बांसुरी की धुन - भाग 14 prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बांसुरी की धुन - भाग 14


बाँसुरी की धुन
भाग 14 — प्रकृति का रहस्य
रामलाल ने उत्सुकता से पूछा, “काका, क्या मेरे बाबा ने अपनी आँखों से आपको कुछ कहना चाहा था?”
रामेश्वर कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, “बेटा, उनकी आँखें धँसी हुई थीं। वे बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे, लेकिन उस समय मैं उनके मन की बात समझ नहीं पाया।”
रामलाल ने गंभीर स्वर में कहा, “काका, मुझे लगता है कि उनके मन में कोई ऐसी बात थी, जिसे मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूँ।”
रामलाल कुछ कहता, उससे पहले घर की चाली से लातू की आवाज सुनाई दी। वह भीतर आते हुए बोला, “बाबा, रामलाल ने दिकू गुरु से दीक्षा ली है। अब यह हमारी परंपराओं को कैसे निभाएगा? मारांग बुरू और जाहेर आयो इससे प्रसन्न होंगे या नहीं, यह भी सोचने की बात है। किस पिता को दुख नहीं होगा, अगर उसकी संतान अपने पुरखों की रीति-रिवाज छोड़ दे?”
लातू की आवाज में उत्तेजना थी। वह शराब के नशे में था।
रामेश्वर ने लातू की तरफ देखते हुए कहा, “बेटा, किसी के मन की बात जाने बिना निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं। हो सकता है, रामलाल के पिता मुझसे कुछ और कहना चाहते हों। गाँव में और भी लोग हैं, लेकिन सपने मुझे ही क्यों आए? इस पर भी विचार करना होगा।”
लातू बोला, “बाबा, इतने दिनों से आप लोगों को सृष्टि के रहस्य बताते आए हैं। क्या आपने कभी मूर्ति-पूजा की बात कही है? जब संताली समाज प्रकृति को पूजता है, तो फिर मूर्ति-पूजा कहाँ से आई?”
रामेश्वर ने लातू की तरफ देखते हुए कहा, “किसी परंपरा को समझने के लिए उसका अध्ययन करना जरूरी है। बिना पूरी जानकारी के किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं।”
लातू ने रामलाल की ओर देखते हुए कहा, “बाबा, मैं तो कहता हूँ कि यह यहाँ ज्ञान लेने नहीं, ज्ञान देने आया है। इससे सावधान रहिए!”
इतना कहकर वह गाय-बकरियों को बाँधने चला गया।
रामेश्वर ने रामलाल से कहा, “बेटा, लातू की बात का बुरा मत मानना। वह अपनी समझ के अनुसार बोल रहा है।”
रामलाल मुस्कराया। “काका, मुझे बुरा नहीं लगा। लातू दादा भी हमारे अपने हैं। मैं अपने पुरखों को भूलना नहीं चाहता, बल्कि उनकी परंपराओं को गहराई से समझना चाहता हूँ। मैं यह कैसे मान लूँ कि किसी गुरु से दीक्षा लेने के बाद अपनी जन्मभूमि, भाषा, संस्कृति और पुरखों से मेरा संबंध समाप्त हो जाएगा?”
रामेश्वर ने स्नेहपूर्वक कहा, “बेटा, सत्य की खोज में प्रश्न करना गलत नहीं है। लेकिन किसी बात को समझने से पहले उसका अध्ययन करना आवश्यक है।”
रामलाल ने पूछा, “काका, यह प्रकृति आखिर है क्या? क्या इसे केवल पेड़-पौधों, पहाड़ों और पत्थरों तक सीमित किया जा सकता है? पानी, नदियाँ, समुद्र, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, तारे और असंख्य जीव-जंतु भी तो प्रकृति का हिस्सा हैं। हवा को ही देखिए, जिसे हम हर पल साँस के साथ भीतर लेते हैं, लेकिन उसके अस्तित्व पर बहुत कम ध्यान देते हैं।”
लातू भी लौटकर पास ही बैठ गया। वह चुपचाप रामलाल की बातें सुनने लगा।
रामलाल ने आगे कहा, “दादा, मैं आपको गलत सिद्ध नहीं करना चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि हम सब मिलकर समझें कि हमारे पुरखों ने प्रकृति को इतना महत्त्व क्यों दिया। जंगल, पहाड़, नदियाँ और जीव-जंतु उनके जीवन में क्या स्थान रखते थे?”
रामेश्वर ने कहा, “बेटा, हमारे पुरखों का ज्ञान केवल लिखित ग्रंथों में नहीं, बल्कि उनके जीवन, लोकगीतों, कथाओं और रीति-रिवाजों में भी मिलता है। हमें उनके अनुभवों को समझना होगा।”
रामलाल की आँखों में चमक आ गई। उसने पूछा, “काका, हमारे पूर्वज विशेष अवसरों पर बाँसुरी बजाते थे। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि उसकी धुन से वातावरण में एक अलग अनुभूति पैदा होती थी। विज्ञान भी बताता है कि ध्वनि कंपन से उत्पन्न होकर तरंगों के रूप में फैलती है। तो क्या बाँसुरी की धुन हमारे पुरखों के लिए केवल संगीत थी, या उसके पीछे प्रकृति और मनुष्य की चेतना से जुड़ी कोई गहरी अनुभूति भी थी?”
रामेश्वर उत्तर देने ही वाले थे कि तभी घर की चाली से किसी के आने की आहट सुनाई दी।
अगले ही क्षण रामलाल का भाई बागुन भीतर आया। वह रामलाल को खोजते हुए वहाँ पहुँचा था। आते ही वह बोल उठा, “तुम यहाँ बैठकर ज्ञान की बातें कर रहे हो, उधर समाज बैठा है, तेरी बेटी माही ने...!”
कहते-कहते बागुन रुक गया। उसके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी।
रामलाल तुरंत उठ खड़ा हुआ। उसने घबराकर पूछा, “भैया, क्या हुआ माही को? समाज में ऐसी कौन-सी बात हो गई है?”
बागुन ने गंभीर स्वर में कहा, “रामलाल, पहले मेरे साथ चलो। वहाँ सब तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
रामेश्वर भी चिंतित हो उठे। प्रकृति और पुरखों के दर्शन की चर्चा अधूरी रह गई। रामलाल बिना देर किए बागुन के साथ चल पड़ा। उसके मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे।
आखिर माही ने ऐसा क्या कर दिया था, जिसके कारण पूरा समाज इकट्ठा हुआ था?
और क्या इस घटना का संबंध रामलाल की अपनी मान्यताओं तथा परिवार में चल रहे पुराने मतभेदों से भी था?
इन प्रश्नों के उत्तर अभी मिलने बाकी थे।
क्रमशः....