संक्षेप में Arunendra Nath Verma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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कितना भी प्रयत्न करूँ कि कहीं काम से जाते समय उनसे सामना न हो, पर हो ही जाता है. वे अपने घर के सामने आसन जमाकर बैठे ही रहते हैं –सर्दियों में छोटे से लॉन के बीचोंबीच बैठ कर धूप में ऊँघते हुए, गर्मियों में उसी से सटे हुए बरामदे में साए में जम्हाइयां लेते हुए. दूर से देखो तो भ्रम होता है कि ऊंघ रहे हैं पर सामने से निकलने वालों का इतना सौभाग्य कहाँ कि बच निकलें. ऊंघते हुए भी वे किसी शिकारी जानवर की तरह चौकन्ने रहते हैं. यह भी संभव है कि पूरी तरह से चौकन्ने रहते हुए भी वे ऊंघने का केवल अभिनय करते हों ताकि शिकार के ऊपर अप्रत्याशित हमला बोल सकें. सारा सारा दिन यूँ ही बिता देते हैं. पिछले जन्म में गोवंश से निकट का सम्बन्ध रहा होगा तभी गोधूलि होने पर ही उन्हें भी घर के अन्दर वापस जाने का विचार आता है. बीस वर्षों से भी अधिक हो गए एक उच्च प्रशासनिक पद से सेवानिवृत्त हुए. अधिक चलना फिरना संभव नहीं रह गया है . फिर भी साल में दो महीने अमेरिका में बसे अपने बेटे के पास हो आते है, दो महीने दिल्ली में बेटी दामाद के पास जो दोनों ही आई ए एस अधिकारी हैं. बैठे बैठे उन्हें उन पुराने दिनों की याद सालती रहती है जब हर समय मातहतों और कृपाकांक्षियों से घिरे रहते थे. लगभग साठ साल से साथ निभा रही जीवन संगिनी घर के बाहर बैठने में उनका साथ देने से साफ़ मना कर देती हैं. बड़े अफसर की पत्नी रही हैं, पति रिटायर हो गए हैं पर इनकी अफसरी बरकरार है. हर आते जाते नत्थू खैरे से पति का बात करना उन्हें नहीं सुहाता अतः कुछ देर घर के अन्दर वृद्ध दम्पति साथ बैठकर ताश खेल लेते हैं. पत्नी उनके जीवन का केंद्र है, उसकी देखभाल उनके जीवन का मिशन है. फिर भी अधिकाँश समय वे घर के अन्दर बैठकर टी वी चैनलों में मोक्ष तलाशती रहती हैं और ये घर के बाहर शिकार की तलाश में घात लगा कर बैठे रहते हैं.

वैसे उनके शिकार भी अब चौकन्ने हो गए हैं. बूढ़े सिंह का आतंक जंगल भर में फ़ैल चुका है अतः सारे पशुओं ने उसकी गुफा के सामने से गुज़रना बंद कर दिया है फिर भी कोई न कोई निरीह प्राणी भटक कर उसका शिकार बन ही जाता है.शिकार फंसा नहीं कि वे अपने अमेरिकावासी सुपुत्र की सफलताओं का, अपने होनहार और कुशाग्र पौत्र पौत्री की आश्चर्यजनक बुद्धिमता का विवरण पूरे लम्बे आख्यान की तरह सुनाते हैं. वैसे पुत्रवधू भी आई टी सेक्टर की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सुपुत्र की टक्कर के ही ऊंचे वेतनमान वाली नौकरी करती है पर उसके सफल कैरियर की चर्चा आती तो है लेकिन सबसे बाद में. जब तक बेचारी का नंबर आये तब तक शिकार किसी न किसी तरह उनके चंगुल से छूट कर भाग लेने का जुगाड़ बैठा लेते हैं.

पहले वे आई ए एस बेटी दामाद के बारे में भी उतने ही चाव से लम्बे लम्बे आख्यान सुनाते थे. बस क्रम विपरीत रहता था अर्थात बेटी की विरुदावली इतनी लम्बी हो जाती थी कि दामाद के हिस्से में थोड़ी कंजूसी करनी पड़ती थी. पर अब इन दोनों के बारे में बातें करने का चाव कम हो गया है. विचित्र मजबूरी है. आई ए एस बेटी दामाद के विषय में बातें सुनने से श्रोतागण इतना नहीं कतराते थे पर धीरे धीरे बेटी ही उनकी आदत से तंग आ गयी. उसी ने आग्रह किया कि उसके और दामाद श्री के पदों की हांकना बंद करें. प्रायः किसी न किसी सरकारी दफ्तर में श्रोताओं का कोई फंसा हुआ काम निकल आता था. वे हर अच्छे श्रोता की सिफारिश बेटी दामाद के पास पहुंचाने में गौरवान्वित होते थे. लेकिन बेटी ने तंग आकर अपनी और अपने पति दोनों की ओर से स्पष्ट कर दिया कि वे सिफारिशें लाना बंद कर दें. अब वे सचेत हो गए हैं. अब जब कोई सुनने वाला मिलटा है तो सबसे पहले जोर से घोषणा करते हैं कि बेटी दामाद को सख्त नापसंद है कि उनके पास किसी की सिफारिश वे पहुंचाएं यद्यपि दोनों के दोनों बहुत महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं. लेकिन पहली घोषणा सुनते ही श्रोता की सारी दिलचस्पी हिरन हो जाती है. वे जानते हैं कि बेटी उन पर जान छिड़कती है पर उसकी अपनी मर्यादाएं हैं. वह और उसका पति दोनों ईमानदार अफसर हैं. कम से कम इतने कि हर छः महीने पर तबादला झेलने की नौबत आये बिना किसी तरह दामन बेदाग बचा रहे. इसलिए बेटी दामाद के बारे में बातें करना उन्होंने अब बंद कर दिया है. पर जब मन में बहुत हूक उठती है तब वे आई ए एस की महिमा का आम तौर पर बखान करने लगते हैं. फिर भी बेटी दामाद का ज़िक्र इस महिमागान में किये बिना उन्हें लगता है जैसे बिना नमक का खाना डाक्टरों की सलाह पर किसी तरह गले से नीचे उतारना पड़ रहा हो.

वैसे तो मैं भी अन्य सतर्क प्राणियों की तरह उनकी अगाड़ी से बचने के लिए उनके घर के सामने से गुज़रने वाला रास्ता बचा कर ही चलता हूँ पर उस दिन सोच समझ कर किनाराकशी का प्रयत्न नहीं किया. पत्नी मायके गयी हुई थीं , बच्चे अपने आप में ही व्यस्त और मस्त थे. मैं घर में अकेला बैठ कर एक व्यंग कहानी पूरी करने के प्रयत्न में था. कुछ ही पृष्ठ लिख पाया था कि कहानी का तार कुछ टूटता हुआ सा लगा. भटकी हुई कहानी को प्रवाह देने से ऊब गया तो सोचा कुछ टहल आऊँ. पता था इस समय पकडे जाने का खतरा था . वे बरामदे में बैठे होंगे. मैं अपपनी कहानी के पृष्ठ हाथों में दबाये उधर से निकलूंगा. फिर वे मुझे घेरेंगे – मैं उन्हें घेर लूंगा. अपनी कहानी उन्हें सुनाने लग जाउंगा – अधूरी ही सही. हो सकता है उनसे कुछ सकारात्मक सुझाव मिल जाए और कहानी जहां अटकी पडी थी उसके आगे बह निकले. इतने वरिष्ठ हैं, इतने दीर्घायु हैं. बहुत कुछ देख सुन रखा है उन्होंने जीवन में. उनके अनुभवों से मेरी कहानी के सूखे बिरवे में शायद कुछ जल पड़ जाए. मैंने वही किया. आगे वही हुआ जो मैं चाहता था.

वे बाकायदा बरामदे में बैठे हुए ही मिले. सामने बेंत की मेज़ पर कुछ अख़बारों के पन्ने खुले हुए थे, कुछ उनके चश्मे के केस से दबा कर रखे हुए थे. मेरे हाथों में कुछ पन्ने देखकर उन्हें बात शुरू करने के लिए अच्छा मुद्दा मिल गया यद्यपि मुद्दों की वैसे भी उनके पास कोई कमी नहीं रहती है. बोले ‘ कहिये, सुना है आजकल आप काफी कुछ लिख रहे हैं.”

मैंने प्रसन होकर हामी भरी. वे बोले “ साहित्य से मुझे भी बहुत प्रेम है. काफी कुछ पढ़ रखा है. आप क्या लिखते हैं?”

मैंने कहा “ जी, हास्य व्यंग की रचनाएं लिखने का प्रयत्न करता हूँ”

बोले “ मगर इतने सारे पृष्ठ किसी हास्य व्यंग रचना के तो नहीं होंगे”

मैंने हाथ में थामे पाँच पृष्ठों की तरफ अपराधभाव से ग्रस्त होकर देखा और कहा “ ये तो हस्त लिखित पांच पृष्ठ हैं. छपने पर दो ही पृष्ठों में समा जायेंगे. फिर अभी तो ये अधूरी रचना है. इतना ही और लिखूंगा तो पूरी हो जायेगी. मैं मन ही मन चाह रहा था कि वे सुनाने को कहें. अधूरी ही रचना सही, उनकी प्रतिक्रया मिली तो पूरी करने में सहायक होगी.

पर उन्होंने घबरा कर कहा “ अरे मारा ! हास्य व्यंग क्या इतना लंबा होता है? किसके पास है इतना पढ़ने का समय?” मुझे गुस्सा आया. जैसे मुझे मालूम ही न हो कि व्यस्तता की बात उनपर कितनी लागू होती है. पर उनकी बात पूरी नहीं हुई थी “ ग्रेज़ी में वो जो कहते हैं न- ब्रीविटी इज द सोल ऑफ़ विट. संक्षेप में लिखा करिए.”

मेरी आशा धराशायी होती दिखाई पड़ने लगी थी. मैं बचाव की मुद्रा में आ गया.-“कहानी है तो चार पांच पृष्ठ तो लेगी ही .”

वे बोले “ अकबर इलाहाबादी के शेर सुने हैं कभी? दो लाइनों में ही वो बात पैदा करते थे कि आदमी तिलमिला उठे.”

“पर वे तो शायर थे. शेर भले दो लाइनों में कह दिया जाए पर कहानी तो विस्तार की मांग करती है.”मैंने उत्तर दिया. वे बोले “मैं तो समझता हूँ कि हिन्दी में जी पी श्रीवास्तव आखिरी हास्य व्यंग कहानीकार थे. मजेदार आदमी थे. अब देखिये अपना नाम जी पी भी अंग्रेज़ी के पी जी (वुडहाउस) के नाम को उलटा खडा करके रख लिया. ऐसे ही हर सिचुएशन की खटिया खड़ी कर लेते थे.”

“पर उन्हें तो गुज़रे हुए एक अरसा बीत चुका है. लगता है उनके बाद के हरिशंकर परसाई, शरद जोशी , श्रीलाल शुक्ल, ज्ञान चतुर्वेदी आदि के नाम से आप परिचित नहीं हैं. “

‘ अरे अब दिल की बीमारियों के डाक्टर हास्य व्यंग लिखने की कोशिश करेंगे तो हंसते हुए को भी रुलाने को छोड़कर और क्या करेंगे. नाम तो सुना है उनका, सुना है डाक्टर अच्छे हैं. लेकिन ये श्रीलाल शुक्ल कौन? वही जो सूचना विभाग, लखनऊ में थे? वो तो पी सी एस के थे.” मुझे ध्यान आया कि उनकी आई ए एस बेटी ने पहले प्रयास में ही यू पी एस सी पर फ़तेह पा ली थी. जब किसी पी सी एस से तरक्की पाकर आई ए एस में आने वाले की बात होती थी तो वे ऐसे ही नाक भौं चढ़ा कर बात करते थे. उन्हें ऐसा लगता था जैसे इस तरह की हरकतें करने वाले उनकी बेटी की निजी मालियत में सेंध लगाकर घुसने की कोशिश कर रहे हों.

मैने कहा “ बात मैं श्रीलाल शुक्ल के हास्य व्यंग रचनाकार वाले व्यक्तित्व की कर रहा हूँ. बात पी सी एस या आई ए एस की नहीं है. आप उनकी राग दरबारी पढ़ कर तो देखिये, मुग्ध हो जायेंगे.”

“मैं तो पक्के गाने से बहुत घबराता हूँ चाहे राग दरबारी हो या भीम पलासी. तीन मिनट में जगजीत सिंह या मेहदी हसन जो जादू पैदा करते हैं वह घंटे भर के पक्के गाने में क्या खा कर आयेगा. ये दरबारी शर्बारी राग मेरे बस के नहीं.”

मैंने सचिन तेंदुलकर की तरह भावविभोर होकर आकाश की तरफ देखा. मुझे श्रीलाल शुक्ल जी वहाँ खड़े नज़र आये. हाथ जोड़ कर विनम्र निवेदन कर रहे थे ‘क्यूँ मेरी फजीहत करा रहे हो भाई?’ मैंने उनकी आत्मा से मन ही मन क्षमायाचना की, फिर उन्हें सांत्वना दी – ‘अरे शुक्ल जी खैरियत है कि आप कम से कम प्रथम श्रेणी के सरकारी अधिकारी तो थे. ज़रा सोचिये, हरिशंकर परसाई जी और शरद जोशी का ये साहेब क्या हश्र करते.” तभी मेरे मस्तिष्क में रवीन्द्र नाथ त्यागी जी का नाम चमका. उन्हें ये अवश्य जानते होंगे. मैंने नाम लिया तो आँखों में पहचान की चमक भर कर वे बोले “ क्यूँ नहीं, बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ. वही न जो डिफेन्स एकाउंट्स सर्विस वाले थे. चलो नही सही आई ए एस प्रॉपर में, कम से कम अपनी सर्विस में तो शिखर पर पहुंचे.”

मैंने पूछा ‘ वो छोडिये, कभी उनका लिखा कुछ आपने पढ़ा भी है क्या?” उत्तर मिला “ अरे औडिट वालों के लिखे हुए से तो मैं जीवन भर त्रस्त रहा. अब नौकरी से मुक्त हुआ तो क्या बुढापे में कहूंगा-आ बैल मुझे मार? पर सच बताऊँ, वो जो सी ए जी वाले विनोद राय हैं उनकी टू जी स्पेक्ट्रम और कोयला खदानों वाले रिपोर्टों में ज़रूर ज़बरदस्त हास्य व्यंग लेखन का स्वाद मुझे क्या सारे देश को मिला.”

मैंने कहा “पर विनोद राय जी तो संक्षेप में कुछ नहीं लिखते, बल्कि खूब विस्तार देते हैं’ उत्तर मिला “ रिपोर्ट तो रिपोर्ट ही है. बहुत संक्षिप्त हुई तो बस चुटकुला बन कर रह जायेगी. पूरा हास्य व्यंग तो विस्तार में सब कुछ खोल देने से ही पैदा हो सकता है.”

मैं किसी भी तरह उन्हे हास्य व्यंग के साहित्यकारों के नज़दीक नहीं ला पा रहा था. हताश होते हुए आखिरी दांव फेंका ‘के पी सक्सेना जी से भी आप परिचित होंगे. वे भी अच्छा हास्य व्यंग लिखते थे.’ बोले “क्यूँ नहीं , वे तो रेलवे में स्टेशन मास्टर रह चुके थे. एकाध बार रिज़र्वेशन कराने में मदद ली थी उनसे.” बोलते बोलते उन्हें लगा कि कुछ गलत बोल गए थे. तुरंत भूल सुधार करते हुए उन्होंने कहा “पर एक बार ही ज़रुरत पडी. वैसे तो मैं जी एम या नहीं मिले तो डी आर एम ( मंडल रेलवे प्रबंधक) से कहकर हेडक्वार्टर कोटा से बर्थ रिज़र्व करा लेता था पर एकाध बार वे छुट्टी पर थे तो नीचे वालों से भी कहना पड़ गया.”

मैंने कहा “मैं के पी सक्सेना साहेब की रचनाओं के बारे में कह रहा था. सभी स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे.” वे बोले “अरे हिन्दी में कोई स्तरीय पत्रिका है भी. वैसे भी मेरी दिलचस्पी समाचार पत्रिकाओं में है. फ़िज़ूल की पत्रिकाएं मैं छूता भी नहीं. अब आप टाइम या न्यूजवीक पत्रिकाओं को देखिये. किसी विषय पर दो पृष्ठ की सामग्री भी दे दी तो समझो पूरी किताब की सामग्री मिल गयी. इतनी चुटीली और संक्षिप्त रिपोर्टिंग कि पढ़ कर मज़ा आ जाता है. फिर वे व्यंग कहकर कुछ नहीं छापते. बल्कि भारत के बारे में जो कुछ भी छापते हैं सब सब का सब व्यंग ही लगता है.”

मैं समझ गया कि वे मेरे हत्थे नहीं चढने वाले. अपने लिखे पृष्ठों को मैं अब कातर भाव से देखकर सोचने लगा कि काश वे मेरा लिखा भी एक बार पढ़ लेते या मुझ से ही सुन लेते, कम से कम ये तो पता चलता कि उनकी राय मेरे व्यंग के बारे में क्या है. तभी उनके फोन की घंटी बजी. मुझसे बोले “ बस दो मिनट रुकिए. मेरी बेटी रोज़ इसी समय फोन करती है- कुशल क्षेम जानने के लिए. बस मैं बहुत संक्षेप में बात करूंगा.”

मुझे जाने की कोई जल्दी नहीं थी, बैठ लिया. सोचा “ आज छोडूंगा नहीं, रोज़ इनकी इतनी सुनता हूँ, आज भी बहुत सुनी, अब तो अपना लिखा आज इनको सुनाकर ही जाउंगा. तब तक देखूं कितने संक्षेप में ये बतियाते हैं. उन्होंने फोन पर बातें शुरू कीं. ममता और स्नेह उनके स्वर से फूट फूट कर बहने लगा. आँखों में चमक थी, चेहरा गौरवान्वित था. आखीर अपनी आई ए एस वाली उच्च पदासीन बिटिया से बात कर रहे थे. बेटी को वे बताने लगे कि उनकी पत्नी को रोज़ एक इंजेक्शन लगाने की सलाह डाक्टरों ने दी थी. किस तरह उनकी पत्नी ने अच्छे से अच्छे अस्पताल में सुई लगवाने से इनकार कर दिया था. कैसे पूरा शहर छान मारा था उन्होंने किसी ऐसी नर्स की तलाश में जो सुई लगाये तो मगही पान की तरह जो मुंह में रखते ही बिना चबाये पूरा घुल जाए.

वे बहुत विस्तार से संक्षेप में बोलते रहे. मैं सुनता रहा. पैंतालीस मिनट में दास्ताने इंजेक्शन समाप्त हुआ तो मैंने भागने में ही अपनी भलाई समझी. अधूरी कहानी के पृष्ठ मोड़ कर अपनी जेब में रखे. बदला लेने का एक ही तरीका सूझा. सोचा इस मुलाक़ात को कलम बंद करके उन्हें दूंगा. कहूंगा ‘पढ़िए, आपकी प्रशस्ति में लिखा है’ भले संक्षेप में न हो, ऐसा कहने से वे पढ़ तो ज़रूर लेंगे.