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ख्वाहिशों का संकल्प

खवाहिशों का संकल्प

"देखो , सीमा एक बार नहीं हजार बार मैं कह चुका हूँ तुम्हारी ये जिद पूरी नहीं होने वाली । समझी तुम ? और आज के बाद इस बारे में मैं कोई बात नहीं करना चाहता । इज दैट क्लियर ! "अविनाश ने कठोरता से कहा

"पर अविनाश तुमने खुद कहा था की मैं जब चाहूँ फिर पढ़ाई या नौकरी शुरू कर सकती हूँ । "

"तब हम शादीशुदा नहीं थे और अब तुम पर माँ की और सोनू की जिम्मेवारी है । ये रोने धोने का नाटक बंद करो और जाकर खाने की तैयारी करो । "

"अविनाश !!! तुम्हें मेरा दर्द नाटक नजर आ रहा है । अपने अहंकार में तुम इतना भी भूल गए की मैं भी इंसान हूँ । मेरी भी कुछ ख्वाहिशें हैं । तुमने मुझसे कहा था की शादी के बाद मैं पढ़ाई कर सकती हूँ"

"ज्यादा चिल्लाओ मत ! हाँ कहा था पर अब मना कर रहा हूँ । सुना तुमने ?? या फिर से कहूँ ।" अविनाश ने आदेशात्मक तरीके से कहा

"पहले तुमने कहा घर बार संभाल लो , फिर जो चाहे करना । फिर बच्चा , फिर बच्चे को पाँच साल का होने दो और अब साफ मना ? तुम लगातार मेरी भावनाओ के साथ खिलवाड़ करते आ रहे हो !" सीमा खुद को ठगा सा महसूस करते हुए बोली

"हाँ , कर रहा हूँ और कुछ । क्या करोगी ? जुबान चलाओगी ?" अविनाश चिल्लाने लगा

" हाँ चिल्लाऊँगी , खूब चिल्लाऊँगी । अब तो सोनू भी दस वर्ष का हो गया है । मैंने तुम्हारी हर मांग पूरी की है । तुम्हारे लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया और तुम ............" सीमा की आवाज गले में ही घुट गयी ।

अविनाश के जोरदार तमाचे ने उसे कुछ क्षणों के लिए जैसे गुम ही कर दिया । उसके बाद कितने चांटे पड़े इसका उसे अंदाजा ही नहीं लगा । कमरा उसके रुदन और सिसकियों से गूंज उठा और अविनाश युद्ध में विजयी की भांति अकड़ कर बाहर चला गया ।

आज पहली बार अविनाश ने उस पर हाथ उठाया था । जुबान से सीमा का मुंह तोड़ देना तो जैसे अविनाश का रोज का मनोरंजन था । हाथ उठाने की ही कमी थी , आज वो भी पूरी हो गयी थी ।

ग्यारह साल पहले जब उसके गरीब माँ बाप ने केवल सोलह वर्ष की सीमा का विवाह अविनाश से किया था तब पढ़ाई में सबसे आगे रहने वाली सीमा को अविनाश ने वादा किया था की वो शादी के बाद भी पढ़ सकती है । माँ बाप की मजबूरी और अविनाश के वादे के कारण कम उम् सीमा शादी करने को राजी हो गयी । शादी के बाद की जिम्मेवारियों और आर्थिक परेशानियों का रोना रोकर अविनाश ने कभी भी उसे पढ़ने नहीं दिया । एक होनहार छात्रा का सपना उसके भीतर ही भीतर दम तोड़ने लगा ।

आज के हादसे ने सीमा को इतना आहत किया की वो जैसे जिंदा तो थी पर केवल शरीर से । दिन बीतते गए और देखते – देखते सोनू पंद्रह का हो गया । इस बार उसकी बोर्ड की परीक्षा थी और वो जी जान से मेहनत कर रहा था ।

सीमा की तरह सोनू भी पढ़ने में अव्वल था । अविनाश शराब पीने लगा था और आए दिन सीमा को मारता भी था । अच्छी नौकरी और रुतबे ने उसका दिमाग खराब कर दिया था । वो सीमा को खुद के लायक ही नहीं समझता था । एक दिन --------

" माँ , कहाँ हो तुम ? सोनू इधर उधर सीमा को ढूंढते हुए सीमा के पास आया ।

" कुछ नहीं बेटू , पापा आने वाले है ना तो खाने के तैयारी कर रही हूँ " सीमा बोली

" माँ दो दिन बाद मेरा रिजल्ट है अगर मैं अव्वल रहता हूँ तो क्या दोगी ?" सोनू चहकते हुए बोला

" अव्वल तो तुम्हें आना ही है , कहो क्या चाहिए ? मैं पापा से कह कर मँगवा दूँगी "

" पापा से नहीं मुझे तुमसे इनाम चाहिए । " सोनू माँ की आंखो मे आंखे डालकर बोला

" मैं......... मैं क्या दे सकती हूँ बेटा ! तुम तो जानते हो घर खर्च पापा खुद करते है और मुझे तो .........म ... मेरा मतलब मेरे पास पैसे नहीं है बेटा । मुझे माफ कर दो , मैंने तुम्हारा दिल तोड़ दिया । सीमा अपने आँसुओ को रोकते हुए बोली

"मेरी भोली माँ ! तुम कभी किसी का भी दिल नहीं दुखा सकती , तुम बहुत अच्छी हो । मैं जो तुमसे मांगना चाहता हूँ वो तुम मुझे दे सकती हो । " सोनू ने माँ को छाती से लगाते हुए कहा

"सच ,अच्छा बताओ मैं क्या दे सकती हूँ अपने राजा को ? " सीमा बेटे को दुलार करते हुए बोली

" आज नहीं दो दिन बाद , अब खेलने जा रहा हूँ " कहकर सोनू दौड़ गया

दो दिन तक सीमा सोनू के रिजल्ट की चिंता के साथ –साथ इस चिंता में भी रही की आखिर सोनू को क्या चाहिए ? अगर वो ना दे सकी तो ?

दो दिन बाद रिजल्ट आ गया और सोनू प्रथम श्रेणी से पास हुआ था । उसने स्टेट लेबल पर भी टॉप किया था । सीमा की खुशी का ठिकाना नहीं था । दिन भर मिठाइयाँ बटीं और लोग आते जाते रहे । अविनाश सब पर ये जताते रहे की उनके बिना सोनू का टॉप होना नामुमकिन था और ये सब उनके अथक प्रयास का फल है । जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल परे थी , उन्होने कभी झांक कर भी नहीं देखा था की सोनू क्या और कैसे पढ़ता है ।

रात हुई और लोग भी विदा हुए । अविनाश सोने चले गए तभी ...............

सोनू किचन साफ करती सीमा के पास आया और उसका हाथ पकड़ कर उसे हाल मे ले आया । सीमा को सोफ़े पर बैठा कर वो उसका हाथ थाम कर उसके पैरों के पास बैठ गया ।

" माँ , मैंने बचपन से तुम्हें सबके लिए मरते , पापा से पीटते और सिसकते देखा है । तुमने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया इस घर के लिए । अपना सपना ,अपनी काबलियत ...सब कुछ । " सोनू ने माँ का हाथ सहलाते हुए कहा

" बेटा ये मेरा फर्ज है । आज ऐसी बातें क्यूँ कर रहे हो । " सीमा सकुचाते हुए बोली

" माँ , मुझे इनाम में वो सपना चाहिए जिसे तुमने बरसों पहले मार दिया था । मुझे वो संकल्प चाहिए जो तुमने खुद से किया था । आगे बढ्ने का संकल्प , कुछ कर दिखाने का संकल्प । मैं जानता हूँ तुमने अपने इस सोनू का नाम संकल्प क्यों रखा था । तुम्हें वो संकल्प पूरा करना होगा । " सोनू ने विश्वास से माँ के हाथों को थामे हुए कहा

" बेटा .....सीमा इससे आगे कुछ ना कह पाई । उसका चेहरा आँसुओ से भीग गया ।

" हाँ , माँ तुम्हें फिर पढ़ना होगा । अपनी उम्र , अपनी खामोशी को पीछे छोड़ते हुए । हम कल ही मामाजी के पास जा रहे हैं । मैंने सब इंतेजाम कर लिया है । हम दोनों आगे की पढ़ाई साथ – साथ करेंगे । ठीक है ना माँ " प्यार से सीमा के चेहरे को थाम कर सोनू ने कहा

" पर बेटा पापा !!!!!! "

" उनकी चिंता तुम मत करो । उन्हे भी अपने किए का कुछ तो फल मिलना ही चाहिए । मुझ पर भरोसा रखो , मैं सब कुछ ठीक कर दूंगा । ' सोनू ने विश्वास से कहा

आज बरसों बाद सीमा को महसूस हुआ की जैसे उसकी भी सांस आ जा रही है । अपने बेटे के प्यार और सहारे ने उसके पंखों को नई उड़ान दे दी थी । आज सोनू का नाम संकल्प रखने का संकल्प पूरा होने के लिए कदम बढ़ रहा था और उसके सपनों का आकाश उसकी प्रतीक्षा कर रहा था ।

संजना तिवारी

आन्ध्रप्रदेश

नोट – रचना मौलिक और अप्रकाशित है ।

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