अनकहा सच ( भाग - 1) Vishakha Pareek द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अनकहा सच ( भाग - 1)

"अनकहा सच____"

"किसी अनकहे सच का पता लगाना ठीक उतना ही मुश्किल है, जितना आग की लपटों से किसी ज़िंदा इंसान को निकाल लाना..."

एक ऐसे ही अनकहे सच की तलाश में था राजू।
उसे खुद मालूम नहीं था कि वह किस राह पर चल रहा है। वह तो बस अपने ही विचारों में खोया हुआ था। उसे रह-रहकर लगता था कि कुछ है जो पीछे छूट रहा है—कोई ऐसी बात जो हवा में तैर रही है, पर उसकी पकड़ से बाहर है।
लेकिन हकीकत में देखा जाए तो ऐसा कुछ था ही नहीं। उसके सामने सब कुछ साफ था, बिल्कुल खुली किताब की तरह। फिर भी, न जाने क्यों उसके मन के किसी कोने में एक अटका हुआ, छूटा हुआ सच बार-बार दस्तक दे रहा था...
राजू, एक 23 साल का लड़का, जिसने हाल ही में दुनियादारी सीखना शुरू ही किया था। वह अपने छोटे से गाँव को छोड़कर शहर में अपनी आगे की पढ़ाई के लिए आया था। दरअसल, राजू अपनी B.Sc पूरी कर चुका था और अब प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams) की तैयारी के लिए शहर के एक नए माहौल में ढलने की कोशिश कर रहा था।
वहाँ आकर उसने ठीक वैसा ही किया जैसा हर नया लड़का करता है—किराए का एक छोटा सा कमरा लिया, पढ़ाई का टाइमटेबल बनाया और शहर की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया... लेकिन इस सब के बीच, उसके दिमाग में चल रही उथल-पुथल शांत नहीं हो रही थी।
राजू हर दिन की शुरुआत एक नए उत्साह के साथ करना चाहता था, लेकिन न जाने क्यों उसके भीतर एक अजीब सा खालीपन था, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। अगर उसके परिवार की बात करें, तो गाँव में उसका एक बहुत ही छोटा सा परिवार था—माता-पिता, एक छोटी बहन और दादा-दादी , चाचा चाची। उसके चाचा चाची अलग रहते थे उनसे ओर दादा दादी कभी उनके साथ तो कभी राजू के परिवार के साथ रहते थे मगर ज्यादातर राजू के परिवार के साथ ही रहते थे।
एक दिन राजू के पास उसकी बहन का फोन आता है। दोनों आपस में बातें करते हैं। बातों ही बातों में राजू पूछता है, "घर पर सब कैसे हैं? दादा-दादी कैसे हैं?"
बहन ने हंसते हुए कहा, "सब ठीक हैं। दादाजी को थोड़ी खांसी-जुकाम है, पर अपनी सेहत का ध्यान रखते हैं। और दादी... दादी का तो रोज का बड़बड़ाना चालू ही रहता है! उससे हमारा भी मन लगा रहता है और उनका भी।"
फिर राजू ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ पूछा, "और... माँ कैसी है?"
बहन ने थोड़ी खामोशी के बाद धीमे से जवाब दिया, "ठीक है।"
"और पिताजी?" राजू ने आगे पूछा।
बहन ने कहा, "वो भी ठीक हैं। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, फालतू बातों में ध्यान मत दिया करो।"
फोन रखने से ठीक पहले राजू ने हिचकिचाते हुए पूछा, "लेकिन... तुम कैसी हो?"
यह सुनते ही बहन खामोश हो गई। कुछ देर की गहरी खामोशी के बाद उसने बहुत ही धीमी आवाज में कहा, "मैं... ठीक नहीं हूँ।"
"हूँ... ठीक है, मैं फोन रखता हूँ," राजू ने कहा और फोन काट दिया। फोन रखने के बाद राजू काफी देर तक शांत बैठा रहा, जैसे किसी पुराने ख्याल में खो गया हो। पर फिर वह उठा, अपने काम में लगा, पढ़ाई की, खाना खाया और सो गया...