अनकहा सच ( भाग - 12) Vishakha Pareek द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अनकहा सच ( भाग - 12)

अनकहा सच___

इसके बाद छुट्टियां खत्म हुई और राजू और हितेश वापस शहर की तरफ चले गए।

शहर की तरफ जाने के कुछ दिनों तक सब वैसा ही चलता रहा। राजू परेशान रहा, हितेश उसे संभालता रहा। राजू की हालत देखकर हितेश भी असमंजस में रहता।
एक रोज हितेश के फोन पर फोन आया। उसके पापा का अचानक से रात को इतना लेट फोन आता देख हितेश परेशान हो गया। उसने तुरंत फोन उठाया और अपने पापा से पूछा, "क्या हुआ पापा? इतनी लेट फोन क्यों किया?"
उसके पापा ने कहा, "नहीं बेटा, मैं बस कुछ परेशान था तो।"
हितेश ने पूछा, "परेशान किस से?"
उसके पापा ने उससे कहा, "क्या तुम कल घर आ सकते हो?"
हितेश परेशान हुआ, "घर क्यों? लेकिन क्या हुआ? आप ठीक तो हैं ना?"
उन्होंने कहा, "नहीं, बस तुम आ जाओ। मुझे तुम्हारी याद आ रही है।"
हितेश ने चिंता जताते हुए कहा, "सब ठीक तो है ना?"
उसके पापा ने संतुष्टि दी, "हां बिल्कुल ठीक है, बस तुम्हारी याद आ रही थी।"
हितेश ने कहा, "ठीक है, मां कैसी है?"
उन्होंने कहा, "मां भी ठीक है।"
हितेश ने कहा, "ठीक है, मैं आ जाऊंगा।"
हितेश के पापा ने कहा, "सुनो, राजू को भी ले आना साथ में।"
हितेश ने कहा, "राजू को?"
"हां, ले आना।"
हितेश ने ज्यादा सवाल नहीं किए। वो सीधा बोला, "ठीक है।"
अगले दिन उसने राजू को कहा कि उसके पापा ने मिलने बुलाया।
तो राजू ने कहा, "हां जाओ।"
उसने कहा, "तुम्हें भी।"
राजू ने कहा, "मुझे?"
हितेश ने कहा, "हां।"
तो राजू ने पूछा, "कोई बात?"
हितेश ने कहा, "नहीं, बस उन्होंने कहा।"
फिर राजू ने बिना ज्यादा सवाल किए चलने के लिए हां कह दी। दोनों गांव चले गए।
हितेश के पापा का अचानक फोन आना, राजू और हितेश को गाँव बुलाना, उनसे मिलने के लिए बुलाना... यह बात हितेश को लगातार परेशान कर रही थी।
खैर, दोनों गाँव पहुँचते हैं। गाँव पहुँचने के बाद पिछली बार की तरह इस बार भी हितेश के पापा उन्हें लेने बस स्टैंड पर आते हैं। वे बस से उतरते हैं और उसके पापा से मिलते हैं।
हितेश अपने पापा से मिलते ही अचानक से पूछता है, "क्या हुआ पापा? आपने हमें अचानक ऐसे कैसे मिलने के लिए बुलाया?"
उसके पापा कुछ नहीं कहते हैं, लेकिन उनके चेहरे से टेंशन बराबर दिख रही थी।
हितेश और राजू परेशान होते हैं और उनसे फिर पूछते हैं। वह सिर्फ इतना ही कहते हैं, "तुम घर चलो... फिर बात करते हैं।"
हितेश और राजू चुपचाप बिना कुछ कहे उनके साथ घर चल देते हैं। घर पहुँचते हैं, बैठते हैं। हितेश की माँ पानी लेकर आती है, उन्हें पानी देती है। वह पानी पीते हैं। हितेश की माँ भी वहीं बैठ जाती है।
फिर हितेश पूछता है, "क्या हुआ? आपने अचानक ऐसे कैसे बुलाया? अब तो बताइए, कोई बात है क्या? आपको पता है, आपने अचानक ऐसे बुलाया तो मुझे कितना डर लग रहा है! मुझे कितनी घबराहट हुई है, मैं कितना परेशान हो गया हूँ!"
(हितेश बोलता है)
उसके मम्मी-पापा उसे शांत कराते हैं, उसे सांत्वना देते हैं कि ऐसी कोई भी बात नहीं है, "तुम डरो मत, कुछ नहीं हुआ है, हम तो बस ऐसे ही मिलने के लिए..."
लेकिन उनका चेहरा देखकर हितेश परेशान ही रहता है। राजू हितेश को संभालते हुए कहता है, "तू शांत रह, बता देंगे ना... बस मिलने बुलाया है।"
और फिर राजू भी घबराकर पूछता है, "क्या बात है अंकल-आंटी? आपने हमें अचानक ऐसे कैसे बुलाया?"
राजू के इतने बोलने भर से ही हितेश के माँ-पापा, जो अब तक परेशानी में दिख रहे थे, जो लग रहा था मानो वह खुद को किसी बात को लेकर संभाल रहे हैं... उनके सब्र का बाँध अचानक टूट जाता है!
वे राजू के सामने आते हैं, राजू के हाथों को पकड़कर उससे माफी मांगने लगते हैं। उसके आगे हाथ जोड़कर वह यही कहते हैं, "राजू, हमें माफ कर दो...!"
और हितेश की माँ रोना शुरू कर देती हैं। उसके पापा की आँखों से भी हल्के-हल्के आँसू निकल आते हैं। राजू के सामने बस दोनों यही कहे जा रहे थे, "हमें माफ कर दो राजू... हमें माफ कर दो..."
राजू यह देखकर घबरा जाता है। हितेश परेशान हो जाता है कि आखिर क्या हुआ! दोनों बहुत घबरा जाते हैं, परेशान हो जाते हैं।
राजू एकदम परेशान सा होकर कहता है, "अंकल-आंटी... क्या हुआ? आप ऐसा क्यों कर रहे हो?"
वह घबरा जाते हैं, लेकिन हितेश के मम्मी-पापा माफी मांगना बंद ही नहीं करते...