वो काली अंधेरी रात Ved Prakash Tyagi द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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वो काली अंधेरी रात

वो काली अंधेरी रात

“मैं डरता नहीं”ऐसे कहा करता था सक्षम, “कितनी भी काली अंधेरी रात क्यों न हो, चाहे शमशान हो या कब्रिस्तान, लेकिन मुझे किसी से डर नहीं लगता, भूत, प्रेत, पिशास सब मन के बहम हैं और मैं ऐसा बहम मन में कभी भी नहीं पालता।” इसका सक्षम को बहुत घमंड भी था।

सक्षम ने बताया कि उसने एक बार घने जंगल में रहकर काली अंधेरी रात का आनंद लिया था और वहीं बैठ कर यह कविता भी लिखी थी ........

रात

अंधेरे सुनसान डरावने, जंगल की वह रात

सितारों से झिलमिलाती, झींगुरों के साथ गुनगुनाती

जुगनुओं से टिमटिमाती, अंधेरी काली वह रात

डर को आगोश मे लिए, भयानकता अपने अंदर समेटे

निशाचरों की परम प्रिय, चाँदनी बिखराती वह रात

सारे संसार को सुलाती, थके परिंदों को आराम कराती

शान्ति का आवरण ओढ़े, कवियों को जगाती वह रात

रात के घुप अंधेरे में, जब उस रात को देखा

वह अंधेरी काली रात, सितारों की चुनरी ओढ़े

चाँदी के गहनों से सजी, मुझे लगी वह खूबसूरत रात

रात को रात के अंधेरे में देखो, कितनी खूबसूरत लगती है रात

नगर की चकाचौंध में, रात कंही खो जाती है

लोग जागते रहते हैं, और रात को बदसूरत कहते हैं

भूल जाते हैं, खूबसूरत सपने दिखती है यह रात

जब उसने कहा चिंता न करो, गम की रात भी कट जाएगी

मैं सोचने लगा अगर रात में खूबसूरती है,

तो गम में भी कोई न कोई खूबसूरती होगी

झिलमिलाते तारे होंगे, चाँदनी बिखराता चाँद भी होगा

लेकिन जैसे रात को, रात में देखने पर ही खूबसूरत लगती है

वैसे ही गम को, गम के अंधेरे में घुस कर,

जब देखोगे तो, भविष्य की खूबसूरती भी दिखेगी।

पूर्णिमा सक्षम से बहुत प्यार करती थी और हमेशा उसके शुभ का ही सोचती थी, लेकिन सक्षम को अपनी पत्नी से ज्यादा अपने घमंड से प्यार था। पूर्णिमा इसलिए भी परेशान रहती थी कि अपने घमंड के कारण सक्षम अपने मित्रों से शर्त लगाता रहता और कई बार संकट में फंस जाता था।

गंगा अपने पूरे उफान पर थी, दूसरे किनारे पर शमशान में चिताएँ जलती रहती थी, लोग उस तरफ जाते हुए भी डरते थे लेकिन सक्षम ने दोस्तो से शर्त लगा ली कि वह अमावस्या की काली अंधेरी रात के घुप अंधेरे में उफनती गंगा को पार करके जाएगा और उधर से जलती हुई चिता से जलती हुई लकड़ी लेकर इस किनारे पर वापस आएगा। दोस्तों ने कहा, “सक्षम ध्यान रहे लकड़ी जलती रहनी चाहिए, अगर बुझ गयी तो तुम शर्त हार जाओगे।” सक्षम बोला, “ठीक है, मैं जलती हुई लकड़ी ही वापस लाकर दूंगा।”

पूर्णिमा को जब इस शर्त के बारे में पता चला तो उसने सक्षम को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन सक्षम ने पूर्णिमा की एक ना सुनी।

उस काली अंधेरी अमावस्या की रात को जब सक्षम दोस्तों के साथ गंगा किनारे जाने लगा तब भी पूर्णिमा ने रोकने की काफी कोशिश की, अपने प्यार का वास्ता भी दिया लेकिन सक्षम नहीं रुका।

आज पूर्णिमा को कुछ अजीब सा लग रहा था। जैसे उसके अंदर कोई बहुत बड़ा दुख आकार बैठ गया हो। सक्षम रुका नहीं तो पूर्णिमा उसके साथ गंगा किनारे चली गई, वहाँ पर सारे दोस्त सक्षम की प्रतीक्षा कर रहे थे।

सक्षम एक अच्छा तैराक भी था, जब तब वह गंगा को तैर कर पार कर लिया करता और फिर वापस भी आ जाया करता था।

उस काली अंधेरी रात में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, दूसरे किनारे पर जल रही चिताओं की कुछ रोशनी गंगा की धारा पर पड़ रही थी जिससे भयंकर गर्जना करता हुआ बह रहा गंगा का पानी दिखाई दे रहा था।

सक्षम ने गंगा की उफनती गरजती विशाल धारा में छलांग लगा दी और तेजी से आगे बढ़ने लगा। देखते ही देखते सक्षम दूसरे किनारे पर पहुँच गया। दूसरे किनारे पर पहुँच कर उसने देखा, शमशान में कई चिताएँ जल रही हैं। एक चिता जिसके आस पास कोई नहीं था और वह धू-धू कर जल रही थी, उसमे से एक जलती हुई लकड़ी लेकर, उसकी जगह दो और सूखी लकड़ियाँ रखी और आकर तेजी से गंगा की तरफ बढ़ा, जलती लकड़ी हाथ में ऊपर उठाए हुए एक हाथ से ही तैरने लगा।

एक हाथ से तेज धारा में दूर तक तैरना मुश्किल हो रहा था, थक भी गया था और मन में एक भय भी था कि हाथ में चिता से उठाई हुई लकड़ी है और उसको बुझने भी नहीं देना है और यह भय उसको कमजोर कर रहा था। गंगा के बीच तेज धार का बहाव सक्षम को अपने साथ बहाने लगा, जलती लकड़ी के साथ सक्षम बहाव के साथ तेज धारा में बह गया। सक्षम को बहते देख पुर्णिमा और उसके सभी दोस्त ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, उनमें से दो दोस्तों ने तो पानी में छलांग लगा दी और गंगा के बीच तक जाकर देखा लेकिन सक्षम नहीं मिला।

पूर्णिमा ने देखा कि तेज धारा में बहती हुई लकड़ी कुछ दूर तक तो जलती रही फिर पानी में डूब कर अदृशय हो गयी। ‘सक्षम डूब गया, सक्षम डूब गया’ इस तरह चिल्ला कर वह गंगा में कूदने की कोशिश करने लगी लेकिन सक्षम के दोस्तों ने उसे कस कर पकड़ लिया।

सक्षम डूब गया था, सभी दोस्तों को स्वयं पर ग्लानि हो रही थी, काश! हम ऐसी शर्त ना लगाते तो सक्षम हमारे बीच जिंदा होता।

एक दोस्त ने जाकर पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई और बाकी सब पूर्णिमा को उठाकर घर लेकर चल दिये।

पुलिस वाले उस दोस्त को लेकर गंगा किनारे आए और जीप की रोशनी में गंगा के किनारे किनारे चलने लगे शायद लाश कहीं किनारे पर लगी हो तो मिल जाएगी।

थोड़ी दूर तक देखने के बाद पुलिस वाले वापस आ गए और कहने लगे”, “अब तो सुबह होने पर ही देखेंगे, इस काली अंधेरी रात में तो जीप की रोशनी भी धुंधली लग रही है। अगर किसी जानवर ने लाश नहीं खाई तो किनारे पर मिल ही जाएगी और हाँ, दूसरे किनारे पर उधर वाली पुलिस देखेगी, सुबह तुम उधर भी सूचना दे देना।”

सभी दोस्त पूर्णिमा को लेकर घर पहुँच चुके थे, पूर्णिमा अभी भी बेहोश थी। घर पहुँच कर सभी दोस्त यह देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि सक्षम तो उनसे पहले ही घर आकर आराम कर रहा है।

सक्षम ने तब उनको बताया, “तेज बहाव में एक हाथ से तैरने मे जब मुश्किल होने लगी और डूबने की नौबत आ गयी तो मैंने जल्दी से जलती हुई लकड़ी गंगाजी में छोड़ दी और दोनों हाथों से तैर कर गंगा पार करने लगा, मैं तुम लोगों से थोड़ी दूर जाकर निकला तो सीधा घर चला आया और चूंकि मैं हार चुका था इसलिए तुम्हारा सामना भी नहीं कर सकता था अतः मैं तुम लोगों को कुछ भी बताए बिना घर आ गया, मुझे क्या पता था कि मेरी इस हरकत से इतना बखेड़ा खड़ा हो जाएगा।

जो दोस्त पुलिस में गया था वह बोला, “बेटा, अभी तो तुम्हें थाने में जाकर भी स्टेटमेंट देनी पड़ेगी।”

पूर्णिमा को होश आ रहा था, जैसे ही पूर्णिमा होश में आई, वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी, “मुझे छोड़ दो, मुझे गंगाजी में डूब जाने दो, मैं सक्षम के बिना नहीं रह सकती, मुझे मर जाने दो, छोड़ दो मुझे।” इतना कह कर पूर्णिमा ज़ोर ज़ोर से रोने लगी।

सक्षम ने पूर्णिमा को अपनी बाहों में भर कर कहा, “हाँ पूर्णिमा, देखो मैं यहीं हूँ, तुम्हारे पास ही, अब मैं तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

सक्षम को इस तरह जीवित पाकर पूर्णिमा की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा, उसने सक्षम को बाहों में कस लिया और वादा लिया, ‘अब कभी मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाओगे और ना ही इस तरह की कोई शर्त लगाओगे।’

सक्षम ने पूर्णिमा को बताया, “उस समय मैं अपनी मौत को सामने देखकर घबरा गया तो मैंने गंगा मैया से विनती की, “हे गंगा मैया! आज मुझे माफ कर दो, आगे से मैं कभी भी ऐसी घमंड वाली बात नहीं करुंगा और ना ही ऐसी कोई शर्त लगाऊँगा।”

उस काली अंधेरी रात में सक्षम का घमंड वहीं गंगा की तेज धारा में बह गया था और अब सामने था विनम्र सक्षम, अपनी पत्नी से भरपूर प्यार करने वाला, जैसे यह उसका दूसरा जन्म था।