गुस्सा नहीं ग़ुरूर Rinki Singh द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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गुस्सा नहीं ग़ुरूर




कुछ महीने पहले काशी जाना हुआ |
बस में मेरी खिड़की वाली सीट थी | मैं बैठ चुकी थी कि एक महिला आकर बगल में बैठीं, उनके साथ उनका पति और लगभग चार-पाँच साल का एक बच्चा |
पतिदेव सामने की सीट पर बच्चे के साथ बैठ गए |
बस चली… कुछ ही किलोमीटर हुए होंगे कि उस महिला ने कुछ धीमे से कहा.. शायद कोई बात पूछी, या याद दिलाई होगी |
और फिर जो हुआ, वो आम होते हुए भी असहनीय था |
उस पुरुष ने अचानक अपनी आवाज़ ऊँची कर दी..नहीं, इतनी ऊँची कि बस के हर मुसाफ़िर का ध्यान उधर गया |
महिला सहम गईं |
चेहरे की रक्तहीनता चीख रही थी कि ये पहला मौका नहीं था |
चारों तरफ़ नज़रों का जाल बिछ गया |
बस की गति थोड़ी बढ़ी, लेकिन उस पल की सिहरन जैसे वहीं ठहर गई |
महिला ने नज़रे झुका लीं |
अपना दुपट्टा खींचकर आँसुओं को छुपाने की असफल कोशिश की |
कुछ बूँदें उनके हाथ पर गिरीं..
और मैंने जानबूझकर खिड़की से बाहर देखने का नाटक किया..
ताकि उन्हें ये न लगे कि उनकी पीड़ा की मैं गवाह हूँ |

लेकिन सच ये है, मैं सिर्फ़ गवाह नहीं थी.. मैं पहचानने वाली थी |
क्योंकि ये चेहरा नया नहीं था |
कई बार, कई जगहों पर.. यही मंज़र देखा है |
बस किरदार बदल जाते हैं.. गुस्सैल पति की जगह कभी पिता होते हैं, कभी बड़ा भाई, कभी ससुर, और कभी कोई ‘परोपकारी’ मामा या चाचा |
और औरत?
वो हर बार वही होती है..
सहमी हुई, सलीके में ढली हुई, आँचल में अपने आँसू और अपमान दोनों को समेटती हुई |
हर बार सोचती है.. "कोई बात नहीं, पति हैं... गुस्से में होंगे... थके होंगे... मेरा ही कसूर होगा शायद…"
पर क्या कभी किसी ने सोचा कि बस, ट्रेन या सार्वजनिक जगहों पर किसी पत्नी पर चिल्लाना मर्दानगी नहीं है,
बल्कि अपने अहंकार का अश्लील प्रदर्शन है?
ये कोई क्षणिक क्रोध नहीं था..
ये वो दंभ था, जो सदियों से पुरुषों के कंधे पर 'स्वामित्व' के नाम पर टिका है |
वो सोचते हैं..स्त्री उनकी "जायदाद" है, उस पर बोलने, चिल्लाने, यहाँ तक कि अपमानित करने का उन्हें हक़ है |
कितना आसान है ना..
मर्द का गुस्सा "तत्काल" होता है,
और औरत का आंसू "अतिनाटकीय" |
मर्द का बोलना “स्पष्टता” है,
और औरत की आवाज़ “अभद्रता” |
मर्द की ऊँची आवाज़ “सामाजिक स्वीकृति” पाती है,
और स्त्री का रोना भी अक्सर "ड्रामा" कहकर खारिज कर दिया जाता है |
और इस सबमें औरत हर बार वही पुराना संवाद दोहराती है..
"कोई बात नहीं... अपने ही तो हैं"
पर अब, जब मैं उस सफर को याद करती हूँ..
मुझे सिर्फ़ उस महिला की आँखें याद आती हैं |
उनकी नम हथेली, उनका संकोच, और वो एक आंसू जो उनके भीतर की चीख़ बनकर गिरा था |
कभी-कभी सोचती हूँ...
अगर उसी समय कोई पुरुष, किसी महिला से इसी तरह सार्वजनिक रूप से बेइज़्ज़त होता..
तो शायद पूरी बस तालियाँ बजाकर महिला की हिम्मत को सलाम करती |
पर जब एक स्त्री अपने ही पति से अपमानित होती है..
तो समाज अचानक मौन हो जाता है |
औरत के आत्मसम्मान पर चोट पहुँचाकर कोई पुरुष कभी सम्मान का अधिकारी नहीं बन सकता |
वो सिर्फ़ डर पैदा कर सकता है.. प्यार नहीं, रिश्ता नहीं, और विश्वास तो बिल्कुल नहीं |
तो अगली बार जब कोई कहे.. "गुस्से में थे..."
मैं बस यही कहूँगी...
"नहीं, वो गुस्सा नहीं था... गुरूर था |"

 ~रिंकी सिंह