द आया था। राकेश ने ही उनकी मित्रता कराई थी। आनन्द पल्लवी की ओर पहले आकर्षित हुआ था। वह चाहता तो मानसी के प्रति सहृदयता दिखलाता और आज मानसी के दिल में भी उसके प्रति सम्मान का भाव होता। लेकिन उसने उसकी जरा सी मदद करने से भी मुंह मोड़ लिया था। तभी तो राकेश को उसकी सहायता करना पड़ी थी। अब वही आनन्द मानसी के लिये कुछ भी करने को तैयार था। यहां तक कि वह राकेश की और अपनी वर्षों पुरानी मित्रता को भूलकर उसके साथ कुटिलता पूर्ण व्यवहार कर रहा था।

गौरव भी राकेश का पुराना मित्र था। वह भी उसी के साथ आनन्द के संपर्क में आया था और उनके बीच भी मित्रता कायम हुई थी। वह दोनों के साथ अपने संबंध भली-भांति कायम रखे था। वह जिसके साथ होता था उसके ही मन की बात करने में निपुण था। वह मन का बुरा आदमी नहीं था। कभी भी किसी को कोई गलत सलाह नहीं देता था। उसमें केवल एक ही कमजोरी थी कि वह बहुत अधिक कंजूस था। चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए ऐसे ही लोगों के लिये कहा गया होगा। महुआ-मूसर की हांकने में वह बहुत प्रवीण था। सामने वाले को अपनी ओर आकर्षित करने में वह सिद्धहस्त था। एक बियर में वह आपा खो कर मन के सारे भेद उगल देता था। उसने मानसी से जो कुछ कहा-सुना या किया वह उसने आनन्द के कहने पर ही किया होगा। अपने मन से वह ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता था।

पल्लवी का पिछला जीवन बहुत कठिनाइयों और अभावों में बीता था। स्वाभाविक है कि उसका बचपन और किशोरावस्था बहुत अधिक लालसाओं से भरी हुई रही होगी। ऐसे में उसे जो लोग मिले उन्होंने उसे जिस धारा में मोड़ा वह उसी धारा में बह गई क्योंकि उसे उसमें अपनी लालसाओं की पूर्ति का रास्ता दिख रहा था। वह उचित और अनुचित को नही समझ सकी और आज भी नहीं समझती है। इस स्थिति ने ही उसे वह रुप दिया है जो आज उसका है। आनन्द से उसका परिचय राकेश के कारण ही हुआ था। इस परिचय से उसका जीवन संवर सकता है। यह बात राकेश ने भी उसे समझाई थी कि आनन्द उसके जीवन में किसी देवदूत के समान आया है, इसे खोना मत।

पल्लवी के समान ही मानसी का भी बचपन और किशोरावस्था अभावों में बीती, किन्तु उसका स्वभाव पल्लवी से अलग रहा। उसने अपने जीवन को संवारने के लिये वैसे प्रयास स्वीकार नहीं किये जैसे पल्लवी ने कर लिये। वह अपने परिश्रम और पुरूषार्थ के माध्यम से जीवन को संवारना चाहती है। राकेश के माध्यम से भी उसने केवल साधन जुटाने का प्रयास किया जिससे वह अपने परिश्रम के दम पर आगे बढ़ सके और अपने परिवार को सम्हाल सके। वह अपनी पुत्रियों को अभावों में नहीं देखना चाहती और उनके जीवन के प्रति सजग है। उसकी सोच में पल्लवी से पूरी भिन्नता और परिपक्वता है।

राकेश अपने विषय में सोचता है तो पाता है कि उसके लिये तो आनन्द और गौरव की खुशियां ही महत्वपूर्ण थीं और आज भी हैं। मानसी और पल्लवी तो अनजाने ही उनके बीच आ गईं हैं। आनन्द की मनः स्थिति के कारण जब वह पल्लवी के करीब आ रहा था तो उसने इसका कोई विरोध सिर्फ यह सोचकर नहीं किया था क्योंकि इसमें उसे आनन्द के चेहरे पर संतोष और प्रसन्नता दिख रही थी। गौरव की भूमिका तो तटस्थ थी किन्तु मानसी के साथ तो वह केवल इस कारण से जुड़ गया क्यों कि वह एक सहृदय और सच्ची महिला थी। वह एक ऐसी मां थी जिसे अपने बच्चों का जीवन संवारना था। वह अभावों से संघर्ष कर रही थी। इसी लिये वह उसकी मदद को आगे आया था। अब आनन्द मानसी की ओर खिंच रहा है और मानसी उससे दूर रहना चाहती है। इस सारे मकड़जाल के विषय में सोचता-सोचता ही राकेश कब सो गया उसे पता ही नहीं चला।

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समय तेजी से बीतता जा रहा था। राकेश जब सो कर उठा वह अपने आप को तरो-ताजा व प्रसन्नचित्त अनुभव कर रहा था। उसने अपने शयनकक्ष के परदे खोले तो सूर्योदय हो रहा था। सत्य का प्रकाश विचारों की किरणें बनकर चारों दिशाओं में फैल रहा था। वह प्रफुल्लित मन से चिन्तन कर रहा था। उसके मानस पटल पर पचमढ़ी की सभी घटनाएं एक-एक कर आ-जा रही थीं। सुख और सौहार्द्र का वातावरण उसे सृजन की दिशा में प्रेरित कर रहा था। आज की दिनचर्या का प्रारम्भ गम्भीरता से नये प्रयासों की समीक्षा कर रहा था। तमसो मा ज्योतिर्गमय के रुप में दिन का शुभारम्भ हो रहा था। वह मन हृदय व आत्मा में आगे आने वाले समय को देखने का प्रयास कर रहा था।

राकेश ने मानसी को वचन दिया था कि वह आरती को हीनताबोध से मुक्त करने के लिये प्रयास करेगा। उस दिषा में आगे बढ़कर उसने अपने मनोचिकित्सक मित्र के पास आरती को परीक्षण के लिये भिजवाया। वहां उसका पूरा परीक्षण करने के बाद चिकित्सक उसे कुछ सामान्य टानिक लिख देता है।

बाद में जब राकेश ने उससे संपर्क किया तो उसने बतलाया- आज समाज में लोग इतने भागमभाग में फंसे हुए हैं कि वे अपने बच्चों के लिये समय ही नहीं निकाल पाते। इससे बच्चों को माता-पिता का जो प्यार, जो संरक्षण और जो मार्गदर्शन मिलना चाहिए वह नहीं मिल पाता। वे अपने माता-पिता और घर के लोगों से उतना नहीं जुड़ पाते जितना उन्हें जुड़ना चाहिए। उनका जुड़ाव या तो अपने बाहरी मित्रों से होता है या फिर टी. वी., वीडियो गेम आदि से होता है। बाहरी मित्रों में भी उनके साथ अधिकांशतः वे ही मित्र जुड़ते हैं जो उनके ही समान परिवार से उपेक्षित होते हैं और जो अपने रास्ते से भटककर चमक-दमक भरे रास्तों पर आगे बढ़ गये होते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे हमजोलियों का साथ उनकी भावनाओं को और भड़काता है।

जो बच्चे टी. वी. से अधिक जुड़े होेते हैं उनमें भी विस्फोटक प्रवृत्तियों का जन्म होता है क्योंकि सामान्यतः वे उसमें शिक्षाप्रद या खेलकूद से संबंधित चेनलों को देखने के स्थान पर

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Asha Rajput 2 महीना पहले

Jitendra 2 महीना पहले

Shaba Shaikh 2 महीना पहले

Parita Chavda 3 महीना पहले

Arvind Solenki 3 महीना पहले