ऑटो रिक्शा बांद्रा की संकरी, गीली गलियों में हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रहा था। बाहर की धुंधली पीली स्ट्रीटलाइट्स की रोशनी ऑटो के काले पर्दे पर नाच रही थी, लेकिन आदित्य के भीतर जैसे पूरी दुनिया की रोशनी एक झटके में बुझ चुकी थी। उसके कानों में एक ही नाम किसी जहरीले तीर की तरह बार-बार चुभ रहा था—**प्रोफेसर वी. के. जोशी**।
उसके बड़े चाचा।
वही चाचा जिन्होंने सात साल की उम्र में पहली बार आदित्य की नन्हीं उंगलियों के बीच वह पुराना विंटेज कैमरा थमाया था। वही इंसान, जो हर रविवार की सुबह घर की बालकनी में बैठकर शेक्सपियर और कबीर के दोहे सुनाया करते थे। जिन्हें पूरे शहर की शैक्षणिक बिरादरी में सच्चाई और ईमानदारी का दूसरा नाम माना जाता था।
"नहीं... यह मुमकिन नहीं है, सिया," आदित्य ने सूखे हलक से थूक निगलते हुए कहा। उसकी आवाज में एक गहरा अविश्वास था जो किसी भी बेटे या भतीजे के दिल में उठना लाजिमी था। "चाचाजी बहुत सख्त मिजाज के हो सकते हैं, लेकिन वो कोई अपराधी नहीं हैं। वो सिर्फ इंजीनियरिंग फैकल्टी के डीन हैं, उनका कबीर के पिता के इस खूनी कंस्ट्रक्शन माफिया से क्या लेना-देना हो सकता है?"
सिया ने खिड़की से बाहर देखते हुए एक बहुत भारी, ठंडी सांस छोड़ी। उसकी आंखों में दर्द के साथ-साथ एक अजीब सा खालीपन था।
"मैं जानती थी कि तुम यही कहोगे, आदित्य," सिया ने अपनी कांपती उंगलियों से उस मुड़े हुए बटर पेपर को छुआ। "जब छह महीने पहले पापा ने मुझे पहली बार यह सच बताया था, तो मुझे भी लगा था कि शायद कोई गलतफहमी हुई है। लेकिन तुम नहीं जानते कि उस सफेद कुर्ते के पीछे कितनी स्याह कालिख छिपी है। इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के डीन होने के नाते, शहर के हर बड़े सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की सेफ्टी ऑडिट रिपोर्ट पर आखिरी दस्तखत तुम्हारे चाचा के होते थे। जिस पुल के ढहने से दर्जनों बेकसूर मजदूर जिंदा दफन हो गए थे, उसकी सरिया और सीमेंट की घटिया क्वालिटी को 'ए-ग्रेड' का फर्जी सर्टिफिकेट प्रोफेसर जोशी ने दिया था। कबीर के पिता धनराज महाजन ने उन्हें इसके बदले क्या दिया... यह तुम्हें अपने उस आलीशान घर की चारदीवारी में जाकर ही पता चलेगा।"
आदित्य के दिल पर जैसे किसी ने बर्फ की भारी चट्टान रख दी हो। उसकी आंखों के सामने वो नक्शा और वो तारीख अंगारों की तरह चमक रही थी—*वेयरहाउस नंबर १२, माहिम क्रीक। ६ सितंबर, रात ११:०० बजे।*
कल रात ग्यारह बजे वहां से वो ओरिजिनल फाइलें हमेशा के लिए जला दी जाने वाली थीं। अगर वो राख हो गईं, तो सिया के कोमा में पड़े बेबस पिता पर देशद्रोह और भ्रष्टाचार का ठप्पा ताउम्र लगा रह जाता।
"मुझे घर जाना होगा," आदित्य ने अचानक बेहद सख्त लहजे में कहा और आगे झुककर ऑटो वाले का कंधा हिलाया। "भैया, यहीं रोकिए!"
"तुम पागल हो गए हो क्या?!" सिया ने घबराकर उसका हाथ दोनों हथेलियों से कसकर पकड़ लिया। उसकी आंखें खौफ से फैल गईं। "अगर उन्हें जरा सी भी भनक लग गई कि तुम्हें इस बारे में कुछ पता है, तो वो तुम्हें छोड़ेंगे नहीं! कबीर के लोग पूरे शहर में फैले हैं!"
"अगर सच में मेरे चाचा इस दलदल में गले तक धंसे हैं, तो मुझे अपनी आंखों से देखना है, सिया," आदित्य की आवाज में एक सर्द, अनजानी सख्ती थी, जो उसने खुद कभी अपने भीतर महसूस नहीं की थी। उसने सिया के हाथों में वो मुड़ा हुआ पीला नक्शा वापस थमाया। "तुम तन्वी के फ्लैट जाओ। कॉलेज हॉस्टल की तरफ देखना भी मत, कबीर के गुर्गे वहां नजर गड़ाए बैठे होंगे। यह डायरी और नक्शा अपने पास रखो, और जब तक मेरा मैसेज या कॉल न आए, कमरे का दरवाजा किसी के लिए मत खोलना।"
सिया ने नम आंखों से उसे देखा। उसने धीरे से अपना सिर हिलाया। आदित्य ऑटो से नीचे उतरा। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे पर थपेड़े मार रही थी। ऑटो अंधेरे मोड़ पर मुड़कर गायब हो गया, और आदित्य तेज कदमों से विले पार्ले की उस पुरानी, शांत लेन की तरफ बढ़ गया जहां जोशी मेंशन स्थित था।
रात के ठीक दस बज रहे थे।
जोशी मेंशन—काले पत्थरों और सागवान की लकड़ी से बनी दो मंजिला पुरानी पुश्तैनी हवेली। मुख्य लोहे का गेट हमेशा की तरह थोड़ा चरमराया। आदित्य ने बहुत आहिस्ता से गेट को धकेला ताकि पहरेदार या किसी नौकर की नींद न टूटे। बैठक की सारी बत्तियां बुझी हुई थीं, लेकिन पहली मंजिल पर चाचाजी की पर्सनल स्टडी रूम की खिड़की से पर्दे के पीछे से हल्की पीली रोशनी छनकर बाहर आ रही थी।
आदित्य ने अपने जूते पोर्च में ही उतार दिए। मोजों के सहारे उसने लकड़ी की घुमावदार सीढ़ियों पर कदम रखा। सीढ़ियों की पुरानी लकड़ी अमूमन भार पड़ने पर हल्की आवाज करती थी, इसलिए आदित्य एक-एक कदम इस तरह रख रहा था जैसे कोई बिल्ली शिकार पर बढ़ रही हो। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लगा पसलियां टूटकर बाहर आ जाएंगी।
स्टडी रूम का भारी शीशम का दरवाजा पूरा बंद नहीं था; वह आधा इंच खुला हुआ था।
अंदर से हल्की फुसफुसाहट और सिगार के गाढ़े धुएं की तीखी गंध बाहर गलियारे तक तैर रही थी।
आदित्य दीवार से अपनी पीठ सटाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी गर्दन को धीरे से आगे बढ़ाया और उस बारीक दरार के जरिए कमरे के भीतर झांका।
अंदर का नजारा देखकर आदित्य के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
कमरे की बड़ी महोगनी टेबल के पीछे प्रोफेसर वी. के. जोशी बैठे थे। आंखों पर सोने के फ्रेम का चश्मा, चेहरे पर वही जानी-पहचानी गंभीरता, लेकिन उनकी आंखों में वो सौम्यता नहीं थी। वहां एक खतरनाक, ठंडी चमक थी। और उनके ठीक सामने, चमड़े के सोफे पर पैर फैलाए बैठा था... **धनराज महाजन**। कबीर का पिता। शहर का सबसे बड़ा और बेरहम कंस्ट्रक्शन टाइकून।
"काम में कोई चूक तो नहीं होगी, प्रोफेसर?" धनराज की आवाज भारी, खुरदुरी और किसी लोहे की चेन के घिसटने जैसी थी। उसने अपने हाथ में पकड़े व्हिस्की के ग्लास को घुमाया।
चाचाजी ने सिगार का एक लंबा कश खींचा और टेबल पर एक भारी, सील बंद खाकी लिफाफा पटका।
"मुझ पर शक करने की जरूरत नहीं है महाजन," चाचाजी का लहजा बर्फ जैसा सर्द था। "उस गिरे हुए पुल के ओरिजिनल ब्लूप्रिंट्स, कंक्रीट की लैब टेस्टिंग की फेल रिपोर्ट्स और तुम्हारी कंपनी के फर्जी इनवॉइस... सब कुछ मैंने माहिम वाले वेयरहाउस नंबर १२ के अंडरग्राउंड वॉल्ट में सुरक्षित शिफ्ट करवा दिया है। कुलकर्णी की बेटी के पास सिर्फ एक पर्सनल डायरी थी, जिसमें तारीखों के सिवा कुछ पुख्ता नहीं है। फिर भी मैंने कबीर को अलर्ट कर दिया था।"
"कबीर ने आज कॉलेज में उस लड़की का पीछा किया था," धनराज ने अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए कहा। "लेकिन बीच में कोई तीसरा लड़का आ गया। उसने लाइब्रेरी से उस लड़की को भगाने में मदद की। विक्रांत ने मुझे बताया कि उस लड़के ने उस पर हमला करने की कोशिश की थी।"
दरवाजे के पीछे खड़े आदित्य की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। उसके माथे पर पसीने की एक ठंडी बूंद उभरी और उसकी कनपटी से फिसलती हुई जबड़े तक चली गई।
चाचाजी ने अपनी कुर्सी पीछे की और एक बेरहम, घमंडी हंसी हंसे।
"कोई कॉलेज का फालतू आशिक मिजाज लड़का होगा, महाजन। आजकल के लौंडे hero बनने का शौक रखते हैं। उसकी फिक्र करके अपना ब्लड प्रेशर मत बढ़ाओ। कल रात ठीक ग्यारह बजे वेयरहाउस में एक 'शॉर्ट सर्किट' का ड्रामा होगा। उस आग में वो सारी फाइलें जलकर राख हो जाएंगी। उस आग की लपटें इतनी तेज होंगी कि राख का एक तिनका भी नहीं बचेगा। उसके बाद वो ऑडिटर कुलकर्णी अगर उस अस्पताल के कोमा से बाहर आ भी गया, तो उसके पास न तो कोई सबूत होगा और न ही मुझे या आपको छूने की कोई कानूनी ताकत।"
"और वो लड़का? जो हमारी राह में आ रहा है?" धनराज ने अपनी खाली ग्लास टेबल पर पटकते हुए पूछा।
चाचाजी ने अपनी सिगार को ऐशट्रे में कुचला। उनके चेहरे पर एक ऐसी वहशियाना क्रूरता उभरी जिसे देखकर आदित्य की रूह कांप गई।
"जो भी महाजन और जोशी के रास्ते में आएगा... वो समंदर की गहराइयों में पत्थरों से बांधकर फेंक दिया जाएगा। कबीर के लड़कों को बोल दो, उस लड़के का चेहरा पहचानते ही उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दें। मुझे इस खेल के आखिरी पड़ाव पर कोई तमाशा नहीं चाहिए।"
आदित्य का पूरा बदन सुन्न पड़ गया। उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। जिस इंसान के पैर छूकर वह रोज सुबह कॉलेज निकलता था, वह इंसान किसी पेशेवर हत्यारे से कम नहीं था। उसके चाचा पैसों और रसूख के लिए इंसानों की बलि चढ़ाने वाले दरिंदे थे।
आदित्य को लगा कि अगर वह एक सेकंड भी वहां और रुका तो उसकी चीख निकल जाएगी। वह उल्टे पांव पीछे हटने लगा।
लेकिन खौफ और घबराहट में उसका ध्यान सीढ़ियों के उस ढीले पायदान से हट गया।
'चर्र्र...'
सन्नाटे में वह पुरानी लकड़ी इतनी जोर से चरमराई जैसे किसी ने सन्नाटे में सूखा बांस तोड़ा हो।
अंदर की बातचीत एक झटके में रुक गई। कमरे के भीतर जानलेवा खामोशी छा गई।
"कौन है बाहर?!"
चाचाजी की तीखी, दहाड़ती हुई आवाज आई।
आदित्य के पास सोचने का वक्त नहीं था। उसने बिना कोई आवाज किए खुद को सीढ़ियों की रेलिंग के नीचे बने उस पुराने, अंधेरे इन-बिल्ट कबाड़खाने की संकरी जगह में धकेल दिया।
स्टडी रूम का दरवाजा झटके से खुला। भारी कदमों की आहट सीढ़ियों के मुहाने पर आकर रुक गई।
चाचाजी के हाथ में भारी पीतल का एक भारी पेपरवेट चमक रहा था। उनके पीछे धनराज का लंबा साया दीवार पर किसी दैत्य की तरह नाच रहा था।
चाचाजी की आंखें बाज की तरह अंधेरे गलियारे को घूर रही थीं।
"कोई था यहां..." चाचाजी ने फुसफुसाते हुए कहा। उनकी नजरें सीढ़ियों पर टिकी थीं।
आदित्य ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना मुंह कसकर दबा रखा था। उसकी सांसें रुकी हुई थीं। सीढ़ियों के नीचे का संकरा कोना धूल और मकड़ी के जालों से भरा था। तभी एक जहरीली काली मकड़ी आदित्य की नंगी कलाई पर रेंगने लगी। आदित्य की आंखों से डर के मारे पानी निकलने लगा, लेकिन उसने अपनी उंगली का एक पोर तक नहीं हिलाया। अगर इस वक्त एक भी सांस बाहर निकली, तो वह सीधे मौत के मुंह में होगा।
चाचाजी सीढ़ियों से दो कदम नीचे उतरे। उनकी चप्पलें ठीक आदित्य के सिर से एक फीट ऊपर लकड़ी के तख्ते पर रुकीं।
तभी नीचे आंगन में हवा के तेज झोंके से खिड़की का एक भारी पर्दा फड़फड़ाया और एक खाली फूलदान फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया।
"हवा है, प्रोफेसर," धनराज ने पीछे से सिगार सुलगाते हुए बेपरवाही से कहा। "पुराने मकानों में हवाएं भी भूत बनकर चलती हैं। बाहर आइए, हमें कमिश्नर से भी बात करनी है।"
चाचाजी ने कुछ सेकंड तक सीढ़ियों के नीचे घूरा, फिर एक गहरी सांस लेकर मुड़े। "हम्म... शायद तुम ठीक कह रहे हो।"
दरवाजा फिर से बंद हो गया।
आदित्य ने सीढ़ियों के नीचे से निकलकर अपने फेफड़ों में हवा भरी। उसने एक पल भी नहीं गंवाया। वह पिछले बगीचे के रास्ते, बाउंड्री की दीवार फांदकर सीधे बाहर सड़क पर कूद गया। उसके घुटने की पुरानी चोट फिर से छिल गई थी और खून बहने लगा था, लेकिन उसे दर्द का कोई होश नहीं था।
वह भागते हुए मुख्य सड़क की एक सुनसान स्ट्रीटलाइट के नीचे पहुंचा।
उसने अपनी जेब से थरथराते हाथों से फोन निकाला। उसकी उंगलियां स्क्रीन पर पागलों की तरह दौड़ रही थीं। उसने सिया का नंबर डायल करने के बजाय फौरन मैसेज टाइप करना शुरू किया:
*‘सिया, सब सच है। चाचाजी और धनराज महाजन मिले हुए हैं। कल रात ग्यारह बजे वेयरहाउस नंबर १२ में वो सारी फाइलें जला देंगे। हमारे पास सिर्फ चौबीस घंटे हैं। तन्वी के घर पर ही रहना, मैं अभी तुम्हारे पास—’*
उसने 'सेंड' का बटन दबाया ही था।
तभी—
'घुर्र्र्र्र...'
एक भयानक, भारी इंजन की गुरराहट रात के सन्नाटे को चीरती हुई आई।
इससे पहले कि आदित्य कुछ समझ पाता, एक विशाल, काले रंग की थार एसयूवी ने ठीक उसके सामने आकर जोरदार ब्रेक मारे। टायरों के जलने की तीखी गंध और डामर की रगड़ ने हवा को भर दिया। गाड़ी की तेज, सफेद हाई-बीम हेडलाइट्स सीधे आदित्य की आंखों पर पड़ीं। रोशनी इतनी अंधी कर देने वाली थी कि आदित्य को अपने चेहरे के आगे हाथ रखना पड़ा।
गाड़ी का ड्राइवर साइड का शीशा बहुत आहिस्ता से, सरसराहट के साथ नीचे उतरा।
अंदर स्टीयरिंग व्हील पर कबीर बैठा था। उसके होठों पर एक ऐसी ठंडी, वहशियाना मुस्कान थी जो किसी शिकारी के चेहरे पर तब आती है जब शिकार खुद चलकर उसके जाल में गिर जाता है।
कबीर ने अपनी सिगरेट का कश खींचा और खिड़की से धुआं सीधे आदित्य के चेहरे पर उड़ा दिया।
"बड़ी जल्दी में लग रहे हो, फोटोग्राफर बाबू?" कबीर की आवाज में एक घिनौनी मिठास थी।
उसने अपनी बगल वाली सीट से कोई चीज उठाई और खिड़की से बाहर लहराई।
वह आदित्य का पुराना विंटेज एनालॉग कैमरा था... जो दोपहर में लाइब्रेरी की हड़बड़ाहट में छूट गया था।
आदित्य की सांसें गले में ही अटक गईं। "मेरा कैमरा..."
"सिर्फ कैमरा नहीं, मेरे भाई," कबीर ने क्रूरता से हंसते हुए अपनी जेब से एक और फोन निकाला। उसने स्क्रीन ऑन करके आदित्य के चेहरे के सामने कर दी।
फोन की स्क्रीन पर एक लाइव वीडियो चल रहा था।
स्क्रीन के उस पार तन्वी का फ्लैट था। कमरे का सामान बिखरा पड़ा था, तन्वी जमीन पर हाथ-पैर बंधे रो रही थी, और सामने सोफे पर सिया बैठी थी—उसकी आंखों पर काली पट्टी बंधी थी और उसके सिर पर विक्रांत की लोहे की भारी रॉड तनी हुई थी।
"सिया!" आदित्य के हलक से एक बेबस, खूंखार चीख निकली। उसने कबीर की तरफ झपट्टा मारना चाहा, लेकिन तभी गाड़ी के दोनों पिछले दरवाजे खुले और दो लंबे, हट्टे-कट्टे गुंडों ने पीछे से आदित्य के गले में लोहे की चेन फंसाकर उसे सड़क पर घसीट लिया।
आदित्य का फोन हाथ से छूटकर नाली के किनारे जा गिरा। स्क्रीन पर लिखा था— *मैसेज फेल्ड।*
"तुम जैसे कीड़े-मकोड़े जब बड़े लोगों के खेल में घुसते हैं ना, तो पैरों के नीचे ऐसे ही मसले जाते हैं," कबीर ने गाड़ी से उतरकर अपनी चमड़े के जूते की नोक आदित्य के जख्मी घुटने पर पूरी ताकत से दबा दी।
आदित्य के मुंह से दर्द की एक भयानक चीख निकली। उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।
"कल रात ग्यारह बजे तक तुम दोनों जिंदा रहोगे," कबीर ने आदित्य के बालों को मुट्ठी में जकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। "क्योंकि वो जो आखिरी चाबी है ना... वो तुम्हारे खून से ही निकलेगी। ले चलो इसे वेयरहाउस १२!"
गुंडों ने आदित्य के चेहरे पर एक काला, बदबूदार बोरा डाल दिया। दुनिया में पूरी तरह अंधेरा छा गया।
क्या आदित्य इस मौत के कुएं से निकल पाएगा? क्या सिया और उसके पिता की बेगुनाही उस माहिम क्रीक की आग में हमेशा के लिए भस्म हो जाएगी, या आदित्य कोई ऐसा दांव चलेगा जो इस पूरे खेल को उलट कर रख देगा?