Chhalawa dhirendraasthana द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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Chhalawa

कहानी

छलावा

धीरेन्द्र अस्थाना

यानी छह साल का जीवन बिलकुल बेमानी था। बेमानी और कमजोर। इतना कमजोर कि शब्दों के एक मामूली प्रहार से टूट गया। हो सकता है कि प्रहार मामूली न रहा हो, लेकिन था तो शब्दों का ही। हो सकता है, शब्द केवल शब्द न रहे हों, लेकिन छह वर्षों का साथ गुजरा जीवन भी तो शब्द नहीं था। जहां तक शब्दों की बात है, तो उनका इस्तेमाल तो वह कई बार कर चुका था। छह वर्ष के जीवन में करीब साठ बार। तो फिर उसी दिन के शब्दों में ऐसी क्या बात थी जो...!

उसने यही तो कहा था न कि ‘वह इस झिक—झिक—भरी जिंदगी से तंग आ चुका है। उसे आज पता चला है कि वह हर मोर्चे पर किस कदर अकेला है। अगर हर तकलीफ उसे अकेले ही झेलनी है तो साथ—साथ रहने में तुक क्या है, अर्थ क्या है? अगर सीमा उसकी जिंदगी को खाली करके जा सके तो उसे बेहद सुकून मिलेगा।‘

और शाम को दफतर से घर लौटने पर उसने पाया कि घर खाली है। सीमा उस घर को इस तरह खाली कर गयी थी जैसे किरायेदार मकान खाली करके जाता है। उसने बौराये हुए आदमी की तरह घूम—घूम कर उस एक कमरे के फ्लैट को देखा था—सीमा अपना एक—एक सामान ले गयी थी। यहां तक कि फोटो—एलबम में लगे उसके चित्र भी गायब थे। जो उन दोनों के संयुक्त चित्र थे, वे बीच से फटे हुए थे और उनमें वह अकेला ही टंगा रह गया था। मकान की चाबी उसे पड़ोस से मिली थी, हमेशा की तरह। उसमें और सीमा में समझौता था कि जो भी मकान का ताला बंद करके जाया करेगा, वह चाबी पड़ोस में दे जाया करेगा। यह समझौता तब हुआ था जब सीमा एक प्राइवेट पब्लिक स्कूल में नौकरी करने लगी थी। यह नौकरी उसने तीन महीने बाद ही छोड़ दी थी, लेकिन चाबी वाला समझौता जारी रहा था। यदि वह उसके लौटने के समय (हालांकि लौटने का समय निश्चित नहीं था, लेकिन यह मान लिया गया था कि यह समय शाम साढ़े—पांच से छह तक का है) कहीं बाजार वगैरह भी जाती तो भी चाबी पड़ोस में दे जाती।

मकान में ताला लगा देखकर उसने पड़ोस की कॉलबेल दबायी थी और जवाब में पड़ोसन उसे चाबी पकड़ा गयी थी। शायद सीमा का ‘चले जाना‘ पड़ोसन को भी नहीं मालूम था, वरना वह इस बारे में जरूर ही कोई सूचना देती या बात करती। ताला खोलकर वह मकान में घुसा था और गलियारा पार करके कमरे के सामने आया था, सहज भाव से। फिर कमरे का दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया था। और इस प्रवेश के साथ ही उसकी आंखें भौंचक्की हो गयी थीं। कमरे की हालत ऐसी थी जैसे वहां कोई घमासान संघर्ष हुआ हो। अलमारी खुली पड़ी थी। उसके भीतर के कपड़े बेतरतीब थे। कुछ कपड़े जमीन पर पड़े थे, उसकी किताबें भी बिखरी हुई थीं और एक खुली हुई अटैची कमरे के बीचों बीच रखी थी। और सबसे अंत में उसकी नजर पड़ी थी राइटिंग पैड पर चिपके कागज पर, जिसमें लिखा था —‘जा रही हूं। अब नहीं आऊंगी। यदि इसी से तुम खुश रह सकते हो तो रहो। मैं तुम्हारी उदासी या बोरडम या अर्थहीनता का कारण क्यों बनूं? गुजरे हुए छह बरसों के दुख याद रखूंगी—सीमा।‘

छह बरसों के दाम्पत्य जीवन के इस फिल्मी अंत पर पहले तो उसे कोफ्त हुई, फिर वह बेदम—सा होकर खाट पर बैठ गया। यानी जो जिया वह जीवन नहीं, जीवन जीने की कोशिश—भर था। यानी दो जने छह साल तक एक—दूसरे की जिंदगी से लगातार दूर होते रहे थे। उनमें अपनापन नहीं, अजनबीपन विकसित हुआ था इस बीच। सीमा छह बरसों के दुखों को याद रखेगी। यानी सुख नाम की कोई चीज उनके जीवन में प्रवेश नहीं पा सकी थी। यानी ऐसा एक भी क्षण नहीं था जिसे ‘सुख‘ मानकर याद रखा जा सकता। यानी छह साल तक जो संघर्ष किया उसका कोई मतलब नहीं था। वह देर तक इस ‘यानी के असंख्य वाक्यों में घिरा बैठा रहा था। फिर मकान का ताला बंद कर, बस में बैठ सतीश के घर चला गया था। थोड़ी देर में उसे यह एहसास हो गया था कि कमरे का अकेलापन कितनी भयावह चीज है।

उस दिन ड्राई डे था। इसलिए जिद करके वह सतीश को अपने साथ ‘बॉर्डर‘ ले गया और जरायमपेशा लोगों के उस खतरनाक अड्‌डे पर सस्ते लोगों की तरह सस्ती शराब पीता रहा और सस्ती बातें करता रहा। अगले दिन वह भूल गया था, लेकिन सतीश ने उसे बता दिया था कि नशे में धुत्त होकर वह कितनी बेहूदा और घटिया बातें करता रहा।

आज याद करता है तो हंसी आती है और दुख भी होता है। क्या सचमुच शराब के भीतर जाने के बाद जो बातें बाहर निकलीं, वे बातें सस्ती थीं या उन बातों की भाषा सस्ती थी? जो कुछ उसने बका वो असभ्य हो सकता है, लेकिन गलत तो नहीं था। इसमें क्या शक है कि उसके जैसा आजाद तबीयत का आदमी छह साल तक सीमा के कारण ही एक के बाद दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे दफ्तर में ऐसी—तैसी कराता रहा और कोल्हू के बैल की तरह बिना चूं—चपड़ किये चक्कर काटता रहा? संघर्ष किया, अनथक संघर्ष किया। रात को रात और दिन को दिन नहीं समझा। पूरे छह साल उसने मुसलसल मेहनत की। बात—बात में काट पड़ने को तैयार एक टेढ़ा आदमी बात—बात पर घिघिया पड़ने वाले पालतू कुत्ते में तब्दील होता चला गया और ‘उफ‘ नहीं की। क्यों? क्योंकि उसने कभी यह नहीं चाहा कि अपनी किसी सनक में आकर वह कोई भी ऐसा काम कर दे जिससे उसके साथ—साथ सीमा भी मुसीबतों में फंस जाये। सीमा के सुखों के लिए उसने अपने को दुखों के जंगल में झोंक दिया। फिर भी सीमा लिखकर चली गयी कि दुखों को याद रखेगी!

हां, लगभग यही कुंठा थी जिसे उसने फूहड़ भाषा में उस रात अभिव्यक्त किया था, मां—बहन की गालियों के साथ। पर उस कुंठा में नाजायज कुछ भी नहीं था, यह वह आज भी स्वीकार करता है।

आज भी! यह कितने आश्चर्य की बात है कि सीमा को उसकी जिंदगी से गये हुए लगभग एक बरस पूरा होने को है और इस एक बरस में वह सीमा के और—और नजदीक होता चला गया है। एक वर्ष में भी वह सीमा से उबर नहीं पाया। उसकी स्मृतियां हैं कि सीमा से शुरू होकर सीमा पर खत्म होती रही हैं। ऐसा नहीं है कि सीमा के चले जाने से उसे कोई पछतावा या अफसोस हो, या वह उसकी याद में घुला जा रहा हो। नहीं, ऐसा नहीं है। आज यदि सीमा उसके सामने आ जाये तो वह लपककर उसके गले लग जायेगा, ऐसा हरगिज नहीं है। हुआ दरअसल यह है कि सीमा ने उसके संघर्ष को, उसके प्रेम को, उसकी चाहत को जिस तरह अपमानित किया है, उसकी याद से उसका सर्वांग ऐंठा हुआ है। वह सीमा को प्रेम करते हुए नहीं नफरत करते हुए उसकी याद में गर्क है। जिसने अलविदा कहने में क्षणांश—भर की देर नहीं की, ऐसी औरत के लिए उसने अपने छह कीमती वर्ष तबाह किये, उसको अफसोस है तो इसी बात को लेकर। वह सीमा के नहीं, अपने व्यवहार पर क्षुब्ध है। अपनी मूर्खता है जो उसे भारी पड़ रही है। वह विरह—वेदना में नहीं, नफरत की आंच में सुलग रहा है। बस एक बार वह चाहता है कि सीमा आकर उसके साथ रहे और इस बार वह खुद उसे छोड़कर चल दे।

पर सीमा है कि साल—भर गुजर गया और लौटना तो दूर, चिट्‌ठी तक नहीं लिख सकी। यह उसने मालूम कर लिया था कि वह मायके में है और किसी स्कूल में नौकरी करने लगी है। सीमा के मायके में मां के सिवा और कोई नहीं है। उसके पिता की मृत्यु उसी दिन हो गयी थी जिस दिन उनके पास सीमा की शादी का कोर्ट—नोटिस पहुंचा था। वे सरकारी किस्म के मध्यवर्गीय ब्राह्‌मण थे और दिल के मरीज थे। यह बरदाश्त नहीं कर सके कि जिस इकलौती लड़की को अपना पेट काट—काटकर उन्होंने एम.ए., बी.एड. कराया है वह इस तरह उनकी घनघोर उपेक्षा कर एक विजातीय लड़के से कोर्ट में शादी कर लेगी। समाचार सुनते ही उनका कमजोर दिल बैठ गया और नतीजा यह हुआ कि शादी के बाद पहली ही तनख्वाह से सौ रुपये महीने सीमा की मां को भी भेजे जाने लगे जो साथ रहने को तैयार नहीं थीं, क्योंकि सीमा के पिता जी जो मकान छोड़ गये थे उसका एक किरायेदार उन्हें सौ रुपये देता था, बाकी दो कमरे और थे और यदि वे दिल्ली में होते तो यकीनन वह घर—जमाई बनकर रहने लगता। तो जिस दिन सीमा उसे छोड़कर गयी उस दिन, रात को शराब के नशे में उसने पहली बार छह साल के बहत्तर महीनों में सीमा की मां को भेजे सात हजार दो सौ रुपयों पर भी अफसोस किया था और जम कर किया था।

सीमा का साल—भर कैसा गुजरा, वह नहीं जानता, पर उसका एक वर्ष बहुत बुरा बीता है। यह भी कितने आश्चर्य की बात है कि सीमा के रहते हुए अकसर रात को आठ—नौ बजे लौटने वाला वह इस पूरे एक वर्ष से लगातार छह बजे घर आ जाता रहा है। पहले जिस दिन वह सतीश से नहीं मिलता था, उस दिन उसका हाजमा बिगड़ जाता था और अब महीनों गुजर जाते हैं, न उसे सतीश की याद आती है, न किसी और दोस्त की। बस कमरे में बंद रहना और पड़े रहना। खाना होटल में खा ही लेता है। कपड़े बाहर धुलते हैं। दफ्तर के साथियों का कहना है कि उसकी सेहत गिर गयी है और शक्ल से वह अब ज्यादा मेच्योर दिखने लगा है।

और ऐसी ही स्थिति में एक दिन तब वह शाम को कमरे में पड़ा दॉस्तोयेव्स्की का ‘क्राइम एंड पनिशमेंट‘ शायद तिबारा पढ़ रहा था, जब घंटी बजी। आहिस्ता से वह उठा और बाहर गलियारे में आया। गलियारे में अंधेरा था। लाइट जलाकर उसने बाहर का दरवाजा खोला और उछल पड़ा। दरवाजे पर सीमा थी। एक साल से अपने भीतर जमा नफरत के कोलाहल को महसूस करने में असफल हो उसने पाया, वह कमजोर पड़ रहा है। उसने रास्ता छोड़ दिया। सीमा भीतर चली आयी और उसके पीछे—पीछे चलता हुआ वह भी कमरे में आ गया और अलमारी का सहारा लेकर खड़ा हो गया।

‘मैं वापस आ गयी हूं।‘ सीमा ने कहा और वह अलमारी पर सिर टिका कर रोने लगा। एक सनसनीखेज तरीके से उसकी नफरत पिघलती जा रही थी और वह चाहने लगा था कि आज वह एक बरस से थामे अपने आंसुओं को सीमा के कंधे पर सिर टिकाकर बहा डाले। अलमारी से सिर उठाकर उसने सामने देखा—कमरा खाली था।

वह सन्न रह गया। सीमा कहां गयी, वह भाग कर गलियारे में आया। गलियारा भी खाली था और बाहर वाला दरवाजा भीतर से बंद था। वह फिर भीतर आया और फिर बाहर गया। सीमा सचमुच नहीं थी।

आखिर एक छलावे से दूसरे के बीच वह कब तक भागता रहेगा? उसने अपने—आपसे सवाल किया और बाहर के दरवाजे को पूरा खोलकर बीचोंबीच खड़ा हो गया।

रचनाकाल : संभवतः 1982

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