अनकहा सच (भाग-9) Vishakha Pareek द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अनकहा सच (भाग-9)

हितेश ने उत्सुकता से पूछा, "अच्छा... तो फिर ऐसा क्या हुआ राजू?"
राजू ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए भारी मन से कहा, "पहले तो उन्हें बस शराब की थोड़ी लत लगी थी... पर धीरे-धीरे बात बढ़ती गई और अब यह हालत हो गई है।"
हितेश कुछ देर शांत रहकर सोचता रहा। फिर उसने एक शंकाजनक सवाल करते हुए कहा, "पर राजू... मुझे एक बात बहुत अजीब लग रही है, कुछ है जो खटक रहा है..."
राजू ने झिझकते हुए पूछा, "क्या? क्या खटक रहा है तुझे?"
हितेश ने एक गहरी सांस ली और बात को सँभालते हुए कहा, "चल छोड़ यार... फोन पर इन सब बातों में क्या दिमाग लगाना। हम मिलकर बात करते हैं! वैसे भी पास का ही तो गाँव है, ज़रा सी दूरी पर तो हैं हम। मैं सीधे तुझसे मिलने आ रहा हूँ, फिर शांति से बैठकर बात करते हैं।"
हितेश का यह कहना राजू को फिर से किसी गहरी सोच में डाल गया।
फोन पर बातचीत के ब
दौरान हितेश ने पूछा, "बता, कहाँ मिलना है? तू मेरे गाँव आ रहा है, मैं तेरे पास आऊँ या फिर कोई बीच की जगह ढूँढें?"
राजू ने कहा, "जहाँ तुझे सही लगे, बता दे भाई।"
हितेश बोला, "चल, किसी बीच की जगह पर मिलते हैं... न तेरा गाँव, न मेरा गाँव!"
दोनों ने अपने-अपने गाँव के बीच की एक शांत जगह पर मिलने का प्लान बनाया। थोड़ी देर में राजू और हितेश वहाँ पहुँच गए।
शुरुआत में दोनों के बीच सामान्य बातें होने लगीं। राजू ने हितेश से पूछा, "और बता भाई, घर पर सब कैसा चल रहा है?"
हितेश ने बताया, "बस यार, वही दिवाली वगैरह की तैयारियाँ चल रही हैं, तो थोड़े बहुत घर के कामों में बिज़ी था।"
फिर अचानक हितेश का चेहरा गंभीर हो गया। उसने राजू की तरफ देखते हुए कहा, "राजू... एक बात पूछूँ तुझसे?"
राजू ने कहा, "हाँ बोल न! तू फोन पर भी कह रहा था कि तुझे कुछ खटक रहा है... क्या हुआ?"
हितेश थोड़ा हिचकिचाते हुए बोला, "देख, अगर तुझे नहीं बताना हो तो कोई बात नहीं... मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है पूछते हुए, लेकिन मुझसे रहा नहीं जा रहा। इसलिए पूछ ही लेता हूँ... उस दिन जब तेरे घर पर वह सब हंगामा हुआ, तो तेरी बहन जब तेरे पापा को संभालने गई, तो उन्होंने उससे ऐसा क्यों कहा—'मुझे तेरा चेहरा नहीं देखना, निकल जा यहाँ से!'? मतलब... ऐसी क्या बात है यार? देख, बुरा मत मानना, मुझे बस थोड़ा अलग लगा तो पूछ लिया..."
हितेश की बात सुनकर राजू अंदर तक काँप गया। उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं।
राजू ने एक गहरी और भारी सांस ली। उसकी आँखों में आँसू छलक आए। उसने खुद को सँभालते हुए रुंधे गले से कहा, "पता है हितेश... पहले ऐसा कुछ भी नहीं था। जब मैं सात साल का था ना, तब तक मुझे सब याद है... सब एकदम ठीक था। हमारी भी एक बहुत ही खुशहाल फैमिली थी, बिल्कुल वैसी जैसी आज तेरी है। सब बहुत बढ़िया चल रहा था..."
राजू बोलते-बोलते थोड़ा हकलाने लगा। उसने फिर से एक गहरी सांस ली और आँखें बंद करके बोला, "फिर... मेरे सात साल के होने के बाद, मेरी माँ ने दो जुड़वाँ बच्चों को जन्म दिया... मेरे छोटे भाई और बहन।"
"अच्छा..." हितेश ने हैरानी से राजू की तरफ देखते हुए कहा।