इंसानियत Rinki Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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इंसानियत



जून का महीना था, बेतहाशा गर्मी, चिलचिलाती धूप, सूर्य देव का प्रकोप अपने चरम पर था, जैसे सबकुछ जला देने को आतुर हों |

मैं बच्चों को स्कूल से घर छोड़कर, पास की दुकान पर कुछ सामान लेने चली गई |
सामान लेकर दुकान से निकल ही रही थी कि मेरी नज़र सड़क के बीचोबीच खड़े एक मासूम बच्चे पर पड़ी, तपती सड़क पर नंगे पाँव खड़ा, कभी एक पाँव ऊपर कर रहा था कभी दूसरा पाँव |
गर्म तवे सी जल रही सड़क उसके नन्हें पाँवों को जला रही थी |

वैसे तो दोपहर में वो सड़क उतनी व्यस्त नहीं रहती थी, पर उस वक़्त थोड़ी दूर पर एक टेम्पो दिखा आता हुआ, मैं किसी अनजाने भय के आभास से भागकर बच्चे के पास गई और उसे गोद में उठाकर एक दुकान के पास लेकर गई |
उसे एक बेंच पर बिठाकर पूछा, "बेटा!मम्मी कहाँ है आपकी? "
उसने अपनी नन्ही उंगलियों से सीधे सड़क की तरफ़ इशारा कर कहा "उधर "

जिधर ऊँगली दिखाई उसने उधर ही दस कदम की दूरी पर बैंक था, मुझे लगा कोई महिला आई होगी इसको लेकर वो व्यस्त हो गई होगी कहीं तो बाहर आ गया होगा | 

मैं उसे लेकर बैंक के पास गई, वहाँ भी दोपहर में लंच का समय था, बैंक में दो चार लोग ही थे जो उस वक़्त बाहर ही बैठे थे |
मैंने बच्चे से कहा 'यहाँ आपकी मम्मी तो नहीं है बेटा, कहाँ हैं वो '
उसने कहा 'घर पर हैं ' और घर किधर है मैंने पूछा उससे |

सीधे रोड की तरफ़ फिर ऊँगली दिखाई,' उधर है '| मुझे लगा इधर से ही आया होगा शायद तभी बोल रहा, मैंने उसे गोद में उठाया और उसी तरफ चलने लगी जिधर इशारा किया था |

कुछ दूर चलने के बाद मुझे एक दुकानदार से पता चला कि वो बच्चा पिछले दो घंटे से ईधर घूम रहा है |
मुझे आश्चर्य हुआ कि इतने सारे लोग हैं यहाँ पर किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, एक छोटा बच्चा यूँ ही तपती सड़क पर घूम रहा |
दुकानदार नें कहा भी कि यहीं बिठा दो कोई नहीं आया ढूंढने तो पुलिस को सौंप देंगे |
पर मेरा मन नहीं माना उसे वहां छोड़ने | बच्चे की ख़ामोश आँखें बता रही थी कि वो अब घर जाना चाहता है, भूख, प्यास से सूखा हुआ चेहरा देखकर दया आ रही थी,

मैंने मन बना लिया कि आगे तक देखूंगी, इतना छोटा है बहुत दूर का नहीं होगा, आसपास कोई न कोई तो बताएगा ही कुछ |

फिर मैंने उसे गोद में उठा लिया और दुकान वाले भईया से कहा, "भईया! मैं इसे लेकर आगे जा रही देखती हूँ अगर आसपास का है तो कोई तो जानता होगा, या कोई ढूंढ रहा हो शायद |अगर कोई नहीं मिला तो यही ले आउंगी वापस "| 
वो बोले 'ठिक है, देख लो '|

बच्चे को उठाकर मैं आगे बढ़ गई, चलते -चलते उससे पूछा "आपको पता है आपका घर कहाँ है"
' उसने फिर इशारा किया सीधे रोड की तरफ़ बोला "उधर है |"

गर्मी की दोपहर थी इसलिए सड़क पर बहुत कम लोग दिख रहे थे,
रोड के दोनों तरफ़ A ब्लॉक और B ब्लॉक की गलियां थीं, मैंने हर गली के बाहर जाकर उससे पूछा क्या इसमें है घर? वो ना में सर हिला देता था और ऊँगली से आगे की ओर इशारा करके बोलता उधर है |
 गर्मी, धूप और ऊपर से चार साल के बच्चे का वज़न उठाके चलना, पूरी तरह से थक गई थी मैं अब तो बोलने की इच्छा भी नहीं हो रही थी |
वो बच्चा रास्ते भर कुछ न कुछ बोलता रहा पर मेरा ध्यान उसकी बातों पर नहीं गया, मैं ये सोच रही थी, " काश कोई तो दिख जाता इसको ढूंढ़ते |"

इसी उधेड़बुन में चलते चलते मेन रोड से बस थोड़ी दूर रह गए थे, जब मेरा ध्यान भागती गाड़ियों पर गया तो मैं रुक गई | अब बस गली नम्बर दो और एक बची थीं मेन सड़क तक पहुँचने में | 
मैंने झुंझलाकर कहा," कहाँ है तुम्हारा घर? अब तो रोड आ गया |" मुझे ये भी पता था कि इतने छोटे बच्चे को क्या ही पता होगा कहाँ घर है इसका फिर भी जिस विश्वास से ऊँगली दिखा रहा था मुझे लगा शायद पता हो | 
उसे शायद लगा हो मैं गुस्से में बोल रही तो उसने गली नम्बर दो की तरफ़ ईशारा किया" इसमें है आंटी | "

मुझे पूरा विश्वास था वो झूठ बोल रहा है उसे कुछ पता नहीं है फिर भी मैं उसे लेकर उस गली में घुस गई |
 अब मुझे गुस्सा उसकी माँ पर आने लगा था "इतने छोटे बच्चे को कोई बाहर कैसे जाने दे सकता है हद है लापरवाही की, कैसी माँ है वो, मैं तो अपने पांच साल के बेटे को अकेले दुकान तक नहीं जाने देती | "मन ही मन उसकी माँ को कोसने लगी |

उस गली में दिखने वाले हर इंसान से पूछा क्या ये बच्चा इस गली का है? किसी ने भी हाँ नहीं कहा |
कुछ दूर जाने के बाद गली आगे से बंद थीं, मुझे अब पूरा यक़ीन हो गया था बच्चे को कुछ नहीं पता उसका घर कहाँ है |
गली के आखिर में एक दुकान थी वहां से बच्चे को चिप्स दिलाया | भूख से व्याकुल मासूम कुछ ही मिनटों में पूरा पैकेट खत्म कर दिया और दूसरा पैकेट मांगने लगा |

एक और पैकेट लेकर बाहर रोड पर वापस आ गई, वहां आकर सोच रही थी अब किधर ले जाऊ उसको उठाकर फिर वापस आना बड़ा टास्क लग रहा था, बुरी तरह से थक गई थी मैं, फिर भी जाना तो था ही | 

तभी वो फिर से बोला "आंटी जूस पीला दो,"
 सामने देखा तो गन्ने के जूस की दुकान थीं, वहां लेकर गई उसे, वहां दो लडके थे जो जूस निकाल रहे थे उनसे बोला "भईया एक ग्लास जूस देना बच्चे को"
 उन्होंने उसे जूस दिया, वो आराम से बैठके जूस पीने लगा |
मैंने उन लड़को से पूछा" भईया ये बच्चा ईधर का है क्या, आप लोगों ने कभी देखा है इसे?"
 दोनों ने ना में सर हिलाया और बोले आपको कहाँ मिला? उन्हें सारी घटना सुनाई,

मैं उनसे कहने लगी अब इसको वापस ले जाना पड़ेगा, सोचा था कोई मिल जायेगा ढूंढ़ते तो घर पहुंच जायेगा सब परेशान होंगे इसके घर लेकिन लग रहा कोई मिलेगा नहीं |
मैंने बच्चे से कहा! "अच्छा चलो पहले वहां चलते हैं दुकान पर " उसे गोद में उठाया ही था कि एक आवाज़ आई,,,
"अरे! आंटी ये तो हमारी गली का बच्चा है | "
मैंने पीछे देखा तो दो लड़के मेरी तरफ़ भागे आ रहे | पास आकर बोले....
"आपको कहाँ मिला ये, हम लोग दो, तीन घंटे से इसे ढूंढ रहे हम मेन रोड से आ रहे | "
उनकी बातें सुनकर मैंने राहत की सांस ली, और उनसे पूछा "किस गली के हो आप लोग?"
 उन्होंने बताया गली नम्बर ग्यारह B ब्लॉक |
 मैंने उनसे कहा "अच्छा मुझे ले चलो इसके घर '!

फिर उनके साथ उसके घर की तरफ़ चलने लगी | रास्ते भर दोनों लडके उस बच्चे की शरारतों के किस्से सुनाते रहे | उन्होंने बताया कि ये तीसरी बार है जब घर से भाग गया ये |
उसमें से एक कह रहा था "इसकी मम्मी बहुत मारती है इसको आंटी लेकिन फिर भी बहुत शैतानी करता है | "

उनकी बातें सुनकर जो गुस्सा था उसकी माँ के लिए वो अब सहानुभूति में बदल गया | 
मैं सोचने लगी हे राम! इतना शैतान बच्चा? 

आखिरकार हम उसके घर पहुंचे, घर के बाहर दस, पंद्रह महिलाएं और पुरुष जमा थे, दोनों लडके दूर से ही चिल्लाने लगे,,,
 "मिल गया आंटी अंकित "|  
 
वहां मौजूद सभी मेरी तरफ़ देख रहे थे उसे मैंने अब भी गोद में लिया हुआ था | 
भीड़ के बीच से एक औरत भागती हुई मेरे पास आई, बिखरे बाल, सूजी और लाल आँखे लगभग पागलों जैसी हालत में,देखकर कोई भी समझ सकता है ये बच्चे माँ है |

देखकर अंदाजा हो गया था मुझे पीछले दो, तीन घंटे से ये रो रही हैं शायद |  
वो जैसे ही पास आई अंकित बोला, "मुझे मारना मत, अब नहीं भागूँगा |"
उसे मेरी गोद से लेते हुए उसकी माँ बोली,, "कहाँ मिला आपको?"

 मैंने बताया हमारी गली के पास रोडपर खड़ा था | 
वो फिर रोने लगी और रोते रोते बोली "बस दो मिनट के लिए ऊपर गई थीं इतने में भाग गया बाहर " इतना कहकर फ़फ़क कर रोने लगी | 

उसे ऐसे रोते देख मेरा गला भी रुंध गया था, मैंने उनसे बस इतना कह पाई, "ध्यान रखा करो आप इसका और प्लीज प्यार से समझाइयेगा मारिएगा मत |"

और मैं अपने घर की तरफ़ मुड़ गई | मेरी आँखों में भी आंसू भर आये थे और दिल में सुकून भी, कि एक मासूम बच्चे को उसकी माँ से वापस मिलवा पाई, ना जाने कबतक मिलता कहाँ - कहाँ भटकता और इसकी माँ का क्या हाल हुआ होता | 

आज भी जब मैं उस घटना को याद करती हूँ मन को एक सुकून का एहसास होता है, जब हम कुछ अच्छा करते हैं तो वो कार्य केवल उस क्षण में ही सुकून नहीं देता नहीं बल्कि उसकी स्मृति भी हमें जीवन पर्यन्त एक सुखद एहसास देती है, 
और हमें ये एहसास रहता है कि,उस अच्छे काम को करते वक़्त हम जाति, धर्म, ऊंच, नीच इन सबसे परे महज़ एक इंसान होते हैं और उस वक़्त इंसानियत ही हमारा सबसे जरुरी कर्म |
    
 ~रिंकी सिंह