कैमरे के शटर की हल्की सी 'क्लिक' आवाज ने उस दोपहर के सन्नाटे को एक मीठे सुकून से भर दिया। बरगद के पत्तों से छनकर आती गुनगुनी धूप सिया के चेहरे पर नाच रही थी। उसकी भूरी आंखें, चांदी के नन्हें झुमके और चेहरे पर खिली वो पहली सच्ची मुस्कान अब हमेशा के लिए उस पुरानी एनालॉग रील में कैद हो चुकी थी।
आदित्य ने लेंस से आंखें हटाईं। सामने बैठी सिया अपनी खुली डायरी के पन्नों को हवा के झोंकों से बचाने के लिए उस पर अपनी नफीस हथेली रखे हुए थी। तीन महीने का वो खौफनाक दौर—आईसीयू की ठंडी मशीनें, गोली की चुभन और अदालतों के चक्कर—जैसे कॉलेज के इस कट्टे पर आकर किसी पुराने बुरे ख्वाब की तरह पिघल गए थे।
"तो मिस्टर फोटोग्राफर," सिया ने अपनी भौंहें नटखट अंदाज में मटकाते हुए कहा, "तस्वीर कैसी आई? फिर से वही शिकायत तो नहीं कि मेरा गुस्सा नाक पर रहता है?"
आदित्य के होंठों पर एक गहरी, शांत मुस्कान तैर गई। उसने अपनी जख्मी कलाई पर बंधी सिया की उंगलियों के स्पर्श को महसूस किया। "गुस्सा तो अब भी वहीं है, सिया। फर्क बस इतना है कि अब उस गुस्से के पीछे का दर्द मुझे पढ़ना आ गया है।"
सिया के चेहरे पर गुलाबी आभा दौड़ गई। उसने नजरें झुका लीं। हवा के एक हल्के झोंके ने उसकी लटों को फिर से उसके माथे पर बिखेर दिया।
लेकिन कॉलेज के उस कट्टे पर पसरा यह सुकून महज़ एक छलावा था—एक ऐसा ठहराव, जो किसी बहुत बड़े समुद्री तूफान के आने से ठीक पहले समंदर के सीने पर छा जाता है।
तभी—
"अरे ओ लैला-मजनू! अगर तुम्हारा यह रोमांस खत्म हो गया हो, तो दुनियादारी की भी खबर ले लो!"
एक जानी-पहचानी, खिलखिलाती आवाज ने दोनों का ध्यान खींचा। सामने तन्वी हाथ में कटिंग चाय के तीन गिलास और समोसे का भूरा लिफाफा लिए खड़ी थी। उसके साथ रोहन भी था।
रोहन... जिसने तीन महीने पहले अनजाने में ही सही, कबीर को वह डायरी की खबर दी थी। रोहन का सिर अब भी शर्मिंदगी से थोड़ा झुका हुआ था। उसने उस दिन के बाद से सिया और आदित्य के सामने आने की हिम्मत बमुश्किल जुटाई थी।
"रोहन, तू ठीक है?" आदित्य ने उठने की कोशिश करते हुए पूछा। उसके सीने में अब भी हल्का खिंचाव हुआ, जिसे उसने मुस्कान के पीछे छुपा लिया।
"मैं... मैं बस यह कहने आया था आदित्य," रोहन की आवाज लड़खड़ा रही थी, उसकी आंखें नम थीं। "उस दिन मुझे सच में नहीं पता था कि कबीर इतना बड़ा शैतान है। उसने मुझे डराया था कि अगर मैंने सिया की हर हरकत की खबर उसे नहीं दी, तो वो मेरे पिता की सरकारी नौकरी छीन लेगा। मैं कायर निकला... पर खुदा कसम, मैं सिया को मारना नहीं चाहता था।"
सिया ने एक गहरी सांस ली। उसने रोहन के कंधे पर हाथ रखा। "जो बीत गया रोहन, उसे वहीं छोड़ दो। कबीर और प्रोफेसर जोशी अब आर्थर रोड जेल की सलाखों के पीछे हैं। अदालत ने जमानत की सारी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अब कोई किसी को डरा नहीं सकता।"
"काश यह सच होता, सिया..." तन्वी ने चाय का गिलास पत्थर की बेंच पर रखते हुए बहुत गंभीर आवाज में कहा।
सिया और आदित्य दोनों ने एक साथ चौंककर तन्वी की तरफ देखा।
"क्या मतलब तन्वी?" आदित्य की भवें तन गईं।
तन्वी ने अपनी बैग से एक मोटा, खाकी रंग का भारी लिफाफा निकाला। उस लिफाफे पर कोई डाक टिकट नहीं था। उस पर सिर्फ लाल स्याही से मोटे अक्षरों में छपा था— **'पर्सनल एंड कॉन्फिडेंशियल: फॉर आदित्य जोशी & सिया कुलकर्णी'**।
"यह कहां से मिला?" आदित्य ने लिफाफा हाथ में लेते हुए पूछा। लिफाफा काफी वजनी था और उसके भीतर कोई सख्त, चौकोर चीज महसूस हो रही थी।
"आज सुबह जब मैं कॉलेज के एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के नोटिस बोर्ड के पास से गुजर रही थी," तन्वी की आवाज में हल्की घबराहट थी, "तो डिपार्टमेंट के एक अनजान प्यून ने यह मुझे थमाया। उसने कहा कि कोई अजनबी इसे गेट पर छोड़कर गया था और सख्त हिदायत दी थी कि यह सीधे तुम दोनों के हाथों में ही पहुंचे।"
आदित्य की उंगलियां उस खाकी लिफाफे के सील बंद सिरे पर जम गईं। उसके भीतर का फोटोग्राफर, जो हर बारीक बदलाव को भांप लेता था, सतर्क हो उठा। उसने सिया की तरफ देखा। सिया के चेहरे का रंग एक बार फिर उड़ चुका था। पुरानी दहशत की एक ठंडी लहर उसके रीढ़ में दौड़ गई।
"खोलो इसे," सिया ने सूखे गले से कहा।
आदित्य ने अपनी जेब से वही लेंस-क्लीनिंग छोटा ब्लेड निकाला और लिफाफे के ऊपरी हिस्से को सावधानी से काटा।
अंदर से दो चीजें बाहर निकलीं।
पहली चीज थी—एक पुरानी, ब्लैक एंड व्हाइट पासपोर्ट साइज तस्वीर।
तस्वीर को देखते ही आदित्य की सांसें हलक में अटक गईं। तस्वीर में तीन नौजवान खड़े थे। बाईं तरफ खड़े थे सिया के पिता—मिस्टर कुलकर्णी, जवानी के दिनों में। दाईं तरफ खड़े थे प्रोफेसर वी. के. जोशी। लेकिन बीच में... बीच में एक तीसरा शख्स खड़ा था, जिसकी आंखें बहुत तेज थीं और चेहरे पर एक अजीब सा, भयानक आत्मविश्वास था। उस तीसरे शख्स के चेहरे पर लाल स्केच पेन से एक बड़ा सा क्रॉस (X) का निशान लगाया गया था।
और तस्वीर के पीछे काली स्याही से लिखा था:
*‘अतीत के मुर्दे जब कब्र से बाहर आते हैं, तो सिर्फ इंसाफ नहीं... खून मांगते हैं। पहला मोहरा गिर चुका है, अब वजीर की बारी है।’*
"यह... यह तस्वीर किसकी है?" सिया ने कांपती उंगलियों से उस फोटो को छुआ। "पापा ने मुझे कभी इस तीसरे इंसान के बारे में नहीं बताया।"
"और यह दूसरी चीज देखो," आदित्य की आवाज एकदम भारी हो गई।
लिफाफे के भीतर से एक भारी, लोहे की पुरानी चाबी निकली। लेकिन यह कोई आम चाबी नहीं थी। उसके ऊपरी हिस्से पर बहुत नफीस कारीगरी से एक सांप का फन उकेरा गया था, और उसके नीचे एक रोमन नंबर खुदा था— **'लॉकर नंबर IX - सेंट जेवियर्स सेंट्रल बेसमेंट'**।
सेंट जेवियर्स का सेंट्रल बेसमेंट!
वही बेसमेंट, जो कॉलेज की मुख्य इमारत के नीचे सदियों से बंद पड़ा था। कॉलेज की स्थापना के समय से बनी वो सुरंगें और पुराने स्टोर रूम्स, जिन्हें सुरक्षा कारणों से साठ के दशक में पूरी तरह सील कर दिया गया था। किसी भी छात्र या शिक्षक को वहां जाने की इजाजत नहीं थी।
"सेंट जेवियर्स का बेसमेंट?" रोहन ने आंखें फैलाते हुए कहा। "वहां तो पचास सालों से कोई नहीं गया! कॉलेज का सारा पुराना कबाड़ और ब्रिटिश जमाने के रिकॉर्ड्स वहीं बंद हैं। यह चाबी वहां की कैसे हो सकती है?"
तभी आदित्य का फोन बज उठा।
'ट्रिन-ट्रिन... ट्रिन-ट्रिन...'
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। वहां सिर्फ लिखा आ रहा था— **'प्राइवेट नंबर'**।
चारों के बीच एक भयानक सन्नाटा छा गया। हवा में तैरती पत्तियों की सरसराहट भी किसी चीख जैसी लगने लगी। आदित्य ने एक नजर सिया पर डाली, फिर अपनी कांपती उंगलियों से 'कॉल रिसीव' का हरा बटन दबाकर फोन कान से लगाया और लाउडस्पीकर ऑन कर दिया।
"हेलो?" आदित्य ने सख्त आवाज में पूछा।
फोन के उस पार से कुछ सेकंड तक सिर्फ किसी भारी सांस के चलने और लोहे की सलाखों पर किसी भारी वस्तु के टकराने की आवाज आई—'खट... खट... खट...'
फिर एक ऐसी आवाज उभरी, जिसे सुनकर आदित्य और सिया के पैरों तले से जमीन खिसक गई।
वह आवाज आर्थर रोड जेल के हाई-सिक्योरिटी सेल से आ रही थी।
वह आवाज प्रोफेसर वी. के. जोशी की थी।
"कैसा लगा तोहफा, मेरे प्यारे भतीजे?" चाचाजी की आवाज में वही सर्द, वहशियाना गुरूर था जो उस वेयरहाउस में दिखा था। लेकिन इस बार उस आवाज में कोई लाचारी या जेल का डर नहीं था; उसमें एक भयानक, रहस्यमयी जीत का नशा था।
"चाचाजी!" आदित्य ने दांत भींचते हुए कहा। उसका हाथ फोन पर कस गया। "आप जेल में हैं! आपका सारा खेल खत्म हो चुका है। पुलिस ने आपकी सारी बेनामी संपत्तियां और वो फर्जी दस्तावेज जब्त कर लिए हैं! अब आप क्या साबित करना चाहते हैं?"
फोन के उस पार से एक डरावनी, सूखी हंसी गूंजी।
"खेल खत्म? हाहाहा... अरे नादान आदित्य! तुमने और उस लड़की ने सिर्फ एक मोहरे को गिराया है। धनराज महाजन? वो तो सिर्फ एक मुखौटा था, एक कठपुतली जिसके पास सिर्फ पैसा था। असली दिमाग... असली ताकत तो उस तस्वीर में है जो तुम्हें अभी-अभी मिली है।"
सिया आगे बढ़ी और फोन के करीब आकर चिल्लाई, "जोशी! मेरे पापा को तुमने क्या नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, सब सामने आ चुका है! वो तीसरा इंसान कौन है उस तस्वीर में?!"
"पूछो अपनी उस डायरी से, सिया कुलकर्णी," चाचाजी का लहजा किसी जहरीले फन जैसा फुफकारा। "तुम्हारे ईमानदार बाप ने अपनी उस डायरी के कुछ पन्ने फाड़कर अलग कर दिए थे। वो पन्ने, जो उस तीसरे इंसान के गुनाहों का कच्चा चिट्ठा थे। जिस पुल हादसे को तुम सिर्फ सीमेंट और सरिए का घोटाला समझ रही हो ना... उसकी नींव तीस साल पहले सेंट जेवियर्स के उसी बेसमेंट में रखी गई थी!"
"बकवास बंद करो!" आदित्य गरजा।
"बकवास?" चाचाजी ने ठंडे स्वर में कहा। "घड़ी देखो आदित्य। दोपहर के ठीक बारह बजने वाले हैं। आज शाम पांच बजे, वो तीसरा इंसान आर्थर रोड जेल में मुझे और कबीर को हमेशा के लिए खामोश करने आ रहा है... ताकि इस राज का आखिरी गवाह भी मिट जाए। अगर तुम दोनों अपनी और अपने उन परिवारों की जान बचाना चाहते हो, तो पांच बजे से पहले उस चाबी का इस्तेमाल करो। सेंट जेवियर्स के सेंट्रल बेसमेंट के लॉकर नंबर नौ में वो सच दफन है, जिसे तुम्हारे बाप ने अपनी जान की बाजी लगाकर छिपाया था।"
"और अगर हम वहां न जाएं तो?" आदित्य ने चुनौती भरे स्वर में पूछा।
"तो ठीक शाम सवा पांच बजे..." चाचाजी की आवाज अचानक कानाफूसी में बदल गई, "सेंट जेवियर्स कॉलेज की मुख्य इमारत की नींव में जो पुराना टाइमर लगा है... वो टिक-टिक करना बंद कर देगा। और इस बार आग किसी वेयरहाउस में नहीं लगेगी, पूरा सेंट जेवियर्स पत्थरों के मलबे में तब्दील हो जाएगा। तुम्हारे पास सिर्फ पांच घंटे हैं। टिक-टिक... टिक-टिक..."
'क्लिक!'
कॉल कट गई।
सिर्फ डायल टोन की एक सपाट, बेजान आवाज फोन के स्पीकर से आ रही थी—'टूं... टूं... टूं...'
कट्टे पर ऐसा सन्नाटा पसर गया मानो वहां खड़े चारों लोगों की सांसें एक साथ रुक गई हों।
हवा अचानक ठंडी हो गई थी। दोपहर की वो सुनहरी धूप अब किसी जलते हुए कफन जैसी लगने लगी थी।
"यह... यह झूठ बोल रहे हैं ना आदित्य?" तन्वी लगभग रोने लगी। "वो जेल में हैं! वो जेल से बैठकर कॉलेज को कैसे उड़ा सकते हैं?"
"चाचाजी कभी खोखली धमकियां नहीं देते," आदित्य ने बेहद संजीदा, कांपती आवाज में कहा। उसने अपनी जेब से वह भारी लोहे की चाबी निकाली। सांप के फन वाली नक्काशी धूप में चमक रही थी। "और वो तस्वीर... मेरे चाचा और सिया के पापा के साथ वो तीसरा इंसान कौन था? इसका जवाब सिर्फ कॉलेज के उसी पुराने बेसमेंट में मिल सकता है।"
सिया ने अपनी उस भूरी लेदर डायरी को देखा। उसने जल्दी से पन्ने पलटे। डायरी के बीच में सचमुच तीन पन्ने बहुत ही सफाई से ब्लेड से काटे गए थे। वो पन्ने, जिन पर उसकी नजर पहले कभी नहीं गई थी।
"पापा ने यह मुझसे भी छिपाया था," सिया ने अपनी मुट्ठियों को कसते हुए कहा। उसकी आंखों में अब आंसुओं की जगह एक भयानक आग सुलग रही थी। "आदित्य, हमें उस बेसमेंट में जाना होगा। अभी।"
"नहीं सिया, तुम पुलिस को फोन करो," रोहन ने हाथ जोड़ते हुए कहा। "एसीपी कदम को बताओ। वो अपनी टीम लेकर आएंगे।"
"पुलिस को खबर करने का वक्त नहीं है रोहन," आदित्य ने कट्टे से अपनी बैग उठाई। "चाचाजी ने कहा है कि पांच बजे जेल में कुछ होने वाला है। अगर पुलिस को भनक लगी, तो वो पहले कॉलेज खाली करवाएंगे, तलाशी लेंगे और इस सब में वो पांच घंटे निकल जाएंगे। अगर कॉलेज में सचमुच कोई विस्फोटक है, तो पैनिक फैलने से पहले हमें उस लॉकर तक पहुंचना होगा।"
आदित्य ने सिया की आंखों में देखा।
सुबह का वो मासूम रोमांस, वो कट्टे पर बिताए सुकून के पल अब एक ऐसी खूनी पहेली में बदल चुके थे, जिसकी हर कड़ी उनके अपनों के अतीत से जुड़ी थी।
"तुम तैयार हो?" आदित्य ने पूछा।
सिया ने बिना एक पल गंवाए अपना सिर हां में हिलाया। उसने डायरी अपनी बैग में डाली और अपनी कुर्ती के पल्लू को कमर में कस लिया। "मैंने एक बार तुम्हें खोने का दर्द झेला है आदित्य। अब इस सच का सामना हम साथ करेंगे।"
चारों दोस्त चुपचाप कॉलेज की पुरानी, वीरान लाइब्रेरी के पिछले हिस्से की तरफ बढ़ गए—जहां से उस सीलबंद सेंट्रल बेसमेंट की सीढ़ियां नीचे पाताल की ओर उतरती थीं।
कॉलेज की विशाल घंटी ने बारह के बारह डंके बजाए—टन... टन... टन...
हर डंका एक चेतावनी था कि वक्त की रेत उनकी उंगलियों से तेजी से फिसल रही थी। और नीचे, उस अंधेरे बेसमेंट के सन्नाटे में, कोई उनका इंतजार कर रहा था।
क्या उस लॉकर नंबर नौ में छिपा राज प्रोफेसर जोशी और सिया के पिता के रिश्ते को हमेशा के लिए तार-तार कर देगा? और वो तीसरा चेहरा कौन था, जिसके इशारे पर मौत अब पूरे कॉलेज के सिर पर मंडरा रही थी?