धड़कने दिल की - 3 Shravan Gore द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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धड़कने दिल की - 3

लाइब्रेरी के सबसे अंधेरे कोने में हवा जैसे बर्फ बन चुकी थी। आर्काइव सेक्शन की ऊंची, महोगनी की पुरानी अलमारियों के बीच सिर्फ दो इंसानों की तेज चलती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी।
आदित्य की उंगलियां खुली हुई डायरी के पन्नों पर ही जम चुकी थीं। ताला टेबल पर एक तरफ खुला पड़ा था और नन्हीं पीतल की चाबी धूप की एक पतली सी लकीर में चमक रही थी।
"तुम... तुम मेरी डायरी के साथ क्या कर रहे हो?!"
सिया के लफ्ज लाइब्रेरी की खामोशी को चीरते हुए निकले। उसकी आवाज में सिर्फ गुस्सा नहीं था; उसमें एक ऐसा भयानक खौफ था, जो इंसान की रूह को अंदर से कंपा दे। उसका रंग एकदम फक पड़ चुका था। वह आगे बढ़ी, उसके कदमों में लड़खड़ाहट थी, लेकिन आंखों में सीधे आदित्य को चीर देने वाली नफरत तैर रही थी।
"सिया, सुनो... जैसा तुम सोच रही हो वैसा बिल्कुल नहीं है," आदित्य ने फौरन अपने दोनों हाथ हवा में उठाए। वह अपनी सफाई में कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके हाथ से छूटकर डायरी का वो पन्ना फड़फड़ाया, जिस पर लिखी पहली पंक्ति आदित्य के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थी— *'मेरे पिता एक मुजरिम हैं...'*
सिया की नजर सीधे उस खुले हुए पन्ने पर गई। एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसका दम घुट जाएगा। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने झपटकर टेबल से डायरी को अपनी छाती से ऐसे चिपका लिया, मानो वो कोई डायरी नहीं बल्कि उसका अपना वजूद हो।
"तुमने इसे पढ़ा..." सिया की आवाज अब बहुत धीमी, एक डरावनी फुसफुसाहट में बदल चुकी थी। उसके होंठ थरथरा रहे थे। "तुमने इसे खोलकर पढ़ा, है ना? बोलो!"
"मैंने सिर्फ एक लाइन देखी, सिया! मुझे नहीं पता था कि—"
"झूठ मत बोलो!" सिया की दबी हुई चीख अलमारियों से टकराई। उसकी आंखों से आंसुओं की दो मोटी बूंदें टूटकर गालों पर बह निकलीं। "तुम जैसे लड़कों को मैं बहुत अच्छे से जानती हूं। पहले कॉलेज के कट्टे पर जानबूझकर मुझसे टकराए, मेरा ध्यान भटकाया, मेरी डायरी चुराई और फिर मुझे यहां अकेले बुलाकर... क्या चाहते हो तुम? पैसे चाहिए? या मुझे पूरे कॉलेज के सामने ब्लैकमेल करना चाहते हो?"
आदित्य के चेहरे पर हैरानी और ठेस के गहरे बादल छा गए। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी की मदद करने का यह सिला मिलेगा। उसका आत्मसम्मान जाग उठा। उसकी भूरी आंखें, जो हमेशा शांत रहती थीं, अब सख्त हो गईं।
"अपनी जुबान संभालकर बात करो, सिया कुलकर्णी," आदित्य का लहजा धीमा था, लेकिन उसमें एक ऐसा भारीपन था जिसने सिया के बहते आंसुओं को एक पल के लिए थाम दिया। "अगर मुझे तुम्हारी डायरी चुरानी होती, तो दोपहर में जब तुम नोटिस बोर्ड के सामने रो रही थीं, मैं वहीं खड़े होकर इसका तमाशा बना सकता था। अगर मुझे ब्लैकमेल करना होता, तो मैं तुम्हें यहां अकेले बुलाने की जहमत नहीं उठाता। यह डायरी मुझे कट्टे पर पत्थरों के बीच गिरी मिली थी।"
"तो फिर तुमने इसका ताला क्यों खोला?" सिया ने कांपते हाथों से डायरी को और जोर से दबाया। "तुम्हें हक किसने दिया किसी की जिंदगी में झांकने का?"
"क्योंकि तुम्हारी उस चाबी का सिरा बाहर लटक रहा था!" आदित्य ने टेबल पर रखी नन्हीं चाबी की तरफ इशारा किया। "और मुझे लगा... मुझे लगा शायद इसमें कुछ ऐसा है जो तुम्हें इतनी बुरी तरह तोड़ रहा है। मैं गलत था। मुझे तुम्हारी इस मनहूस डायरी को वहीं कचरे में छोड़ देना चाहिए था।"
आदित्य ने नफरत से अपना बैग उठाया और मुड़कर जाने लगा। उसका एक-एक कदम भारी था। वह उस घुटन भरे कोने से बाहर निकलना चाहता था।
लेकिन जैसे ही वह दो कदम आगे बढ़ा, पीछे से कपड़ों की सरसराहट और एक भारी आवाज आई।
आदित्य ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा।
सिया फर्श पर घुटनों के बल बैठ चुकी थी। उसका सिर अलमारी की लकड़ी से टिका था और उसका पूरा शरीर हिचकियों से कांप रहा था। वह लड़की, जो सुबह कॉलेज के कट्टे पर एक तीखे तूफान की तरह आई थी, जो कुछ देर पहले आदित्य पर चिल्ला रही थी, अब एक टूटे हुए कांच की तरह बिखर चुकी थी। उसके हाथ से डायरी छूटकर फर्श पर गिर गई थी।
"मैं बर्बाद हो जाऊंगी..." सिया अपने आंसुओं में घुटते हुए बुदबुदा रही थी। "अगर किसी को पता चला... तो वो लोग मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।"
आदित्य के कदम अपनी जगह पर जम गए। वह चाहकर भी आगे नहीं बढ़ सका। उस लड़की की बेबसी में कोई बनावट नहीं थी। यह कोई कॉलेज का मामूली ड्रामा या रूठना-मनाना नहीं था; यह मौत और जिंदगी के बीच फंसा कोई गहरा, डरावना दलदल था।
आदित्य धीरे-धीरे वापस लौटा। वह सिया के सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसने बहुत ही नर्मी से फर्श पर गिरी डायरी उठाई, उसे बंद किया, ताला लगाया और चाबी सिया की कांपती हुई हथेली में रख दी।
"सिया..." आदित्य की आवाज में अब गुस्सा नहीं, सिर्फ एक अनजानी हमदर्दी थी। "मैंने सच में कुछ नहीं पढ़ा। सिर्फ पहली लाइन पर नजर पड़ी थी। और खुदा की कसम, मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पिता कौन हैं या तुम्हारा अतीत क्या है। लेकिन एक बात मैं जानता हूं... जो इंसान सच में मुजरिम होता है, उसकी आंखों में ऐसा खौफ नहीं होता।"
सिया ने धीरे से अपनी भीगी पलकें उठाईं। उसने पहली बार आदित्य की आंखों में सीधे देखा। वहां कोई लालच नहीं था, कोई चालाकी नहीं थी, कोई हवस या ब्लैकमेलिंग का साया नहीं था। वहां सिर्फ एक सच्चा, साफ और ठहरा हुआ इंसान था।
"तुम... तुम सच कह रहे हो?" सिया की आवाज बहुत कमजोर थी।
"हां," आदित्य ने संजीदगी से सिर हिलाया। "तुम्हारा राज तुम्हारे पास सुरक्षित है। कॉलेज में किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी कि यह डायरी मेरे पास थी।"
सिया ने राहत की एक बहुत लंबी सांस ली, मानो उसके सीने पर रखा कई मनों का बोझ एक पल के लिए हट गया हो। उसने अपनी हथेली में बंद चाबी को कसकर भींच लिया। उसने अपनी कुर्ती के पल्लू से आंसू पोंछे और खड़े होने की कोशिश की। आदित्य ने सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन सिया ने खुद को संभालते हुए सिर हिला दिया।
"थैंक यू... और सॉरी," सिया ने नजरें झुकाकर कहा। "मुझे तुम पर चिल्लाना नहीं चाहिए था। पर मेरे हालात ऐसे हैं कि मैं अपने साए पर भी भरोसा नहीं कर सकती।"
"कोई बात नहीं," आदित्य ने एक हल्की सी राहत भरी मुस्कान दी। "अब तुम यह डायरी अपने बैग के सबसे अंदर रखो और आराम से—"
तभी...
'खट!'
लाइब्रेरी के सन्नाटे में एक भारी, चमड़े के जूतों की आहट गूंजी।
यह कोई आम छात्र के चलने की आवाज नहीं थी। कदमों की रफ्तार धीमी, नपी-तुली और बेहद भारी थी। वो कदम सीधे इसी आर्काइव सेक्शन की तरफ बढ़ रहे थे।
आदित्य और सिया दोनों एक साथ चौंक पड़े।
लाइब्रेरी का यह हिस्सा नियमों के मुताबिक चार बजे बंद हो जाता था। यहां इस वक्त किसी का आना नामुमकिन था।
"कोई आ रहा है..." सिया का चेहरा एक बार फिर सफेद पड़ गया। उसका निचला होंठ डर से कांपने लगा।
आदित्य ने तेजी से चारों तरफ देखा। आर्काइव सेक्शन सिर्फ एक तरफ से खुला था, बाकी तीन तरफ विशाल अलमारियां थीं। बाहर निकलने का सिर्फ वही एक रास्ता था जिधर से वो जूते आगे बढ़ रहे थे।
'टैप... टैप... टैप...'
कदमों की आवाज अब अलमारी के ठीक दूसरी तरफ पहुंच चुकी थी।
आदित्य ने बिना एक पल गंवाए सिया का हाथ पकड़ा। सिया ने झटके से पीछे हटना चाहा, लेकिन आदित्य ने अपनी उंगली अपने होंठों पर रखकर उसे बिल्कुल चुप रहने का इशारा किया। आदित्य ने उसे खींचा और दो विशाल, धूल भरी बुकशेल्व्स के बीच के उस संकरे अंधेरे कोने में धकेल दिया, जहां पुरानी जिल्दसाजी की फाइलें रखी थीं। वह खुद भी उसके ठीक आगे खड़ा हो गया ताकि बाहर से देखने वाले को सिर्फ पुरानी फाइलों का ढेर दिखे।
जगह इतनी कम थी कि दोनों के जिस्म एक-दूसरे से लगभग सटे हुए थे। सिया की तेज चलती, गर्म सांसें आदित्य के सीने पर महसूस हो रही थीं। सिया का दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि आदित्य को लगा कि शायद बाहर खड़ा शख्स यह आवाज सुन लेगा। आदित्य ने सिया के कंधे पर अपना हाथ रखा, उसे शांत रहने की तसल्ली देते हुए। सिया ने डर के मारे अनजाने में ही आदित्य के कुर्ते को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया।
अलमारी के मोड़ पर एक लंबा, भारी साया उभरा।
धूप की आखिरी किरण उस चेहरे पर पड़ी। वह कॉलेज का कोई चपरासी या लाइब्रेरियन नहीं था।
वह कबीर था।
कॉलेज का सबसे रईस, घमंडी और खतरनाक सीनियर। वही कबीर, जिसके पिता शहर के बड़े बिल्डर थे और जिसकी कॉलेज में अपनी एक अलग ही दहशत थी। लेकिन इस वक्त कबीर के चेहरे पर वो हमेशा रहने वाली अय्याश मुस्कान नहीं थी। उसके चेहरे पर एक खतरनाक, शिकारी जैसी बेचैनी थी।
कबीर के हाथ में उसका महंगा आईफोन था। वह फोन कान से लगाए धीरे-धीरे टहल रहा था।
"हां डैड, मैं लाइब्रेरी में ही हूं," कबीर की भारी, घमंडी आवाज शेल्फ के ठीक पीछे गूंजी। वह उन दोनों से महज चार फीट की दूरी पर खड़ा था। "लड़की अभी तक नहीं मिली। पर रोहन कह रहा था कि वो अपनी कोई पुरानी डायरी ढूंढते हुए पागलों की तरह रो रही थी... हां, वही डायरी जिसमें उसके बाप के पुराने पेपर्स का हिसाब है।"
यह सुनते ही शेल्फ के पीछे खड़ी सिया का जिस्म बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। उसके मुंह से एक हल्की सी चीख निकलने ही वाली थी कि आदित्य ने बिजली की तेजी से अपना हाथ सिया के होंठों पर रख दिया।
सिया की आंखें खौफ से फैल गईं। उसकी पलकों से आंसुओं की गर्म बूंदें आदित्य की हथेली पर टपक पड़ीं।
अलमारी के उस पार कबीर रुका। उसने अपनी जेब से एक सिगरेट का लाइटर निकाला और उसे 'क्लिक-क्लिक' करके जलाने-बुझाने लगा।
"चिंता मत करो डैड," कबीर फोन पर क्रूरता से हंसा। "अगर वो डायरी मेरे हाथ लग गई, तो उसका बाप अपनी बची हुई जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे ही काटेगा... और वो घमंडी लड़की? वो खुद घुटनों पर चलकर मेरे पास आएगी। मैं पूरा कॉलेज छान मारूंगा, वो डायरी जाएगी कहां?"
कबीर ने कॉल काटा। उसने एक नजर खाली पड़े आर्काइव टेबल की तरफ दौड़ाई।
टेबल खाली थी, लेकिन तभी कबीर की नजर फर्श पर पड़ी।
फर्श की धूल पर किसी के हाल ही में चले जूतों के ताजा निशान बने हुए थे, जो सीधे उस संकरी शेल्फ की तरफ जा रहे थे जहां आदित्य और सिया सांसें रोके खड़े थे।
कबीर की आंखें संकुचित हो गईं। उसने अपना फोन जेब में रखा और बहुत धीमी, दबे कदमों से ठीक उसी शेल्फ की तरफ बढ़ना शुरू किया।
'एक कदम... दो कदम...'
आदित्य ने अपनी दूसरी मुट्ठी कस ली। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठीं। सिया ने डर के मारे अपनी आंखें कसकर मूंद लीं और आदित्य के कुर्ते को सीने से और जोर से दबा लिया।
कबीर का साया अब बिल्कुल उस शेल्फ के मुहाने पर पहुंच चुका था। उसका हाथ उस पुरानी अलमारी के किनारे को छूने ही वाला था कि—
दूर, लाइब्रेरी के मुख्य दरवाजे पर एक जोर की आवाज गूंजी।
"अरे कौन है अंदर? चार बज गए हैं! मैं मेन गेट लॉक कर रहा हूं!" मुख्य लाइब्रेरियन की भारी आवाज हॉल में गूंज उठी।
कबीर के कदम ठिठक गए। उसने दांत पीसते हुए मुड़कर देखा। "धत् तेरे की!" वह बुदबुदाया। उसने एक आखिरी बार उस अंधेरे कोने की तरफ घूरा, और फिर लंबे डग भरता हुआ बाहर की तरफ निकल गया।
कुछ मिनटों तक दोनों वैसे ही जड़वत खड़े रहे। जब कबीर के जूतों की आवाज पूरी तरह गायब हो गई और मुख्य दरवाजे के बंद होने की आवाज आई, तब जाकर आदित्य ने सिया के होंठों से अपना हाथ हटाया।
दोनों की सांसें ऐसे फूल रही थीं जैसे मीलों दौड़कर आए हों।
सिया की टांगों ने जवाब दे दिया और वह वहीं फर्श पर बैठ गई। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था, लेकिन अब उन आंखों में सिर्फ डर नहीं, एक गहरा, डरावना सच था जो बाहर आ चुका था।
"कबीर..." सिया की आवाज कांप रही थी। "कबीर मेरे पापा को फंसाना चाहता है... वो मुझे बर्बाद करना चाहता है आदित्य।"
आदित्य उसके सामने खड़ा था। उसकी नजरें उस बंद डायरी पर और फिर सामने बैठी उस असहाय लड़की पर टिकी थीं। कहानी अब सिर्फ एक कॉलेज की गुमशुदा डायरी की नहीं रह गई थी; यह एक रईस, ताकतवर भेड़िए और एक बेबस परिवार के बीच की खूनी जंग बन चुकी थी।
और इस जंग में, आदित्य अनजाने ही सही, बिल्कुल बीच में आकर खड़ा हो गया था।
"सिया," आदित्य ने बेहद संजीदा और अडिग आवाज में कहा, "यह डायरी अब सिर्फ तुम्हारी नहीं है। जब तक यह सच सामने नहीं आता, यह डायरी मेरे पास रहेगी। क्योंकि अगर यह तुम्हारे पास रही, तो कबीर इसे छीन लेगा।"
सिया ने चौंककर आदित्य की तरफ देखा।
क्या सिया आदित्य पर इतना बड़ा भरोसा कर पाएगी? और कबीर जब अगली चाल चलेगा, तो क्या आदित्य सिया को उसके चंगुल से बचा पाएगा?