एक दिन की देवियाँ Rinki Singh द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

एक दिन की देवियाँ



बचपन के दिनों में एक बार एक साधु महाराज हमारे गाँव में आए थे। गाँव में साधु-संतों का आना कोई मामूली बात नहीं थी। उनके आते ही लोगों की श्रद्धा जैसे उमड़ पड़ती थी। उनके ठहरने, खाने-पीने और सेवा-सत्कार में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए लोग एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते।
महाराज कुछ दिनों तक गांव के एक घर में विशेष रूप से रुके । जिस घर में सबसे अधिक आदर-सत्कार मिला था, शायद वो घर उन्हें कुछ अधिक ही प्रिय हो गया था, वो घर मेरी दोस्त बुल्ली का था,महाराज के उठने, बैठने, सोने, नहाने और भोजन करने का समय निश्चित था। घर के लोग उनके आगे-पीछे ऐसे लगे रहते, मानो उनकी सेवा में ही जीवन का सारा पुण्य छिपा हो।
एक दिन महाराज ने कहा, 'घर का वातावरण बड़ा अशांत है। एक यज्ञ करवा लीजिए, सब ठीक हो जाएगा।'
घर के लोगों ने उनकी बात सिर-माथे पर रख ली। यज्ञ की तैयारियाँ शुरू हो गईं। हवन हुआ, मंत्र पढ़े गए, घी की आहुतियाँ डाली गईं। अग्नि में न जाने कितनी सामग्री स्वाहा हुई। सबको उम्मीद थी कि अब घर में सुख-शांति उतर आएगी।
यज्ञ के बाद महाराज ने नौ कन्याओं को भोजन कराने की बात कही।बस, फिर क्या था! गाँव की नौ बच्चियाँ चुन ली गईं। हम भी उनमें शामिल थीं।
हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। जीवन में पहली बार किसी ने हमें बताया था कि हम देवी हैं। महाराज ने हम सबको देवियों के नाम भी दे दिए थे। हम उन नामों को लेकर इतराती फिर रही थीं।
आज हम देवी थीं!आज कोई हमें डाँटेगा नहीं। आज कोई काम करने को नहीं कहेगा। आज हमारी हर बात मानी जाएगी।
बचपन में बस इतना ही पता था कि जिस दिन घर में डाँट न पड़े, जिस दिन कोई मार न दे और जिस दिन बिना किसी डर के भरपेट खाने को मिल जाए, वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता।हम नहीं जानती थीं कि देवी होना और देवियों की तरह पूजे जाना दो अलग-अलग बातें हैं।
हममें जो सबसे छोटी थी वो थी ..बुल्ली।
दो दिन पहले उसके पिता ने शराब के नशे में उसे बिस्तर से उठाकर पटक दिया था। उसका दाहिना हाथ मुड़ गया था। माँ ने हल्दी को किसी पत्ते में लपेटकर उसके हाथ पर बाँध दिया था। हाथ सूजकर इतना बड़ा हो गया था कि देखकर ही दर्द होने लगता, मगर आज बुल्ली देवी थी।
एक और लड़की थी,चंचला पड़ोस की ही। उसकी माँ घर के कामों को लेकर उसे रोज गालियाँ देती, कभी बाल पकड़कर मारती। वह चुपचाप पास के बाग में जाकर बैठ जाती और रो लेती। शायद उसके दुख सुनने वाला बाग के पेडों के अलावा कोई नहीं था,मगर आज वह भी देवी थी उसका नाम आज मंगला था।अंजू दीदी भी थी सबसे बड़ी देवी बनी थी वो.. मुझसे एक क्लास आगे पढ़ती थी स्कूल में,
ऐसी ही नौ बच्चियाँ थीं हम। किसी के घर में गरीबी थी, किसी के हिस्से में उपेक्षा, किसी के हिस्से में मार और किसी के हिस्से में चुप्पी, किसी को नहीं मालूम था कि हममें से कितनी बच्चियाँ अपने ही घरों में अनचाहे बोझ की तरह ढोई जा रही थीं।लेकिन हम भोली थीं। एक दिन के आदर-सत्कार ने हमें खुशी से भर दिया था। उस उम्र में हमें यह समझने की कहाँ फुर्सत थी कि हमारा सम्मान हमारे होने के लिए नहीं, एक धार्मिक परंपरा निभाने के लिए था।
उस दिन बुल्ली के पिता भी उसका पैर धो रहे थे।
जिस हाथ पर परसों तक मार की चोट थी, आज उसी बच्ची के पैरों को श्रद्धा से छुआ जा रहा था। साधु महाराज ने कहा, 'बेटा, आशीर्वाद दो।'
बुल्ली के दाहिने हाथ में पट्टी बँधी थी। उसने अपना बायाँ हाथ उठाया और आशीर्वाद दे दिया. किसी ने कहा अरे बाएँ हाथ से आशीर्वाद नहीं देते.. किसी ने कहा कोई बात नहीं चलता है(धर्म के नाम पर कुछ भी चलता है जैसे )
खैर, भोजन हुआ। हम सबने खाया-पिया। उस दिन हमें जो सम्मान मिला, वह हमारे लिए नया था। खाना खाने के बाद हम आपस में बैठकर बातें करने लगीं।
बात निकली कि अगर सचमुच हमें एक दिन के लिए देवी माँ जैसी शक्तियाँ मिल जाएँ, तो हम क्या करेंगी?
फिर तो सपनों का सिलसिला चल पड़ा।
कोई अपने लिए नए कपड़े माँगती, कोई खिलौने, कोई अपने घर में सबको खुश देखना चाहती। कोई चाहती कि उसे पढ़ने दिया जाए, कोई चाहती कि उसके घर में रोज होने वाली लड़ाई बंद हो जाए।
बचपन के सपने भी कितने सीधे होते हैं! हमें महल नहीं चाहिए थे, न सोने-चाँदी के आभूषण। किसी को बस इतना चाहिए था कि उसे मारा न जाए, किसी को यह कि उसे स्कूल जाने दिया जाए, और किसी को यह कि घर में कोई उससे प्यार से बात भर कर ले,अगले दिन महाराज गाँव से चले गए।
उनके साथ ही शायद हमारी देवियों वाली शक्तियाँ भी चली गईं। यज्ञ संपन्न हो चुका था। घर में शांति स्थापित हो गई थी। कम-से-कम बड़ों की मान्यता के अनुसार तो हो ही गई थी।
बस, बुल्ली के पिता अब रोज शराब पीकर आने लगे थे,
चंचला भी अब फिर से पेड़ों से कहने लगी थी मन की बातें 
धीरे-धीरे हम सब बड़ी होने लगीं। हमारी इच्छाएँ भी बड़ी हुईं, लेकिन उन्हें पूरा करने के अधिकार छोटे होते चले गए।
 अंजू दीदी जो पढ़-लिखकर शिक्षिका बनना चाहती थी। इंटरमीडिएट के बाद ही उसकी शादी कर दी गई। वह अपनी किताबों और सपनों को पीछे छोड़कर लाल चुनरी ओढ़े ससुराल चली गई।कुछ दिनों बाद वापस आई थी कहती थी अब नहीं जाउंगी वहाँ बहुत मारते हैं सब मुझे,
पर उसके घर वालों ने वापस भेज दिया बोले लड़की का घर उसका ससुराल ही होता है इसलिए वो फिर कभी नहीं आई 
गांव वाले कहते थे ख़ाना बनाते हुए स्टोव से जल कर मर गई,
और मैं? मैं घर के कामों से थोड़ी फ़ुरसत मिलने पर.. कुछ लिख लेती हूँ कभी कविता कभी कहानी.. पऱ जो सोचती हूँ वो नहीं लिख पाती.. शब्द बदलने पड़ते हैं..डर से कोई पूछ न ले हिम्मत कैसे हुई ये लिखने की,जाने कितनी कविताएं इसलिये अधूरी हैं मेरी वो मुझे वो मिथ्या लगने लगती हैं... कोरा झूठ लगती हैं.. विरोधाभास लगती हैं कभी कभी लगता है मैं खुद कोई अधूरी कविता हूँ जो अपनी पूरक पंक्ति तलाश रही हूँ 
ऐसी ही न जाने कितनी लड़कियों के हाथों से किताबें छीनकर बेलन पकड़ा दिया गया। किसी के सपनों को घर की इज्जत के नाम पर दबा दिया गया, किसी की इच्छा को परिवार की मजबूरी बताकर चुप करा दिया गया।
किसी ने विरोध किया तो उसे बदतमीज़ बोला गया बदन पर नील दिए गए ईनाम में । जिसने भी अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने की इच्छा जताई, उसके चरित्र तक पर सवाल उठा दिए गए।
धीरे-धीरे वे सारी एक दिन की देवियाँ अलग-अलग घरों में पहुँच गईं। अब कोई बच्चों को सँभाल रही,चूल्हा-चौका कर रही सब मन या बेमन से अपने जीवन को काट रहीं 
वो जिन्हें बचपन में आशीर्वाद देने के लिए बुलाया गया था, वे बड़ी होकर दूसरों की इच्छाओं के लिए अपना जीवन खपाने लगीं। न जाने कितनी लड़कियाँ होंगी, जिन्होंने बाग में बैठकर रोना छोड़ दिया होगा, क्योंकि अब उनके पास रोने के लिए भी कोई अपना बाग नहीं होगा।
हर नवरात्रि मुझे वे नौ बच्चियाँ याद आती हैं।
याद आता है बुल्ली का पट्टी बँधा हाथ। याद आता है उसका पिता, जो एक ही हाथ से घायल बच्ची के पैर धो रहा था और दूसरे ही दिन शायद फिर उसे चोट पहुँचाने वाला था।
अब सोचती हूँ, उस दिन हम बच्चियाँ नहीं, इस समाज की सबसे बड़ी विडंबना बनकर बैठी थीं।
एक तरफ हमारे पैर धोए जा रहे थे, दूसरी तरफ हमारी जिंदगी पर हमारा कोई अधिकार नहीं था।
एक तरफ हमें देवी मानकर आशीर्वाद माँगा जा रहा था, दूसरी तरफ हमारे सपनों के लिए घरों में कोई जगह नहीं थी।
एक तरफ हमारे सामने थालियाँ सजाई जा रही थीं, दूसरी तरफ हमारे भविष्य का फैसला हमारी इच्छा पूछे बिना किया जा रहा था।
और यह सब करते हुए किसी को कोई विरोधाभास भी नहीं दिखाई देता था।
शायद इसलिए कि समाज को स्त्री की शक्ति से अधिक उसकी शक्ति के प्रतीक पसंद हैं। उसे वह देवी चाहिए जो चमत्कार करे, आशीर्वाद दे, संकट दूर करे; मगर वह लड़की नहीं चाहिए जो अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ी हो जाए
देवी के हाथ में त्रिशूल अच्छा लगता है, लेकिन उसी हाथ में अपने फैसलों की ताकत आ जाए तो समाज को तकलीफ़ होने लगती है।
आज भी हर नवरात्रि नौ कन्याएँ बुलाई जाती हैं। उनके पैर धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है, दक्षिणा दी जाती है। तस्वीरें खिंचती हैं, श्रद्धा व्यक्त की जाती है और घर की सुख-शांति के लिए उनसे आशीर्वाद माँगा जाता है।बदला तो आज भी कुछ नहीं है 
मैं इस परंपरा के विरोध में नहीं हूँ। बच्चियों का सम्मान होना चाहिए, उन्हें प्रेम मिलना चाहिए, उन्हें अच्छा भोजन मिलना चाहिए।
मगर सवाल यह है कि क्या यह सम्मान नवरात्रि के नौ दिनों तक ही रहेगा? क्या बाकी दिनों में भी उनके हिस्से में उतना ही प्रेम, उतनी ही सुरक्षा और उतनी ही स्वतंत्रता आएगी?
क्या कोई पिता यह प्रण लेगा कि वह अपनी बेटी पर हाथ नहीं उठाएगा? क्या कोई माँ अपनी बेटी की इच्छाओं को अपनी प्रतिष्ठा से छोटा नहीं समझेगी? क्या कोई परिवार बेटी की पढ़ाई को उसकी शादी से पहले पूरा होने वाला सपना मानेगा, न कि शादी के बाद भुला दिया जाने वाला शौक?
क्या कभी ऐसा भी होगा कि किसी बच्ची के पैर धोने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि उसके पैरों में बेड़ियाँ न हों? कि उसे देवी कहने से पहले यह स्वीकार किया जाए कि वह एक इंसान है, और इंसान होने के नाते उसे सम्मान, सुरक्षा और अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है?
मुझे लगता है, उस दिन सचमुच कोई यज्ञ सफल होगा।
वरना हर साल की तरह इस साल भी कुछ बच्चियाँ देवी बनेंगी। वे चुपचाप हाथ उठाकर आशीर्वाद देंगी। उन्हें बताया जाएगा कि देवियाँ कुछ माँगती नहीं, देती हैं।
वे भी मुस्कुराकर सिर हिला देंगी।उन्हें क्या मालूम कि इस दुनिया में लड़कियों से उनका बचपन छीनने से पहले उन्हें देवी बना देने की एक बहुत पुरानी परंपरा है।
और देवियों को चुप रहना सिखाने का इससे आसान तरीका शायद कोई दूसरा नहीं।
क्योंकि इस समाज को ऐसी देवियाँ बहुत पसंद हैं, जो आँखें बंद करके आशीर्वाद देती रहें; बस, आँखें खोलकर अपने हिस्से का हक़ न माँगें।

हर नवरात्रि वे नौ बच्चियाँ मुझे हर तरफ दिखती हैं...
खैर....
"बेटियों के वास्ते क्या खूब इंतज़ाम हैं 
नौ दिनों तक देवियाँ बाक़ी दिनों ग़ुलाम हैं"


~ रिंकी सिंह