धड़कने दिल की - 4 Shravan Gore द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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धड़कने दिल की - 4

लाइब्रेरी के भारी शीशम के दरवाजों पर लोहे की सांकल गिरने की गूंज सन्नाटे में दूर तक तैर गई। बूढ़े लाइब्रेरियन की चाबियों का गुच्छा खनखनाया, और फिर सब कुछ एकदम शांत हो गया। गहरा, जानलेवा सन्नाटा।
धूल भरी खिड़कियों से छनकर आती नारंगी धूप अब धीरे-धीरे सुरमई नीले अंधेरे में बदल रही थी। आर्काइव सेक्शन के उस संकरे कोने में, जहां कबीर कुछ पल पहले एक भूखे भेड़िए की तरह सूंघता हुआ खड़ा था, अब सिर्फ दो लोगों की भारी सांसों की हलचल बची थी।
सिया ने जमीन पर बैठे-बैठे ही दोनों हाथों से अपना चेहरा ढांप रखा था। उसकी चूड़ियों की हल्की सी खनक उस खामोशी को और भी भयानक बना रही थी। उसका पूरा वजूद कांप रहा था। वह लड़की, जिसकी आंखों में सुबह एक अलग ही गुरूर था, अब एक ऐसे भंवर में फंसी थी जहां हर लहर उसे निगलने को तैयार दिख रही थी।
"सिया..." आदित्य ने बहुत धीरे से पुकारा। उसकी आवाज में कोई हड़बड़ाहट नहीं थी, बस एक ऐसा ठहराव था जो किसी डूबते हुए को तिनके का सहारा दे सके। "वो जा चुका है। उठो, हमें यहां से निकलना होगा। अगर किसी ने हमें यहां बंद देख लिया, तो बात संभलने के बजाय और बिगड़ जाएगी।"
सिया ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। उसकी पलकें भीगी हुई थीं और गालों पर काजल की हल्की लकीरें फैल गई थीं। उसने अपनी कांपती उंगलियों से उस लेदर की डायरी को छुआ, जो अब भी आदित्य के हाथों में थी।
"तुम... तुम नहीं जानते आदित्य," सिया की आवाज इतनी धीमी थी कि आदित्य को सुनने के लिए उसके करीब झुकना पड़ा। "कबीर सिर्फ एक बिगड़ा हुआ रईसजादा नहीं है। उसके पीछे वो ताकतें हैं जो रातों-रात इंसानों को गायब करवा देती हैं। मेरे पापा... वो शहर के पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट में चीफ ऑडिटर थे। छह महीने पहले उन्होंने कबीर के पिता की कंस्ट्रक्शन कंपनी के एक ऐसे टेंडर को खारिज कर दिया था, जिसमें करोड़ों का घोटाला था। वो पुल, जो पिछले साल शहर के बाहरी हिस्से में गिरा था... उसके असली दस्तावेज पापा के पास थे।"
आदित्य की आंखें सिकुड़ गईं। वह खबर उसने अखबारों में पढ़ी थी। उस हादसे में दर्जनों मासूम मजदूर मलबे में दबकर मर गए थे, और केस को 'प्राकृतिक आपदा' कहकर दबा दिया गया था।
"तो इस डायरी में..." आदित्य ने डायरी के सख्त किनारों को देखा।
"इसमें सिर्फ हिसाब नहीं है," सिया ने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा, उसकी आंखों में अब एक सर्द खौफ था। "पापा जानते थे कि उन पर कभी भी हमला हो सकता है। दो महीने पहले उनका एक रहस्यमयी कार एक्सीडेंट हुआ... वो आज भी कोमा में हैं, अस्पताल के आईसीयू में जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। पुलिस ने उसे 'हिट एंड रन' बताकर फाइल बंद कर दी। लेकिन होश खोने से ठीक एक रात पहले, पापा ने यह डायरी मुझे दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें कुछ हो जाए, तो इसे किसी ऐसे शख्स तक पहुंचाना जो बिक न सके। कबीर महीनों से मुझे सिर्फ इसलिए स्टॉक कर रहा है ताकि वो डायरी छीनकर उन सबूतों को जला सके।"
आदित्य के जिस्म में सिहरन दौड़ गई। सुबह जिस डायरी को वह कॉलेज के किसी आशिक मिजाज दिल की दास्तान समझ रहा था, वह दरअसल खून से सनी एक ऐसी फाइल थी जिसने एक पूरे परिवार को उजाड़ दिया था।
"और रोहन?" आदित्य को अचानक याद आया। "कबीर फोन पर कह रहा था कि रोहन ने उसे तुम्हारी डायरी के बारे में बताया। क्या रोहन...?"
सिया के चेहरे पर एक गहरा, कड़वा दर्द उभर आया। "रोहन मेरा बचपन का दोस्त है। कम से कम सुबह तक मैं यही समझती थी। मुझे नहीं पता था कि उसने भी खुद को कबीर की दौलत के आगे बेच दिया है। मैंने रोते हुए सिर्फ उसे बताया था कि मेरी डायरी खो गई है... और उसने जाकर सीधे कबीर को खबर कर दी।"
"मतलब इस कैंपस में तुम्हारे आसपास कोई भी सुरक्षित नहीं है," आदित्य ने संजीदगी से कहा। उसने एक पल सोचा, फिर अपनी जैकेट की भीतरी जेब से अपना फोन निकाला। स्क्रीन पर कोई नेटवर्क नहीं था। लाइब्रेरी की गॉथिक दीवारें इतनी मोटी थीं कि सिग्नल अंदर तक नहीं पहुंच पा रहे थे।
"पहले बाहर चलो," आदित्य ने सिया का हाथ पकड़कर उसे उठाया। इस बार सिया ने हाथ नहीं छुड़ाया। डर ने दोनों के बीच के सारे फासलों को एक ही झटके में मिटा दिया था।
दोनों दबे पांव आर्काइव सेक्शन से बाहर निकले। लाइब्रेरी का मुख्य हॉल अब पूरी तरह अंधेरे में डूब चुका था। कतारों में रखी हजारों किताबें किसी विशाल कब्रिस्तान के पत्थरों जैसी लग रही थीं। मुख्य द्वार पर बाहर से भारी ताला लटका हुआ था।
"अब क्या करेंगे?" सिया ने घबराकर पूछा। "खिड़कियां सब लोहे की जालियों से बंद हैं।"
"एक रास्ता है," आदित्य ने लाइब्रेरी के पश्चिमी कोने की तरफ इशारा किया। "वहां पुरानी मेंटेनेंस गैलरी है। पिछले साल जब फोटोग्राफी एग्जिबिशन की तैयारी चल रही थी, तब मैंने देखा था कि वहां की एक छोटी खिड़की का कुंडा टूटा हुआ है। वो खिड़की सीधे कॉलेज के पीछे वाले संकरे बगीचे में खुलती है।"
दोनों उस अंधेरे गलियारे की तरफ बढ़े। हर कदम के साथ फर्श पर बिछी पुरानी लकड़ी से हल्की सी आवाज आ रही थी, जो इस सन्नाटे में दिल दहला देने वाली लग रही थी।
तभी—
'चर्र्र...'
अंधेरे हॉल में किसी चीज के घिसटने की आवाज आई।
आदित्य ने फौरन सिया को अपने पीछे खींचा। दोनों एक विशाल बुकशेल्फ की आड़ में छिप गए। आदित्य ने अपनी सांसें रोक लीं। उसकी नजरें लाइब्रेरी के उस हिस्से पर टिकी थीं जहां काउंटर था।
हल्की सी चांदनी में एक परछाईं हिलती हुई दिखी।
कोई अंदर था।
लाइब्रेरियन तो बाहर से ताला लगाकर जा चुका था, तो फिर यह कौन था?
परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। उसके हाथ में एक टॉर्च थी, जिसकी पीली रोशनी किताबों की कतारों पर नाच रही थी। रोशनी का दायरा धीरे-धीरे उसी गलियारे की तरफ बढ़ रहा था जहां आदित्य और सिया खड़े थे।
सिया ने डर के मारे आदित्य की बांह को अपने नाखूनों से कसकर पकड़ लिया। आदित्य ने अपनी नजरें उस शख्स के चेहरे पर टिकाईं।
जैसे ही टॉर्च की रोशनी एक शीशे की अलमारी पर पड़ी, उसका अक्स सामने आया। वह कबीर नहीं था। वह कबीर का खास गुर्गा—विक्रांत था, जो कॉलेज में हमेशा उसके साथ रहता था। उसके हाथ में एक लोहे की रॉड थी। वह लाइब्रेरी से बाहर गया ही नहीं था; वह यहीं कहीं अंधेरे में छिपा बैठा था, इस इंतजार में कि सिया शायद अपनी डायरी ढूंढने अंदर आए।
"सिया बेबी..." विक्रांत की फुसफुसाती हुई, जहरीली आवाज सन्नाटे में गूंजी। "मुझे पता है तुम यहीं कहीं हो। कबीर भाई को तुम्हारी वो डायरी चाहिए। चुपचाप दे दो, वरना इस अंधेरे में अगर तुम्हें कोई चोट लग गई, तो कोई बचाने भी नहीं आएगा।"
विक्रांत के जूते एक-एक करके आगे बढ़ रहे थे। वह ठीक उसी शेल्फ की तरफ आ रहा था जिसके पीछे वे दोनों छिपे थे। दूरी महज दस कदम की रह गई थी।
आदित्य ने तेजी से अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए। अगर विक्रांत उस कोने तक पहुंच गया, तो दोनों रंगे हाथों पकड़े जाएंगे। और उस संकरी जगह में लोहे की रॉड से लैस विक्रांत का मुकाबला करना नामुमकिन था।
आदित्य की नजर नीचे पड़ी। फर्श पर किसी भारी किताब का टूटा हुआ लकड़ी का बुक-एंड पड़ा था।
उसने सिया की आंखों में देखा और बहुत धीरे से फुसफुसाया, "जैसे ही मैं इशारा करूं, बाईं तरफ की सीढ़ियों से गैलरी की तरफ भागना। पीछे मुड़कर मत देखना।"
"लेकिन तुम—"
"जो कहा वो करो!" आदित्य की आवाज में एक ऐसा आदेश था जिसे सिया टाल नहीं सकी।
आदित्य ने पूरी ताकत से उस लकड़ी के टुकड़े को लाइब्रेरी के दूसरे छोर—यानी मुख्य दरवाजे की तरफ फेंक दिया।
'खट-धड़ाम!'
आवाज इतनी तेज थी कि सन्नाटे में गोली चलने जैसा भ्रम हुआ।
"कौन है वहां?!" विक्रांत चिल्लाया और तेजी से मुख्य दरवाजे की तरफ भागा।
"अब!" आदित्य ने सिया का हाथ खींचा।
दोनों बिजली की तेजी से मेंटेनेंस गैलरी की तरफ भागे। अंधेरे में सीढ़ियां चढ़ते हुए सिया की सांसें फूल रही थीं। ऊपर पहुंचकर आदित्य ने उस पुरानी लकड़ी की खिड़की को धक्का दिया। जैसा उसने सोचा था, खिड़की का पुराना कब्जा चरमराते हुए खुल गया। बाहर ठंडी, ताजी हवा का एक झोंका उनके चेहरों से टकराया। खिड़की के ठीक नीचे एक पुराना छज्जा था और उसके नीचे कॉलेज के पिछले हिस्से का बगीचा, जहां अमूमन कोई नहीं आता था।
"पहले तुम निकलो," आदित्य ने खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ते हुए कहा।
सिया ने बिना वक्त गंवाए खिड़की से छज्जे पर कदम रखा और फिर सावधानी से नीचे बगीचे की नरम घास पर कूद गई।
तभी नीचे से विक्रांत की दहाड़ सुनाई दी। "अरे सालो! तुम लोग ऊपर हो?!"
विक्रांत ने सीढ़ियों पर दौड़ना शुरू कर दिया था। उसके जूतों की भारी थाप तेजी से ऊपर आ रही थी।
आदित्य ने खिड़की से बाहर छलांग लगाई। उसका पैर छज्जे से फिसलते हुए सीधे नीचे जमीन पर पड़ा। गिरने के झटके से उसके घुटने में तेज दर्द उठा, लेकिन उसने दर्द को नजरअंदाज किया।
"भागो!" आदित्य ने सिया का हाथ पकड़ा।
दोनों कॉलेज के पिछले जंगले की टूटी हुई तार की जाली से निकलकर बाहर की मुख्य सड़क पर आ गए। पीछे कॉलेज की इमारतों में जलती बत्तियां अब बहुत दूर छूट चुकी थीं। रात के आठ बज रहे थे और सड़क पर गाड़ियों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी।
एक खाली ऑटो रिक्शा को आते देख आदित्य ने हाथ दिया। दोनों बदहवास हालत में ऑटो के पीछे की सीट पर जा गिरे।
"बांद्रा स्टेशन, जल्दी चलो!" आदित्य ने ड्राइवर से कहा।
ऑटो तेजी से सड़क पर दौड़ पड़ा।
सिया सीट के कोने में सिमटी हुई थी। उसका शरीर अब भी हल्के-हल्के कांप रहा था, लेकिन उसकी आंखों में उस खौफ के बीच आदित्य के लिए एक गहरा, अनकहा विस्मय था। कॉलेज का वो लड़का, जिसे सुबह उसने 'अकड़ू' और 'लापरवाह' कहा था, उसने अपनी जान जोखिम में डालकर उसे एक ऐसे जाल से निकाला था जहां से बचना नामुमकिन लग रहा था।
"तुम्हारे पैर से खून बह रहा है," सिया ने अचानक आदित्य के घुटने की तरफ देखते हुए कहा। उसकी आवाज में बेइंतहा फिक्र थी।
आदित्य ने नीचे देखा। खिड़की से कूदते वक्त उसकी जींस फट गई थी और घुटने से खून रिसकर कुर्ते के निचले हिस्से को लाल कर रहा था।
"मामूली खरोंच है," आदित्य ने गहरी सांस लेते हुए कहा। उसने अपनी बैग की चेन खोली और वह लेदर की डायरी बाहर निकाली। "अहम यह है कि यह अभी भी हमारे पास है।"
सिया ने उस डायरी को अपने कांपते हाथों में लिया। लेकिन इस बार उसने उसे छुपाने की कोशिश नहीं की। उसने अपनी उंगलियों से उस छोटे से पीतल के ताले को छुआ।
"आदित्य..." सिया ने नम आंखों से उसकी तरफ देखा। "तुमने मेरी जान बचाई है। तुमने उस डायरी के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी जिसके बारे में तुम कुछ नहीं जानते थे। अब वक्त आ गया है कि तुम पूरा सच जानो।"
सिया ने अपनी कलाई से वो नन्हीं चाबी निकाली, जिसे उसने अपनी घड़ी के पट्टे के अंदर छिपा लिया था। उसने ताले में चाबी घुमाई।
'क्लिक।'
उसने डायरी खोली। लेकिन पहले कुछ पन्नों को छोड़कर, वह सीधे डायरी के सबसे आखिरी पन्ने पर गई। वह पन्ना बाकी पन्नों से अलग था—उसे बहुत सावधानी से गोंद से चिपकाया गया था, जैसे कोई गुप्त लिफाफा हो। सिया ने अपने नाखून से उस पन्ने की सील को धीरे से उधेड़ा।
अंदर से एक मुड़ा हुआ, पीला पड़ चुका बटर पेपर बाहर निकला।
उस पर हाथ से बना हुआ एक नक्शा था। किसी अंडरग्राउंड बेसमेंट का नक्शा। और उस नक्शे के सबसे नीचे लाल स्याही से एक ऐसी तारीख लिखी थी, जो आने वाले कल की थी— **"६ सितंबर, रात ११:०० बजे - वेयरहाउस नंबर १२, माहिम क्रीक।"**
और उस तारीख के ठीक नीचे एक नाम लिखा था। वो नाम पढ़कर आदित्य का खून जम गया।
वह नाम किसी अंडरवर्ल्ड डॉन का नहीं था।
वह नाम था— **'प्रोफेसर वी. के. जोशी — डीन ऑफ इंजीनियरिंग, सेंट जेवियर्स कॉलेज।'**
आदित्य की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसके होंठ कांपने लगे। वह नक्शा और वो नाम... उसके सामने घूम रहा था।
"यह... यह क्या है सिया?" आदित्य की आवाज लड़खड़ा गई।
सिया ने भारी मन से आदित्य की तरफ देखा, उसकी आंखों में बेबसी का समंदर था। "यह उस जगह का नक्शा है जहां उस पुल हादसे की असली फाइलों की मूल प्रतियां छिपाई गई हैं। और प्रोफेसर जोशी... वही वो इंसान हैं जिन्होंने कबीर के पिता के साथ मिलकर मेरे पापा के खिलाफ झूठे सबूत गढ़े थे। कबीर कल रात इस जगह से वो फाइलें हमेशा के लिए जलाने वाला है।"
आदित्य का सिर चकरा गया।
प्रोफेसर वी. के. जोशी... कॉलेज के सबसे सम्मानित डीन... और आदित्य के सगे बड़े चाचा थे।
ऑटो बांद्रा की तेज रोशनी वाली सड़क पर दौड़ रहा था, लेकिन आदित्य के भीतर एक ऐसा भयानक, काला अंधेरा छा गया था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जिस लड़ाई को वह अब तक सिया की समझ रहा था, उसकी जड़ें सीधे उसके अपने घर के आंगन से जुड़ी थीं।
क्या आदित्य अपने ही परिवार के खिलाफ जाकर सिया का साथ देगा? और कल रात ग्यारह बजे उस सुनसान वेयरहाउस में कौन सा खूनी खेल खेला जाने वाला था?
कहानी कैसी लगी? कमेंट में जरूर बताना।
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