धड़कने दिल की - 9 Shravan Gore द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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धड़कने दिल की - 9

'धड़ाम!'
लोहे के विशाल भारी कपाट गिरने की गूंज उस संकरी, नम सुरंग में गूंज उठी। सीलन, सड़ी हुई काई और जंग की तीखी गंध हवा में इतनी गाढ़ी थी कि हर सांस के साथ सीने में जलन हो रही थी।
सामने वो विशाल लोहे की जाली थी, जिस पर ब्रिटिश हुकूमत के दौर के पांच मोटे जंग खाए ताले लटके थे। और पीछे... पीछे सिर्फ घुप अंधेरा था, जिसे चीरती हुई तीन भारी टॉर्चों की पीली रोशनी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी। साथ ही भारी बूटों की थाप पत्थरों पर टकरा रही थी—'ठक... ठक... ठक...'
"आदित्य..." सिया ने दीवार से अपनी पीठ सटाते हुए फुसफुसाया। उसकी आवाज में अब आंसुओं की जगह एक सर्द खामोशी थी। उसने अपनी दोनों हथेलियों में उस १९९४ की सरकारी डायरी को सीने से ऐसे चिपका रखा था, मानो वो कागज नहीं बल्कि उसके पिता की आखिरी सांसें हों। "रास्ता बंद है। हम फंस चुके हैं।"
आदित्य ने अपनी सांसों की रफ्तार को काबू में किया। उसके कंधे की पुरानी गोली का घाव उस खिंचाव और भागदौड़ से फिर से सुलग उठा था, लेकिन उसका दिमाग इस वक्त बर्फ की तरह ठंडा था। उसने लोहे की जाली के सलाखों के बीच से हाथ डालकर देखा।
सलाखें बेहद मोटी थीं, लेकिन जाली के निचले हिस्से में पत्थरों की चिनाई पुरानी होने की वजह से चूना झड़ चुका था। नीचे की तरफ एक संकरा सा नाबदान था, जिससे कॉलेज के पुराने फव्वारे का पानी कभी बाहर निकाला जाता था। वह रास्ता इतना संकरा था कि कोई इंसान उसमें सिर्फ पेट के बल रेंगकर ही निकल सकता था।
"सिया, सुनो," आदित्य ने सिया के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा। उसकी उंगलियों पर धूल और खून लगा था। "सिंघानिया के आदमी इस तरफ आ रहे हैं। अगर वो यहां पहुंचे, तो पहले वो डायरी छीनेंगे और फिर सीधे गोली मारेंगे। वो कोई गवाह नहीं छोड़ना चाहते।"
"तो फिर?" सिया की बड़ी-बड़ी काली आंखों में एक भयानक चमक कौंधी। "क्या हम यहीं खड़े रहकर उनका इंतजार करेंगे?"
"नहीं। तुम इस नीचे के सुराख से निकलोगी," आदित्य ने नीचे की टूटी ईंटों की तरफ इशारा किया। "यह नाला बाहर कॉलेज के पुराने बॉटनिकल गार्डन के कुएं में खुलता है। मैंने पहले साल के सर्वे प्रोजेक्ट में इसका नक्शा देखा था। तुम निकल सकती हो।"
"और तुम?" सिया ने झटके से उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियां आदित्य की कलाई में गड़ गईं। "तुम मेरे बिना नहीं रह सकते आदित्य! मैं तुम्हें यहां अकेले उन भेड़ियों के सामने छोड़कर एक कदम भी आगे नहीं जाऊंगी!"
"सिया, बात को समझो!" आदित्य की आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें एक ऐसी तल्खी थी जो उसने पहले कभी इस्तेमाल नहीं की थी। "मेरी छाती का घाव और चौड़ा कंधा उस सुराख में अटक जाएगा। अगर मैं फंसा, तो हम दोनों यहीं मारे जाएंगे। इस डायरी को बाहर पहुंचना ही होगा। तुम्हारे पिता का सच, उन अस्सी मजदूरों की मौत का इंसाफ और इस कॉलेज के सैकड़ों मासूम छात्रों की जिंदगी इस डायरी पर टिकी है। और सबसे बड़ी बात... आर्थर रोड जेल में बंद उन दो मोहरों को पांच बजे से पहले बचाना है ताकि वो अदालत में सिंघानिया के खिलाफ गवाही दे सकें!"
सुरंग के मोड़ पर परछाइयां लंबी होने लगी थीं।
"वो यहीं हैं! मैंने कदमों की आवाज सुनी थी!" एक गार्ड की भारी, खुरदुरी आवाज गूंजी।
दूरी महज तीस मीटर रह गई थी।
सिया के गालों पर आंसुओं की दो गर्म लकीरें उतर आईं। उसने आदित्य की आंखों में देखा—उन आंखों में कोई डर नहीं था, सिर्फ एक बेपनाह, अटूट भरोसा था।
सिया ने डायरी को अपनी कुर्ती के अंदर कमरबंद में कसकर बांधा। उसने आगे बढ़कर एक पल के लिए आदित्य के माथे को अपने कांपते होंठों से छुआ। "अगर तुम्हें कुछ हुआ ना, आदित्य जोशी... तो मैं इस पूरी दुनिया को आग लगा दूंगी। जिंदा रहना... तुम्हें उस कट्टे पर वापस आना होगा।"
"जाओ!" आदित्य ने उसे नीचे धकेला।
सिया ने बिना वक्त गंवाए उस संकरे, कीचड़ से भरे सुराख में खुद को झोंक दिया। नुकीले पत्थरों ने उसकी कोहनियों और घुटनों को छील दिया, लेकिन उसने उफ तक नहीं की। वह अंधेरे नाबदान में रेंगती हुई आगे बढ़ गई।
आदित्य ने तेजी से आसपास देखा।
जमीन पर कुछ पुरानी ईंटें और एक भारी लोहे का पाइप पड़ा था। उसने वो ईंटें उठाकर उस सुराख के मुहाने पर इस तरह सजा दीं जैसे वहां सालों से मलबा गिरा पड़ा हो।
तभी टॉर्च की तेज रोशनी सीधे आदित्य की आंखों पर पड़ी।
"यहीं है साला!" गार्ड की दहाड़ गूंजी।
तीन हथियारबंद गार्ड्स राइफल्स ताने सामने खड़े थे। उनके पीछे इटैलियन सूट पहने शशांक सिंघानिया अपनी सोने की मूठ वाली छड़ी को पत्थरों पर पटकता हुआ आगे आया।
सिंघानिया की नजरें आदित्य के पीछे खाली पड़ी जाली पर गईं। उसके चेहरे की मुस्कान एक झटके में गायब हो गई।
"लड़की कहां है?" सिंघानिया की आवाज में एक डरावनी फुसफुसाहट थी।
आदित्य ने दीवार का सहारा लिया। उसके होंठों पर खून लगा था, लेकिन उसने मुस्कुराते हुए सीधे सिंघानिया की आंखों में देखा।
"लड़की वो सच लेकर वहां पहुंच चुकी है जहां तुम्हारी ये काली दौलत और ये बंदूकें कभी नहीं पहुंच पाएंगी, सिंघानिया।"
"बकवास मत कर!" एक गार्ड ने आगे बढ़कर अपनी राइफल की भारी बट आदित्य के पेट में पूरी ताकत से दे मारी।
'धप!'
आदित्य के मुंह से चीख निकली और वह घुटनों के बल गिर पड़ा। पेट में उठा दर्द उसकी छाती के पुराने जख्म से टकराया। सांसें एक पल के लिए रुक गईं।
"तलाशी लो इसकी!" सिंघानिया गुर्राया।
गार्ड्स ने बेरहमी से आदित्य की जेबें खंगालीं। लेकिन उन्हें कोई डायरी नहीं मिली। सिर्फ एक छोटा सा विंटेज कैमरे का लेंस कैप और एक पुराना सादा रूमाल निकला।
सिंघानिया का चेहरा गुस्से से नीला पड़ गया। उसने अपनी सोने की छड़ी से आदित्य की ठुड्डी को ऊपर उठाया। "तुम दोनों ने अपनी कब्र खुद खोदी है, लड़के। तुम्हें क्या लगता है, वो लड़की बाहर जाकर पुलिस के पास जाएगी और कोई उसकी बात सुनेगा? शहर का पुलिस कमिश्नर मेरे साथ गोल्फ खेलता है। गृह मंत्रालय की फाइलों पर मेरे इशारे पर दस्तखत होते हैं।"
सिंघानिया ने अपनी रोलेक्स घड़ी देखी।
"दोपहर के ठीक डेढ़ बज चुके हैं। साढ़े तीन घंटे बाद... ठीक पांच बजे, आर्थर रोड जेल के सेल नंबर सात में बंद तुम्हारे चाचा वी. के. जोशी और कबीर महाजन का खाना परोसा जाएगा। उस दाल में पोटेशियम सायनाइड की सिर्फ दो बूंदें होंगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहेगी— 'अचानक दिल का दौरा'। और ठीक पांच बजकर पंद्रह मिनट पर, जब इस बेसमेंट का आरडीएक्स फटेगा, तो पूरा कॉलेज एक श्मशान बन जाएगा। तुम यहीं बंधे रहोगे, अपनी आंखों से उस उल्टी गिनती को शून्य होते देखने के लिए।"
सिंघानिया मुड़ा। "इसे उस खंभे से बिजली की तारों से बांध दो। मुंह में कपड़ा ठूंस दो ताकि इसकी चीखें भी इस मलबे से बाहर न जा सकें।"
गार्ड्स ने आदित्य को उस भारी खंभे से कसकर बांध दिया। मोटे, कटीले तारों ने उसके जिस्म को जकड़ लिया। मुंह पर एक मोटा कपड़ा बांध दिया गया।
सिंघानिया और उसके आदमी उस भारी लोहे के कपाट को बाहर से बंद करके चले गए। भारी ताले के गिरने की आवाज के साथ सुरंग एक बार फिर गहरे, सर्द सन्नाटे में डूब गई।
सिर्फ एक आवाज बाकी थी।
खंभे के ठीक सामने, मलबे के बीच रखे उस इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर की लाल बत्ती—
'टिक... टिक... टिक... टिक...'
स्क्रीन पर समय घट रहा था: **०३:२२:१४... ०३:२२:१३...**
आदित्य ने अपनी आंखें बंद कीं। दर्द की लहरें उसके दिमाग को सुन्न कर रही थीं। लेकिन उस सन्नाटे में, जब मौत महज कुछ इंच की दूरी पर टिक-टिक कर रही थी, आदित्य की उंगलियों ने कुछ महसूस किया।
खंभे के पीछे, जहां उसके हाथ बंधे थे, वहां कोई पुरानी, सख्त धातु की चीज दीवार में धंसी हुई थी।
वह ब्रिटिश जमाने का एक पुराना, जंग लगा लोहे का हुक था!
आदित्य ने अपनी बंधी हुई कलाइयों को उस हुक की नुकीली कोर पर रगड़ना शुरू किया।
हर रगड़ के साथ लोहे का तार उसकी चमड़ी को काट रहा था। खून रिसकर उसकी उंगलियों को फिसलन भरा बना रहा था। दर्द इतना भयानक था कि आदित्य की आंखों के आगे तारे नाचने लगे, लेकिन उसने रगड़ना बंद नहीं किया। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही चेहरा घूम रहा था—सिया। उसकी वो कांपती हुई आवाज— *'जिंदा रहना... तुम्हें उस कट्टे पर वापस आना होगा।'*
बीस मिनट की खूनी जद्दोजहद के बाद, तार का एक मुख्य सिरा चरमराहट के साथ टूट गया।
आदित्य ने अपनी पूरी ताकत से झटका दिया। हाथ आजाद हो गए! उसने झटके से मुंह का कपड़ा खींचा और गहरी सांस ली।
वह लड़खड़ाते हुए उस टाइमर डिवाइस के सामने पहुंचा।
डिवाइस एक भारी स्टील के बक्से में बंद थी, जिस पर दर्जनों रंग-बिरंगी तारें जुड़ी थीं। कोई गलत तार काटने का मतलब था—उसी सेकंड मौत। लेकिन आदित्य ने बचपन में अपने चाचा के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स के कई सर्किट्स बनाए थे। उसने देखा कि इस पूरे सर्किट का कंट्रोल उस टाइमर से नहीं, बल्कि एक पुराने वायरलेस एंटीना से जुड़ा था, जो बाहर से सिग्नल रिसीव कर रहा था।
सिंघानिया के पास इसका रिमोट था!
"अगर सिग्नल ही जाम हो जाए..." आदित्य के दिमाग में एक बिजली कौंधी।
उसने अपनी जेब से वही विंटेज कैमरे का टूटा हुआ लेंस कैप निकाला। उसके भीतर एक बहुत बारीक, सोने की पॉलिश वाली कॉपर की क्वाइल लगी थी, जिसे उसने दोपहर में ट्रांसमीटर से अलग किया था।
आदित्य ने अपने कांपते हाथों से उस कॉपर क्वाइल को टाइमर के मुख्य ट्रांसमीटर चिप के दोनों सिरों के बीच फंसा दिया।
'चिर्र्र...'
एक हल्का सा नीला स्पार्क हुआ। टाइमर की स्क्रीन की लाल बत्तियां पागलों की तरह टिमटिमाने लगीं।
स्क्रीन पर जो समय तीन घंटे दिखा रहा था, वह अचानक फ्रीज हो गया— **एरर ४०४: सिग्नल लॉस्ट!**
टाइमर रुक गया था! कम से कम कुछ वक्त के लिए!
आदित्य ने एक पल भी नहीं गंवाया। वह उस नाबदान के सुराख की तरफ दौड़ा। उसने मलबे की ईंटों को हटाया और उस संकरे, कीचड़ से भरे पाइप में खुद को झोंक दिया। उसका जख्मी कंधा हर इंच पर पत्थरों से टकरा रहा था। घुटन इतनी थी कि फेफड़े फटने को आ रहे थे। कीचड़ और बदबूदार पानी उसके मुंह में जा रहा था, लेकिन वह पागलों की तरह आगे रेंगता रहा।
दस मिनट की अंधी मशक्कत के बाद, सामने एक हल्की सी रोशनी दिखी।
वह बाहर बॉटनिकल गार्डन के पुराने, सूखे कुएं का मुहाना था!
आदित्य ने लोहे की पुरानी सीढ़ियों को पकड़ा और कुएं से बाहर निकल आया।
दोपहर की तेज धूप उसकी आंखों में चुभी। उसने घड़ी देखी।
**दोपहर के ठीक तीन बज रहे थे!**
जेल में होने वाले उस खूनी खेल में अब सिर्फ दो घंटे बचे थे!
आदित्य लड़खड़ाता हुआ गार्डन के पिछले गेट से बाहर मुख्य सड़क पर आया। उसके कपड़े कीचड़ और खून से सने थे, राहगीर उसे किसी पागल की तरह देख रहे थे। उसने पास के एक पब्लिक बूथ से तेजी से एक नंबर डायल किया।
एसीपी कदम का पर्सनल नंबर!
"हेलो, एसीपी कदम स्पीकिंग।"
"एसीपी साहब... मैं आदित्य जोशी बोल रहा हूं!" आदित्य की आवाज हांफ रही थी।
फोन के उस पार से एसीपी की चौंकती हुई आवाज आई, "आदित्य?! तुम कहां हो? सिया कुलकर्णी पिछले एक घंटे से हमारे हेडक्वार्टर में बैठी है! उसने वो १९९४ की डायरी हमें सौंप दी है... पूरा डिपार्टमेंट हिल चुका है! शशांक सिंघानिया के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है!"
"वारंट से कुछ नहीं होगा सर!" आदित्य चिल्लाया। "सिंघानिया आर्थर रोड जेल पहुंच रहा है! तीन बजकर पचास मिनट पर वो जेलर के जरिए प्रोफेसर जोशी और कबीर को जहर देने वाला है! अगर वो दोनों मर गए, तो इस डायरी की कानूनी अहमियत आधी रह जाएगी! सिंघानिया सारे सबूतों को मिटा देगा!"
"क्या?!" एसीपी कदम की आवाज में खलबली मच गई। "आदित्य, तुम तुरंत हेडक्वार्टर आओ—"
"वक्त नहीं है सर! मैं सीधे आर्थर रोड जेल जा रहा हूं! आप अपनी स्वाट टीम लेकर वहां पहुंचिए!"
आदित्य ने फोन पटका। सामने एक डिलीवरी बॉय की पल्सर बाइक खड़ी थी, जिसकी चाबी इग्निशन में ही लगी थी। आदित्य ने बिना सोचे बाइक पर छलांग लगाई, किक मारी और पूरी रफ्तार से एक्सलेटर खींच दिया।
मुंबई की भरी दोपहर के ट्रैफिक को चीरती हुई वो बाइक हवा से बातें कर रही थी।
चार बजकर पैंतालीस मिनट।
आर्थर रोड जेल का हाई-सिक्योरिटी विंग।
चारों तरफ ऊंची, कंटीली तारें और संतरियों के कड़े पहरे। सेल नंबर सात के बाहर एक भारी खामोशी पसरी थी।
सलाखों के पीछे प्रोफेसर वी. के. जोशी और कबीर महाजन बैठे थे। कबीर के चेहरे पर डर साफ दिख रहा था, जबकि चाचाजी दीवार से टिके शून्य में घूर रहे थे।
तभी भारी जूतों की आवाज आई।
जेल का सीनियर वार्डन दो थालियों में खाना लेकर आया। थालियों में दाल, रोटी और चावल थे। लेकिन उस दाल की सतह पर एक अजीब सी, तेल जैसी नीली चमक तैर रही थी।
"खाना खा लो," वार्डन ने ठंडे स्वर में कहा और थालियां सलाखों के नीचे से अंदर सरका दीं।
कबीर भूख के मारे रोटी उठाने ही वाला था कि चाचाजी ने झटके से उसका हाथ पकड़ लिया।
"रुक जा, कबीर," चाचाजी की नजरें उस दाल पर टिकी थीं। उनकी अनुभवी आंखें उस नीली परत को पहचान चुकी थीं। "यह खाना नहीं है... यह मौत है।"
वार्डन के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। उसने अपनी कमर से पिस्टल निकाली और सीधे सलाखों के बीच से चाचाजी के सीने पर तान दी। "पहचान तो अच्छी है प्रोफेसर साहब। लेकिन अफसोस... यह खाना आपको खाना ही पड़ेगा। सिंघानिया सर को अपनी राह में कोई रोड़ा पसंद नहीं है। चुपचाप निगल लो, वरना गोली से मारूंगा और रिपोर्ट लिखूंगा कि कैदियों ने भागने की कोशिश की थी।"
कबीर की चीख निकल गई। "नहीं! प्लीज! मुझे माफ कर दो!"
वार्डन ने ट्रिगर पर उंगली रखी।
उसी सेकंड—
'धड़ाम!'
जेल के गलियारे का मुख्य भारी लोहे का दरवाजा किसी उल्कापिंड की तरह उड़ता हुआ अंदर गिरा।
एक काली पल्सर बाइक सीधे जेल के भीतरी गलियारे में फिसलती हुई आई और वार्डन के पैरों से जा टकराई!
वार्डन का संतुलन बिगड़ा और उसकी पिस्टल हाथ से छूटकर दूर जा गिरी।
धुएं और धूल के बीच से एक साया उठा। खून से लथपथ, आंखों में शोले लिए— **आदित्य!**
"आदित्य?!" चाचाजी की आंखें फटी की फटी रह गईं।
वार्डन ने जमीन से उठकर अपनी जेब से चाकू निकाला और आदित्य पर झपटा। लेकिन आदित्य ने झुककर वार्डन का हाथ मरोड़ा और पूरी ताकत से उसका सिर लोहे की सलाखों पर दे मारा।
वार्डन वहीं ढेर हो गया।
तभी जेल के सायरन पागलों की तरह बजने लगे—'पों-पों-पों-पों!'
पीछे से दर्जनों पुलिस कमांडोज और एसीपी कदम हथियार ताने अंदर दाखिल हुए। उनके साथ सिया भी थी।
सिया ने जब आदित्य को जिंदा, अपने पैरों पर खड़ा देखा, तो उसके मुंह से एक बेकाबू सिसकी निकली। वह सुरक्षा घेरा तोड़कर सीधे आदित्य की तरफ भागी और उसके सीने से लिपट गई। उसने आदित्य के जख्मों की परवाह किए बिना उसे अपनी बाहों में कस लिया, मानो अगर उसने छोड़ा तो वो फिर से गायब हो जाएगा।
"तुम आ गए..." सिया रो पड़ी। "तुम वापस आ गए।"
आदित्य ने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ रखा। "मैंने कहा था ना सिया... मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता।"
सलाखों के पीछे खड़े प्रोफेसर जोशी घुटनों के बल गिर पड़े। उनकी आंखों से पश्चात्ताप के आंसू बह रहे थे। जिस भतीजे को उन्होंने मारने की साजिश रची थी, उसी ने आज उनकी जान बचाई थी।
"आदित्य..." चाचाजी ने कांपती आवाज में पुकारा।
आदित्य ने मुड़कर अपने चाचा को देखा। उसकी आंखों में अब न कोई नफरत थी, न कोई ममता। सिर्फ एक गहरा, सर्द फैसला था।
"मैंने आपकी जान इसलिए नहीं बचाई क्योंकि आप मेरे चाचा हैं, प्रोफेसर जोशी," आदित्य की आवाज उस पूरी जेल में गूंज उठी। "मैंने आपकी जान इसलिए बचाई ताकि आप अदालत के कठघरे में खड़े होकर उन अस्सी बेकसूरों की मौत का हिसाब दे सकें। ताकि दुनिया देख सके कि झूठी शान के पीछे कितना घिनौना चेहरा छिपा था।"
तभी एसीपी कदम का वॉकी-टॉकी खड़खड़ाया:
*"सर! बड़ी कामयाबी! शशांक सिंघानिया को मुंबई एयरपोर्ट से प्राइवेट जेट में भागने की कोशिश करते हुए गिरफ्तार कर लिया गया है! बेसमेंट का बम स्क्वॉड ने आरडीएक्स पूरी तरह डिफ्यूज कर दिया है! कॉलेज पूरी तरह सुरक्षित है!"*
पूरे गलियारे में एक सुकून भरी खामोशी छा गई।
तीस साल पुराना वो खूनी चक्रव्यूह हमेशा के लिए टूट चुका था।
**एक हफ्ते बाद...**
शाम के ठीक पांच बज रहे थे। सेंट जेवियर्स कॉलेज का वही ऐतिहासिक परिसर।
छात्रों की चहल-पहल, हवा में गूंजती हंसी और पत्तों की वही पुरानी सरसराहट। बरगद के उस मशहूर 'कॉलेज कट्टे' पर कोई खौफ नहीं था। कोई साजिश नहीं थी।
कट्टे की पत्थर की बेंच पर आदित्य बैठा था। उसके हाथ में वही विंटेज कैमरा था।
सिया उसके ठीक सामने खड़ी थी। उसने हल्के पीले रंग का सादा कुर्ता पहन रखा था, हवा उसके घुंघराले बालों से खेल रही थी और उसके चेहरे पर एक ऐसा नूर था जो सिर्फ आजादी और सुकून से आता है।
सिया ने अपनी बैग से वही भूरे रंग की लेदर डायरी निकाली।
उसने डायरी के पहले पन्ने को पलटा। उस पर अब कोई ताला नहीं था।
"तो मिस्टर आदित्य जोशी," सिया ने अपनी सुरीली, नटखट आवाज में कहा, "आज से सौ एपिसोड की इस कहानी का यह पहला पड़ाव खत्म हुआ। अब आगे क्या?"
आदित्य ने कैमरा उठाया। उसने लेंस को सिया के चेहरे पर फोकस किया। उसकी भूरी आंखों में डूबती शाम की सुनहरी किरणें तैर रही थीं।
"आगे?" आदित्य मुस्कुराया। "आगे यह कि अब इस डायरी के हर खाली पन्ने पर सिर्फ हमारी कहानी लिखी जाएगी। बिना किसी डर के, बिना किसी राज के।"
'क्लिक!'
कैमरे के शटर ने उस पल को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
सिया खिलखिलाकर हंसी और आकर कट्टे पर आदित्य के कंधे से अपना सिर टिका दिया। मुंबई की ठंडी शाम की हवा ने दोनों को अपने आगोश में ले लिया। कॉलेज का वो कट्टा... और वो दोनों, अब हमेशा के लिए एक हो चुके थे।