प्रमाणपत्र Rinki Singh द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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प्रमाणपत्र



ऑनलाइन कवि सम्मेलन की तैयारी में नीलिमा पुरानी अलमारी खंगाल रही थी |
विषय था- "अपनी पहली रचना"|
सोच रही थी, उस पुरानी डायरी को ढूंढ ले, जिसमें अपने शुरुआती दिनों की कविताएँ लिखी थीं |

एक पुरानी डायरी हाथ लग ही गई | धूल झाड़कर जैसे ही पन्ने पलटने लगी, अचानक एक तह किया हुआ कागज़ बीच से फिसलकर गिरा |
नीलिमा ने उसे खोला… और एक पल के लिए जैसे समय ठहर गया।
यादों की पगडंडी पर वह सालों पीछे चली गई, अपने बारहवीं कक्षा के दिनों में |

वो उम्र… जब वह साँवली, दुबली-पतली, साधारण नैन-नक्श वाली लड़की थी |
घर में बाकी तीनों बहनें गोरी-चिट्टी, रूपवती थीं |
मेहमान आते तो कह देते..
"सब कितनी सुंदर हैं… बस यही बेचारी थोड़ी साँवली है |"
और फिर आधी आह, आधा निष्कर्ष..
"इसकी शादी में थोड़ी दिक्कत होगी |"

ये सब बातें शुरू में चुभती थीं, फिर आदत-सी पड़ गई |
कोई उसके पक्ष में कुछ कहेगा..इस उम्मीद से भी वह खाली हो चुकी थी |
ख़ुद को पढ़ाई में झोंक दिया था |
बनाव-श्रृंगार से दूरी बना ली, क्योंकि वह जान चुकी थी, रंग-रूप को आखिर कितने दिन छिपाया जा सकता है |

उस दिन स्कूल से घर लौट रही थी कि अचानक एक लड़का सामने आकर ठिठका |
कुछ कहे बिना, उसके हाथ में एक मोड़ा हुआ कागज़ रखकर तेज़ी से भीड़ में खो गया |

नीलिमा ने चुपचाप ख़त खोला..

"प्यारी नीलिमा,
तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो…
तुम्हारे भीतर एक अलग ही खूबसूरती है,
जिसे कोई आँख अनदेखा नहीं कर सकती |"

तुम्हारे कुछ लिखा है...

ज्यों रात के आँचल में कोई तारा झिलमिलाता है,
वैसा ही उजाला तेरे चेहरे से आता है |

ज्यों सावन की बूँदें चुपके धरती को सहलाती हैं,
वैसे ही तेरी बातें मन को शांति दे जाती हैं |

ज्यों नदिया की धारा निर्मल, चुपचाप बहती है,
तेरी सरल मुस्कान वैसे ही मन में रहती है |

ज्यों मंद पवन की लहरें मन को छूकर जाती है,
तेरी मीठी वाणी वैसा ही सुकून पहुँचाती है | 

ज्यों फूल बिना श्रृंगार के भी खुशबू बिखराते हैं,
वैसे ही तेरे गुण मेरे हृदय को लुभाते हैं |

ज्यों दीपक की लौ..अँधेरे को बुहारती है,
तेरी सादगी भी यूँ ही तेरे रूप को संवारती है |


ज्यों भोर की लाली नभ में आशा की किरण जगाती है ,
तेरे साथ की कल्पना से यूँ ही, मेरी ज़िन्दगी मुस्कुराती है | 

सुनो! तुम खूबसूरत हो हमेशा ऐसे ही रहना 
कोई है यहाँ जो तुमको हमेशा खुश देखना चाहता है |


नीलिमा ने उस लड़के की ओर कभी दोबारा नहीं देखा |
उस ज़माने में लड़कों से मेल-जोल लड़कियों के लिए वर्जित था |
परिवार की इज्ज़त पर आंच समझी जाती थी |
और वह लड़का भी फिर कभी उसके रास्ते में नहीं आया |
लेकिन… उस दिन, उस ख़त ने नीलिमा के भीतर कहीं गहरे एक जगह को सहला दिया था |
जैसे किसी ने उसके ज़ख्म पर हल्का-सा मरहम रख दिया हो |
उसने ख़त संभालकर रख लिया..जैसे कोई गुप्त खज़ाना हो |

शादी, बच्चे, ज़िम्मेदारियों के सागर में डूबते-उतराते, पचपन साल बीत गए |
अब उसके लिए.. रंग- रूप की बातें कोई मायने नहीं रखती.. थी,
लेकिन एक वक़्त था..
जब कभी कोई "सांवली" कहकर उसे ठेस पहुँचाता,
वह चुपके से वो ख़त खोलती, कविता पढ़ती..और मन हल्का हो जाता |
उसमें लिखा था..वह भी किसी की नज़रों में बहुत सुंदर है |

वो भी खाली समय में अपने अनकहे जज़्बात लिखने लगी थी,
उस दिन काव्य गोष्ठी में नीलिमा ने अपनी पहली लिखी कविता भी सुनाई,
और वह पहली कविता भी..जो किसी ने सिर्फ उसके लिए लिखी थी |
और अपनी वो अनकही कहानी भी सुनाई,
तालियाँ गूंज उठीं |
चेहरे मुस्कुराने लगे,
और नीलिमा की आँखें भीग गईं..पर इस बार खुशी से |

कार्यक्रम समाप्त होने पर उसने ख़त को वापस उसी डायरी में रख दिया |
ठीक वैसे ही जैसे हम कभी-कभी कोई पुराना स्कूल का प्रमाणपत्र देखते हैं..
एक नज़र मुस्कुराते हैं और फिर अलमारी में रख देते हैं |

क्योंकि वो ख़त भी तो उसके लिए एक प्रमाणपत्र ही था..
जिस पर लिखा था..
"तुम बहुत खूबसूरत हो |"

~रिंकी सिंह ✍️


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