स्वाभिमान - लघुकथा - 45 SURENDRA ARORA द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 45

लघुकथा -1

शंकर की वापसी

शंकर के तबादले की खबर आग की तरह सारे दफ्तर में फ़ैल गयी. शंकर, साहब की आँख की किरकिरी था. वह अकेले दम साहब के पक्षपाती, दमनकारी और गैरकानूनी कामों का विरोध करता था.

अब अपनी ऊँची पहुंच के चलते साहब का क्रोधी स्वभाव और जरा-जरा सी बात पर किसी को भी अपमानित करने का सिलसिला बढ़ जायेगा. नौकरी उनकी मजबूरी थी इसलिए साहब की सभी बेजा हरकतों के सामने घुटने टेकने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते थे. शंकर के तबादले से वे दबाव में थे.

अगले दिन बड़े बाबू अपनी बिटिया की खराब तबियत के कारण आफिस देर से आये. प्रवेश करते ही, उनके पास साहब का बुलावा आ गया. सहमे हुए बड़े बाबू साहब के केबिन में गए. सभी की नजरे केबिन के गेट पर टिक गयीं. तय था कि बिना उनकी उमर का ख्याल किये बड़े बाबू का भरपूर अपमान होगा.

हुआ भी वही. केबिन से बाहर आने पर बड़े बाबू का चेहरा लटका हुआ था. साहब की जबान से निकले अपशब्द उनके माथे पर टिके हुए थे. उनकी सूरत रोनी थी. वे सबके लिए सहनुभूति के पात्र हो गए.

कुछ लोग साहब का विरोध करना भी चाहते थे पर उन्हें रोजी जाने का डर था. उन्हें शंकर याद आ रहा था. वो होता तो साहब की हिम्मत नहीं पड़ती कि वह बड़े बाबू को अपमानित करता.

अगले दिन भी फिर उसी वजह से बड़े बाबू को आफिस आने में फिर देरी हो गयी. सिर झुकाये वे सीधे साहब के केबिन में प्रवेश कर गए. शायद वे बेइज्जती के लिए तैयार होकर आये थे. सभी को उनकी हालत पर तरस आ रहा था.

सभी गमगीन से बैठे थे कि उन्हें लगा कि आफिस में अचानक भूकंप आ गया है. झटके से साहब के केबिन का दरवाजा खुला. बड़े बाबू का चेहरा तमतमाया हुआ था. उन्होंने ऊँची आवाज में बोलना शुरू कर दिया, " आज, अभी और इसी वक्त यह निर्णय होगा कि हम सब अपमान सहेगें या इस निरंकुश और बद्द्त्मीज अधिकारी का विरोध करेंगें ! या तो इसे अपना रवैया बदलना होगा या फिर मेरी भूख-हड़ताल का सामना करना होगा. स्वाभिमान से बढ़कर कुछ नहीं. कोई, चाहे तो मेरा साथ दे या न दे.

यह कहकर बड़े बाबू वही फर्श पर बैठ गए.

सभी को लगा कि उन्हें नया शंकर मिल गया है.

***

लघुकथा – 2

डिप्राइवड केटेगरी

"डैडी ! कल फी - डे है. "

" तो कल स्कूल से आपकी छुट्टी ! "

" छुट्टी क्यों. मैं तो ठीक - ठाक हूँ !"

" मैं भी तो यही कह रहा हूँ बेटे. आपकी मम्मा की शिकायत रहती है कि हम उन्हें बहुत दिन से कहीं घुमाने नहीं ले गए. कल आपके स्कूल की छुट्टी है. कल पिकनिक का प्रोग्राम पक्का. मैं भी छुट्टी कर लेता हूँ. "

" डैडी ! फी - डे है, फ्री - डे नहीं. मैं कल भी स्कूल जाऊँगा. मैंने तो फी- डे इसलिए बताया है कि आप मुझे तीन महीने की स्कूल फीस जो फाइव थाउसेण्ड थर्टी फाइव रूपीस है, दे दीजिये. "

"पर बेटा ! आपकी फीस कहाँ लगती है. आप तो डिप्राइव केटेगरी के स्टूडेंट हैं. "

" डिप्राइव क्यों डैडी ! क्या आपकी सेलेरी इतनी नहीं है कि आप मेरी स्कूल फीस दे सकें. सब बच्चे कहते हैं, इतने अच्छे घर से आता है, इतने अच्छे कपड़े पहनता है, कभी - कभी तो इसे छोड़ने इतनी बड़ी गाड़ी भी आती है पर स्कूल -फीस के नाम पर मेरी केटेगरी, डिप्राइव हो जाती है. मेरा मजाक बनता है. मैं तो स्कूल - फीस दुँगां डैडी. "

" बातें मत बना. ये हक़ हमें मुफ्त में नहीं मिला है. सदिओं की स्ट्रगल के बाद मिला है. "

" प्लीज डैडी, जो सचमुच डिप्राइवड हैं, यह हक़ उन्हें ले लेने दीजिये. आप मेरी फीस नहीं देंगे तो मैं कल से स्कूल नहीं जाऊंगा.

टीचर ने कहा है कि अगर मैं डिप्राइवड केटेगरी से अपना नाम वापस ले लूँ तो हरनाम, जो पास की झुग्गी - बस्ती में रहता है पर उसके मार्क्स मुझसे कम हैं और उसके पापा बहुत गरीब हैं, को इस केटेगरी में एडमिशन मिल सकता है. उसे सचमुच इसकी जरूरत है डैडी. मुझे अच्छा नहीं लगता कि आपकी इतनी अच्छी जॉब होते हुए भी कोई हमें डिप्राइवड क्लास का कहे. इससे मुझे बहुत बुरा लगता है. मैं हर्ट होता हूँ डैडी. "

पिता कुछ देर तक बेटे की ओर प्यार से देखते रहे फिर बोले, "लगता है बेटे तुम ठीक कहते हो, तुम इस तरह हरनाम की मदद्त भी कर सकोगे. कल अपनी स्कूल फीस लेकर जाना. पिकनिक संडे को चलेंगें.

***

लघुकथा - 3

बंधन

" कल कितने बजे चलना है ? "

" कहां ? "

राकेश मुस्कुराते हुए प्यार से शालू को देखते रहे.

ये कोई नई बात नहीं थी. जब भी राकेश अपनी शालू की किसी बात से बहुत अधिक इमोशनल हो जाते है, तब वे ऐसे ही रिएक्ट करते है पर आज उसमें प्यार के साथ दुलार भी था. राकेश की भावनाओं को महसूस करते हुए उसने कहा, " आते ही चलने की बातें करने लगे. फ्रेश हो लीजिये, चाय बनी रक्खी है, साथ बैठ कर पी लीजिये फिर कहिये जो कुछ भी कहना है. "

"जानू!कल रक्षा बंधन है, भैया को राखी बाँधने नहीं जाओगी? इस बार तो मैंने भी छुट्टी कर ली है. " राकेश ने शर्ट को उतारकर आलमारी में रखते हुए कहा.

राकेश की मासूमियत पर शालिनी को प्यार आया. इससे पहले कि वह प्यार शब्दों में ढलता, उस पर मायूसी सवार हो गयी.

" क्या हुआ शालू? उदास क्यों हो गयीं ? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?"

" आपको पता है न कि मैंने कई साल से भईया को राखी नहीं बाँधी है और उन्होंने भी कोई पहल नहीं की. चार साल पहले जब हम गए थे तो भाभी मुझे इग्नोर करती, मैं सह जाती पर उसने आपको भी वह इज्जत नहीं बक्शी, जिसके आप हक़दार थे. गलती तो क्या माननी थी उलटे अपने कमरे में बंद हो गयी थीं और मैं आपके साथ उस घर से भरी आँखे लेकर आ गयी थी, जो कभी मेरा भी था. उन्हें पता होना चाहिए कि अपने माँ - बाबूजी की बेटी शालिनी, राकेश जैसे उस नायाब जोहरी की पत्नी है जो इतने बड़े आफिस में न जाने कितने हीरे तराशता है, फिर भी इतना भोला है. कोई आपका अपमान करे, ये मैं सहन नहीं कर सकती. आपके स्वाभिमान के लिए, शालू किसी भी पहाड़ से टकरा सकती है. "

राकेश तुरंत किचन में गए और एक गिलास पानी लेकर आ गए. अपने हाथों से शालिनी को पानी के दो घूंट पिलाकर उसका गुस्सा शांत किया.

" सॉरी शालू !ये ठीक है कि अगर हमारे अंदर अपने स्वाभिमान की भावना नहीं होगी तो हममें और मूर्खों में फर्क ही क्या रह जाएगा, पर!"

" पर क्या ?"

" थोड़ी कोमलता के स्तर पर सोचो. रिश्ते जन्म से मिले हों या हम खुद बनाये, वे ईश्वर की इच्छा से बनते हैं और अगर हम किसी मान - अपमान जिसे कभी - कभी हम स्वाभिमान का कवर चढ़ा देते है, के नाम पर उन्हें तोड़ने की हद तक चले जाते है तो हम ईश्वर की इच्छा का अपमान करते हैं. इंसान गलतियों का पुतला है. भैया - भाभी से भी हो गयी तो क्या उसे हमेशा के लिए गाँठ बाँध लें. हो सकता है उन्हें ग्लानि हो. चलो हम ही पहल कर लेते है. अपनों से कैसा अभिमान ? "

शालिनी ने पानी के रखे आधे गिलास को भी खाली कर दिया फिर बोली, "बड़ा भोला ही नहीं प्यारा भी है मेरा रॉकी. "

फिर वह उससे लिपट गयी.

***

सुरेंद्र कुमार अरोड़ा