"क्या चाचा कैसी चल रही है बिक्री आजकल?"
अलीपुर में रात की गिरती ठंडी चांदनी को सहन करने के बाद सवेरे सूरज की तपिश के नीचे, कच्ची सड़को पर धूल मिट्टी में अपनी अपनी दुकानें लगाए वहां के लोग आपस में अलीपुर के हाल की बातें करते नज़र आए
"कहां बेटा बिक्री विक्री कुच्छो हो ही नाही राही, और अब तो साम होअत होअत ठंडी भी बढ़ जावे।" दुकान के पास बैठे, धूप की ताज़ा गर्माहट लेते हुए एक बूढ़े आदमी ने जवाब दिया
"कहां चाचा अभी ठंड आई कहां है, अभी तो शुरू हुई है आना।" हंसकर एक दुकानदार ने सफ़ाई करते हुए उन्हें छेड़ा
"ऊ तो तोहार लिए न, हमार बुड्ढी हड्डी से पुछौ ई ठंड कैसे बर्दास करत है।" चाचा ने उसे घूरकर कहा
"हां चाचा तुम्हारी बात सही है, अब कहां इन हड्डियों में उतना ज़ोर रहा।" चाचा को चिढ़ाकर उसने अपने आपको बचाते हुए उनसे पूछा "वैसे कित्तूर भाई कहां है तुम्हारे साथ नही आए?"
"ऊ तो सुबह सुबह छोटी दरगाह गैल हई ना।" इनके बातचीत, हंसी मज़ाक, तालमेल को तोड़ते हुए उड़ती उड़ती धूल इन्हें छूने लगी जिसे देखकर दुकानदार का रुख़ उस तरफ़ हो गया
"ये घुड़ सवार कौन है, इस तरफ़ ही आ रहे हैं।" तबतक उड़ती धूल, मिट्टी के बीच में से सागर भाई और उनके साथी ने दौड़ते हुए घोड़े को इन्हीं के बीच में रोक दिया। वहां आस पास के लोगों ने इन्हें घेर लिया।
उनका साथी भी बिलकुल उन्ही की तरह का लंबा चौड़ा सा था। सर पर पगड़ी पहने हुए, सूखे लबों के साथ हांपते हुए वो दोनो घोड़े से उतर गए
"बहुत प्यास लगी है भाई क्या पानी मिल जाएगा हमलोग को?" सागर भाई ने एक आदमी से कहा
"हां हां काहे नाही।" जल्दी से चाचा ने आगे बढ़कर इन्हें बिठाते हुए अपने पास से पानी पिलाया।
उन्होंने पानी ऐसे पिया मानो जैसे जन्मों के प्यासे थे।
पानी पीते ही सागर भाई की लाल सुखी आंखों में तरी पहुंच गई, बचा पानी उन्होंने अपने साथी को दे दिया। जब दोनों पानी पी चुके और चाचा ने इन्हें सुकून में देखा तब सवालात का सिलसिला शुरू कर दिया
"केहर से आवात हौ बेटा, कौन हो तुम?"
"हम तो मुसाफ़ीर है चाचा, कई दिनों से लगातार सफ़र में है। खाना पानी सब ख़त्म हो चुका है। नहीं मालूम कहां पहुंच गए।" सागर भाई ने सबको भ्रम में रखते हुए चार दिन के सफ़र को ज़्यादा बताकर ऐसी कहानी बुनी जो अस्तित्व में थी ही नहीं
"तुमलोग केहर को जात हौ?" सवाल फ़िर चाचा की तरफ़ से आया
"हमलोगों को आलीपुर जाना है चाचा मगर नजाने कब पहुंचेंगे।"
वहां लोग ये सुनकर आपस में एक दूसरे को देखकर इनके बारे में बातें करने लगे और चाचा के सवाल ने भी ज़ाहिर किया की वो भी इनके लिए मशकूक हो गए हैं
"आलीपुर! उहर काहे जात हौ? उहर के तो ना लागत हो।"
"आलीपुर की छोटी दरगाह में मेरी बीवी ने मन्नत माना था कि अगर हमारी शादी सही सलामत हो गई तो मैं वहां पर चादर डालूंगा। उसकी मन्नत पूरी हो गई है और अब मुझे चादर डालना है।" सबका शक समझते हुए सागर भाई ने फिर से एक नई कहानी बुना जिसे सुनकर चाचा का दिल फिर बदल गया
"हाउ तो ख़ूब खूसी की बात हौ हमार कस्बे से तोहार मनोकामना पूरी हुई।"
भीड़ ने भी चाचा का साथ देते हुए इस बात में दिलचस्पी दिखाया "तुम इस बकत आलीपुर की जमीन पर ही हौ और ओहार दरगाह मिलिए तोक।" इशारा करके चाचा ने रास्ता दिखा दिया
"क्या आप मुझे रास्ता दिखा सकते है।" सागर भाई ने अपनी थकन ज़ाहिर करते हुए सवाल किया
"चलिए आप मेरे साथ मैं दिखा देता हूं रास्ता।" भीड़ में से एक आदमी आगे आ गया और उन्हें लेकर दरगाह की तरफ़ बढ़ गया "आपलोग बहुत दूर से आए है क्या?" उसने चलते चलते पूछा
"जी हां।"
"हमारे आलीपुर में आपकी बहुत ख़िदमत होगी, किसी भी तरह की मदद के लिए आप किसी से भी बेझिझक कह सकते हैं। यहां के लोग मुसाफ़िरों की मदद करने से कभी पीछे नहीं हटते क्योंकि उनकी मदद करना पुण्य का काम होता है।"
"सही सुना था मैने आपलोग सच में बड़े दिलवाले है।"
"ये तो हमारे आलीपुर की ख़ासियत है।"
दरगाह बहुत दूर नही था इसलिए वो लोग जल्दी पहुंच गए।
दरगाह के पास पहुंचकर उसने इशारा करके सागर भाई से बताया "और ये मुसाफ़िरख़ाना। यहां आप आराम से रह सकते है, यहां आपको खाने रहने की कोई परेशानी नहीं होगी।"
"बहुत शुक्रिया भाई।" सागर भाई ने कहा।
वो आदमी अपना काम पूरा करके अपनी जगह को लौट गया और ये लोग दरगाह के अंदर आ गए। एक जगह खड़े होकर चारों तरफ़ का मुआयना किया, उनकी नज़र पानी के नलके के पास पहुंची, अपने साथी के साथ हाथ मुंह धोने वो भी इधर आ गए। हाथ मुंह धोकर उन्होंने नज़रे दौड़ाकर किसी की तलाश करतें हुए अपने साथी से पूछा
"क्यों भाई राघव कोई नज़र आया क्या?"
"चलिए उससे मालूम करते है।" राघव ने दरगाह में खड़े एक शख़्स की तरफ़ इशारा किया, दोनो उसके क़रीब पहुंच गए
"भाई यहां के पीर कहां हैं?" राघव ने पूछा
"वो तो आज नहीं आए है भाई यहां।" शख़्स ने ठहर कर बताया
"वो मुझे कहां मिलेंगे?"
"क्या नए हो यहां?" शख़्स ने इनके सवाल से अंदाज़ा लगाया
"हां भाई मुसाफ़िर हूं, चादर डालने आया हूं।"
"अच्छा अच्छा। वो देखो उधर पीले कुर्ते वाला लड़का, उससे मालूम करो वो बता देगा।" इशारे से बताकर वो आगे बढ़ गया
सागर भाई उसकी बात ठीक ठीक समझ नही पाए मगर पीले कुर्ते वाले लड़के के पास पहुंच गए
"सलाम भाई।" उन्होंने कहा
"सलाम।"
"क्या आप बता सकते है पीर कहां मिलेंगे।"
"पीर साहब अभी नहीं मिलेंगे।" उसका लहजा बहुत सख़्त था
"क्यों भाई?"
"वो बाहर गए हुए है, कोई काम है उनसे तो बता दो।"
"अच्छा अम्हेल आरा नाम की लड़की आया करती थी, वो कहां है?"
"क्या ज़माने भर के बाद आए हो?" उसने इस दफ़ा घूर कर और ज़्यादा सख़्ती से कहा
"नहीं मैं तो पहली बार आया हूं, मेरी बीवी से उनकी अच्छी पहचान है उनके लिए तोहफ़ा भिजवाया है उन्होंने।" सागर भाई ने लहजा नर्म रखा
"वो भी नही मिलेंगी।" नज़र नीचे करके उसने जवाब दिया
"क्यों?"
"वो अब यहां नही आती।"
"क्यों क्या हुआ?"
तुम जाओ यहां से भाई, साहबान से मिलने परसों आना।"
"पर भाई मुझे उनका तोहफ़ा देना है, वो कहां मिलेंगी ये तो बता दो।"
"हवेली की बातें खुलेआम नहीं होती। अब यहां से जाओ तुम।"
सागर भाई की पहली कोशिश नाकामयाब हो गई जिसपर वो किसी और शिकार की तलाश में राघव के साथ मुसाफ़िरख़ाने पहुंच गए
"सलाम भाई।..हमलोग को रहने की जगह चाहिए।" वहां दरवाज़े पर बैठे एक आदमी से सागर भाई ने कहा
"मुसाफ़िर हो?" उसने दोनों को ग़ौर से देखकर पूछा
"हां।"
"दरगाह के लिए आए हो?"
"हां।"
"अच्छा......।" अपने नौकर को आवाज़ लगाकर इसने बुलाया "जमाल इन्हें इनका कमरा दिखा दो।"
"जी साहाब।" जमाल से जवाब पाकर वो सागर भाई और राघव को देखने लगा
"ज़्यादा देर इस हाल में मत रहना।" उसने कहा। पल भर सागर भाई ने कुछ सोचकर उससे पूछा
"बेलोस हवेली का रास्ता कहां से है?"
"आपलोग क्या हवेली के मेहमान हो?" हवेली के नाम पर साहाब फ़ौरन खड़ा हो गया
"नहीं हम तो अम्हेल आरा की तलाश में है।"
"छोटी साहबजान की तलाश में हो!" उसने चौंक उठा।
उसकी बात पर सागर भाई थोड़ा ठनके फिर उसने बअदब जवाब दिया
"वो तो आपको नही मिल पाएंगी।"
"क्यों भाई?"
"वो तो आली पुर में हैं ही नहीं।"
"तो फिर वो कहां मिलेंगी?"
"ये मैं आपको नहीं बता सकता।"
"तो फिर मैं उनसे कैसे मिल सकता हूं?"
"आपको उनसे क्या काम है?"
"मेरी बीवी की तरफ़ से लाया हुआ तोहफ़ा देना है उन्हें।"
"तो आप तोहफ़ा हवेली पहुंचा दीजिए।"
"तो मैं ये तोहफ़ा हवेली पहुंचा सकता हूं क्या?"
"हां बिल्कुल। आप इसे हवेली पहुंचा दीजिए।"
"शुक्रिया आपका।"
"अरे भाई छोटी साहबजान की बात करते हो फिर शुक्रिया कहते हो।"
"छोटी साहबजान! क्या उन्हें इस तरह पुकारते है।" जो सवाल उनके में में पहले ठनका था उन्होंने इस बार पूछ लिया
"हां भाई, सहाबजान ने अपने बाद अपनी आवाम की देख रेख हमारी छोटी साहबजान को ही सौंपा था। वो भी साहबजान की तरह बेहद दरियादिल और ख़ुश मिज़ाज थीं और ज़्यादा तर अपना वक़्त हमलोग को दिया करती थीं।..
बहुत ख़्याल रखती थी हमलोगों का - इसलिए हम उन्हें छोटी साहबजान ही कहते हैं।"
"फिर वो चली क्यों गई?"
"देखो भाई हवेली की बातें बाहर नही आती। हां मैं इतना बता सकता हूं कि वो तीन मौसमों से आलीपुर में नहीं है और कबतक आएंगी कुछ नही पता। कुछ लोग कहते हैं वो अब लौटेंगी ही नहीं, कुछ उनके जाने से बहुत दुखी हैं। उनके न रहने से आवाम बड़ी ख़राब होती जा रही है।"
"तो क्या उनके रहने से आवाम ठीक थी?"
"ठीक थी? उनके सामने तो कोई ग़लत कर ही नहीं सकता था, और जो करता था वो उनसे बच नही पाता था। उनका खौफ़ और इज्ज़त दोनों ही हैं हमारे आलीपुर में।"
"हां भाई सही कह रहे हो तुम। मेरी बीवी ने भी ऐसा ही बताया था।"
"हवेली अपना हुलिया दुरुस्त करके जाना।" उसने कहा
सागर भाई और राघव अपना सामान लिए जमाल के पीछे अपने कमरे में पहुंच गए। जमाल के चले जाने के बाद झोले में से कपड़ा निकाल कर सागर भाई अपना हुलिया दुरुस्त करने चले गए। राघव वहीं बैठ कर अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा
"सागर भाई क्या फ़ौरन ही चलेंगे हवेली?" उसने ऊँची आवाज़ में पूछा
"मेरा ख़्याल है हमें वक़्त ज़ाया नही करना चाहिए, वक़्त कम है और सफ़र लंबा। महल भी जल्द से जल्द पहुंचना है।"
गुसलखाने के बंद दरवाज़े के पीछे से गूंजती हुई आवाज़ बाहर आई। बाहर आकर सागर भाई अपने मन में आलीपुर की बनी तस्वीर के बारे में बात करने लगी
"आलीपुर में नैतिकता आसमान छूती है। हमलोग कई जगह पर गए लेकिन ऐसे लोग बहुत कम मिलते है।...
अगर अम्हेल इनकी छोटी साहबजान है तो उसने क्या ही संभाला हुआ है अपने लोगों को।"
अभी इनलोगों ने अलीपुर की बातें शुरू किया था इतने में जमाल इनका नाश्ता और पानी रखकर वापस चला गया।
राघव ने उसके जाने के बाद सागर भाई की अधूरी बात पूरी किया
"सही कहा आपने। कोई शक नही की अम्हेल ऐसी क्यों हैं। हमने ये भी तो देखा कि कितना मान करते है ये लोग अपनी छोटी साहाबजान पर, ज़ाहिर है जहां के लोगों का मार्गदर्शन अम्हेल के हाथों में हो....।"
"उसे लेकर मेरे ख़्याल में कभी ये आया भी नही था की उसका रुतबा, उसकी हस्ती इतनी ऊंची भी हो सकती है, मेरी नज़र में वो बिल्कुल आम सी थी।...
कब, कैसे, कहां किसी के लिए नज़रिया बदल जाए कुछ नही कहा जा सकता।"
महल में पहली दफ़ा आई हुई अम्हेल से लेकर अभी तक की तस्वीर को अपने मन में उतारते हुए सागर भाई ने कहा
"मगर आपको मालूम है कि अम्मा साहब ने हमें ये बातें मालूम करने के लिए क्यों भेजा। यक़ीनन उन्हें ये सबकुछ पहले से मालूम होगा।"
"इस मामले से हमें दूर रहना है अभी, मगर इतना तो समझ सकते है की इसके पीछे बड़ी वजह है वरना अम्मा साहब ऐसा न करतीं।"
"आप सोचिए वो महल आईं और उन्हें महल के बाहर आने जाने के लिए सिपाहियों को देख रेख में कर दिया गया - किसी आम के लिए महल कि तरफ़ से ये क्यों किया जाएगा? और तो और उन्हें अनाबी की नज़रों से भी महफूज़ रखा गया है।"
"वो ख़ास मेहमान बनकर महल आई। शेख़ बाबा के ज़ेरे पनाह हुईं उसके बाद ये सारे अमल।" उन्होंने सोचते हुए कहा
"बात बड़ी तो है - मैंने तो रुक्मणी से ये भी सुना है कि उन्हें किसी भी तरह की हानि से महफ़ूज़ रखने के लिए शरबती के भी ख़ास पनाह में रखा गया है।...
इसके बारे में हमें आगे चलकर मालूम हो ही जाएगा।"
आलीपुर में अम्हेल का मर्तबा देखकर उसके लिए इनके मन में इज़्ज़त और बढ़ जाने की वजह से उससे जुड़े कई सवालों के जवाब ढूंढने का और अपने काम को और बारीकी से करने का मन बना लिया । उनकी थकन अपने काम को अंजाम तक पहुंचाने के बारे में सोचते ही गायब हो गई। नाश्ता ख़त्म करके राघव भी अपना हुलिया दुरुस्त करने चला गया।