"अनकहा सच____"
फोन वाली उस बात के बाद भी ऐसे ही कुछ दिन बीतते चले गए...
एक दिन कोचिंग से लौटते समय राजू ने घर जाने के लिए एक ऑटो लिया। ऑटो में उसकी बगल में आकर एक दूसरा शख्स बैठा।
ऑटो में बैठे उस शख्स से राजू की हल्की-फुल्की बातचीत होने लगी। बातों ही बातों में दोनों को पता चला कि वे दोनों तो पड़ोसी गाँव से ही हैं! दोनों यह जानकर बेहद खुश हुए कि इस अजनबी शहर की भीड़ में कोई तो अपने इलाके का मिला—पड़ोसी ही सही, पर गाँव का तो है।
बस फिर क्या था, कोचिंग से लौटते वक्त रोज उनकी मुलाकात होने लगी और आपस में बातें भी। धीरे-धीरे वे दोनों काफी अच्छे दोस्त बन गए। भरी भीड़ के किसी कोने में अपने इलाके के किसी चेहरे का मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं होता हैं ठीक वैसे ही इस अनजाने शहर में मानों दोनों को एक-दूसरे के रूप में कोई अपना मिल गया हो।
उस शख्स का नाम हितेश था।
राजू और हितेश दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गये थे।
एक दिन बातों ही बातों में हितेश ने राजू से पूछा, "और बता भाई, तेरे घर पर सब कैसे हैं?"
राजू ने उसकी तरफ देखा और फिर तुरंत अपनी नजरें चुराकर बोला, "सब ठीक हैं..."
"बातें होती रहती हैं तेरी घर पे?" हितेश ने सहजता से पूछा।
राजू ने थोड़ी खामोशी के बाद कहा, "हम्म... हो जाती है कभी-कभी।"
"कभी-कभी?! रोज नहीं करता क्या तू बात?" हितेश ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
"नहीं, मैं रोज नहीं करता... बस कभी-कभी होती है," राजू ने धीमी आवाज में कहा।
"अच्छा! सही है यार... मेरे घरवाले तो रोज फोन करके परेशान कर देते हैं, बिल्कुल प्राइवेसी ही नहीं देते! तेरा सही है भाई," हितेश ने मुस्कुराते हुए कहा। राजू बस हल्का सा "हम्म..." कहकर रह गया।
फिर हितेश ने बड़ी उत्सुकता से आगे पूछा, "वैसे कौन-कौन है तेरे घर में?"
राजू ने बताया, "माँ हैं, पापा हैं, एक छोटी बहन है... दादा-दादी और चाचा-चाची भी हैं। पर मम्मी-पापा, मैं और बहन साथ रहते हैं। दादा-दादी कभी चाचा-चाची के साथ रह लेते हैं तो कभी हमारे साथ।"
"अरे वाह! बढ़िया है यार," हितेश ने कहा, "
वैसे तूने कभी अपने परिवार के बारे में ज्यादा बताया ही नहीं यार राजू।"
राजू ने हितेश की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहां, "अरे यार! तूने पूछा ही नहीं तो मैंने बताया भी नहीं...
हितेश ने हंसते हुए कहां.... सही में यार , मैं तो अपनी ही हांकने में लगा रहता हूँ! देख, मैंने तुझे अपने बारे में सब बता दिया पर तेरे बारे में पूछना ही भूल गया। आज पता नहीं कैसे याद आ गया मुझे!"
हितेश की बात सुनकर राजू ने भी बस मुस्कुराकर हाँ में सर हिला दिया... लेकिन उसकी आँखों के पीछे की घबराहट साफ दिख रहीं थी, जिसे हितेश भाप सकता था लेकिन वो सीधे राजू से कुछ नहीं कहना चाहता था लेकिन उसे लगने लगा था कि राजू किसी बात से काफी परेशान रहता हैं, जिसे वो बताना नहीं चाहता। वैसे तो हितेश उम्र में राजू से छोटा था लेकिन समझदारी में राजू के बराबर ही था।राजू के इस परेशानी भरे चेहरे को देखकर हितेश को राजू की चिंता लगी रहती थी।।।