अनकहा सच___
धीरे-धीरे हितेश और राजू की दोस्ती बहुत गहरी होती जा रही थी। दोनों इस अजनबी शहर में अपनी-अपनी ज़िंदगी जी रहे थे, पर हर दिन का उनका एक-दूसरे का साथ उनके सफ़र को आसान बना रहा था।
ऐसे ही बातों-बातों में एक दिन हितेश ने राजू से पूछ ही लिया, "अरे यार, तू कभी गाँव नहीं जाता क्या? मतलब... मैंने तुझे हमेशा यही देखा हैं, कभी घर जाते नहीं देखा।"
हितेश का यह अचानक पूछा गया सवाल सुनकर राजू थोड़ा घबरा गया। उसने खुद को संभालते हुए कहा, "जाता तो हूँ... शायद तेरा ध्यान नहीं रहा होगा।"
हितेश ने थोड़ा सोचकर कहा, "अच्छा? मुझे तो याद ही नहीं कि तूने कभी गाँव जाने का जिक्र भी किया हो!"
"हाँ, कोई बात नहीं... हो सकता है तेरा ध्यान नहीं गया होगा, या मैं गया होऊंगा तब तुझे बताना भूल गया हूँगा," राजू ने बात को किसी तरह दबाते हुए कहा।
"हाँ, हो सकता है। कोई नहीं! इस बार जब तू गाँव जाएगा न, तो हम दोनों साथ में ही चलेंगे। पास-पास ही तो हैं यार हमारे गाँव, इसका तो फायदा उठाए, बड़ा मज़ा आएगा!" हितेश ने उत्साह से कहा।
यह सुनकर राजू ने सहमते हुए बस इतना कहा, "हूँ..." और मन ही मन इस बात को टालने का रास्ता सोचने लगा।
लेकिन हितेश इतना बेवकूफ़ नहीं था। उसने राजू के चेहरे के हाव-भाव देख लिए थे , उसे समझ आ रही थी हितेश के अंदर की चल रही घबराहट। आखिर में, उसने थोड़ा गंभीर होकर कहा, "देख राजू, मैं काफी समय से एक बात नोटिस कर रहा हूँ... जब भी मैं तेरे गाँव या परिवार की बात छेड़ता हूँ ना, तू उस बारे में बात ही नहीं करना चाहता! और बात करता हैं तो किसी तरह बस उस बात से बचना चाहता हैं , टालना चाहता हैं, कोई बात है क्या यार?"
उसकी बात सुनकर राजू सहम गया और उसके हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे। उसकी घबराहट साफ़ दिख रही थी। उसने किसी तरह बात संभालते हुए कहा, "नहीं तो! ऐसी तो कोई बात नहीं है... तुझे बस ऐसा लग रहा है। वो बस... मैं पढ़ाई में थोड़ा बिज़ी रहता हूँ ना, तो सोचता हूँ कि इन बातों में क्या समय बर्बाद करना। बस इसलिए थोड़ा कम ही आता-जाता हूँ, और बात नहीं करता क्योंकि फिर बात करुगा तो घर की याद आएगी तो बस इसलिए ही, और कोई बात नहीं है।"
हितेश ने उसकी तरफ देखा और कहा, "अच्छा... सच में क्या? राजू का चेहरा देखकर उस बात को वहीं छोड़ते हुए कहां कि चल कोई ना! वैसे भी अब तो कोचिंग की छुट्टियाँ आने ही वाली हैं। दिवाली आ रही है, तो छुट्टियाँ तो मिलेंगी ही ना? बस, इस बार साथ में ही चलते हैं फिर! मेरी भी छुट्टियाँ हैं और तेरी भी... बहुत मज़ा आएगा।"
हितेश आगे की प्लानिंग बनाते हुए बोला, "एक काम करते हैं, जैसे ही छुट्टियाँ शुरू होंगी, हम तुरंत निकल चलेंगे। और हाँ, इस बार मैं तुझे अपने घर भी ले चलूँगा और अपने घरवालों से भी मिलवाऊँगा!"
राजू के पास हितेश की हाँ में हाँ मिलाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था, लेकिन उसके मन के अंदर एक नया तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था...