डर लगता है SURENDRA ARORA द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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डर लगता है

कहानी

डर लगता है

" क्यूँ किया है फिर से फोन ? मजबूरिया तुम्हारीं हैं और उनकी आग में झुलस मैं रहा हूँ . खुद पर कंट्रोल नहीं कर सकती और इर्धन मैं बना हुआ हूँ , आखिर मैंने तुम्हारा बिगाड़ा क्या है ? "

पंद्रह दिन पहले के असमंजस भरे कटु वाद - विवाद के अनबोले को झेलने के बाद वन्दिता का फोन आया तो आलोक बिफरे बिना रह नहीं सका क्योंकि दर्द की चीस उसके भी शरीर के हर कोने में लगातार उठ रही थी .

" .......................................! "

जब कोई उत्तर नहीं मिला तो बोला ," फोन किया है तो अब कुछ बोलती क्यूँ नहीं ? "

" कुछ कहने दो , तभी तो बोलूं . पिछले पंद्रह दिन किस तरह से गुजरे हैं , इसे बता पाना मेरे बस की बात नहीं है . हर रात आँखों में गुजरी है तो हर दिन की रौशनी चुभती हुई सी लगी है . जिन कार्यक्रमों से मेरा कोई नाता नहीं था , वहां भी जाती रही . जो काम मेरे मतलब के नहीं थे , उन्हें भी करती रही .आफिस से आने के बाद घर में भी नौकरानी की तरह खटती रही . हर बार यही सोचती कि खुद को इतना थका लूँ कि शरीर का अंग - अंग थक कर इतना चूर हो जाये कि रात को कम से कम उसे नींद तो आ जाए पर नींद ने मुझसे दुश्मनी पाल ली और मुझसे कोसों दूर भागी रही . अगर कुछ देर के लिए आ भी जाती तो उसी पल तुम्हारा सपनीला चेहरा मेरी आखों में समा जाता और तब मैं उठ कर बैठ जाती . "

" यह सब मुझे कहने से क्या होगा ! हम तो पहले ही एक - दूसरे के ऐसे किसी घेरे से बाहर हो चुके हैं . "

" जानती हूँ ! तुम मेरी कोई परेशानी हल नहीं कर सकते क्योंकि मैं ही तुम्हें करने नहीं दूंगीं , फिर भी मैं बेबस हूँ क्योंकि मैं तुमसे बात किये बिना भी नहीं रह सकती और .....! "

" और क्या .....? "

" मैं क्या करूँ ! मुझे लगता है मेरे अंदर का कुछ भी मेरे बस में नहीं है , वह सब कुछ तुममें घुलमिल गया है . मैं तुममें इन्वॉल्व हो गयी हूँ ."

" जानती भी हो कि क्या कह रही हो ? "

" यही समझ पाती तो कहती ही क्यों ? मैं तुमसे बात किये बिना नहीं रह सकती . मैं तो बस इतना जानती हूँ कि मैं अपने अंदर की हर बात तुमसे कहूँ . इतना ही नहीं मेरा मन करता है कि मैं तुमसे तुम्हारी हर बात सुनूं भी ." सिसकियाँ वंदना के शब्दों का पीछा कर रहीं थीं .

" प्लीज वन्दिता ! चुप हो जाओ . अब और कुछ भी मत कहो . मैं भी केवल हाड़ - मांस का पुतला नहीं हूँ . मेरे सीने में भी दिल ही धड़कता है . संवेदनाएं यहाँ भी अंगड़ाइयां लेती हैं . भावनाएं मुझमें भी चटकती हैं . प्लीज अपने सूखेपन का निवाला मुझे मत बनाओ . तुम्हारे अंधरे , तुम्हारे हैं . मेरे पास ऐसा कोई दिया नहीं है जो उनमें रौशनी भर सके . उन्हें दूर करने की खिड़कियां तुम्हें खुद खोलनी होंगीं ."

पिछले पंद्रह दिनों की दिमागी हलचलों से निकले मंथन ने आज आलोक को अपनी बात पूरी स्पष्टता से कहने की हिम्मत दे दी . उसने एक निर्णय कर लिया था और अब वह उससे पीछे नहीं हटना चाहता था .

" जानती हूँ कि तुम मेरी मुश्किलों का हल नहीं हो . मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता भी नहीं है पर इतने दिनों की पहचान के बाद , इंसानियत का रिश्ता तो हमारे बीच बन ही चुका था . उसी की बिनाह पर यह जानने के लिए फोन तो कर ही सकते थे की तुमसे रूठने के बाद किस तरह की जिंदगी जी रही हूँ ! "

" हाँ ! कर सकता था , करना भी चाहता था परन्तु उसका जो अर्थ तुम लेतीं , उसे सोच कर ही सिहर जाता हूँ . हर बार का तुम्हारा असमंजस , तुम्हारे अहंकार पर आकर समाप्त हो जाता है .फोन पर ही डांटने - डपटने लगती हो .इस तरह का तुम्हारा एटीट्यूड मुझे जो तनाव देता है , उसके बारे में सोचा है कभी ? "

" हाँ ! यही सब करती क्योंकि मैं हूँ ही ऐसी पर मैं क्या करूँ , किसे दोष दूँ . क्या अपने भाग्य को . लोकेश को छोड़ने के ख्याल मात्र से कांप जाती हूँ और उसके साथ जी रही बोझभरी जिंदगी भी मुझसे ढोते नहीं बन रही . न जाने लोकेश को इतनी बेगैरत जिंदगी क्यों पसंद है ? "

" साफ़ - साफ़ कहो . क्या हुआ है .बात - चीत में तो लोकेश बड़े जहीन और सभ्य लगते हैं . तुमसे प्यार भी बहुत करते हैं ."

" उनके इसी दोहरेपन ने ही तो मेरे वैवाहिक जीवन के सभी सुख - चैन को मुझसे छीन लिया हैं . "

" दोहरापन ! क्या उल्टा - सीधा कहे जा रही हो ? क्या कोई और आ गयी है उनकी जिंदगी में . प्यार तुमसे और पेंगें किसी और के साथ ! "

" काश कि कोई आ गयी होती तो कम से कम मैं इसे अपना भाग्य मान कर , बेटे अर्जुन के साथ जिंदगी को एक मुकाम तो दे देती ! "

इतना कहकर वन्दिता का रुदन शुरू हो गया . आलोक हैरान थे . जब वह थोड़ा रुकी तो आलोक बोला , " प्लीज अपने आंसुओं को रोको . तुम्हे तो हर परिस्थिति से लड़ना आता है . जब लोकेश की जिंदगी में कोई और लड़की आयी ही नहीं है तो किसकी हिम्मत है जो तुम्हारे वैवाहिक जीवन को ग्रहण लगा सके ? छोटे - मोठे झगड़े तो सभी जोड़ों के बीच होते रहते है . समय के साथ सभी मन मुटाव अपनी तल्खी खो देते हैं . तुम भी प्रतीक्षा करो और हिम्मत रखों . सब ठीक हो जायेगा ."

" हिम्मत को मजबूत करने वाली तुम्हारी ये बातें ही , मुझे तुमसे बात करने को मजबूर करती हैं . पर आलोक जिस नाव में सवार हो गए हैं , उसमें छेद ही छेद हैं . जिसका डूबना तय है . मुझे चिंता अर्जुन की भी है . क्या वो इसी दूषित माहौल में बड़ा होगा . मेरे साथ उसके भविष्य का भी बर्बाद होना तय है ! "

" कुछ बताओगी भी या पहेलियाँ ही बूझता रहूँ ? "

" लोकेश ने अपने संबंध किसी अमीर लड़की से नहीं एक अमीर लड़के से बना लिए हैं और उसके प्रभाव में मेरे साथ भी अंतरंग क्षणों में उनका व्यवहार अननेचुरल हो चला है ."

" तुम्हारी जिंदगी का यह सच बेहद भद्दा ही नहीं शर्म से सिर झुका देने वाला भी है . शक तो मुझे था परन्तु तुम्हें कहने से डरता था कि तुम बुरा मान जाओगी. हो सकता है ये सोचने लगो कि तुम्हारी जिंदगी का यह संताप तुम्हें लेकर मेरे लिए कोई अवसर बन सकता है , यह मैं पहले भी नहीं चाहता था और तुम्हारी स्वीकृति के बाद अब भी नहीं . "

" मैं अब और अधिक सहन नहीं कर सकती . मुझे इस त्रासद जिंदगी से छुटकारा चाहिए .मेरे लिए आलोक की यह करतूत असहनीय है . उनकी इस आदत से मेरे साथ अर्जुन का जीवन भी नर्क बन जायेगा ." वन्दिता का रुदन अब भी रुक नहीं रहा था .

" वन्दिता , हिम्मत रखो . हिम्मत हारने से कुछ हासिल नहीं होगा . हमारे हाथों में कुछ लकीरें ऐसी भी होती हैं जिनके आड़े - तिरछेपन को बदलने के लिए सिर्फ हमारी इच्छाशक्ति ही काम आती है . वो इच्छाशक्ति तुम्हारे अंदर है . यह मैं जानता हूँ . "

" मैं सोच नहीं पा रही कि मैं क्या करूँ ? क्या आलोक के जंगल की आग को अपना भविष्य मान लूँ और अर्जुन के साथ उसमें जल मरूं ! "

" नहीं . आलोक के इस तंदूर में तुम्हें इंर्धन कत्तई नहीं बनना है . उसका पुरजोर विरोध तुम्हारा हक़ है . कुछ दिनों के लिए उससे अलग होकर उसे अकेला छोड़ सकती हो . हो सकता है बात बन जाए , हो सकता है न भी बने . दोनों ही परिस्थितिओ के लिए तुम्हें तैयार रहना होगा . "

" अगर बात न बनी तो ? "

" तो क्या हुआ . जो कुछ हो रहा है , उससे खराब तो कुछ भी नहीं होगा . पढ़ी - लिखी हो , जॉब भी करती हो . तुम्हारी ये चीजें किस दिन काम आएँगी . खुद पर विशवास भी तो कोई चीज होती है . "

" तो क्या ये घर छोड़ दूँ ? " उसके शब्दों में सूखे पत्तों सी चरमराहट थी .

" घर क्यों छोड़ोगी . उसी घर में खुद को लोकेश से अलग भी तो कर सकती हो ."

" वो तो कर सकती हूँ पर हर दिन की चिक - चिक में अर्जुन को क्या समझाऊं ? "

" ये तो ठीक कह रही हो पर कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही होगा न ! "

वन्दिता ने कोई उत्तर नहीं दिया .

" सुन रही हो न मेरी बात ! "

" हाँ सुन रही हूँ . कोशिश भी करूंगी पर .............. "

" पर क्या ? "

" क्या कोई और हल नहीं है ? "

" मैंने कहा न , हल तो तुम्हें ही खोजना है . "

" क्या मेरे हाथों की लकीरों में तुम्हारी कोई जगह नहीं है ? " वन्दिता न जाने कैसे कह गयी .

" जगह है तभी तो जब हम एक - दूसरे से बात नहीं कर पाते तो हम दोनों ही बैचैन हो जाते हैं पर यह जान लो कि जिंदगी का कोई भी छोटा रास्ता हमें बहुत दूर तक नहीं ले जा सकता . जो लोग हमेशा पुख्ता और लम्बे रास्तों को चुनते हैं , वहीँ मंजिल का माथा चूमते हैं . एक बात और , हमारे बहुत सारे सवालों के जवाब हमारे अंदर ही छुपे होते हैं . जो उन्हें खोज लेते हैं उन्हें कभी भटकने की जरूरत नहीं पड़ती . "

कुछ देर चुप रहने के बाद वन्दिता बोली , " ठीक कहा तुमने . तुमसे बात करने के बाद न जाने क्यों जिंदगी की वो अच्छाइयाँ सामने आ जातीँ हैं जो जैसे कहीं थीं ही नहीं . "

" बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे . बोलो अब कब रूठोगी ? "

" और बातों से बहलाना तुमसे सीखा जा सकता है . लो मैं फिर से रूठ जाती हूँ ."

" नहीं ! प्लीज रूठना मत , भले ही डांट लेना ."

" ठीक है . जो चाहोगे वहीँ करूँगीं . अब रखती हूँ . अर्जुन टूशन पढ़कर आने वाला है . “

आलोक बहुत देर तक मोबाईल हाथ में लिए बैठा रहा . उसका मन कह रहा था " लगता है कोई बवंडर उसकी जिंदगी को झकझोरने वाला है , क्या वह उसका सामना कर पायेगा ! "

सुरेंद्र कुमार अरोड़ा

डी - 184 , श्याम पार्क एक्सटेंशन . साहिबाबाद ( ऊ.प्र.)

पिन : 2010 05 ( मो . 9911127277 )