अनकहा सच (भाग -5) Vishakha Pareek द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अनकहा सच (भाग -5)

अनकहा सच___

राजू और हितेश घर जाने के लिए निकल पड़े।

हितेश आज बेहद खुश था। आखिर वह पहली बार राजू को अपने गाँव ले जा रहा था, उसे अपने घरवालों से जो मिलवाना था। पूरे रास्ते हितेश के चेहरे पर एक अलग ही उत्साह तैर रहा था। वह मन ही मन योजनाएँ बना रहा था कि गाँव जाकर राजू को क्या-क्या दिखाएगा और घर पर कैसे सबका परिचय करवाएगा।
लेकिन दूसरी तरफ राजू की हालत बिल्कुल अलग थी। उसके मन में रह-रहकर एक अजीब सी हलचल, एक बेचैनी मचल रही थी।
दोनों बस स्टैंड पहुँचे और गाँव जाने वाली बस में बैठ गए। बस जैसे-जैसे शहर की सीमाओं को लाँघकर आगे बढ़ रही थी, राजू की धड़कनें उतनी ही तेज़ होती जा रही थीं। हितेश पूरे रास्ते राजू से बातें करने की कोशिश करता रहा, अपनी पुरानी यादें और गाँव के किस्से सुनाता रहा, लेकिन राजू बस खाली नज़रों से खिड़की के बाहर भागते पेड़ों को देखता रहा। वह हितेश की बातों में हाँ में हाँ तो मिला रहा था, पर उसका ध्यान कहीं और ही अटका हुआ था।
राजू को लग रहा था जैसे यह बस उसे उसके उस अतीत की तरफ खींचकर ले जा रही है, जिससे भागने के लिए उसने शहर का रुख किया था...
हितेश और राजू आख़िरकार हितेश के गाँव पहुँच गए।
बस स्टैंड पर हितेश के पापा उन्हें लेने आए हुए थे। राजू ने गाड़ी से उतरते ही बड़े अदब से हितेश के पापा के पैर छुए और आशीर्वाद लिया।
हितेश ने बड़े उत्साह से अपने पापा से कहा, "पापा, यह मेरा दोस्त राजू है! यह अपने पास वाले गाँव का ही रहने वाला है। यह अपने घर जा रहा था, तो मैं इसे ज़िद करके अपने यहाँ ले आया। मैंने आपको फोन पर इसके बारे में बताया था न!"
हितेश के पापा मुस्कुराए और बोले, "हाँ-हाँ, बिल्कुल! चलो बहुत अच्छा किया। आओ बेटा राजू, घर चलो।"
राजू हितेश के घर पहुँचा। वहाँ उसके घरवाले राजू से बहुत ही प्यार से मिले। हितेश के पूरे परिवार को राजू का सीधा-साधा स्वभाव बहुत पसंद आया। सब उससे हाल-चाल पूछ रहे थे और राजू को भी इतने समय बाद किसी परिवार के बीच बैठकर बातें करना बहुत अच्छा लग रहा था।
बातचीत के दौरान हितेश के पापा ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो राजू बेटा, तुम पास वाले गाँव से हो? गाँव में कहाँ रहते हो और तुम्हारे परिवार में कौन-कौन है?"
राजू ने सादगी से अपने गाँव का नाम और अपने परिवार—अपने माता-पिता और दादा-दादी के बारे में बताया।
जैसे ही राजू ने अपने गाँव और परिवार का नाम लिया, हितेश के पापा के चेहरे के भाव अचानक बदल गए। उनके चेहरे पर गहरी सोच और एक अजीब सी हलचल आ गई, जैसे उन्हें कोई पुरानी बात याद आ गई हो... लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाला, उस बात को अनदेखा किया और मुस्कुराकर राजू से दूसरी बातें करने लगे।
थोड़ी देर बाद राजू ने जाने की इजाज़त माँगी, "अंकल जी, अब मैं अपने घर चलता हूँ।"
"अरे नहीं-नहीं भाई! आज तो तू यहीं रुक जा," हितेश ने तुरंत रोकते हुए कहा।
राजू ने काफी मना किया, लेकिन हितेश और उसके घरवालों के प्यार भरे दबाव के आगे राजू को रुकना ही पड़ा। उसने तय किया कि वह अगली सुबह अपने गाँव चला जाएगा।
अगली सुबह जब राजू ने फिर से जाने की बात छेड़ी, तो हितेश बोला, "अरे तू बस के धक्के खाते हुए क्यों जाएगा? रुक, मैं तुझे अपनी बाइक से छोड़ देता हूँ! वैसे भी तेरे घर वालों से मिलना हो जाएगा।"
यह सुनते ही राजू के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। वह मन ही मन गिड़गिड़ा रहा था कि हितेश उसके घर न जाए। उसने घबराते हुए बहुत मना किया, "नहीं-नहीं हितेश, तू परेशान मत हो... मैं चला जाऊँगा।"
लेकिन हितेश तो हितेश था! उसकी ज़िद के आगे राजू की एक न चली। हितेश हँसते हुए बोला, "अरे मैं छोड़ूँगा ना तुझे! चल, चुपचाप खाना खा ले, फिर दोनों साथ में ही चलते हैं।"
राजू अंदर से बेहद परेशान हो उठा। वह नहीं चाहता था कि हितेश उसके घर कदम भी रखे, लेकिन हितेश की बेफ़िक्र ज़िद के आगे उसे हार माननी पड़ी। दोनों ने खाना खाया, तैयार हुए और हितेश अपनी बाइक चालू करके राजू को उसके घर छोड़ने के लिए निकल पड़ा... राजू के दिल की धड़कनें अब बेकाबू हो रही थीं।