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बस ! काफ़ी है

बस ! काफ़ी है

सुमन शर्मा

बस! काफ़ी है

महिलायें भी अज़ीब होती हैं। एक चीज़े ऐसी होती हैं जिसे वे हमेशा कम आंकती हैं ,जैसे अपनी उम्र और कुछ चीज़ें, तोबा तोबा इतना ज्यादा कि ,बस पूछो मत जैसे अपनी सास नन्द के भीतर बुराईयाँ और पति का भुल्लकड़ पन। जब तक अपने पति की एक भूल को, ये नमक मिर्च लगाकर अपनी सखियों के बीच प्रस्तुत न कर लें इन्हें चैन नहीं मिलता।

कुछ महिलाएँ अपने पड़ोस में चल रहे रामायण के पाठ में हिस्सा लेने के लिए एकत्र हुईं।

पाठ करने वाली मंडली पाठ कर रही थी और वह सब आपस में बैठकर बाते कर रहीं थीं। एक महिला बोली, ‘ मेरे पति बहुत भुल्लकड़ हैं। मैं तो उनके भुल्लकड़पन से बहुत परेशान हो गई हूँ। दूसरी महिला बोली, ‘शायद मेरे पति जितना भुल्लकड़ तो, कोई दूसरा नहीं होगा।

अपने पतियों के भुल्लकड़ होने का दुखड़ा, एक दूसरे को सुना रही, महिलाओं में से एक महिला ने कहा, ‘चलो हम सब अपने -अपने पतियों के भुल्लकड़पनों के किस्से बारी-बारी से एक दूसरे को सुनाते हैं।’

पहली महिला - ‘बात उस समय की है जब हमारी 'शादी हुई थी। 'शादी के बाद मायके से जब मेरी डोली ससुराल आई तो बहुत सी रस्में हुई।’ दूसरी महिला पूछती है, ‘कितने साल हो गए तुम्हारी शादी को?’ तीसरी महिला ने झुंझला कर कहा, ‘तुम्हें इससे क्या लेना देना? चुपचाप किस्सा सुनो।‘ पहली महिला ने फि़र बोलना 'शुरू किया, ‘सारी रस्में निभाने के बाद, 'शाम को मैं कमरेे के एक कोने में; शर्माई हुई बैठी थी।’ दूसरी महिला बोली, ‘हाँ पहले दिन ससुराल में मैं भी बहुत 'शरमा रही थी।’

तीसरी महिला, ‘अरे आप! आप इनके भुल्लकड़ पति का किस्सा तो सुनने दो, बीच -बीच में अपनी टांग क्यों अड़ा रही हो।" यह सुनकर दूसरी महिला ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को चुप किया।

पहली महिला ने फिर से बोलना शुरू किया ,वह बोली, ‘जब मैं शरमा कर अपने आप में सिमटी जा रही थी, तभी मेरे पति वहाँ आए और मुझ से बोले, ‘सारे मेहमान तो जा चुके, बहिन जी! आप यहाँ अकेली क्या कर रही हो?’ यह सुनकर सब महिलाएँ खिलखिला कर हँस पड़ीं।

दूसरी महिला- एक दिन हम दोनों उनके गाँव जा रहे थे। यह सुनकर पास बैठी दो महिलाएँ तो अपनी अलग दुनिया में ही खो गईं। गाँव में बनी चूल्हे की रोटियाँ और गाँव की खुली हवा को याद करने लगीं। तब अन्य महिला ने टोकते हुए कहा, ‘‘हमें किस्सा तो पूरा सुनने दो।’’ महिला ने किस्सा आगे बढ़ाया,‘‘हम बस में सफ़र कर रहे थे। हम दोनों को अलग-अलग सीटें मिली थीं। लगभग एक घंटा बीत जाने के बाद मैंने इन से इशारों में पूछा कि गाँव और कितनी दूर है?’’ इन्होंने अपने साथ में बैठे हुए व्यक्ति का कंधाा थपथपा कर कहा,‘‘ भाई साहब! ओ भाई साहब! आपकी बीवी आपसे कुछ पूछ रही है।’’ महिलाओं के बीच फि़र ठहका गूँज गया।

तीसरी महिला - एक बार मेरे ‘वो’ नहाने जा रहे थे। घर में साबुन नहीं था। मैं बाज़ार से साबुन लेने चली गई। थोड़ी देर बाद मैं साबुन लेकर लौटी और घर का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने घर का दरवाजा खोला। मैंने साबुन उनके आगे बढ़ाया। वह बोले, ‘मैडमजी! मैं आपसे साबुन ज़रूर खरीद लेता, लेकिन मेरी एक मजबूरी है, अभी- अभी मेरी पत्नी भी बाजार से नहाने का साबुन लेने ही गई हुई है।’

चौथी महिला बोली, ‘ अरे भई मेरे पति के कारनामें भी तो सुनो , एक बार मेरा बेटा राहुल अपने दोस्त के घर पढ़ने जा रहा था। वह अपनी अलमारी में से गणित की पुस्तक लेकर जैसे ही बाहर दरवाज़े की ओर बढ़ा, इन्हेाने एक ज़ोरदार तमाचा उसके मुँह पर जड़ दिया और बोले,’ ‘ इधार दिखा! तू मेरे बेटे की अलमारी से क्या लेकर भाग रहा है?

पाँचवी महिला बोली, ‘‘अरी बहना मेरे घर की भी लगभग यही कहानी है। एक दिन मेरे पति मेरे छोटे बेटे मोहित को स्कूल से लेने गए। आधो घंटे के बाद न जाने किसे साथ ले आए। मैंने उनसे पूछा, ‘मोहित कहाँ है?’ वह बोले , ‘‘यही तो है अपना मोहित।’’ मैंने अपना सिर पकड़ लिया और कहा, ‘यह लड़का हमारा मोहित नहीं है।’ वह बोले, ‘ अच्छा? यह हमारा मोहित नहीं है। अब समझ आया, इसलिए यह सारे रास्ते मुझे अंकल-अंकल कह रहा था।’

जिस महिला के घर में पाठ हो रहा था, उसका पति काम काज़ से 'शीघ्र घर लौट आया था। वह महिलाओं की बातें बड़ी देर से सुन रहा था। वह महिला मंडली के पास आकर बोला , ‘तुम महिलाएँ हम पुरुषों कों यूँ हीं बदनाम करती हो। कहाँ होते हैं हम लोग इतने भुल्ल्कड़? देखो मुझे अच्छी तरह याद था कि, आज हमारी 'शादी की वर्ष र्गाठ है। इसलिए में ऑफिस से जल्दी घर आ गया।’

इस पर उनकी पत्नी नथूने फ़ूला कर बोली, "‘आज हमारी शादी की वर्ष र्गांठ नहीं, अपितु ससुरजी की बरसी है।’ अब तो महिलाओं के बीच ठहाका गूंजना ही था।

सचमुच ये पुरुष भी अजीब होते हैं। जब- जब में इन का पक्ष लेती हूँ , ये मुझे गलत साबित कर , कोई न कोई भूल करही देते हैं और थमा देते हैं , महिलाओं को एक न एक चर्चा का विषय ।

सुमन शर्मा

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