विषधर Ashish Kumar Trivedi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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विषधर

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आशीष कुमार त्रिवेदी

बात अंग्रेज़ी राज की है। लाला दर्शनलाल पुराने रईसों में थे। उनके बाप दादा बहुत दौलत छोड़कर गए थे। अन्य रईसों की तरह वह भी शौक़ीन मिज़ाज़ थे। शौक पूरे करने के लिए दिल खोल कर खर्च करते थे। उनकी दो पत्नियां थीं। प्रभावती और लीलावती। दोनों सगी बहनें थीं किन्तु उनमें बहनों जैसा प्रेम नहीं था।

प्रभावती लीलावती से दस वर्ष बड़ी थी। जब वह सोलह साल की हुई तब उसका विवाह दर्शनलाल से हुआ। वो घर की मालकिन बन गई। छुटपन में जब लीलावती अपनी बहन के घर आती थी तो प्रभावती उसे अपने पूरे नियंत्रण में रखती थी। लीलावती को यह अच्छा नहीं लगता था। लीलावती ने जब यौवन में कदम रखा तो रूप और लावण्य में वह प्रभावती से कहीं अधिक थी। लाला दर्शनलाल उस पर लट्टू हो गए। प्रभावती से उन्हें कोई संतान भी नहीं थी। वो लीलावती से ब्याह करना चाहते थे। दैवयोग से उनके ससुर का देहांत हो गया। उन्होंने अपनी सास के समक्ष प्रस्ताव रखा। पहले तो वह हिचकिचाईं। किंतु बाद में उन्होंने पूरा गणित लगा कर सोंचा कि यदि वह कहीं और लीलावती का ब्याह करेंगी तो बहुत दहेज देना पड़ेगा। जिसके बाद उनके अपने निर्वाह के लिए कुछ नहीं बचेगा। जबकी दर्शनलाल बिना दहेज़ के शादी को तैयार थे। अतः वह मान गईं।

प्रभावती को लगा लीलावती ने जानबूझ कर उसकी सौत बनना मंज़ूर किया। यदि वह चाहती तो मना कर सकती थी। लीलावती भी अब हर चीज़ पर अपना बराबर का हक़ जताती थी। दोनों के बीच बैर भाव पनप गया।

साल के भीतर ही लीलावती ने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रभावती की चिंता और बढ़ गई। उसे लगने लगा कि लीलावती तो पुत्रवती है। यदि उसके पति को कुछ हो जाता है तो सारी संपत्ति लीलावती के पुत्र को चली जायेगी और उसे उस पर आश्रित होकर रहना पड़ेगा। इससे प्रभावती लीलावती से और अधिक ईर्ष्या करने लगी। वो उससे छुटकारा पाना चाहती थी।

लाला दर्शनलाल केवल खर्च करना जानते थे। केवल खर्च करने से तो कुबेर का खज़ाना भी खाली हो जाता है। अतः उन्हें भी चिंता होती थी। किंतु उस दौलत को बढ़ाने के लिए मेहनत करना उनके बस की बात नहीं थी। वैसे यदि संयत में रह कर खर्च करते तो उनके जीवन यापन के लिए पर्याप्त दौलत थी। किन्तु वो तो अपनी आदतों के ग़ुलाम थे। उन्हें तंत्र मन्त्र पर बहुत विश्वास था। अक्सर सोंचा करते थे कि कोई चमत्कार हो जाए और उनकी दौलत बढ़ जाए।

कुछ दिनों से गाँव के बाहर एक साधू और उसके चेले ने आकर डेरा डाला था। गाँव में उनके खूब चर्चे थे। सभी उस साधू को सिद्ध महात्मा समझते थे। दरअसल वो कोई साधू और चेला नहीं बल्कि डाकू भैरव और उसका साथी मैकू थे। जो पुलिस से छिपते हुए इस गाँव में आ गए थे और भेष बदल कर रह रहे थे। भैरव कुछ हाथ की सफाई जानता था जिसके बल पर गाँव वालों को प्रभावित करता था। बाकी एक के मुह से निकला तिल दूसरे के मुख से ताड़ बन कर निकलता था । इसी कारण सब उसे सिद्ध महात्मा समझते थे।

बात उड़ती हुई प्रभावती तक पहुंची। उसने सोंचा ये सिद्ध पुरुष ही उसके कष्ट दूर कर सकते हैं। अतः अगले दिन प्रभावती उस ढोंगी साधू को घर ले आई और खूब आवभगत करने लगी। लाला दर्शनलाल को भी लगा कि ये महात्मा अवश्य उनकी दौलत को बढ़ाने में सहायता करेंगे। अतः प्रभावती के साथ वो भी उनकी खातिर करने लगे। लेकिन लीलावती को साधू महात्माओं पर विश्वास नहीं था। वह उस ढोंगी की बिलकुल भी इज़्ज़त नहीं करती थी। उसे यह खातिरदारी पैसों की बर्बादी जान पड़ती थी। अतः एक दिन उसने इस पर आपत्ति जताई। भैरव कोई साधू नहीं था किंतु इन दिनों उसे अपना आदर करवाने की आदत पड़ गई थी। इसलिए लीलावती का व्यवहार उसे असह्य लगा। वह मन ही मन उससे बदला लेने की सोंचने लगा।

एक दिन प्रभावती ने मौका देखकर अपने मन की बात भैरव को बता दी कि कैसे उसकी छोटी बहन उसकी शत्रु हो गई है। उसने प्रार्थना की कि उसे सबक सिखाने में वह उसकी सहायता करे। भैरव ने आश्वाशन देकर उसे भेज दिया। उसी शाम लाला दर्शनलाल भी भैरव के कमरे में आये और प्रार्थना की कि अपना चमत्कार दिखा कर उसकी दौलत को कई गुना बढ़ा दे।

जब भैरव गाँव आया था उसने दर्शनलाल की संपत्ति के विषय में सुना था। उसी दिन से वह उनकी दौलत लूटने की योजना बना रहा था। दर्शनलाल के लालच और उनकी पत्नियों के आपसी बैर के बारे में उसे खबर थी। वह जनता था कि एक दिन उसे हवेली से बुलावा अवश्य आएगा। अतः वह पहले ही योजना बना कर आया था उसे बस सही समय की प्रतीक्षा थी। दर्शनलाल की बात सुनकर उसने कहा कि उसने अपनी शक्तियों से एक जिन्न को कब्ज़े में कर रखा है। उसकी सहायता से वह ऐसा कर सकता है। किंतु जिन्न को प्रसन्न करना होगा। उसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ भेंट देनी होगी।

दर्शनलाल सोंच में पड़ गए। ऐसी क्या चीज़ है जो वह जिन्न को भेंट कर सकते हैं। जब भी वो दुविधा में होते प्रभावती से सलाह लेते थे। आज भी वह उसके पास गए। प्रभावती समझ गई कि वह किसी विषय में सलाह लेने आये हैं। उसका दिमाग तेज़ी से चलने लगा। दर्शनलाल की दुविधा जानकार लीलावती के प्रति छिपी हुई नफ़रत काले नाग की भांति फुंफकारने लगी। उसने कहा दुनिया में संतान से अधिक प्रिय तो कुछ भी नहीं होता है। प्रभावती की बात सुन कर दर्शन लाल क्रोधित हो उठे। वो प्रभावती को कोसने लगे की वह सौतिया डाह में जल रही है इसीलिए ऐसा कह रही है। किंतु उनके क्रोध से वह विचलित नहीं हुई। वह उनके मन के लालच को समझती थी। अतः शांति पूर्वक बोली कि मैंने कब कहा कि आप अपने पुत्र की भेंट दें। धन दौलत का मुझे कोई लोभ नहीं। जितना है वही बहुत है। मैं तो कहती हूँ आप ये बात ही स्थगित कर दें। दर्शनलाल की समस्या और बढ़ गई। दौलत बढ़ाने का मोह छूट नहीं रहा था और पुत्र को भी खतरे में नहीं डालना चाहते थे। उनके असमंजस को भांप कर प्रभावती ने बड़ी चतुराई से बात आगे बढ़ाई। बोली वैसे जीवन का क्या भरोसा। मेरे मामा का लड़का पिछले साल हैजे से चल बसा। सारी संपदा पड़ी रह गई। आपकी सारी संपत्ति तो आपके पुत्र की ही है। लेकिन जिस प्रकार आप उसे खर्च कर रहे हैं उसकी बारी आने तक सब ख़त्म हो जाएगा। गरीबी का जीवन तो मृत्यु से भी ज़्यादा कष्टप्रद होता है। वैसे भी जिन्न महात्मा जी के वश में है। वह अवश्य ही उसे बचा लेंगे। प्रभावती की बात दर्शनलाल को सही लगी। खासकर आख़िरी बात। अतः वो एक फैसले के साथ भैरव के पास गए।

उन्होंने उससे पूंछा क्या वह उनके पुत्र के प्राण वापस दिला सकता है। भैरव अपनी योजना में कोई विघ्न नहीं चाहता था। उसने हाँ कर दी। एक कार्यक्रम बनाया गया । जिसके तहत सब नौकरों को छुट्टी दे दी गई । भैरव ने प्रभावती को एक पुड़िया दी। जिसे उसने लीलावती और उसके पुत्र के भोजन में मिला दिया। जिसे खाकर वो दोनों बेहोश हो गए। तय समय पर सब लोग उस गुप्त कक्ष में एकत्रित हुए जहाँ दर्शनलाल की दौलत थी। प्रभावती लीलावती के पुत्र को उठा लाई थी। भैरव ने पूजा आरम्भ की। उसने कहा कि जिन्न को खुश करने के लिए पहले बच्चे की बलि देनी होगी। उसने बच्चे का गाला रेत दिया। दर्शनलाल ने मुह फेर लिया। उसने सोंचा अभी जिन्न प्रकट होगा जो उसकी दौलत को बढ़ा देगा और उसके पुत्र के प्राण भी बक्श देगा। भैरव ने दर्शनलाल और प्रभावती से आँख बंद कर ध्यान करने को कहा। जब दोनों ध्यान में लीन थे तो भैरव और मैकू ने दोनों का का काम तमाम कर दिया। सारी दौलत बटोर कर वो उसे दर्शनलाल की बैलगाड़ी में लाद कर रात में ही निकल गए।

दिन चढ़ते चढ़ते वो गाँव से दूर निकल आये। एक दूसरे गाँव के बाहर पहुँच कर वो कुछ आराम करने को रुक गए। भैरव ने कहा कि उसे भूख लगी है अतः मैकू गाँव जाकर कुछ खाने को ले आये। मैकू जब खाना लेने गया तो भैरव के मन में लालच आ गया। उसने मैकू को मारने की योजना बनाई। वह घात लगा कर उसके लौटने का इंतज़ार करने लगा। उसके वापस आते ही उसने उसे मार दिया। उसके बाद वह आराम से खाने बैठा। एक दो ग्रास खाते ही उसे खून की उल्टी हुई और वह भी मर गया।

लालच के विषधर ने सभी को डस लिया था।

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