सूर्यकुल का सूर्यास्त

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क्षितिज के उस पार तक फैला आकाश आज नीले रंग का नहीं, बल्कि ताजे बहते रक्त के समान गहरा लाल था। हवा भारी और बोझिल हो चुकी थी, जिसमें लोहे जैसी तीखी खून की महक और जलते हुए मांस की दुर्गंध घुली हुई थी। यह महक इतनी तीव्र थी कि जीवित बचे लोगों की साँसें घुट रही थीं। आकाश में हज़ारों गिद्ध और मांसाहारी जंगली पक्षी मंडरा रहे थे, जो नीचे बिछी लाशों के ढेर को अपनी भूखी निगाहों से तौल रहे थे।

Full Novel

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 1

क्षितिज के उस पार तक फैला आकाश आज नीले रंग का नहीं, बल्कि ताजे बहते रक्त के समान गहरा था। हवा भारी और बोझिल हो चुकी थी, जिसमें लोहे जैसी तीखी खून की महक और जलते हुए मांस की दुर्गंध घुली हुई थी। यह महक इतनी तीव्र थी कि जीवित बचे लोगों की साँसें घुट रही थीं। आकाश में हज़ारों गिद्ध और मांसाहारी जंगली पक्षी मंडरा रहे थे, जो नीचे बिछी लाशों के ढेर को अपनी भूखी निगाहों से तौल रहे थे। उनके डैने फड़फड़ाने की आवाज़ें और बीच-बीच में सुनाई देने वाली कर्कश चीखें इस वीराने को और ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 2

अध्याय 2: नियति का नया खेलमहान अपराजित तलवार योद्धा, जिसकी तलवार की चमक से कभी नक्षत्र कांपते थे, उसकी के 5 लंबी शताब्दियों के बाद कालचक्र ने एक नया मोड़ लिया। एक सुदूर, अनजाने ग्रह की मिट्टी में उसका पुनर्जन्म हुआ। समय अपनी गति से बहता रहा और वह योद्धा 21 वर्षों तक एक साधारण युवक की चेतना में सोया रहा।विराज एक रात अपने कक्ष की शांति में गहरी निद्रा में लीन था, तभी अचानक ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक तीव्र झोंका उसके मस्तिष्क से टकराया। बंद आंखों के पीछे स्मृतियों का एक प्रलयंकारी सैलाब उमड़ पड़ा। उसके पूर्व जन्म ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 3

अध्याय 3: नियति का ज्वारविराज अपने अंतर्मन की गहराइयों में उतरने ही वाला था, अपनी चेतना को साधना के चरण की ओर मोड़ने ही वाला था कि तभी उसके एकांत को भंग करती हुई एक भारी दस्तक दरवाजे पर हुई। लकड़ी के किवाड़ों से टकराती उस आवाज ने शांत वातावरण में एक कंपन पैदा कर दिया।विराज, जो अपनी पालथी जमाए बैठा था, धीरे से खड़ा हुआ। उसकी चाल में एक अजीब सा ठहराव और गरिमा थी। वह आंगन के बीचों-बीच से गुजरते हुए मुख्य द्वार की ओर बढ़ने लगा। यह घर, जो बाहर से जितना साधारण दिखता था, भीतर ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 4

अध्याय 4 आध्यात्मिक सागर की नींबइस समय विराज आंगन में अकेला खड़ा था। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था, कभी-कभार हवा का हल्का झोंका पेड़ों की पत्तियों को सरसरा देता था।तभी वह फिर से उसी पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया जहाँ वह पहले बैठा था। विराज ने अपनी आँखें बंद कीं, गहरी साँस ली, और संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल करने लगा। उसके शरीर का हर रोम, हर अणु, इस साधना के लिए तड़प रहा था—मानो वह जानता हो कि अब समय आ गया है।विराज के पुराने जन्म में उसके सूर्यकुल में दो साधना विधियों का इस्तेमाल ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 5

अध्याय 5: चुप्पी का प्रहरठीक इसी तरह, बिना किसी बड़ी उपलब्धि या हलचल के, पूरा एक महीना बीत गया। अपनी निरंतर अभ्यास में लगा रहा। उसका साधना स्तर अब ‘लघु लड़ाकू योद्धा’ के दूसरे चरण से ऊपर उठकर तीसरे चरण पर आ गया था, लेकिन वहाँ आकर अटक गया था।इस ठहराव का एक मुख्य, बहुत गहरा कारण था। इंदौर शहर एक ऐसी जगह थी जहाँ हर साधक, हर उम्र का व्यक्ति, ज्यादातर अपने ही घर की चारदीवारी के भीतर एकांत में साधना करता था। इस एकांत साधना का परिणाम यह होता था कि पूरे शहर के वातावरण में उपस्थित ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 6

अध्याय 6 नौकर के गाल पर सचसभा भवन में सभी की बातें अभी चल ही रही थी, तभी विराज बड़े आलसी पन से कहा "क्या आप सब ने मुझे यही बेकार की बातें सुनने के लिए बुलाया है?"विराज के मुख से यह शब्द निकलते ही पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया, मानो किसी ने तेज बहती नदी के बीच एक बड़ा सा पत्थर फेंक दिया हो।यह सुनते ही मोहन की पत्नी के चेहरे का रंग कुम्हलाया हुआ सा हो गया। उसकी आँखों में आग सी लग गई थी। वह अब तक के सारे संयम को तोड़ते हुए विराज की ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 7

अध्याय 7 ठोस नींव का सिद्धांतसभा भवन से आने के बाद विराज अपने घर के आंगन में आ गया। को जब नौकर रामू उसके घर में खाना बनाने और घर के काम करने के लिए फिर से आया, तब विराज ने रामू से पूछा—"घर में कितने दिन का राशन बचा हुआ है?"विराज की आवाज़ में एक सामान्य जिज्ञासा थी, मानो वह केवल एक रोज़मर्रा के हिसाब-किताब का प्रश्न पूछ रहा हो।रामू के चेहरे पर न तो कोई आश्चर्य था, न ही कोई घबराहट—बल्कि एक अजीब सी शांति थी, मानो वह इस प्रश्न के लिए पहले से ही तैयार था।क्योंकि ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 8

अध्याय 8 आचार्य विदुर का अटूट निर्णयवहीं दूसरी तरफ मगध साम्राज्य की राजधानी के अंदर स्थित नालंदा गुरुकुल में आकृतियां मुख्य छात्रों को रहने के लिए आवंटित घरों की श्रृंखला की सड़क पर चले जा रहे थे। सुरेश और गीता, जो इंदौर शहर के सम्मानित नागरिक थे, अब धीमे कदमों से उन भव्य हवेलियों के बीच से गुजर रहे थे। उनके मन में अपनी बेटी रवीना से मिलने की उत्कंठा थी, और हर कदम के साथ वह उत्कंठा और गहरी होती जा रही थी। सात महीने का लंबा अंतराल उनके और उनकी बेटी के बीच खिंच गया था, और ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 9

अध्याय 9 राजगद्दी का विश्वासघातआचार्य विदुर द्वारा कही गई बात अब सत्य होने लगी थी। वह ज्वालामुखी जिसके फूटने बात उन्होंने किशन से कही थी, अब धरती के गर्भ में सुलगने लगा था। उसकी गरमाहट अब ऊपरी सतह तक आने लगी थी। और उस ज्वालामुखी की आहट मगध साम्राज्य के शाही महल तक पहुँच चुकी थी।मगध साम्राज्य के राजा अपने कार्यालय में बैठे हुए थे, उनके साथ उनके चौथे भाई सेनापति मेघनाथ बैठे हुए थे। कार्यालय का वातावरण भारी था, मानो कोई अदृश्य बोझ कमरे में रख दिया गया हो।मेघनाथ मगध साम्राज्य के राजा की ओर देखते हुए कहते ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 10

अध्याय 10 दशानंद की कुटिल चालदशानंद से अब सब्र हो नहीं रहा था। वह तीनों भाइयों में सबसे बड़ा सबसे शक्तिशाली था, परंतु आज उसकी शक्ति उसके सामने फीकी पड़ रही थी। रहस्य के इस जाल में, सच्चाई के इस अंधेरे कुएँ में, वह खुद को असहाय महसूस कर रहा था। इसीलिए वह झुंझलाते हुए पूछता है, "कुंभकरण, तुम हमें पूरी सच्चाई बताओ। हम शुरू से जानना चाहते हैं कि तुम्हें क्या-क्या जानकारियाँ मिली हैं और कैसे-कैसे मिली हैं।"कुंभकरण बताता है, "भ्राता, करीब दो महीने पहले मेरी मुलाकात नालंदा गुरुकुल के अधीन कार्य कर रही शकुंतला चौहान से हुई। ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 11

अध्याय 11 अस्सी शिकार और एक रहस्यमगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में हो रही अराजक गतिविधियों और राजनीतिक उथल-पुथल कोसों दूर, विराज लगभग पंद्रह दिनों के लंबे अंतराल के बाद अपनी शिकार यात्रा से वापस इंदौर शहर की ओर आ रहा था। उसके मन में संतोष की गहरी लहर थी, क्योंकि यह यात्रा उसके लिए केवल एक साधारण शिकार अभियान से कहीं अधिक सिद्ध हुई थी।विराज के लिए यह यात्रा उम्मीद से कहीं-कहीं ज्यादा बेहतर किस्मत लेकर आई थी। उसने अपनी सारी गणनाओं को धूल चटा दिया था, और जो उसे प्राप्त हुआ, वह उसके प्रारंभिक लक्ष्यों से कहीं ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 12

अध्याय 12 ​काल मुख घाटी का संकटदरअसल, विराज की शिकार यात्रा पंद्रह दिन नहीं, बल्कि चौदह दिन में ही हो गई थी। उसने जंगल में जितने दिन रहने की योजना बनाई थी, उससे एक दिन पहले ही उसका अभियान पूरा हो गया। और वह जंगल से बड़े आराम से, मानो कोई सामान्य यात्रा ही कर रहा हो, काल मुख घाटी से बाहर निकल रहा था, तभी अचानक उसका सामना तीसरे चरण के आध्यात्मिक काले भालू से हो गया।उस तीसरे चरण के काले भालू ने, जो अपनी चालाकी और क्रूरता के लिए जाना जाता था, एक छोटे से दर्रे के ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 13

अध्याय 13 भविष्य की तैयारीरात के उस सन्नाटे भरे समय में, जब चारों ओर सब कुछ गहरी नींद में चुका था, विराज अपने कमरे में लेटा हुआ था — परंतु उसकी आँखें खुली थीं। वह गहन विचारों में खोया हुआ था, मानो कोई सागर उसके मन में उमड़ रहा हो, और अब तक के अपने जीवन — इस नए जीवन और पुराने जीवन — और अपने उद्देश्यों के बारे में गहराई से विचार कर रहा था। उसे क्या करना है? उसका अंतिम लक्ष्य क्या है? ये सब प्रश्न उसके मानसिक पटल पर एक-एक करके उभर रहे थे।विराज का यह ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 14

अध्याय 14 राघव जोशी का अपमानअगले दिन विराज इंदौर शहर की मुख्य बाजार से होकर गुजर रहा था। संकरी थीं, किंतु उन गलियों के दोनों ओर खड़े भव्य प्रासादों के कारण वे किसी स्वर्गीय पथ से कम नहीं लगती थीं। बाजार के फुटपाथ पर रंग-बिरंगे कपड़े, मसाले, आभूषण और हथियार बिक रहे थे। मिट्टी के बर्तनों की दुकानों से मिट्टी की सुगंध आती थी, वहीं मिठाई की दुकानों से घी और खोए की महक पूरे बाजार में बिखरी थी। दूकानों के आगे लकड़ी के छप्परनुमा ढांचे बने थे, जो धूप और बारिश से राहगीरों को बचाते थे। गलियों में ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 15

अध्याय 15 जगदीश मित्तल की गणनादिव्य नीलामी कला केंद्र के एक भव्य कमरे के बीच में दो लोग हाथों गिलास पकड़े हुए फलों के शरबत को सुकून से पी रहे थे। कमरे के बीचों-बीच शीशम की लकड़ी से बनी एक विशाल मेज रखी थी, जिसके चारों ओर आरामदायक कुर्सियाँ थीं, जिन पर मुलायम गद्दे बिछे थे। मेज पर संगमरमर के बने गिलास रखे थे, जिनमें रंग-बिरंगे फलों का शरबत था—कुछ में अनार का लाल रस था, कुछ में आम का पीला, तो कुछ में अंगूर का हरा। शरबत की मीठी-मीठी खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी, जिससे वातावरण ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 16

अध्याय 16 उच्च लड़ाकू योद्धा का उदयदिव्य नीलामी कला केंद्र से निकलने के बाद, विराज सीधे अपने घर में गया। फिर सबसे पहले वह अपने घर के पीछे के आंगन में गया, यह एक बंद, सुरक्षित स्थान जहाँ चारों ओर ऊंची दीवारें थीं और ऊपर खुला आकाश था। रात के समय चाँद की रोशनी सीधे इस आंगन में आती थी, और दिन में सूरज की किरणें इस स्थान को ऊर्जा से भर देती थीं।दो विशाल पत्थर के टब वहाँ पहले से ही रखे हुए थे, जिन्हें उसने विशेष रूप से अपने आकार और गहराई के हिसाब से बनवाया था। ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 17

अध्याय 17 मीनाक्षी जिंदल का आगमनदो दिन बीत चुके थे।विराज अपने घर के आगे के आंगन में विशाल वृक्ष घनी छाल के नीचे आराम कुर्सी पर बैठा हुआ था। सुबह की सुनहरी धूप पत्तियों के बीच से छनकर उसके शरीर पर बिखर रही थी। मंद-मंद बहती ठंडी हवा में पक्षियों की कलरव और बगीचे के फूलों की सुगंध घुली हुई थी। उसके हाथ में कांच के ठंडे गिलास में ताजे फलों का शरबत था, जिसे रामू ने अभी-अभी बनाकर दिया था।चूंकि उसने अत्यधिक तेजी से अपने साधना के मार्ग पर प्रगति की थी, इसीलिए अब उसके लिए यह अत्यंत ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 18

अध्याय 18 जिंदल परिवार की अंतिम आशाअगले ही पल, विराज कमरे के अंदर आया।उसने कमरे के अंदर एक नज़र — एक ओर जगदीश मित्तल अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ था, और उसके साथ एक अपरिचित महिला थी, जो संभवतः कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति लग रही थी, क्योंकि जगदीश का व्यवहार उसके प्रति अत्यधिक आदरपूर्ण था।वह महिला दिखने में निस्संदेह सुंदर थी। परंतु विराज ने अपनी पुरानी जिंदगी में इससे भी अधिक सुंदर महिलाओं को देखा था। ऐसी सुंदरियाँ जिनके सामने यह महिला फीकी पड़ जाती। लेकिन उनमें से कोई भी उसे कभी अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाई थी, क्योंकि ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 19

अध्याय 19 कंकाल दर्रे का गुप्त इतिहासकुछ देर बाद, दिव्य नीलामी कला केंद्र के एक विशेष अतिथि कक्ष में मीनाक्षी और जगदीश मौजूद थे।यह कक्ष केंद्र के सबसे आरामदायक और गोपनीय कमरों में से एक था, जहाँ केवल अत्यंत विशिष्ट अतिथियों को ही ठहराया जाता था।विराज पलंग के किनारे बैठा हुआ था। उसने जयदेव जिंदल का हाथ पकड़ रखा था। और उनका आकलन कर रहा था।लगभग पाँच मिनट तक पूर्ण मौन रहने के बाद, विराज ने अपनी आँखें खोलीं। उसने जयदेव का हाथ धीरे से वापस पलंग पर रखा, और फिर उठकर खड़ा हो गया।फिर वह बोला "इनकी स्थिति ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 20

अध्याय 20 अनचाहे मेहमानों का आगमनसूर्य अस्त हो चुका था, और उसकी अंतिम किरणें भी क्षितिज के पीछे जा थीं। हल्की-हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी, जिससे वातावरण में मिट्टी की सुगंध घुल गई थी। सड़कों पर लालटेनें जलनी शुरू हो चुकी थीं।विराज अपने घर से तैयार होकर निकला था।उसने कुछ अच्छे कपड़े पहन रखे थे, एक सादा सफेद कुर्ता, जिस पर बहुत ही साधारण और मामूली कढ़ाई थी। उसने अपने बालों को संवारा था, और अपने चेहरे पर वही शाश्वत उदासीन भाव लिए हुए था।उसके हाथों में एक सुंदर कागज में लिपटा हुआ एक डिब्बा था, वह तोहफा ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 21

अध्याय 21 निखिल जोशी का प्रस्तावअचानक आए इन छह लोगों के समूह में से विराज की नजर दूसरे नंबर व्यक्ति पर पड़ी। हॉल की रोशनी में उस व्यक्ति का चेहरा साफ दिख रहा था, अहंकार से भरी मुस्कान, और उस चाल में वही परिचित घमंड जिसने कुछ दिन पहले चौराहे पर विराज को टक्कर मारी थी।यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि राघव जोशी था, लेकिन विराज बाकी में से किसी को भी नहीं जानता था। पर ये सभी जोशी परिवार के ही कुछ खास सदस्य या अधीनस्थ प्रतीत हो रहे थे।राघव जोशी की भी नजर विराज पर पड़ी, और ...और पढ़े

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 22

अध्याय 22 पांच दिलों का जागरणइस समय राघव जोशी जमीन पर घुटनों के बल बैठ चुका था। उसका सिर हुआ था, और उसके कंधे समय-समय पर कांप रहे थे। बेशक विराज ने उसकी पिटाई नहीं लगाई थी, फिर भी वह किसी डरपोक कुत्ते की तरह सिकुड़ गया था।वह एक बुजदिल की तरह व्यवहार कर रहा था, ठीक वैसे ही जैसे वह हमेशा से था। ताकत होने पर शेर बनने वाला, और ताकत के सामने आते ही चूहा बन जाने वाला। विराज, जो पुराने जन्म में महान अपराजित तलवार योद्धा के नाम से प्रसिद्ध था, उसके लिए किसी बुजदिल व्यक्ति ...और पढ़े

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