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पाँय लागू ताईजी !

पाँय लागू ताईजी !

---------सुमन शर्मा

jahnavi.suman7@gmail.com

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पाँय लागू ताईजी !

बड़े ,बूढ़ों की छत्र छाया भला किसे बुरी लगती है। बड़े व्यक्ति तो घने वृक्ष के समान होते हैं , जो केवल परोपकार करते हैं ,लेकिन हमारे बीच ,कभी- कभी ऐसे बुज़ुर्ग भी उपस्थित रहते हैं , जो स्वयं को बहुत अक्लबंद समझते हैं और दूसरों को अजीबो -गरीब परिस्थति में डाल देते हैं। ऐसा ही कुछ नज़ारा, मैंने अपनी इन, दो आँखों से देखा, आप भी गोता लगा लीजिए।

जून का, गर्मी और पसीने से सरोबार महीना था। इसी महीने, मौसी के घर राजिस्थान, शादी में जाने का मौक़ा मिला।

दोपहर का समय था। सुबह से कई रस्में निभाई जा रही थीं। जिस के बाद सब मेहमान इधर- उधर सुस्ता रहे थे। बहुत से लोग एक बड़े से कमरे में बैठे गप्प शप्प मार रहे थे।

अचानक , गली में से, कुछ लोगों के दौड़ने की आवाज़ आई। सब लोग एक दूसरे से सवाल कर रहे थे, ‘इतने ज़ोर से कौन दौड़ रहा है।’

कुछ बच्चों ने हाफ़ँते हुए कमरे में प्रवेश किया । सबके चेहरों पर हवाईयाँ उड़ रहीं थीं। वे मौसी जी के पास आये और सहमें हुए से बोले, ‘चाचीजी! चाचीजी! लम्बू ताई आ रहीं हैं।’ मौसी जी का भी चेहरा फ़ीका पड़ गया। मैंने आश्चार्य से पूछा, ‘लम्बू ताई क्या किसी डाकूओं के गैंग का नाम है?’ मौसीजी हँसती हुई कहती हैं,‘अरे नहीं। ‘लम्बू ताई कोई डाकूओं का गैंग नहीं है। वो तो मेरी ताई सास हैं।’

मेरे चेहरे पर फिर एक प्रश्न मंडराने लगा , मैंने पूछा, वो आपकी ताई सास हैं ,यानी एक बुजुर्ग महिला , फि़र ये बच्चे इतना क्यों डरे हुए हैं?

मौसीजी ने अपनी साड़ी का पल्लू, सिर पर लेते हुए कहा, ‘वह आ ही रही हैं, तुम खुद ही देख लेना।’

जिज्ञासावश मेरी गर्दन मुख्य द्वार की ओर मुड़ गई और मेरे चक्षु अपने सामान्य आकार से चार गुना अघिक फ़ैल गए। तभी एक महिला अपने दोनों कंधों में भारी- भारी थैले लटकाए , नीले रंग की बंधेज़ की साड़ी पहने, गोरा रंग, सिर पर आधे सफ़ेद व आधे काले बाल, कमरे के प्रवेश द्वार पर खड़ी दिखाई दी ।

कमरे में उपस्थित लगभग सभी लोगों ने, होठों को फ़ैलाकर ,चेहरे पर मुस्कान दिखाकर उन्हें ताकना शुरू कर दिया ।

सबके दिल धक -धक धड़क रहे थे ,पता नहीं अब किस किस की खैर नहीं।

सबसे पहले उन्होने, मुझे ही आड़े हाथों लिया और घूरते हुए बोलीं, ‘ऐसे दीदे फ़ाड़ कर क्या देख रही है? यहाँ आकर मेरा थैला पकड़।’ इससे पहले कि, मैं अपना हाथ आगे बढ़ाती, कई हाथ उनके थैले की ओर बढ़ गए।

सब के सब उनकी गुप्त रिपोर्ट कार्ड में, दस में से दस अंक पाना चाहते थे। ताईजी का आ़ज्ञाकारी बनने के चक्कर में मौसी जी का बेटा, तो कुछ ऐसा थैले की ओर लपका कि, औंधो मुँह फ़र्श पर जा पड़ा।

ताई जी, सुरक्षित हाथों में थैला थमा कर , भीतर आ गईं। सोफे पर मामाजी का छोटा बेटा शिवांग, पाँव से सर तक चादर ओढे , सोया हुआ था। ताईजी ने आव देखा ना ताव जाकर सोफे पर बैठ गईं। शिवांग ने उन्हें अपने हाथों से एक ओर धकेला, वह चिल्लाता हुआ दूसरे कमरे की ओर भागा, तो ताईजी बोलीं, ‘यहाँ कोई सो रहा था क्या?’ मौसी जी बोलीं, ‘हाँ शिवांग सो रहा था।’ ताईजी बेफिक्री से हाथ नचाती हुईं बोलीं, ‘मैंने तो सोचा, नए डिज़ाईन का सोफ़ा है ,जिसकी गद्दी का डिजाइन ही ऐसा है, बीच में से उठा हुआ।’ कमरे में उपस्थित सभी लोगों ने अपनी हँसी को, होठों में दबा लिया।

मेरी मौसेरी बहिन ‘निशा ’ ताईजी के लिए 'शर्बत का गिलास लेकर आई, तो ताईजी ने उसके हाथ से 'शर्बत का गिलास लेकर उसे फ़टकारना 'शुरू कर दिया, ‘अरी! कुछ तो शर्म कर, कल तेरी 'शादी है और आज तू यह फ़्रॉक सी पहन कर, बाल फ़ैला कर, क्यों सबके बीच घूम रही है?’ निशा तो यह सुनकर , सिर पर पाँव रखकर, वहाँ से भाग गई। मौसी जी ने साहस बटोर कर कहा, ‘ताईजी! 'शादी 'नीलू' की है।" निशा तो अभी बारहवी कक्षा में है। ताईजी ने मुँह फ़ाड़ कर कहा, ‘बारह क्लास पढ़ चुकी ? लगे हाथ इसके भी हाथ पीले कर दो , लड़के को तो मैं अभी फोन करके बुला लेती हूँ। बस तुम लोग हाँ कह दो। " इसके बाद ताईजी , लग गई फ़ोन मिलाने , मौसीजी गिड़गिड़ाती रहीं , "सासू माँ ! सुनिए तो, नीलू अभी आगे पढ़ना चाहती है। "इस पर ताईजी गर्दन मटका कर बोलीं ,"नीलू जो कहेगी वही मानोगे ? तुम्हारा अपना दिमाग क्या घास चरने गया है?"

बाहर शामियाने में गीत संगीत के कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी। मैं भी तैयार हो रही थी। मैंने अपना ‘हेयर जैल’ मेज़ पर रखा ही था, कि ताईजी ने उसे उठा लिया और बाम समझ कर सारा जैल घुटनों में चुपड़ लिया। इतना ही नहीं वह सोफे पर पसरती हुई बोलीं , दिल्ली से लाई होगी तू ये बाम। ‘बड़ा अच्छा बाम हैे। यहाँ नहीं मिलता ऐसा बाम। पैरों में ऐसी ठंडक पड गई। भगवान कसम क्या बताऊँ। ’

मैं भी कसम से ताईजी को नहीं बता सकी कि, ये बाम नहीं, नौ सौ पचास रुपए का हेयर जैल था ,जो मैं बरात के आगमन के समय अपना हेयर स्टाइल बनाने के लिए ले गई थी।

ताईजी के घुटनोँ में तो, ठंडक पड़ गई, लेकिन जैल की शीशी को खाली देखकर मेरा कलेजा जल उठा।

उसी समय मौसी जी की नन्द, ‘काजल’ अपनी चप्पलें ढूँढती हुई, वहाँ आ गई। उसे परेशान देखकर ताईजी बोलीं , ‘ क्या हो गया? क्या ढूँढ रही है?’ काजल ने कहा, ‘ताईजी मेरी चप्पलें पता नहीं कौन पहन गया?’ ताईजी हाथ नचाते हुए बोलीं, ‘अरी तू तो चप्पलों के लिए परेशान हो रही है। शादियों में तो कौन किसके कपड़े पहन लेता है ये भी पता नहीं चलता।’

ताईजी का इतना कहना था कि, मेरी सात वर्षीय छोटी बहिन 'शिप्रा ' पागलों की तरह गुसलखाने की तरफ़ दौड़ी, वह चिल्लाती जा रही थी, ‘ये मेरे कपड़े हैं , इन्हें कोई मत पहनना।’ वह बुरी तरह से गुसलखाने के दरवाजे को पीट रही थी। वह बार- बार कह रही थी, ‘अन्दर मेरे कपड़े हैं, उन्हें कोई मत पहनना।’ चिल्ला -चिल्ला कर उसका गला बैठ गया था।

तभी गुसलखाने से मौसा जी, शेरवानी के बटन बंद करते हुए बाहर निकलते हैं और सहम कर खड़ी हुई शिप्रा से कहतें हैं ,‘ अरी बावली! तेरे लहगे को क्या मैं, अपने गले में लटका कर घूमूँगा। फिर वो हॅंसते हुए बोले ,'लगता है ,लम्बू ताईजी आ गईं। "

----------------सुमन शर्मा

jahnavi.suman7@gmail.com

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