मीडाज़ टच वाली हैटट्रिक Arunendra Nath Verma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मीडाज़ टच वाली हैटट्रिक

मीडाज़ टच वाली हैटट्रिक

अरुणेन्द्र नाथ वर्मा

इंस्पेक्टर यादव को जिन बातों से तकलीफ होती थी उनमे कौन सबसे ज़्यादा तकलीफ़देह थी, कौन कुछ कम- बताना कठिन नहीं था. सबसे अधिक कष्ट तब होता था जब एस एच ओ अर्थात थानाध्यक्ष बन जाने के बाद भी कोई उन्हें केवल इंस्पेक्टर साहेब कह कर बुलाता था. फिर तो उस साले को हवालात में बंद करके दो जूते लगाने का मन होता था. ऐसा होना स्वाभाविक भी था. कितने पापड बेल कर सैकड़ों में से एक नायब दारोगा एस एच ओ की गद्दी हासिल कर पाता है किसी उल्लू के पट्ठे को मालूम हो तब न! एक बार तो ऐसे गधे से भी साबका पड़ गया था जिसने उन्हें दारोगा जी कह कर संबोधित किया था. पर उस बार खून के घूँट पीकर चुप लगा जाना पडा था क्यूंकि बात स्थानीय विधायक की थी. फिर भी मन में यादव जी ने तय कर लिया था कि मौक़ा मिलेगा तो चूकेंगे नहीं, विधायक जी को इशारा तो कर ही देंगे कि एस एच ओ साहेब छोड़कर किसी और संबोधन से न ही बुलाएं तो बेहतर होगा.

दूसरे नंबर पर जिन और बातों से उन्हें चिढ लगती थी उन सबको एक ही श्रेणी में रखा जा सकता था. ये अन्य बातें इस प्रकार थीं. एक तो किसी के सामने इस भेद का खुल जाना कि एस एच ओ साहेब का हाथ अंग्रेज़ी में तंग था. दूसरे इस रहस्य का पर्दाफ़ाश हो जाना कि दो चार लोगों की रोज़ ठुकाई करने के अतिरिक्त उन्हें और किसी तरह के शारीरिक श्रम, कसरत या खेलकूद से सख्त नफरत थी. उन्हें तो उन लोगों तक से नफ़रत थी जो क्रिकेट का मैच देखने के लिए दीवाने रहते हैं. पर ज़माने की हवा ऐसी थी कि दूसरों के सामने यह कबूलना भी कठिन था कि उन्हें क्रिकेट की शब्दावली के आम शब्दों का अर्थ भी ठीक से नहीं मालूम था. वैसे तो और भी कई बातों से उन्हें कष्ट पहुंचता था लेकिन यहाँ वे अप्रासंगिक होंगी अतः उनकी चर्चा फिर कभी.

यह भी एक विडम्बना ही थी कि उस दिन वे दोनों बातें एक साथ हो गयीं जिनसे यादव जी को सख्त चिढ थी. दुःख इसका था कि अंग्रेज़ी पर पकड़ ढीली होने के कारण वे उन शब्दों को ठीक से समझ नहीं पाए जो स्पष्टतः उनकी तारीफ़ में ही कहे गए थे. पहला शब्द था मीड़ाज़ टच और दूसरा था हैट ट्रिक. टच का अर्थ तो यादव जी खूब समझते थे पर उसमें ये जो ससुरा मीड़ाज़ घुसा हुआ था वह कौन था. दूसरा शब्द था हैट ट्रिक. इस पुलिसिया नौकरी में रहकर वे पचासों किस्म की ट्रिकों से परिचित थे. बस अकेली इस हैट ट्रिक से कभी वास्ता नहीं पडा था. चिढ यादव जी को अंग्रेज़ी से जितनी थी उतनी ही क्रिकेट के खेल से भी. फिर हैट ट्रिक से परिचय होता तो कैसे होता. पर यादव जी इतना तो भांप ही गए थे कि इस ट्रिक का उल्लेख उनकी तारीफ़ में हुआ था. हैटट्रिक बनाने की शुभकामना देकर जिस ने उनकी पीठ ठोंकी थी वह और कोई नहीं बल्कि खुद यादव जी के सर्किल ऑफिसर साहेब थे. सी ओ साहेब पुलिस अधीक्षक से ठीक नीचे वाली पायदान पर विराजमान थे और यादव जी जैसे छः थानाध्यक्षों के इम्मीडीयेट बॉस थे. इन छहों झिलमिलाते सितारों के बीच यादव जी की प्रतिभा की चमक देखकर सी ओ साहेब को हाई स्कूल की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में पढ़ा एक दोहा याद आ जाता था ‘अबके कवि खद्योत सम जंह तंह करत प्रकास” यादव जी सी ओ साहेब के सबसे ‘कमाऊ पूत’ जो थे. कभी कभी तो वे अपनी पत्नी तक से यादव जी की तारीफ़ करते हुए कहते थे ‘, क्या गज़ब का बन्दा है ये यादव भी. तिल की बजाय सूखी रेत मुठ्ठी में लेकर निचोड़े तो वह भी तेल टपकाने लगेगी.’ वैसे सी ओ साहेब यादव जी के मुंह पर उनकी तारीफ़ करने में थोड़ा हाथ खींच कर ही चलते थे –क्या पता ज़्यादा तारीफ़ बन्दे के सर पर न चढ़ जाए. पर मजबूरी हो गयी. पिछले दो महीनों में यादव जी ने एक के बाद एक दो लम्बे हाथ मारे. वह भी बहुत साफ़ सुथरे तरीके से. न चोरी न फौजदारी. न केस बनाने की झंझट न चोर डकैतों से भिड़ने का ख़तरा. दो गुमनाम इंसानों ने आत्महत्या कर ली थी और यादव जी ने उसमे भी इस सफाई से नकद नारायण को ढूँढ़ निकाला कि सी ओ साहेब की आत्मा तृप्त हो गयी. फिर निहायत ईमानदारी से सी ओ साहेब को लगातार उन्होंने लूप में भी रखा. केस को अच्छी तरह से पाल में रख कर पकाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी. यादव जी ने पलक झपकते में ही सारा जूस निचोड़ लिया था और सारी झंझट रफा दफा कर दी थी. फिर जूस निचोड़ने के बाद उतनी ही ईमानदारी से उन्होंने सी ओ साहेब के यहाँ उनका ‘हक़’ चुपचाप पहुंचा दिया. निष्ठा, ईमानदारी, स्वामिभक्ति की मिसाल एक तरफ कायम की और अपनी प्रतिभा, कार्यकुशलता और लगन से सी ओ साहेब को चकाचौंध कर दिया सो अलग. फिर कहाँ तक सी ओ साहेब अपने सबसे प्रिय थानाध्यक्ष के प्रति मन में उमड़ती भावनाओं पर नियंत्रण रख पाते. आखीर मुंह खोल कर उन्हें यादव जी की तारीफ़ उनके मुंह पर ही करनी पड़ी.

दो महीनों में एक ही पार्टी की आंत के अन्दर हाथ घुसाकर एक के बाद एक, पंद्रह पंद्रह लाख करके तीस लाख रुपये वसूल लेना, उनमे से आधे रुपये सी ओ साहेब और ऊपर के लिए चुपचाप पहुंचा देना, शेष पंद्रह में से पांच अपने प्यादों और फर्जियों के लिए अलग कर देना और स्वयं केवल दस लाख रखना. वाह! वाह! वाह! कर्तव्य परायणता की जीती जागती मिसाल बन गए थे यादव जी. सारा काम इतनी होशियारी से किया था उन्होने कि कहीं से किसी तरह की शिकायत की बू आने का प्रश्न ही नहीं था.

पिछले दिनों क़र्ज़ के बोझ से दबे और सूखे के प्रकोप से तड़पते लाचार न जाने कितने किसानों ने आत्महत्याएं की थीं. लगातार एक के बाद एक होती ये आत्महत्यायें मीडिया की सुर्ख़ियों में ऐसी छायी हुई थीं कि सारा देश टकटकी लगाकर लगातार उधर ही देखने में तल्लीन था. उन अभागे किसानों की स्तब्ध मौत विधानसभाओं और संसद में विपक्ष के गर्जन और शासक दल की हतप्रभ सफाइयों पर हाबी हो गयी थी. जब सारा देश किसानों की आत्महत्याओं से क्षुब्ध हो, जब उन्ही पर सारे देश का ध्यान केन्द्रित हो तो ऐसे में बड़े बड़े शहरों में लाखों करोड़ों रुपयों के फ़्लैट बुक करा कर लुट जाने वाले मध्यम वर्ग के आंसू पोंछने की फुर्सत किसे थी. तथाकथित मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के गिनती के कुछ बन्दे अपनी मजबूरियों से लड़ते लड़ते आत्महत्या कर भी लेते तो मीडिया के वितान पर एक क्षणिक चिंगारी की तरह चमकते और लुप्त हो जाते. शहरों में आत्महत्याओं के लिए यूँ ही इतने ढेर से कारण थे कि किसी एक का सुर्ख़ियों में छा जाना संभव ही नहीं था. परीक्षा में असफलता, नौकरी न मिलना या मिल कर छूट जाना , लिविंग इन का लिविंग आउट हो जाना पचासों वज़हें थीं शहरियों के लिए आत्महत्या का प्रयोजन बन जाने के लिए. फिर अगर छः सात साल से अधबने पड़े हुए बहुमंजिले फ्लैट से कोई सिरफिरा कूद ही पड़े तो उसके लिए स्पष्ट तौर से दोषी कहकर किसका गला पकड़ा जा सकता था. आत्महत्या करने वाले ने अन्य सामाजिक, पारिवारिक या आर्थिक मानसिक तनावों के बोझ से उबरने के लिए मुक्ति का यह मार्ग चुना या सीधे सीधे किसी बिल्डर की लालच का शिकार होकर, इसका ठीक पता तो अन्य ज़रुरी कामों में उलझे हुए भगवान को भी नहीं होगा. बेचारी सरकार इसमें क्या करती. बहुत शोर मचा तो बयान दे दिया जाता कि आत्महत्या की जांच होगी और ठीक से होगी. शोर न भी मचता तो हर आत्महत्या की जांच पुलिस करती ही है. पर बिल्डरों की क्रूरता और लालच के शिकार बने लोगों ने आत्महत्या का मार्ग चुना तो उन्हें स्वप्न में भी ध्यान नहीं आया होगा कि पुलिस की झोली में गिरकर उनकी आत्महत्या भी स्वर्णमुद्रा में बदल जायेगी.

यादव जी को कल तक बहुत शिकायत थी शहर से बाहर कम आबादी वाले इस इलाके में नियुक्ति होने से. वहाँ बहुत सी नयी नयी बिल्डर कोलोनियाँ बन रही थीं. इस सुनसान में फसल काटना कोई खेल तमाशा था क्या?.ऊपर वालों को खुश रखने के लिए उन्हें नाकों चने चबाने पड़ते. लोग रहें तब तो अपराध हों! अपराध हों तब तो चूल्हे पर चढी यादव जी की पतीली में दाल खदके! पिछले कई वर्षों से अधिकाँश बिल्डरों की बहुमंजिली इमारतों की बढ़त थम गयी थी. सड़क के किनारे जन्नत का नज़ारा खींचती हुई दर्जनों फ्यूचरिस्टिक रंगीन होर्डिंग्स लगी हुई थीं. उन्ही होर्डिंग्स और उनसे भी सुन्दर ब्रोशर्स को देखकर चक्रव्यूह में फंसे हुए फ्लैटों के भावी मालिक अब उधर से गुज़रते तो दिन में हताशा और घृणा से उन होर्डिंग्स पर थूकते थे. रात में वहाँ केवल गीदड़ रोते थे. मगर जब यादव जी के तथाकथित बंजर इलाके में इन्ही हताश खरीदारों में से दो ने एक के बाद एक आत्महत्या कर डाली तो यादव जी को विश्वास हो गया कि ऊपरवाले के राज में देर है तो इन बिल्डरों की तरह है, पर उनकी तरह अंधेर नहीं.

किस्मत ने यादव जी की झोली में इस दरियादिली से दो आत्महत्याएं डालीं कि उनके वारे न्यारे हो गए. बस पुलिसिया जांच यादव जी को इतनी होशियारी से करनी थी कि कोई बवाल न होने पाए, लोग आत्महत्या के बारे में पढ़ें, देखें, सुनें तो कुछ घंटों में भूल जाएँ. बिल्डर पर इतना दबाव बनाया जाए कि वह आत्महत्या के लिए उकसाने और प्रेरित करने के इलज़ाम से घबराकर पुलिस के पाँवों में अपनी पगड़ी उतार कर रख दे. हनुमान चालीसा के बाद यादव जी को और भी कुछ पढ़ा हुआ कंठस्थ था तो भारतीय दंड संहिता की धारायें. सोते में भी यादव जी से कोई पूछता कि ताजीराते हिन्द या दंड संहिता की इन धाराओं में क्या था तो यादव जी आँखें बंद किये हुए बड़बड़ाने लगते मानों ट्रुथ सीरम लगाया गया हो. बताते कि धारा ३८३ एक्स्टोर्शन से सम्बद्ध है, इसके अंतर्गत सज़ा है १ से ३ साल तक की कैद, फाइन अलग. फिर दफा ३०६ के बारे में कहते कि वह आत्महत्या के लिए उकसाने पर लागू होती है. इसकी सज़ा तगड़ी है- दस साल तक की सादी या सश्रम कैद और फाइन अलग. धोखाधड़ी और जालसाजी के बीच का महीन अंतर भी उन्हें रटा हुआ था. इसके बाद भी बड़बड़ाने का और समय मिलता तो धारा ४२० से लेकर जाने कितना ज्ञान वे बघार डालते. पर प्रबुद्ध सिद्धार्थ की तरह यादव जी को भी पता था कि वीणा के तार इतने ही कसने चाहिए कि स्वर मधुर हो जाएँ पर तार टूटने न पायें. लगाने को तो वे बेहिसाब धाराएँ लगाकर उनका भी जीना मुश्किल कर दें पर पुलिस के शिकंजे में जकड़े हुए बिल्डर के हाथ में इतना नफ़ा तो बचना ही चाहिए कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की जान सलामत रह सके. बिल्डर सुरक्षित रहा तो आत्महत्याएं और होंगीं. आत्महत्याएं और होंगी तो बिल्डर को भी कुछ बचेगा. फिर बिल्डर भी खुश, पुलिस भी खुश.

तो आइये वहां वापस चलते हैं जहाँ अपने इलाके में पिछले दो महीनों में दो आत्महत्याओं के होने की खुशी में डूबकर सी ओ साहेब ने यादव जी की पीठ ठोंकते हुए कहा “ यादव अब तो लगता है तुम हैट ट्रिक बना कर ही मानोगे. मान गए भाई , तुम्हारे हाथों में तो वाकई मीडाज़ टच है.’’ अनजाने में यादव जी की कमजोरियों पर सीधी ठोकर मारी थी उन्होंने. न तो यादव जी को मीडाज़ टच का अर्थ मालूम था न ही उन्हें क्रिकेट में इतनी दिलचस्पी थी कि वे हैटट्रिक का अर्थ समझते. जिसके स्पर्श से हर चीज़ सोने की बन जाती थी उस राजा की कहानी हिन्दी में यादव जी ने सुन रखी थी. बस वे किंग मीडा के नाम से परिचित नहीं थे वरना उन्हें यह भी याद आता कि कहानी का राजा जब अपनी फूल सी बेटी को प्यार करने के लिये गोद में उठाता है तो वह निष्प्राण सोने में बदल जाती है और यादव जी शायद अन्दर तक कांप जाते . पर सी ओ साहेब ने जो कुछ कहा वह उनकी तारीफ़ में ही कहा था यह वे भांप गए. यादव जी ने मुस्करा कर एक कड़क सल्यूट सी ओ साहेब को ठोंका और मगन मन दफ्तर से बाहर आ गए.

दो महीने पहले का वह दिन उनकी आँखों के सामने सजीव हो उठा जब थाने में फोन पर बैठने वाले मुंशी जी ने यादव जी के पास आकर उत्तेजना से हांफते हुए बताया था ‘ सर जी, मीडाज़ हाइट्स बिल्डिंग से एक आदमी छठीं मंजिल से कूद पडा है.’ ऐसे मामलों की ही तो यादव जी को प्रतीक्षा थी. आनन् फानन में वे अपनी मारुती जिपसी में सवार हुए, सिगरेट को मुठ्ठी में बांधकर उसका तगड़ा सा कश खींचा और चुटकी बजाकर उसकी राख झाड़ते हुए ड्राईवर से कहा, ‘तेज़ चला ,फ़टाफ़ट मीड़ाज़ हाइट्स पहुँचना है.‘ ड्राइवर भी अनुभवी था. जानता था कहीं आग तो लगी नहीं है न कहीं डाका पड़ रहा है कि जिप्सी खरामा खरामा आराम से चलाकर वहां पहुंचे. साहेब को एक मोटे बिल्डर की अधबनी बिल्डिंग तक पहुंचाने की बात ही कुछ और थी. जिप्सी हवा से बातें करने लगी. मौकाए वारदात पर पहुँच कर यादव जी ने देखा कि लाश पक्की लाश थी याने उसके जीते बचे रहने की कोई संभावना नहीं थी. रेत, बदरपुर मौरंग और टूटी फूटी ईंटों के बीच आराम से शवासन में पड़े हुए उस अधेड़ आदमी के शव को यादव जी ने अपने साथ आये नायब दरोगा के हवाले किया और उसकी पॉकेट में रखे कागजातों. बटुवे आदि को अपने कब्ज़े में लेने का आदेश दिया. मौत हो ही चुकी थी. अस्पताल भेजने की जल्दी थी नहीं. नायब सब संभाल लेगा. यादव जी ने बिल्डिंग में बने साईट ऑफिस की तरफ रुख किया. वहाँ जाकर मैनेजर को बुलाया. सामने आये तीस बत्तीस साल के उस लड़के के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. हकलाते हुए उसने बताया कि साईट पर सबसे सीनियर कर्मचारी वही था. नाम था रोहित सिंह. वह मार्केटिंग मैनेजर था, हेड ऑफिस में शहर में बैठता था और साईट पर केवल किसी कस्टमर से मिलने आया हुआ था. यादव जी उसकी कुर्सी पर जम कर बैठ गए. सिगरेट सुलगायी, एक लंबा कश लेकर उसकी राख ऑफिस के ग्रेनाईट के चमचमाते फर्श पर झाड़ी और बोले ‘ अपने डायरेक्टर साहेब को तुरंत बुलाओ. मैं यहीं इंतज़ार कर रहा हूँ. तब तक कुछ कोफ़ी शोफी मंगवा लो. अपने साहेब से कह देना फरार होने की ज़रूरत नहीं है, मैं हूँ न!’

जब तक कोफ़ी आये, नायब दारोगा शव की जेब से बरामद बटुवा, रुमाल और एक पर्ची लेकर आ गया. साथ में कम्पनी से हुए पत्राचार की एक फ़ाइल भी थी जिसके पन्ने शव से पांच मीटर दूर हवा में फडफडाते हुए मिले थे. बिल्डर जल्दी ही आ जाएगा, इतना बताकर मार्केटिंग मैनेजर वहीं मुंह लटका कर एक कुर्सी पर यादव जी के कहने से बैठ गया था. बिल्डर अपने दफ्तर से चल चुका था. आने में आधा घंटा लग जाएगा. यादव जी ने शव से बरामद पर्चा पढ़ा. बस दो ही पंक्तियों में मृतक ने बिल्डर के अत्याचार से हुई अपनी तबाही से तंग आकर आत्महत्या करने का मंतव्य बता डाला था. पढ़कर यादव जी ने होठों पर आती हुई मुस्कराहट को जबरन दबाया. फिर वे फ़ाइल के पन्ने उलटने लगे. सरसरी तौर पर पन्ने उलट लेने भर से आत्महत्या की वह कहानी शीशे की तरह साफ़ होकर सामने आ गयी. सीधी सी बात थी. मृतक ने छः साल पहले तीन बेड रूम का एक फ़्लैट अस्सी लाख रुपयों में बुक कराया था. इसके लिए उसने बैंक से साठ लाख रुपयों का ऋण लिया था. फ़्लैट एक साल बाद मिलने वला था और ऋण की ई एम् आई एक साल बाद ही प्रारम्भ होनी थीं. मृतक ने उम्मीद लगाई थी कि उसे अभी किराए के मकान का जो तीस हज़ार रुपये प्रति माह किराया देना पड़ रहा था और जो अगले साल तैंतीस हज़ार हो जाएगा, वह अपने फ़्लैट में शिफ्ट होने के बाद बचने लगेगा. पर अपने फ़्लैट का सपना बस सपना ही बना रहा. एक के बजाय छह साल बीत गए थे. बार बार कुछ मिला था तो बस यह आश्वासन कि फ़्लैट मिलेगा ज़रूर, वह भी देर होने के लिए हर्जाने के साथ. इस बीच मृतक के लिए ई एम् आई और अपने मकान का किराया दोनों देना असंभव हो गया था. वह भारी कर्जों में डूब रहा था. उसने बिल्डर से अनुरोध किया था कि उसकी बुकिंग कैंसिल करके उसका पैसा लौटा दे. पर बिल्डर ने कान्ट्रेक्ट पेपर में महीन अक्षरों में छपी हुई टर्म्स एंड कंडीशंस की तरफ उसका ध्यान आकृष्ट करके बताया था कि बुकिंग एक महीने के अन्दर कैंसिल करने पर दस प्रतिशत रूपये काट लिए जाते, छ महीने के बाद पंद्रह प्रतिशत की कटौती थी और एक साल के बाद पच्चीस प्रतिशत की. अतः अब कैंसिल करने पर पच्चीस प्रतिशत अर्थात बीस लाख काट कर ही रुपये वापस होंगे. और इस स्थिति में फ़्लैट का पोजेशन देर से देने के लिए मिलने वाला हर्जाना भी नहीं मिलेगा. इस बीच मृतक की बेटी का विवाह सर पर आ गया था. उसने बिल्डर से लाख अनुनय विनय की पर वह नहीं पसीजा. काट कूट कर जो साठ लाख रुपये बिल्डर देने को तय्यार था वह भी सीधे बैंक को जायेंगे. उसके बाद भी बैंक की बकाया ई एम् आइज़ पर लागू ब्याज, पेनाल्टी आदि मिलाकर मृतक पर लाखों का क़र्ज़ बचता. बेटी का विवाह कर पाने का प्रश्न ही नहीं था. महीनों तक बिल्डर के सामने गिड़गिड़ाने का जब कोई असर नहीं हुआ था तो आज अंतिम बार उसके दफ्तर से मनाही सुनने के बाद आवेश में आकर उसने आत्म ह्त्या कर डाली थी.

यादव जी की अंग्रेज़ी भले कमज़ोर हो, गणित ठीक ठाक थी. बिल्डर ने साठ लाख लौटा भी दिए तो उसके पास बचे बीस लाख रुपयों में पंद्रह लाख लेकर पांच लाख उसके पास छोड़ देना यादव जी की उदारता होगी. एक आत्महत्या वाली पर्ची और पत्राचार वाली फ़ाइल यादव जी से खरीदने के बाद भी बिल्डर के पास पांच लाख बचेंगे. वैसे भी तो फंड्स की कमी के कारण ही बेचारे की बिल्डिंग्स अधबनी पड़ी हुई थीं. फिर एक एक फ़्लैट के केस में क्या पत्राचार हो रहा था उसे क्या पता. वह सब तो मार्केटिंग मैनेजर को मालूम होगा, वही तीस साल का अधकच्चा मुलाजिम जो अभी यादव जी के सामने मुंह लटकाए खडा था. उसी ने तो यादव जी को अपने डायरेक्टर से बात करने और सौदा तय हो जाने के पहले बताया था कि जब वह अपने डायरेक्टर को उस कस्टमर की परेशानियां समझाकर उसके लिए दया की भीख मांगने गया था तो उस पर क्या गुज़री थी. डायरेक्टर ने उसे साफ़ साफ़ समझा दिया था कि कम्पनी का नफ़ा नुक्सान उसकी प्राथमिकता न हो तो वह अपना रास्ता नापे और वह दुम दबाकर वापस आ गया था अपने कमरे में. वहाँ उसने कस्टमर को भेजे जाने वाले कंपनी के अंतिम पत्र पर चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए थे. उस गरीब को भी तो एम बी ए में दाखिले के लिए अपने पिता द्वारा दिए गए डोनेशन की भरपाई करनी थी. डोनेशन वाले कोलेज की एम् बी ए डिग्री लेकर इसी नौकरी को पाने में उसकी एडियाँ घिस गयी थीं. यादव जी को उस बेचारे पर दया आ रही थी. उन्होंने उस दिन एक बड़ा धार्मिक कृत्य किया. बिल्डर से रुपये वसूले, मामला रफा दफा किया और उस मार्केटिंग मैनेजर पर तरस खाते हुए उसे मुफ्त में छोड़ दिया.

पर उस केस के बाद इतनी जल्दी उसी अधबनी बिल्डिंग पर मंडराती, पिछले आत्महत्या करने वाले की, प्रेतात्मा किसी और को भी अपने पास बुला लेगी, इसकी आशा यादव जी ने सपने में भी नहीं की थी. कौन जानता था कि एक ही बिल्डिंग से उनके ऊपर बार बार छप्परफाड़ धनवृष्टि होगी ‘उपरवाले की दया हो तो रंक भी सर पर छत्र धरा कर चलता है.’ इतना तो वे जानते थे पर उनके महकमे पर ऊपरवाले की दया का प्रत्यक्ष प्रमाण महीने भर के अन्दर ही दुबारा मिलेगा यह किसने सोचा था.

इस बार बिल्डर बिना उनका फरमान पाए ही स्वयं अपने साईट ऑफिस में पहुँच गया था और दफ्तर के फर्श पर बिछे महंगे गलीचे पर बेचैनी से चक्कर काट काट कर यादव जी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था. बस इसका संतोष था कि पिछली बार यादव जी से ‘सेटिंग’ अच्छी हो गयी थी. पर इस बार बात कुछ टेढ़ी हो गयी थी. खाली आत्महत्या की पर्ची फाड़ कर फेंक देने से और पत्राचार की फ़ाइल गुम कर देने से बात नहीं संभलने वाली थी. इस बार आत्मह्त्या एक विधवा ने की थी. पर चुपचाप मौत को गले लगाने वालों में वह नहीं थी. असमय में पति की कैंसर से मृत्यु हो जाने के बाद वह अन्दर से बुरी तरह से टूट गयी थी. यहाँ भी बैंक लोन की ई एम् आई का चक्कर था, यहाँ भी पति की पेंशन से बारहवीं और दसवीं कक्षाओं में पढने वाले दो बच्चों की पढ़ाई असाध्य थी. यहाँ भी अपनी बुकिंग कैंसेल कराने की जीतोड़ कोशिश थी. पर वह तो बड़ी तेज़ निकली. बिल्डर ने पच्चीस प्रतिशत काट कर पैसे लौटाने को कहा तो वह राजी हो गयी. साठ लाख रुपये सचमुच वापस देने पड़ेंगे यह तो कम्पनी ने सोचा ही नहीं था. देना भी पड़े तो वे इस पत्राचार को इतने दिन और खींचने की सोच रहे थे कि मामले को लेकर वह औरत कोर्ट में चली जाए. फिर मामला खुद ब ख़ुद बरसों तक ठंढे बस्ते में पडा रहेगा. पर वह बाकायदा स्वयं आई और आकर मार्केटिंग मैनेजर के कमरे में जम कर बैठ गयी. घोषित कर दिया कि कि साठ लाख रूपये का चेक लेकर ही वापस जायेगी. मैनेजर साहेब ने समझाने की कोशिश की, पर उसने तो चिल्ला चिल्ला कर आत्महत्या करने की धमकियां देनी शुरू कर दीं. बेचारे तरुण मार्केटिंग मैनेजर की सिट्टी पिट्टी गुम हो रही थी. जल्दी से उठ कर बाहर आया और वहाँ से उसने अपने मालिक को मोबाइल पर स्थिति समझायी. पर डायरेक्टर साहेब का एक ही उत्तर था ‘देख भाई, तू अपने लिए लाइफ इंश्योरेंस में काम ढूँढ़ ले. हम यहाँ हर विधवा के सर पर आई मुसीबतें संभालने लगेंगे तो हमीं को बहुत जल्दी अपनी बिल्डिंग से कूदना पड़ जाएगा. वैसे भी तेरी मार्केटिंग से आजकल कोई नए ग्राहक आते नहीं नज़र आते. ऐसा कर, अब तू भी अपना रास्ता नाप ले, हाँ थोड़ी सी भी अकल हो तो याद रख, गरजने वाले बरसते नहीं. बकने दे उस बुढ़िया को. बक झक कर थोड़ी देर में चली जायेगी. अगर फिर भी अड़ी रहती है तो बोल दे हम सारे कागज़ात चेक करके उसे पचहत्तर प्रतिशत लौटायेंगे पर कागज़ी कार्रवाई में थोड़ा समय लगेगा. कम्पनीके लॉ और अकाउंट्स डिपार्टमेंट्स से ओके मिल जायेगी तो पैसा भेज देंगे.’

बेचारा मार्केटिंग मैनेजर पसीने पसीने हो रहा था. कैसे समझा पायेगा उस सिरफिरी को कि कंपनी के पास अभी पच्चीस प्रतिशत काट कर तुरंत दे देने के लिए फंड्स ही नहीं थे. कम से कम कंपनी के खातों में तो नहीं ही थे. होंगे तो उस अकाउंट में होंगे जहां से रुपये निकाल कर गुलछर्रे उड़ाने में डायरेक्टर साहेब के परिवार के सदस्यों को कभी कोई दिक्कत नहीं होती थी. डायरेक्टर की झिडकी खाकर बेचारा अपना मुंह लटकाए हुए कमरे में दाखिल हुआ तो गुस्से से अर्धविक्षिप्त वह औरत चीखती हुई बोली ‘ मुझे मेरे रुपये वापस दे रहे हो कि नहीं?’ जवाब में उसने हकलाते हुए कहा ‘जी अभी तुरंत के तुरंत देना तो संभव नहीं होगा-----‘ वह अपनी बात पूरी कह पाता इसके पहले ही उस दुबली पतली औरत पर पागलपन का दौरा पड़ गया. ‘तो फिर मार डालो तुम लोग मिल कर मुझे’ चीखती हुई वह कुर्सी से उठी और बाहर निकल गयी. बेचारा मैनेजर रुमाल निकाल कर माथे पर आयी हुई पसीने की बूंदें पोंछने लगा. दो चार क्षण वह खिडकी से बाहर शून्य में देखता रहा. फिर वह सोच ही रहा था कि चपरासी को बुलाये और चाय लाने को कहे कि बाहर कुहराम मच गया. उस अधबनी बिल्डिंग में केवल दो तीन सिक्योरिटी गार्ड थे. वे हक्के बक्के देखते रह गए और क्षोभ और क्रोध से पागल हुई वह औरत सीढ़ियों पर लगभग भागते हुए चढ़ गयी. इसके पहले कि कोई उस तक पहुँच कर उसे रोक पाता उसने चौथे माले से छलांग लगा ली. दो मिनट तक नीचे के अधकच्चे फर्श पर वह तड़पी और फिर ठंढी पड़ गयी. अपनी सारी यातनाओं से मुक्त!

इस बार एक सहूलियत थी. यादव जी का निजी नंबर रोहित की डायरी में पहले से दर्ज था. यादव जी ने दूसरी आत्महत्या की खबर बड़े धैर्य और शान्ति से सुनी. रोहित को बताया कि वे और उनकी टीम जल्द पहुंचेगी. इस बार सब कुछ पहले से लिखी हुई स्क्रिप्ट के अनुसार सुचारू रूप से हो गया. थोड़ा ज़्यादा घाटा हुआ तो बिल्डर का. यादव जी ने उसे जिस मानसिक रोग विशेषज्ञ का पता दिया वह बहुत कमीना निकला. पिछली तारीखों में केस की एंट्रीज़ डाल कर उस औरत के मानसिक रोग से ग्रस्त होने का सर्टिफिकेट देने की मुंहमांगी कीमत वसूलने में उसने कोई संकोच नहीं किया. बहरहाल हमारे यादव जी के पास दस लाख की दूसरी सौगात भी आ गयी.

यादव जी को इस बार उस लौंडे पर बहुत गुस्सा आया. लौंडे से उनका तात्पर्य उसी तरुण मार्केटिंग मैनेजर रोहित से था. वह तो बहुत कमज़ोर दिल वाला निकला. इस बार उसके चेहरे पर केवल हवाइयां ही नहीं थीं; उसके चेहरे पर तो मौत की सफेदी सी छायी हुई थी. यादव जी ने ताड़ लिया कि उसकी मानसिक स्थिति अच्छी नहीं थी. यादव जी से जब उसकी मुलाक़ात हुई थी तभी उसकी आँखों में आंसू थे. कमजोरी के एक क्षण में उसने कह ही डाला ‘सर, पता नहीं, इस हालत में मैं यहाँ कितने दिन काम कर पाउँगा. डायरेक्टर साहेब मुझसे खुश नहीं हैं. मैंने इन दोनों केसों में उनसे रिक्वेस्ट की थी कि ये मुसीबतजदा लोग हैं. कंपनी उन्हें कुछ छूट दे दे. पर डायरेक्टर साहेब ने मेरी बात के जवाब में कहा ‘यह कंपनी है, कोई चैरिटेबल ट्रस्ट नहीं. तुम्हारा काम कंपनी के हितों की रक्षा करना है. एक सौ बीस करोड़ लोगों के इस देश में दो एक लोग मर भी जायेंगे तो कुछ नहीं बिगड़ेगा. पर यदि कम्पनी तुम्हारी सिफारिश के आधार पर यूँ ही सबके पैसे लौटाने लग गयी तो तुम पहले भूखे मरोगे, फिर हम सबको मारोगे’. यादव जी को लगा कि बिल्डर की बात में तो दम था!. इतनी साफ़ सोच रखने वाले ही इस दुनिया में उतनी सफलता हासिल करते हैं जितनी इस बिल्डर ने पायी है! यादव जी को लगा कि यह लौंडा रोहित कहीं मीडाज़ हाईट्स वालों के लिए कोई दिक्कत न खडी कर दे. बेहद कमज़ोर सा आदमी लगा था उन्हें वह, यदि उसने अपना मुंह ज़्यादा खोला तो अपनी कंपनी ही नहीं, यादव जी अर्थात पुलिस विभाग के लिए भी परेशानियां पैदा कर देगा.

यादव जी की सफलता का राज़ ही ये है कि वे जो करने की सोचते हैं तुरंत कर डालते हैं. रोहित के बारे में उन्होंने जो कुछ सोचा, उसके अनुसार ही उन्होंने मीडाज़ हाइट्स के डायरेक्टर को फोन पर तुरंत सलाह दे दी कि रोहित के साथ थोड़ी नरमी और मीठास से बातें करें और इन दोनों आत्महत्याओं को इतनी सूझबूझ और समझदारी से हैंडल करने के लिए उसे कम से कम बीस पच्चीस हज़ार का नकद ईनाम तो दे ही दें.कंपनी के लिए यही अच्छा रहेगा. ( और हम पुलिस वालों के लिए भी – उनके मन ने जोड़ा.)

दूसरी आत्महत्या भी हाथों हाथ सुलटा देने के लिए सी ओ साहेब ने अगले ही दिन यादव जी को अपने दफ्तर में बुलाया था. आखीर बिजली की रफ़्तार से काम जो किया था यादव जी ने. पिछली शाम को ही सी ओ साहब का सामान उनके घर पहुंचा कर उन्होंने ग़ज़ब की कर्तव्य परायणता और फुर्ती दिखाई थी.

सी ओ साहेब के यहाँ से लौटते हुए यादव जी अपनी मारुती जिप्सी मे बैठ कर सिगरेट का कश लगाकर अपनी बंद मुठ्ठी से राख झाडते रहे, मुस्कराते रहे और सोचते रहे कि घर जाते ही अपने कोंवेंट स्कूली बेटे से मीडाज़ टच और हैट ट्रिक का अर्थ समझेंगे. तभी उनके मोबाइल की घंटी बजी. यादव जी को अपनी सफलता के इन क्षणों को जी लेने के बीच बजती हुई फोन की घंटी अपने दफ्तर में बिना पूछे घुस आने वाले जैसी लगी. बेजारी से उन्होंने फोन पर हैलो कहा. फोन पर उनके दारोगा जी थे जिनके क्षेत्र में मीडाज़ हाईट्स बिल्डिंग थी. दरोगा की आवाज़ में घबराहट थी या खुशी यह यादव जी तय नहीं कर पाए. दरोगा ने कहा ; सर ग़ज़ब हो गया. अब उस मनहूस मीदाज़ हाइट्स में एक और आत्महत्या हो गयी. वह जो मार्केटिंग मैनेजर था न, हाँ वही रोहित. इस बार वह खुद छठी मंजिल से कूद पडा है. उसकी पोकेट में पच्चीस हज़ार नकद मिले हैं. दफ्तर में कोई बता रहा था कि बड़े साहेब ने उसे कोई ईनाम देने के लिए हेड ऑफिस बुलाया था. वहाँ थोड़ी देर पहले गया था, लौट कर आते ही बिना किसी से कुछ कहे सुने उसने सीधे इस बिल्डिंग के छठे माले से छलांग लगा ली. यादव जी ने बिना उत्तेजित हुए दारोगा से कहा ‘चल, आज भगवान् ने तेरे लिए सीधे पूरे पच्चीस हज़ार भेज दिए. रख ले और पता कर किस लडकी के प्यार में नाकाम होकर उसने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया. समझ गया न?’

अरुणेन्द्र नाथ वर्मा

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