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Sukha

कहानी

सूखा

धीरेन्द्र अस्थाना

राजधानी की सबसे महंगी और व्यस्त सड़क पर विश्वविजेता सिकंदर की तरह सिर ताने खड़े विशालकाय, कई मंजिला भवन के चौथे माले पर था, देश के उस सबसे बड़े और प्रतिष्ठित साप्ताहिक का कार्यालय जिसकी सेवा में मुल्क के नामीगिरामी आला दर्जे के दिमाग दिन—रात लगे हुए थे। तीन केंद्रीय मंत्रियों, पांच मुख्यमंत्रियों, दर्जनों अधिकारियों और बीसियों संस्थाओं के निदेशकों को सत्ताच्युत कर देने वाले इस साप्ताहिक का बौद्धिक दबदबा भी उन्नीस नहीं था।

जिस व्यक्ति के हाथ में साप्ताहिक दिखायी पड़ जाता था, उसे विशिष्ट होने का गौरव अनायास ही प्राप्त हो जाता था। साप्ताहिक के ‘चिट्‌ठी मिली‘ कॉलम में जिस शख्स की प्रतिक्रिया छप जाती थी, उसे महीने भर तक यह सपना आया करता था कि वह महान हो चुका है। अनेक उदीयमान पत्रकारों, रंगकर्मियों, साहित्यकारों, कलाकारों, फिल्मकारों, अभिनेताओं, राजनेताओं और संगीतकारों को ‘स्टार‘ बना देने की भूमिका साप्ताहिक निभा चुका था। साक्षात्कार न देने वाले अकड़ू मंत्रियों का राजनैतिक जीवन साप्ताहिक ने नष्ट कर दिया था। पी. एम. हाउस में साप्ताहिक की सीधी पहुंच थी।

साप्ताहिक में एक चीफ था जिसके करीब एक दर्जन सहयोगी थे। इन्हें स्तंभ संपादकों का दर्जा प्राप्त था। चीफ अभिव्यक्ति की सवतंत्रता और जनतंत्र का कट्‌टर समर्थक था जिसके कारण प्रत्येक स्तंभ संपादक अपने स्तंभ का बेताज बादशाह था।

लब्बो लुबाब यह कि आदमी की आंखों के आकाश में टंग जाने, पांवों के डेढ़ इंच ऊपर उठ जाने और गर्दन के अकड़ जाने के पूरे इंतजामात थे। मोटी तनख्वाहें थीं, रेडियो, टेलीविजन, किताबों, नाटकों, पत्रिकाओं, सम्मेलनों आदि—आदि से होने वाली अतिरिक्त आय थी। पचास प्रतिशत स्तंभ संपादकों के पास (जिन्हें साप्ताहिक की सेवा करते—करते एक दशक पूरा हो चुका था) अपनी कारें या स्कूटर थे, फोन थे, मकान थे, फ्रिज थे, वीडियो थे, बीबियां थीं, बच्चे थे, व्हिस्की थी।

यह था सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और बौद्धिक दुनिया के ग्लैमर की चकाचौंध में डूबा साप्ताहिक का वह चेहरा, जो राजधानी के आसमान में कोहेनूर की तरह झिलमिलाया करता था।

साप्ताहिक के स्तंभ संपादकों की गर्दनें महानता के बोझ से इतनी भारी हो चुकी थीं कि आसानी से ऊपर नहीं उठ पाती थीं और दूसरे शहरों से उनसे मिलने आये कम महान लोगों को उनकी एक नजर पा जाने के लिए उनके सामने बैठकर कई दफा आधा—आधा और पौन—पौन घंटा इंतजार करना पड़ता था। उनके शब्द इतने कीमती थे, कि उनकी जुबानें बोलना भूल चुकी थीं। उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा हो चुका था कि वे अकेले रह गये थे। यह था उनके जीवन का वह सुनहरा पक्ष जो दूसरों के लिए या तो आदर्श या कुंठा और ईर्ष्या पैदा करने वाला था।

दूसरा पक्ष विस्मयकारी तरीके से उदास और क्षत—विक्षत था। इंटरनेशनल डेस्क का संपादक मूलतः कवि था, लेकिन उसके दिमाग में चौबीसों घंटे ईरान—इराक युद्ध, दो महाशक्तियों की होड़, रेगन की चीनी—यात्रा के नतीजे, श्रीलंका में तमिलों का नरसंहार, और पाकिस्तान में लोकतंत्र की हत्या जैसी चीजें कलाबाजियां खाया करती थीं और उसके कवि को पटखनी दे—देकर गिराती रहती थीं। ओ. के. पेज में कोई अशुद्धि न चली जाये इसका खयाल रखते—रखते उसके सिर के बाल तीस बरस की उम्र में ही उड़ने लगे थे। ‘रेगन‘ सही नाम है या ‘रीगन‘, ‘स्पानी‘ सही है या ‘इस्पहानी, ‘पीकिंग लिखना चाहिए या ‘पेकिंग‘‘ लिखना चाहिए, ‘बेजिंग‘ लिखना चाहिए या ‘बीजिंग‘ लिखना चाहिए, ‘डी लॉरेन‘ शुद्ध है या ‘डी लॉरेयन, यह सब कन्फर्म करने के लिए दूतावासों के फोन नंबर घुमाते—घुमाते उसके सीधे हाथ की अंगूठे के बगल वाली पहली उंगली को चक्राकार घूमने की आदत पड़ गयी थी। रोज रात को व्हिस्की के साथ कबाब निगलते हुए वह तय करता था कि कल सुबह से अपने नये कविता—संग्रह पर काम करेगा, लेकिन रोज सुबह दफ्तर की तरफ से मुफ्त आने वाले आधा दर्जन हिंदी अंग्रेजी अखबार उसे या तो मार्गरेट थैचर की गोद में पटक देते थे या जिया उल—हक के पीछे लगा देते थे। दफ्तर में वह ‘विश्व‘ के नाम से जाना जाता था।

लिटरेचर की डेस्क संभालने वाला संपादक, जो ‘साहित्य‘ के नाम से विख्यात था, खुद भी एक कहानीकार था लेकिन उसने पिछले तीन बरस से एक भी कहानी नहीं लिखी थी। दूसरे लेखकों पर लिखते—लिखते और उस लिखे हुए के प्रूफ पढ़ते—पढ़ते उसके चश्मे का लैंस लगातार मुटा रहा था। रात को घर पहुंचकर खाना खाते समय या सोते समय वह अक्सर ही चौंककर उछल पड़ता था और उसे याद आता था कि जिस पेज को वह ओ. के. कर आया है, उस पेज के फोटोग्राफ तो उसकी दराज में ही छूट गये हैं। ऐसी स्थिति में उसे पुनः दफ्तर भागना पड़ता था, टैक्सी या स्कूटर लेकर।

‘खेल और खिलाड़ी‘ स्तंभ का संपादक भी कवि था और कविता लिखने का ही समय और मूड उसके पास उपलब्ध नहीं रहता था। उसका सारा समय स्टेडियमों में मैच देखने, कमेंट्री सुनने, खिलाड़ियों के इंटरव्यू लेने और विभिन्न क्लबों में कॉकटेल पार्टियां अटैंड करने में ही निकल जाता था। कविताएं लिखना स्थगित कर—करके अपने कॉलम को ज्यादा से ज्यादा समृद्ध करने के प्रयत्न में उसका चेहरा सूख गया था और बियर पी—पीकर तोंद निकल आयी थी। कविता न लिख पाने की पीड़ा ने उसे लगभग परपीड़क बना दिया था। अक्सर ही पॉकेट ट्रांजिस्टर कान में लगाये रखने के कारण वह ऊंचा सुनने और कम बोलने लगा था।

कमोबेश यही स्थिति स्वास्थ्य, विज्ञान, फिल्म, कला, प्रदेश, रंगमंच, अपराध और अन्य स्तंभों के संपादकों की भी थी। प्रोडक्शन इंचार्ज, जिसे सर्वज्ञ के नाम से जाना जाता था, एक दर्जन लोगों के स्टाफ में अकेला ऐसा शख्स था जो हंसमुख था, सबका दोस्त था और जिसकी आंखें चढ़ी हुई नहीं रहती थीं।

रंगमंच दफ्तर में नया—नया भर्ती हुआ था। पतला—दुबला कुछ—कुछ मासूम और कुछ—कुछ चुगद जैसे चेहरे का वह 23—24 साल का कुंवारा लड़का था। साप्ताहिक में नौकरी पा गया था इससे यह तो प्रमाणित होता था कि वह प्रतिभाशाली रहा होगा, लेकिन प्रसिद्ध पत्रकार या चित्रकार या साहित्यकार या कवि नहीं था इसलिए बड़े—बड़े नामों के बीच में फंसकर लगातार अकेला, कमजोर और हताश महसूस करने लगा था। उसे अभी परमानेंट भी होना था। इसलिए असुरक्षा की तलवार उसे अतिरिक्त चौकन्ना रखती थी जिसके कारण वह जब—तब कोई—न—कोई गलती कर बैठता था और परिणामतः उसका प्रोबेशन पीरियड कुछ और लंबा खिंच जाता था।

रंगमंच शराब नहीं पीता था इसलिए सो नहीं पाता था, सिगरेट नहीं पीता था इसलिए आत्मकेंद्रित नहीं हो पाता था और शादीशुदा नहीं था इसलिए अपनी कुंठा और तनाव को बहा नहीं पाता था। उसे लगता था कि न सिर्फ दफ्तर में वरन्‌ इतनी बड़ी दिल्ली में वह एकदम तनहा है। और ठीक इसी जगह पहुंचकर वह फिर गलती करता था, क्योंकि वस्तुस्थिति यह थी कि साप्ताहिक के सभी लोग तनहा थे। नौकरी, घर, बीवी, बच्चों, टी. वी., फ्रिज, स्कूटर, फोन, सम्मान, किताबों, संगीत और शराब के बावजूद तनहा थे।

स्टाफ के आपसी संबंधों की स्थितियां भी खासी रोचक थीं। मसलन चीफ के कमरे में मीटिंग वाले वक्त को छोड़कर बाकी किसी भी दिन या समय कोई किसी के साथ उठता—बैठता नहीं था। असली बात यह थी कि हर आदमी दूसरे आदमी से बेतरह चिढ़ा और और ऊबा हुआ था। सब एक ही दफ्तर में नौकरी करने को अभिशप्त थे इसलिए उनका वश केवल यहीं तक चलता था कि सुबह—सुबह आकर अपनी—अपनी कुर्सियों पर जम जायें और गर्दन झुका लें।

वे आपस में अगर बतियाते भी थे तो नुकीले और दूर तक मार करने वाले शब्दों के जरिये। सभी लोग सजग शब्दशिल्पी थे इसलिए अक्सर ही संवाद अपनी सहजता खो देते थे। मसलन साहित्य अगर सहज भाव से एकअर्थी वाक्य उच्चारता हुआ विश्व से कहता, ‘कल तुम नागार्जुन के एकल काव्य पाठ में नहीं दिखाई दिये,‘ तो विश्व इसे बहुअर्थी वाक्य की तरह लेता था और प्रत्याक्रमण करते हुए कहता था, ‘मैं कल रात ग्यारह बजे तक पेज ओ. के. कर रहा था, लेकिन तुम तो परसों शाम पांच बजे ही फ्री हो गये थे फिर भी सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में दिखायी नहीं पड़े। पन्नालाल पटेल को ज्ञानपीठ मिला है। तुम्हें रिपोर्टिंग करनी चाहिए थी।‘

तो इस कारण संवाद की स्थितियां अक्सर ही बन नहीं पाती थीं। अज्ञानवश एक बार नया—नया भर्ती रंगमंच खिलाड़ी के पास जाकर बैठ गया। खिलाड़ी ने काफी देर तक तो गर्दन ही नहीं उठायी, लेकिन रंगमंच फिर भी बैठा ही रहा तो खिलाड़ी को असुविधा होने लगी। आखिर खिलाड़ी ने गर्दन उठायी और आहिस्ता से पूछा, ‘लगता है आज कोई काम नहीं है, तुम्हारे मजे हैं।‘

रंगमंच डर गया और तुरंत उठ गया। उसकी हिम्मत ही नहीं हुई कि वह किसी और के सामने जाकर बैठे।

बहरहाल! देश के इस सबसे बड़े साप्ताहिक के दफ्तर में एक दिन टाइपिस्ट खन्ना की मेज पर एक कम उम्र, खूबसूरत, उत्तेजक उभारों लेकिन मासूम—से चेहरे वाली लड़की बैठी नजर आयी।

सबसे पहले उसे विश्व ने देखा। वह दफ्तर में सबसे पहले आनेवाला कारिंदा था। लड़की को देखता—देखता ही विश्व अपनी मेज तक गया, परिणामतः टेलीफोन के तार से उलझ गया जिससे सर्वज्ञ की मेज पर रखा टेलीफोन जमीन पर गिर पड़ा। रंगमंच होता तो इसी बात पर घबड़ा जाता जबकि विश्व खिसियाया तक नहीं, टेलीफोन गिरने के प्रति पूर्णतः उदासीन वह मेज पर बैठ गया और घंटा बजा दी। चपरासी ने आकर टेलीफोन यथास्थान रख दिया और बोला, ‘हां साहब!‘

‘चाय ले आओ।‘ विश्व ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा, ‘अपने लिए भी। और सुनो, यह लड़की कौन है?‘

‘खन्ना छुट्‌टी गया है न साहब,‘ चपरासी ने बत्तीसी निकाल दी, ‘लीव वैकेंसी पर आयी है। हफ्ते भर के लिए।‘

तभी खिलाड़ी ने प्रवेश किया। लड़की को देखते ही खिलाड़ी का कवि मन उछल—कूद करने लगा और लॉयड के शतक की जगह लंबी कविता ने ले ली। वह लगभग लड़की की परिक्रमा—सा करता हुआ अपनी सीट की तरफ बढ़ा। विश्व ने अपनी चौकन्नी आंखों से खिलाड़ी की आंखों में उतर आयी चमक को कैच कर लिया और पहलू बदलने लगा। विश्व को माओ के चीन में कोकाकोला संस्कृति पर लेख लिखना था जबकि उसके दिमाग में लोर्का की प्रेम कविताओं ने आसन जमा लिया था। सहसा ही विश्व के सामने अभिव्यक्ति के संप्रेषण का संकट उपस्थित हो गया। वह बड़ी देर से लड़की की आंखों पर कोई खूबसूरत—सी टिप्पणी करने के लिए बेचैन था। लेकिन आसपास कोई सुपात्र नहीं था। खिलाड़ी की आंखों में जो चमक उसे दिखायी दी थी वह खिलाड़ी को चीख—चीखकर विश्व का रकीब घोषित कर रही थी। विश्व पानी पीने के लिए मुड़ा और पुनः अपनी सीट पर बैठा तो दृश्य थोड़ा समृद्ध हो गया था। लड़की के ठीक पीछे वाली मेज पर रखे हाजिरी रजिस्टर में ‘कला‘ अपने दस्तखत जड़ रही थी। कला को दस्तखत करते देख खिलाड़ी और विश्व दोनों को एक साथ खयाल आया कि उन्होंने कई दिनों से अपनी हाजिरी नहीं भरी है। दोनों अपने—अपने बॉलपेन लेकर एक साथ उठे और लड़की की परिक्रमा करते हुए कला के पास पहुंच गये जो लड़की को देखकर अपनी साड़ी की सलवटें ठीक करने लगी थी।

दस्तखत करते समय खिलाड़ी ने पाया कि लड़की की गर्दन भी खासी उत्तेजक है और विश्व को लगा कि समूचा रीतिकालीन साहित्य लड़की के आगे निष्प्राण है, कि प्रेम करने के लिए इससे आदर्श स्त्री संसार में दूसरी नहीं हो सकती। विश्व और खिलाड़ी द्वारा लड़की को आसक्त नजरों से देखे जाने पर कला केे गंभीर चेहरे पर क्रोध की एक लकीर ने जन्म लिया और उसके नारी स्वातंत्र्‌य आंदोलन वाले मस्तिष्क में एक ही वाक्य चकराने लगा—सब पुरुष एक जैसे होते हैं। लोलुप और कामांध और गिरे हुए।

तीनों के अपनी—अपनी सीटों पर बैठते ही ‘सर्वज्ञ‘ का खिलता मुस्कराता चेहरा उपस्थित हुआ और लड़की को देखते ही अवाक्‌ रह गया। सर्वज्ञ के पीछे—पीछे ही बदहवास—सा रंगमंच भी अवतरित हुआ था। और लड़की पर नजर जाते ही उसकी आंखें चुंधिया गयी थीं। खुद को अभी तक कुंवारा पाने का सुख उसके भीतर इतने जोर से उमड़ा कि कान लाल हो गये और दिल लंबी छलांग लेकर हलक में आ फंसा। उन दोनों के सीट पर बैठते ही दुबले—पतले, सिगरेट के हर कश के साथ खांसते, पीले, निस्तेज चेहरे वाले स्वास्थ्य का आगमन हुआ। अपने सामने अचानक ही इतनी सुंदर लड़की को पाकर स्वास्थ्य लड़खड़ा गया और बुरी तरह खांसने लगा। अपनी पीठ पीछे लगातार गूंजती खांसी को सुन लड़की ने कनखियों से पीछे देखा और स्वास्थ्य का दिमाग घूमने लगा। उसने मन—ही—मन अपनी नौकरी की लानत—मलामत करते हुए तय किया कि कल ही छुट्‌टी लेकर वह मेडिकल इंस्टीट्‌यूट में अपना चैकअप करा डालेगा। फिर आया साहित्य, गमगीन चेहरे और सूनी आंखों के साथ, कंधे पर थैला लटकाये, एक तरफ को झुका—झुका और लगभग लड़खड़ाता—सा। लड़की को उसने अपने मोटे लैंस वाले चश्मे के पीछे से देखा और उसके कदम जाम हो गये। उसके मार्क्सवादी दिमाग में तत्काल ही ‘अकहानी‘ वाले दिनों की एक अश्लील इच्छा ने जन्म लिया और वह नोबेल पुरस्कार के पीछे छिपे अमेरिकी साम्राज्यवाद के इरादों को यक—ब—यक भूल गया। इससे पहले कि वह लड़की के शारीरिक सौष्ठव को अपनी गहरी आंखों से पूरी तरह पी पाता, विज्ञान ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया। उसने पलटकर गुस्से से देखा और सामने विज्ञान को खड़ा देख हंसकर हैलो कर दिया। विज्ञान ने लड़की को देखा ही नहीं जिससे विश्व को विज्ञान के सौंदर्यबोध पर सख्त अफसोस हुआ।

दरअसल, यह विश्व का जल्दबाजी में लिया गया निर्णय था क्योंकि वस्तुस्थति यह थी कि विज्ञान को इस बार परखनली शिशुओं के बारे में आवरण—कथा लिखनी थी जिसका कि मैटर वह अभी तक प्रेस नहीं भेज पाया था और मैटर भेजने की डैडलाइन कल निकल गयी थी। उस पर हालत यह थी कि कल रात सोवियत दूतावास में जो पार्टी थी उसमें विज्ञान ने जरूरत से ज्यादा वोदका पी ली थी जिस कारण उसका दिमाग अभी भी नशे से आक्रांत था।

विश्व को अभी तक सुपात्र नहीं मिल पाया था। आखिर उसने तय किया कि लड़की की आंखों पर अपनी टिप्पणी वह कला के सामने अभिव्यक्त करेगा। पहले तो वह बहुत शालीन ढंग से मुस्कराया, फिर उतनी ही शालीनता से वह कुर्सी घसीटकर कला के सामने बैठ गया। फिर उसने चपरासी को आवाज देकर दो कॉफी लाने के लिए कहा। इतनी खुशामद पर्याप्त थी, कला का गर्वोन्नत चेहरा मुस्कराने लगा। विश्व का का हौसला दो फुटा हो गया, सो उसने कह ही दिया, ‘लड़की की आंखें उदास झील की तरह नजर आती हैं।‘

इतनी खूबसूरत छायावादी उपमा को एक मामूली—सी टाइपिस्ट पर खर्च होते देख कला का चेहरा विकृत हो गया। उसने तन्नाकर कहा, ‘बस, निकले न शुद्ध पुरुष। लड़की देखी और फिसल गये। टाइपिस्ट है वो।‘

विश्व को अपने इस बेवजह अपमान से गहरा दुख हुआ लेकिन कॉफी का ऑर्डर जा चुका था इसलिए मजबूरन उसे वहीं बैठे रहना पड़ा। कॉफी आने तक उसकी यह धारणा दृढ़ हो चुकी थी कि बुद्धिजीवी होने के बावजूद कला साधारण औरत की तरह स्त्री—सुलभ ईर्ष्या का शिकार हो गयी है। कला के इस पतन से उसे अपने पतन का अफसोस कुछ कम होता जान पड़ा।

तभी एक चमत्कार हुआ।

रंगमंच अपनी सीट से उठा और लड़की की बगल में जाकर बैठ गया। वह लड़की को डिक्टेशन देने आया था।

स्वास्थ्य को खांसी आ गयी और विश्व का चेहरा फीका पड़ने लगा। साहित्य को लगा कि यह ठीक नहीं हुआ। किसी कुंवारी लड़की के लिए कुंवारे लड़के की संगत ठीक नहीं है। वह जल्दी से डिक्टेशन देने के लिए अगले अंक का मैटर तय करने लगा। खिलाड़ी को यही सोच—सोचकर आश्चर्य हो रहा था कि बित्ते—भर के रंगमंच की हिम्मत इतनी विशाल हुई तो कैसे और क्यों?

दरअसल रंगमंच ने यह कदम सोच—समझकर ही उठाया था। वह एक लंबे अर्से से एक अदद कंधे की तलाश में था। उसकी ठहरी हुई, नीरस और एकाकी जिंदगी को तरंग और धड़कनों की सख्त जरूरत थी, इसलिए उसे पूरी गंभीरता से यह इलहाम हुआ था कि इस लड़की का आगमन केवल और केवल उसी के लिए हुआ है। दूसरे, उसने यह भी मान लिया था कि लड़की से प्रेम करने का सबसे अधिकारी पात्र एकमात्र वही है। इन सब कारणों पर कई कोणों से विचार करने के बाद उसने तय किया कि इससे पहले लड़की किसी और के इश्क में गर्क हो जाये, उसे लड़की से गंभीरतापूर्वक प्रेम करना शुरू कर देना चाहिए। उसके कुंवारेपन ने उसके प्रेम की संभावित विजय को एक के बाद एक जो तर्क प्रदान किये उनसे उसके चेहरे पर एक साबुत आत्मविश्वास आकर पसर गया। हनुमान की तरह यह जानकारी मिलते ही कि वह समुद्र पार कर सकता है, रंगमंच उठा और लड़की की बगल में जाकर बैठ गया।

अचानक दूसरा चमत्कार हुआ।

सर्वज्ञ की मेज पर क्रमशः विश्व, स्वास्थ्य, खिलाड़ी और साहित्य आकर बैठ गये। सर्वज्ञ को चाय मंगानी पड़ी। कला भी धीरे से सर्वज्ञ की मेज पर चली आयी। सर्वज्ञ को एक चाय बढ़वानी पड़ी।

दफ्तर में प्रवेश करती फिल्म को लगा कि कोई हादसा घटा है, वह भी सीधे ही सर्वज्ञ की मेज पर चली आयी। सर्वज्ञ को एक चाय और बढ़वानी पड़ी। विश्व इस बीच लड़की के ऊपर एक कविता लिख चुका था और उसका पाठ करने की मुद्रा में आ गया था।

कविता पूरी होने के बाद एक जोरदार सम्मिलित ठहाका सर्वज्ञ की मेज से उठा और चारों तरफ की दीवारों तथा छत से चिपक गया।

फिल्म, जो कविता सुनने के दौरान ही मामले की तह में पहुंच चुकी थी, इस बीच लड़की का नखशिख दर्शन कर चुकी थी और इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि विश्व का दिमाग सड़क छाप हो गया है। उसे पक्का यकीन था कि उसकी अपनी आंखें लड़की से कहीं ज्यादा आकर्षक हैं और अपनी देहयष्टि पर तो वह बेतरह फिदा थी ही। यूं भी, वह अभी—अभी मृणाल सेन से इंटरव्यू लेकर आयी थी, जो अपनी एक नयी फिल्म के सिलसिले में दिल्ली आये हुए थे। इसलिए उसने विश्व का एक मामूली—सी टाइपिस्ट लड़की पर आसक्त हो जाना सख्त नापसंद किया, साथ ही कविता चूंकि बहुत ही खूबसूरत थी इसलिए उसे यह अफसोस भी हुआ कि अगर वह शादीशुदा न होती तो यह कविता यकीनन उसी पर लिखी जाती। फिल्म को पहली बार अपने इंजीनियर पति पर गुस्सा आया जो कविता नहीं, बिल्डिगें और बांध बनाता था। अपने वैवाहिक जीवन की और भी बहुत सारी विसंगतियां कविता सुनने के बाद फिल्म के सामने खुलने लगीं। मसलन फिल्म कामू, काफ्का और दॉस्तोयेवस्की की दीवानी थी जबकि उसके पति ने इन लोगों का नाम भी नहीं सुना था। फिल्म प्यारेलाल भवन में एक दिन के लिए आयी मणि कौल की ‘दुविधा‘ देखने का प्रस्ताव रखती और उसका पति कमाल अमरोही की ‘रजिया सुल्तान‘ के टिकट सामने रख देता। वह अचानक ही उदास हो गयी और चुपचाप अपनी सीट पर जाकर मृणाल सेन के इंटरव्यू का टेप सुनने लगी।

रंगमंच नर्वस हो चुका था, डिक्टेशन देते हुए उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी थी। दरअसल, लड़की इतनी मासूम नहीं थी जितना रंगमंच ने समझा था। वह लीव वैकेंसी पर जरूर आयी थी लेकिन सीधे ही टाइपिंग इंस्टीट्‌यूट से उठकर नहीं आ गयी थी। इससे पहले वह एक दैनिक के कार्यालय में थी। इसलिए जब अचानक ही लड़की की नजर रंगमंच के मैटर पर पड़ी तो उसने टाइप करना रोककर अपनी महीन आवाज में पूछ लिया, ‘इसकी तो प्रेस कॉपी तक बनी हुई है।‘

रंगमंच की जगह यही प्रश्न अगर साहित्य को झेलना होता तो वह लापरवाह अंदाज में, आवाज को थोड़ा सख्त करके लड़की को जवाब थमा देता कि ‘इस स्क्रिप्ट को चीफ ने रिजेक्ट कर दिया है।‘ लेकिन रंगमंच जबाव नहीं दे पाया। वह अक्लमंद जरूर था लेकिन अनुभवहीन था इसीलिए हकलाने लगा। हकलाने की दूसरी वजह सर्वज्ञ की मेज पर मजमा लगाये लोग थे जो बीच—बीच में रंगमंच और लड़की की तरफ देख—देखकर मुस्करा दिया करते थे। इन मुस्कराहटों से रंगमंच की हलक सूखने लगी थी। अंततः वह मैदान से भाग खड़ा हुआ।

रंगमंच के सीट छोड़ते ही विश्व सर्वज्ञ की मेज से उठा और लड़की की बगल में जाकर बैठ गया। लोग उसे देखकर मुस्कराये तो वह भी मुस्करा दिया। रंगमंच को बाजी पलट जाने का गम सताने लगा।

विश्व ‘माओ के चीन में कोकाकोला संस्कृति‘ पर डिक्टेशन दे रहा था और वह भी मुंहजबानी। टाइप करती लड़की इस रहस्य से परिचित नहीं थी कि विश्व कल रात चार घंटे तक इसी विषय पर पैंग्विन से प्रकाशित किताब का अध्ययन करता रहा था, इसलिए वह विश्व की इस भयानक प्रतिभा से बुरी तरह प्रभावित हो गयी। उसने शायद, विश्व से मुस्कराकर कुछ कहा और विश्व ने तत्काल ही दो कॉफी तथा बटर स्लाइस का आदेश प्रसारित कर दिया। साथ ही वह विजेता के भाव से मुस्कराया। रंगमंच की हथेलियां पसीने से भीगने लगीं। इस बीच सर्वज्ञ को चीफ ने याद किया था। बाकी लोग अपनी—अपनी मेजों पर चले गये थे।

तभी हॉल में विश्व का ठहाका और लड़की की खिलखिलाहट एक साथ पैदा हुए। फिल्म तत्काल ही अपने नाखून देखने लगी, कला ने अपने होंठ काटे, खिलाड़ी अपनी सीट से उठकर टहलने लगा, स्वास्थ्य खांसने लगा, साहित्य का चश्मा नाक से फिसल गया और रंगमंच का चेहरा स्याह पड़ने लगा। विज्ञान पूरे घटनाक्रम से निरपेक्ष, टाइपिस्ट आनंद को अपनी आवरण कथा डिक्टेट करा रहा था। असल में विज्ञान को यह उथल—पुथल सिरे से ही गलत लग रही थी। विज्ञान जिंदगी के हर क्षेत्र में स्तरीयता का मारा हुआ था। उसे सर्वाधिक कष्ट रंगमंच की मानसिकता को लेकर हुआ था जो बाकी लोगों की अपेक्षा लड़की को लेकर ज्यादा गंभीर था। विज्ञान को रंगमंच पर की गयी अपनी पंद्रह दिवसीय मेहनत अकारथ होती लग रही थी।

लड़की फिर खिलखिलायी और रंगमंच को लगा कि वह उसी पर हंसी है। वह तेजी से उठा और बाहर चला गया।

लंबे अर्से बाद विश्व, कला, रंगमंच, साहित्य, खिलाड़ी, सर्वज्ञ और फिल्म ने एक साथ लंच लिया। लंच में ही यह बात खुल गयी कि रंगमंच लड़की के प्यार में बेतरह और गंभीरतापूर्वक फंस गया है। इस गंभीरता का प्रमाण यह था कि रंगमंच ने ‘फंस गया‘ जैसे सड़कछाप शब्द पर आपत्ति की। उसका तर्क था कि बुद्धिजीवियों के मुंह से इतने घटिया शब्द शोभा नहीं देते। यह लगभग विस्फोट जैसा था। सभी को अचानक अपनी—अपनी गरिमा का बेतरह खयाल हो आया।

इस बीच साहित्य चुपके से खिसक लिया था। जब तक बाकी लोग खाना खाकर हॉल में पहुंचे, साहित्य की डिक्टेशन चालू हो चुकी थी। अब रंगमंच को पक्का यकीन हो गया कि वह षड्‌यंत्रकारियों के बीच फंसा हुआ है। खिलाड़ी को अफसोस हुआ कि वह चूक गया। साहित्य लड़की को स्त्री—पुरुष संबंधों पर डिक्टेशन दे रहा था, जो कि उसका प्रिय विषय था और जाहिर था कि इस विषय में लड़की को प्रभावित करने और आकर्षित करने की भरपूर गुंजाइश थी।

डिक्टेशन के दौरान साहित्य लड़की को सूचना दे चुका था कि वह कितनी भाग्यशाली है कि इतने बड़े—बड़े इंटेलेक्चुअल्स उसे पसंद कर रहे हैं। उसने यह भी बता दिया था कि विश्व को पिछले बरस कविता का बहुत बड़ा सम्मान प्रधानमंत्री के हाथ से मिल चुका है, कि उससे पिछले बरस यही सम्मान खिलाड़ी को प्राप्त हुआ था कि सर्वज्ञ का नाम देश के चुनिंदा पत्रकारों में लिया जाता है कि शबाना आजमी और रेखा जैसी अभिनेत्रियां फिल्म की सहेली हैं कि कला की शामें हुसैन, रामकुमार और हिम्मत शाह जैसी हस्तियों के साथ गुजरती हैं कि विज्ञान तीन बार विदेश हो आया है और सबसे अंत में उसने बड़ी विनम्रता और संकोच के साथ यह भी उगल दिया कि वह खुद एक प्रसिद्ध कहानीकार है और उसकी चार किताबें छपकर खत्म हो चकी हैं और दो कहानियों पर श्याम बेनेगल तथा बासु चटर्जी जैसे निर्देशक फिल्में बना रहे हैं।

मतलब यह कि रंगमंच के अलावा बाकी सबके लिए साहित्य जमीन तैयार कर आया और रंगमंच को जड़ समेत उखाड़ आया। लड़की ने विस्मित होकर सारी बातें सुनी थीं और मुग्धा की तरह साहित्य का चेहरा निहारने लगी थी। लड़की द्वारा खुद को इतने प्यार से देखे जाने पर साहित्य का दिल कलाबाजियां खाने लगा था और उसे जिंदगी फिर से सुहानी लगने लगी थी।

लेकिन कमाल, कि अपनी इस विजय—यात्रा से साहित्य की प्रसन्नता थोड़ी ही देर में मुर्झा गयी। लड़की द्वारा टाइप किये गये मैटर की अशुद्धियां ठीक करते—करते उसका दिल लड़की के मानसिक दिवालियेपन को देख बुरी तरह रोने—चीखने लगा। मैटर प्रेस भेजने के बाद उसने सर्वज्ञ की मेज पर आकर घोषणा की कि इस दौड़ से वह खुद को हटा रहा है कि लड़की की अपर स्टोरी खाली है कि ऐसी मूर्ख लड़की जो मोहन राकेश का नाम नहीं जानती, प्यार करने के काबिल नहीं है। असल में साहित्य गेटे के इस सिद्धांत को तो मानता था कि ‘प्यार में हम सब समान रूप से मूर्ख हैं,‘ लेकिन यह उसे गवारा नहीं था कि जिस लड़की से वह प्रेम करे, वह लड़की उसकी दुनिया के मशहूर लोगों से कतई अनजान हो।

साहित्य की घोषणा से रंगमंच का डूबता हुआ दिल सहसा ही खड़ा हो गया और तेजी से धड़कने लगा। उसे लगा कि अभी उम्मीद बाकी है, कला और फिल्म को साहित्य की इस ‘घर वापसी‘ से सुकून की अनुभूति हुई और दोनों को साहित्य पर, थोड़ा—सा प्यार आ गया। लेकिन खिलाड़ी का उत्साह भंग नहीं हुआ। साहित्य की तरह खिलाड़ी एक ही दुनिया में नहीं जीता था। उसे पक्का यकीन था कि लड़की भले ही मोहन राकेश, शमशेर और मुक्तिबोध को न जानती हो, लेकिन कपिलदेव और गावस्कर से तो हर हाल में परिचित होगी ही। खिलाड़ी को कपिलदेव और गावस्कर से कई बार इंटरव्यू लेने का श्रेय प्राप्त था। सो इस बार लड़की की बगल में खिलाड़ी था। शाम हो रही थी जब खिलाड़ी ने डिक्टेशन समाप्त की। इस बीच बाकी लोग दोनों पर बराबर नजर नहीं रख पाये, क्योंकि एक तो यह प्रकरण लंबा खिंच गया था, दूसरे इस सारे चक्कर में काम का बहुत हर्ज हुआ था। इसलिए लोग गर्दन झुकाये अपनी—अपनी मेजों पर प्रूफ और प्रेस कॉपी से आंखें फोड़ने में हमेशा की तरह तल्लीन हो गये थे।

रंंगमंच ने जब खिलाड़ी, विश्व और लड़की को एक साथ बाहर जाते पाया तो उसका दिल बैठ गया। उसे लगा कि वह हार गया है।

चौथा दिन बीतते—बीतते स्थितियां क्रांतिकारी तरीके से बदल गयीं। रंगमंच ने सिगरेट और शराब शुरू कर दी और साहित्य ने छोड़ दी। इस बीच साहित्य विश्व और खिलाड़ी के इस तर्क से सहमत हो गया था कि एक हफ्ते के लिए आयी लड़की की अपर स्टोरी से क्या लेना—देना। परिणामतः साहित्य पुनः मैदान में लौट आया था और खिलाड़़ी तथा विश्व की तरह लड़की के साथ एक शाम गेलार्ड के सुखकारी माहौल में जाकर कोल्ड कॉफी पी आया था। वह महसूस कर रहा था कि अब रात को सोते समय उसे आत्महत्या कर लेने का खयाल नहीं आता, दफ्तर आते समय कहानी न लिख पाने की कसक दिल में दर्द की लहरें पैदा नहीं करती, जिंदगी जीने लायक लगती है और चिड़ियों की चहचहाहट सुनायी पड़ती है। फूल फूलों की ही तरह दिखते हैं और ठहाका दिल से निकलता है। प्रूफ पढ़ने में गलती नहीं होती और होंठ गुनगुनाते रहते हैं। लगभग उसी तरह के परिवर्तन खिलाड़ी और विश्व ने भी अपने भीतर महसूस किये थे।

लेकिन रंगमंच की दुनिया लुट चुकी थी। वह चिड़चिड़ाया—चिड़चिड़ाया सा रहने लगा था और हरदम दूसरों को पीड़ा पहुंचाकर सुख पाने का मौका ढूंढ़ता रहता था। ज्यादा मात्रा में शराब पीने के कारण उसकी आंखें पिछले दो दिन से लाल थीं और वह दिन में भी महकता रहता था। उसने अखबार और पत्रिकाएं पढ़ना छोड़कर गुलाम अली की गमजदा गजलें सुननी आरंभ कर दी थीं, और अपनी शाम अमेरिकन लाइब्रेरी में बिताने के बजाय कनाट प्लेस के सेंट्रल पार्क में गुजारने लगा था। आखिर जब पराजित हो जाने की पीड़ा सहनशक्ति की सीमा क्रॉस कर गयी तो उसने अपनी समस्या सर्वज्ञ के सामने रखी। सर्वज्ञ ने अपनी नेक सलाह इस प्रकार दी, ‘लड़की तुम्हें प्रेम करने लगे, इसमें मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता। हां, अगर लड़की से विवाह करना चाहो तो मैं बात करूं। प्रेम शादी के बाद भी किया जा सकता है।‘

दरअसल सर्वज्ञ मजाक कर रहा था लेकिन रंगमंच ने कहा, ‘मंजूर है।‘

यह छठे दिन की बात है। लड़की की नौकरी का एक दिन बाकी था।

अगले यानी सातवें दिन रंगमंच शेव बनाकर और नये कपड़े पहनकर आया। सर्वज्ञ चूंकि सलाह देकर फंस गया था इसलिए कोशिश करके देख लेना चाहता था। उसने आदेश कर दिया था कि लड़की को कोई डिक्टेशन न दे। सर्वज्ञ का इशारा साहित्य, खिलाड़ी और विश्व की तरफ था।

लेकिन रंगमंच को पता नहीं था कि साहित्य, विश्व और खिलाड़ी की दिलचस्पी लड़की में खत्म हो चुकी थी। तीनों इस बात पर सहमत हो चुके थे कि लड़की का आज अंतिम दिन है इसलिए अब अपने पांव पीछे हटा लेने चाहिए। वे प्रीत करके दुख नहीं पाना चाहते थे। उन्होंने अपनी—अपनी पसंदीदा लड़कियों से प्रेम—विवाह किया था और दुख उठा रहे थे। वे इस बात पर प्रसन्न थे कि उनके छः दिन प्रफुल्लता से भरे—पूरे गुजर गये। कल से फिर वही शामे गम, वही गैलियां, प्रूफ, प्रेस कॉपी, डमी पेस्टिंग, अकेलापन, शराब और विद्वेष शुरू होना था। इसलिए तीनों यथास्थिति में लौट गये थे—अपनी अपनी मेजों पर, अकेले, अपरिचित और ऊबे हुए, सो, रंगमंच के लिए हरी झंडी थी। लेकिन दोपहर के एक बजे तक लड़की नहीं आयी, उसका फोन आया कि वह आज से ही नहीं आ पायेगी। संयोग कि फोन रंगमंच ने ही सुना।

‘हम कहां मिलेंगे?‘ रंगमंच ने पूछा।

‘कहीं नहीं।‘ उधर से आवाज आयी और फोन कट गया।

रंंगमंच कटे पेड़ की तरह सर्वज्ञ की मेज पर गिरा।

तभी विश्व अपनी मेज से उठा और सर्वज्ञ के पास आकर दनाक से से बोला, ‘अंतिम कविता अर्ज है :

हम तेरे आभारी हैं, ओ अनजान लड़की

अपने 365 दिनों की उदास डायरी में

तेरी उपस्थिति के

छह ताजा गुलाब से दिन

हम अपने खून से लिखेंगे

और किसी भी वर्ष सूखने नहीं देंगे

हम पुनः आभारी हैं

ओ अनजान लड़की।‘

आश्चर्य कि इस बार कोई नहीं हंसा। खिलाड़ी अपने भीतर कुछ और दूर तक खिसक गया। साहित्य ने जेब से रूमाल निकालकर पहले अपनी आंखें, फिर चश्मा साफ किया और गाब्रियल गार्सिया मारखेज का उपन्यास ‘हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्‌यूड‘ पढ़ने लगा, फिल्म अपना इकलौता पेज ओ. के. करने लगी, सर्वज्ञ चीफ के पास चला गया और कला पुनः नदी की द्वीप बन गयी।

लेकिन डूबते रंगमंच को शायद यह नहीं पता था कि लड़की के चले जाने का उससे भी ज्यादा अफसोस अगर किसी को था तो कैंटीन के पंडित जी को, जिनके पास अभी तक एक भी कॉफी का ऑर्डर नहीं पहुंचा था।

रचनाकाल : 1986

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