DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 7 Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 7

"आपने बताया नहीं मुझे?" लाइब्रेरी जाते हुए कुसुम ने अम्हेल के सामने बे शानो गुमान ऐसा सवाल किया जिससे अम्हेल भी जुस्तुजू में पड़ गई

"क्या नही बताया हमने तुम्हे?" उसकी आंखें हैरानी से बड़ी हो गईं 

"यही की.. ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से बरसती शबनम के अंधेरे के बीच आज ये खिली खिली ख़ुशी नज़र आ रही है?" चिढ़ाते हुए कुसुम ने अम्हेल को कमरे में किया हुआ सवाल दुबारा याद दिलाया

"अच्छा ये!..ये तो बबाजान की वजह से।" उसके लबों पर गहरी मुस्कान सज गई

"हम्मम, बाबजान की वजह से। मुझे ये समझ लेना चाहिए था... हर बार की तरह इस बार भी।" 

ठिठोली करते हुए उसने अपनी आवाज़ ऊंची करके अम्हेल को परेशान किया "बाबजान आप ऐसे आते रहा करिए।" 

उसकी तेज़ आवाज़ चारों तरफ़ गूंज गई।
"कुसुम!" हंसते हुए अम्हेल उसे दौड़ाने लगी, भागा भागी करते हुए दोनो लाइब्रेरी के अंदर पहुंच गईं।

अंदर सबसे पहले दरवाज़े के पास पहुंचते ही अम्हेल का चेहरा अचानक से बिल्कुल सुन्न पड़ गया, उसकी हंसी एकदम ग़ायब हो गई। उसने बेअवाज़, दरवाज़े के पीछे ख़ुद को छुपाकर चुपके चुपके कमरे में झांकना शुरू कर दिया। 

किताबों से घिरा कमरा जिसमें बड़ी सी खिड़की से हल्की रौशनी की बारिश हो रही थी। उसी धुंधली पीली रोशनी के तले किताब लिए, सफ़ेद कुर्ते में, दूसरी तरफ़ के दरवाज़े से बाहर जाता हुआ वही शक्स जिसे अम्हेल ने बग़ीचे में उस रात टहलते देखा था, उसकी उंगली में वो अंगूठीयां अभी भी वैसी ही थी और इस दफ़ा ठंड से बचने के लिए उसने अपने कंधो पर शॉल डाला हुआ था। अम्हेल ग़ौर से उसे जाते हुए देखने लगी, अम्हेल को देखकर कुसुम ने इसके पीछे से उचक कर कमरे में देखते हुए कहा

"ये वलिए मीर की किताबें है, यहां पर सिर्फ़ वही आ सकते है हम नही जा सकते। हमें ऊपर  ही जाना होगा।" 

उसकी बात सुनकर अम्हेल का चेहरा सूख गया, कुसुम ने उसे बताया "आप उन्हें नहीं जानती। वो बहुत गुस्सा करते हैं अगर उनकी चीज़ें इधर से उधर हो जाएं, इसलिए बीबीजी के इलावा कोई उनकी चीज़ें नहीं छूने की हिम्मत नहीं करता।" 

"वलिए मीर!?" उसने सन्नाटे में आकर दोहराया

"हां, किताब लेकर वही तो गए हैं अभी।" 

अब अम्हेल के चेहरे पर घबराहट की बूंद आ गई जैसे उसने किसी मौत के फ़रिश्ते को अपने सामने देख लिया हो। उसने फ़िर से ख़ुद को सिमट कर छुपा लिया।

"वैसे तो वो आपको कुछ नही कहेंगे। आप महल की ख़ास मेहमान जो हैं लेकिन बाक़ियों को डांट पड़ सकती है।... लेकिन अगर आपको जाना हो तो आप बीबीजी के साथ जा सकती हैं।" ये वाला मंसूबा उसने फुसफुसा कर बताया 

"नहीं।" अम्हेल ने बड़ी मुश्किल से ख़ुद के दर्द को छुपाकर उसे जवाब दिया

"ठीक है फ़िर चलिए अब हम चलते हैं।" कुसुम ऊपर की तरफ़ बढ़ रही थी, अम्हेल उसके पीछे ख़्यालों में डूबी चल रही थी।

उसके सामने फ़िर से वलिए मीर घूमने लगे, फिर उसके दिल में दर्द उठने लगा। ये वो दर्द था जिसे न वो छुपा पा रही थी और न उसे दिखा सकती थी। 

इस दर्द से बार बार हारने पर उसने अपने दिल में अपने आप को कोसना शुरू कर दिया, वो ख़ुद से लड़ने लगी इस उम्मीद में की शायद कभी वो इस लड़ाई में जीत जाए। हर बार उसने ऐसा ही सोचा था, लेकिन हर बार वो एक क़दम पीछे ही हुई। 

इस कश्मकश की हालत में वो ऊपर लाइब्रेर पहुंच गई। वहां पहुंचते ही पल में कुसुम की आवाज़ पूरे लाइब्रेरी में गूंजने लगी जिसे सुनकर रुक्मणि ने उसे देखकर आवाज़ लगाया

"कुसुम।" कुसुम उसकी तरफ़ बढ़ गई

"आप दोनो भी यहीं पर हैं?"

"हां, इन्हें भी किताबें चाहिए थीं।" रुक्मिणी ने कहा

"तुम्हारी तबियत बेहतर है? मुझे पता चला था कुछ ठीक नही है।" हया ने कुसुम से सवाल किया जिसका जवाब उसे रुक्मणि से मिला

"उसका कोई भरोसा नहीं है पल में यहां तो पल में कहीं और।" उसके जवाब पर हया ने मुस्कुराकर कहा

"इसे देखकर लगता भी ऐसा ही है।" 

"लेकिन कुसुम तुम इतनी सुबह यहां कैसे आ गई?" ये तंज भरा सवाल रुक्मणि की तरफ़ से उठा

"क्यों मैं नही आ सकती क्या? मैं अम्हेल आपी के साथ आईं हूं।" उसने इतरा कर कहा

"मतलब अम्हेल के लिए आई हो, तभी तो कहूं सुबह सुबह तुम यहां।" रुक्मणि ने कुसुम चिढ़ाना चाहा, उसकी इस हरकत पर कुसुम ने पलट वार किया

"रुक्मणि दीदी......क्या आपको मालूम है कि सागर भाई आपको पूरी जगह ढूंढ रहे है।"

"क्या सच में?" रुक्मणि जल्दी से महल की तरफ़ भाग गई, उसे भागता देख कुसुम ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी 

"देखिए इन्हें ध्यान ही नही की सागर भाई महल में हैं ही नही।" 

"तुमने ऐसा क्यों किया उसके साथ?" हया ने हैरानी से पूछा

"अरे बस यूंही उन्हें परेशान करने के लिए!" 

कुसुम की नजरें अम्हेल को ढूंढने लगी, साथ में हया भी उसे देखने लगी।

अम्हेल पूरी तरह से खोई हुई अपनी ज़रूरत की किताबें ढूंढने में मसरूफ़ थी, इसलिए कुसुम हया के पास ही बैठ गई। 

अम्हेल का मन ख़ुद में इस क़दर उलझ गया था कि उसे आस पास कुछ नज़र नहीं आ रहा था। उसकी ज़रूरत की किताबें उसके सामने होने के बावजूद उसे नज़र नहीं आ रही थी। किताबों के नाम उसकी उलझन में धुंधले हो जा रहे थे। कई बार ध्यान देने के बाद वो समझ पा रही थी वो कौन सी किताबें ढूंढ रही।

"इन्हें किताबों के बीच लादो फ़िर सब भूल जाएंगी।" कुसुम ने उसे देखते हुए मज़ाकाना अंदान में कहा

"ये अम्हेल हैना?" हया की नज़रें भी उसी पर टिक गई थी

"जी।" 

"क्या ये वही है?" हया ने काफ़ी ग़ौर करने के बाद ये सवाल किया था "ये वही अम्हेल है जिसकी चर्चा पूरे महल में है?" 

"हां वही तो हैं।" कुसुम ने बेफिक्री से जवाब दिया

जवाब सुनते ही वो हवा की तरह अम्हेल के सामने आकर खड़ी हो गई। अचानक ऐसा होने पर अम्हेल उसे घबराकर हैरत से देखने लगी। 

अम्हेल मामला तब समझ पाई जब उसने अपना तरर्रूफ़ कराया 

"मैं हया हूं।...तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चहती हूं।"

 लउसकी हैरानी इस बार आगे तब बढ़ी जब उसने हया से बिना किसी वजह बेशानों गुमा न ये मुतालबा सुना, वो सवाल पर सवाल जी कर सकी
"जी!?"

"मेरा भाई सिर्फ़ तुम्हारी वजह से बहिफाज़त है वरना मुझे नहीं मालूम क्या हो जाता।" उसके लहजे में अफ़सोस झलक रहा था "मेरे भाई ने तुम्हारे साथ जो किया ग़लत था इसलिए मैं माफ़ी मांगती हूं।" उसने बेहद नर्मी अपनाया 

अम्हेल पहले से एक झटके में थी, और अब दूसरा झटका भी मिल गया जिसकी वजह से अम्हेल कुछ पल के लिए बेसुध हो गई थी इसलिए हाया की बातों को सुनने के इलावा कुछ नही कर सकी

"मुझे इस बात का पूरा अंदाज़ा है की भाई ने जो किया वो नाक़ाबिले माफ़ी है और मुझे कोई हक़ नहीं की मैं ऐसा कहूं मगर मैं यक़ीनन बेहद शर्मिंदा हूं और तुम्हारी शुक्रगुज़ार भी।"

हया ने दोनों हाथ से अम्हेल का एक हाथ पकड़ा 

"मैं ग़लती पर हूं की मैं उन्हें समझा ही न सकी, उन्हें आगे बढ़ने से रोक नहीं पाई। जो हुआ उसमें मैं बराबर की हक़दार हूं इसलिए मैं रवादार हूं कि मैं तुमसे भी माफ़ी तलब करूं।" 

"देखिए हम समझ रहे है आप किस बारे में बात कर रही है, लेकिन आप किसी माफ़ी की तलबगार नही हैं, और हमें किसी से कोई शिकवा भी नही है।" उसने मामला अपने मन में सुलझाने के बाद ही उसे जवाब दिया

"नहीं, मुझे नहीं मालूम ऐसा क्यूं हुआ बस उनकी क़िस्मत उनका साथ नहीं दे पाती है।"

"ऐसा नही है, क्या ये ज़रूरी है के भाई के कसूर पर बहनें शर्मिंदा हो और बहनों की वजह से भाई। अपने गुनाह का हिस्सेदार सिर्फ़ वही है जिसका गुनाह होता है। जिसने उसका साथ नहीं दिया, न ही उसे इल्म हो तो कैसे...कैसे कोई बन सकता है गुनाह का हिस्सेदार?" उसे देखकर बेलोस हवेली में अपनों के बीच अपनी बेबसी अम्हेल को याद आ गई

उसकी बात सुनकर हया ने ख़ामोशी थाम लिया। अम्हेल ने आगे कहा

"आपको भी मालूम होगा— हर इंसान अपने किए का ज़िम्मेदार ख़ुद होता हैं फिर आप क्यों इतना कुछ सोच रही है।... सही ही तो है किसी का गुनाह कोई अपने ऊपर लेकर क्यों घूमे। भले ही वो आपके भाई हैं लेकिन उनकी सज़ा तो उन्हें अकेले ही काटना पड़ेगा।" 

"तुम्हारी बात सही है लेकिन अगर मैंने ऐसा नही किया तो मुझे मलाल होगा।"

"मलाल तो दोनों सूरतों में होना ही है, क्योंकि आप उनकी बहन है।"  हया कुछ पल अम्हेल को देखकर उसकी बातों का मतलब समझने लगी, समझ जाने पर वो हल्का मुस्कुराई 

"मैंने मीरास महल को बहुत अलग पाया है, ये दीवारें सबको अपना बनाने की कला ख़ूब रखती हैं।"

"सही कहा आपने, ये वाक़ई किसी को भी अपना बना लेती है।" अम्हेल भी यहां से मिले अपनेपन में डूब गई, दोनों नरमी से मुकुराने लगे।

अपनी किताबें लेकर अम्हेल हया के साथ बैठ गई। दोनों के बीच कुसुम ने चंचलाते हुए आ गई

"मैं देख रही हूं अम्हेल आपी अब आपको एक नई साथी मिल गईं हैं लाइब्रेरी आने के लिए। अब आप मुझे भूल जाएंगी?" 

"तुम क्या किसी को ख़ुद को भूलने दे सकती हो?" अम्हेल ने उसे तंग किया

"हम तुम्हें साथ लेकर आया करेंगे।" हया ने जवाब दिया

"हां अब ठीक है।" कुसुम बोली 

"तुम्हें कहानियों का शौक़ है?" मेज़ पर रखी किताबों को देखकर हया ने अम्हेल से पूछा

"ख़ाली वक़्त में पढ़ लेते है।"

"मुझे भी कभी कहानियों का शौक़ था।......" अपने बचपन को याद करके उसने बताया

"अब नहीं पसंद?" कुसुम ने पूछा

"पसंद है पर अब इन्हें पढ़ने का दिल नहीं चाहता।" हया ने जवाब दिया

"ऐसा अक्सर होता है कि जो चीज़ पसंद हो उससे ही दूर रहना पड़ता है।... नजाने ऐसा क्यों होता है?" अम्हेल भी अपने ख़्यालों में डूब गई

"ये तो हमारे लिए ही होता है। हम नही जानते की इस दुनिया में हमारे लिए क्या बेहतर है और क्या नहीं मगर ख़ुदा को तो दोनो जहां का इल्म है, और वो हमें उसी चीज़ से नवाज़ता है जो हमारे लिए बेहतरीन है।"

"सही कहा आपने।" मायूसी में भटकती सांस खींचते हुए अम्हेल आहिस्ता से जवाब दिया

"मैं भी बचपन में भाई की तरह ख़ुद को एक डॉक्टर के रूप में ही देखती थी। मेरे शानो गुमान में भी नहीं था कि मैं वक़ालत सीखूंगी।" 

"आप वकालत जानती हैं?" कुसुम उत्सुक हो गई "अभी तो माशरे में लड़कियों की तालीम भी आम नहीं हुई है और आपने वक़ालत भी सीख लिया?" 

"हां मैने कई कस्बों में सीखा है,... और परसों कक्षदरबार में मेरी हाज़री भी लगनी है।"

"अरे वाह, ये तो बड़े मज़े की बात है। तब तो आप यक़ीनन अव्वल दर्जे की वक़ालत जानतीं होंगी।...
मैं तो सबको बताऊंगी।" कुसुम ने खुश होकर कहा

"नहीं ऐसा भी नहीं है।" 

"ऐसा नहीं है?... मैंने बाबा, मुंशीजी और बाक़ी मंत्रियों से तो ऐसा ही सुना है - उन्होंने कहा था वकील कक्षदरबार से ही लेना, वहां अव्वल दर्जे वाले होते हैं।"

"हां वहां होते हैं, पर अभी मैं गईं नहीं हूं।"

"कोई बात नहीं, आप तेज़फ़हम हैं ज़रूर पहुंच जाएंगी।" उसकी इनकेसारी पर दोनों मुस्कुरा उठे
"काश मैं भी आपलोग की तरह होती तो मैं भी सब कर सकती।" 

"क्यों! अभी नही कर सकती क्या?" हया ने पूछा

"मुझे न घुड़सवारी, तीरंदाज़ी, तलवारबाज़ी बहुत पसंद है, लेकिन बाबा मुझे उनके बीच जाने नही देते।"

"क्यों?" अम्हेल ने पूछा

"उन्हें लगता ही अभी मैं बहुत छोटी हूं और बाबा डरते हैं कहीं उनके बीच जाने से मुझपर बचपन का खौफ़ तारी न हो जाए क्योंकि कई बार ऐसा हो चुका है।"

"बचपन का खौफ़?" दोनो की तरफ़ से एक ही सवाल आया, कुसुम ने दोनों को देखकर हल्के अंदाज़ में सादगी से से बताया 

"हां...असल में जब मैं सात साल की थी तब मेरे बाबा को मीरास महल की तरफ़ से जंग में जाना था। मुझे याद है उन खनखती हुई तलवारों के बीच जब मेरे बाबा को तीर लगा था और वो उन लोगों के साथ वहीं तीर खाकर सो गए थे। उसके बाद से ही वो सारी आवाज़ो ने मुझे डराना शुरू कर दिया है और इसलिए तो मैं कुछ नही कर पाती।"

"तुम्हारे बाबा!" एक और हैरत अंगेज़ कर देने वाला खुलासा सामने आया

"हां मेरे बाबा, सबसे अव्वल दर्जे के सिपाह सालार थे। वो किसी से नहीं डरते थे, बल्कि कई कस्बे के लोग उनसे घबराया करते थे।" 

कुसुम की दास्तान सुनकर दोनो उदास हुए मगर उससे ज़्यादा हैरान हुए। उनदोनों के सामने कुसुम का एक ऐसा पहलू आ गया था जिसका उन्हें कोई अंदाज़ा भी नही था। कुसुम की आपबीती पर दोनों अपना दर्द भूल गई और बस उसे देखती रह गई। 

अभी तक उसकी हंसी की खिलखिलाहट लाइब्रेरी में गूंज रही थी, और अब उसकी ख़ामोशी के साथ पूरी लाइब्रेरी में सन्नाटा छा गया जैसे यहां कोई मौजूद ही न हो। उस पल उस सन्नाटे को चीरते हुए बुलंद आवाज़ अंदर आई

"कुसुम महल लौट आओ बाबा ने बुलाया है।"

इस आवाज़ ने हया और अम्हेल को कुसुम की दास्तान में से बाहर खींच लिया, खड़े होते हुए कुसुम का तेवर और लहजा फिर बदल गया

"बाबा को बहुत तकलीफ़ हो जाती है जब मुझे वो मंज़र याद आ जाता है इसलिए वो मुझे तलवारों के बीच जाने नहीं देते।" उसने फ़िर से चंचलाते हुए मुस्कुराकर कहा "चलते हैं अब, बाबा ने बुलाया है।" 

आज महल की ज़मीन की दास्तान के ख़ज़ाने में से एक नई दास्तान निकल कर सामने आई जिसका वाक़ई किसी को कोई अंदाज़ा नही था। हंसते हुए चेहरे के पीछे कितने राज़ दफ़न है कोई महसूस भी नहीं कर सका। उसका हंसता चेहरा सबके दिल को बहलाने का सबब अलबत्ता बना मगर उसका दर्द सिर्फ उसके अंदर ही छुपा बैठा था। उसके दर्द ने सबसे छुपकर उसके दिल की गहराई में अपनी ऐसी जगह बनाई की अब उनके साथ उसने मुस्कुराकर, हंसकर रहना सीख लिया था।