बांसुरी की धुन - भाग 13 prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बांसुरी की धुन - भाग 13


बाँसुरी की धुन
भाग 13 — अपनी जड़ों की तलाश
स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी। अन्य दिनों की तरह रामलाल अपने घर की ओर लौट रहा था। तभी प्रधानाध्यापक सुनील झा ने उसे आवाज देकर रोक लिया।
मुस्कराते हुए उन्होंने पूछा—
“क्यों रामलाल, आज इतनी जल्दी जा रहे हो? सब ठीक तो है?”
फिर उसके चेहरे की ओर देखते हुए हँसकर बोले—
“जब से तुमने ठाकुर जी से दीक्षा ली है, तुम्हें देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। पहले शराब पीकर नाले में पड़े रहते थे, लेकिन अब घर-परिवार, पत्नी, समाज और धर्म की बातें करते हो। आदमी जब स्वयं को बदलने का संकल्प ले लेता है, तो उसका जीवन किस तरह बदल सकता है, यह तुम्हें देखकर समझ में आता है।”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।
“लेकिन आज तुम्हारे चेहरे पर पहले जैसी प्रसन्नता नहीं है। लगता है, मन में कोई गहरी उधेड़बुन चल रही है। कोई परेशानी है क्या?”
रामलाल कुछ कहता, उससे पहले ही प्रधानाध्यापक ने स्नेहपूर्वक कहा—
“खैर, पहले घर जाओ। जब मन करे, आकर बात करना।”
रामलाल ने आदरपूर्वक प्रणाम किया और आगे बढ़ गया।
उसके कदम घर की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन मन मगन की कही बातों में उलझा हुआ था। वे शब्द बार-बार उसके भीतर गूँज रहे थे। ऐसा लगता था, जैसे किसी ने उसके मन के बंद दरवाजे पर दस्तक दे दी हो।
क्या उसने दीक्षा तो ले ली, लेकिन अपनी जड़ों को समझने का प्रयास नहीं किया? क्या अपने धर्म को जानने से पहले उसे अपनी संस्कृति, अपने पुरखों और उनकी जीवन-दृष्टि को भी नहीं समझना चाहिए था?
उसके मन में एक के बाद एक प्रश्न उठने लगे।
संताली संस्कृति, संस्कार, मारंग बुरू, लुगू बाबा, लुगू आयो, मोड़े तुरुई, जाहेर, हापराम, पिलचू हाड़ाम, पिलचू बूढ़ी, कारमू और धारमू—इन सबके विषय में वह बचपन से सुनता आया था। लेकिन सुनना और समझना दो अलग बातें थीं।
आज पहली बार उसे महसूस हो रहा था कि जिन परंपराओं के बीच वह पला-बढ़ा, उनके मूल अर्थ को जानने का उसने कभी गंभीर प्रयास ही नहीं किया।
आदिवासी समाज की प्रकृति के साथ जीने की परंपराएँ कितनी प्राचीन थीं! जंगल, पहाड़, नदी, धरती, पशु-पक्षी और मनुष्य के बीच संबंधों को लेकर उसके पुरखों की क्या मान्यताएँ थीं? सृष्टि की उत्पत्ति को उन्होंने किस रूप में समझा था? उनके रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के पीछे कौन-सी जीवन-दृष्टि काम करती थी?
क्या इन परंपराओं में ऐसा ज्ञान छिपा था, जिसे समय के साथ दोहराया तो जाता रहा, लेकिन समझने का प्रयास कम होता गया?
रामलाल का मन जितना सोचता, उसकी जिज्ञासा उतनी ही गहरी होती जाती।
उसे लगा कि इन प्रश्नों के उत्तर किसी ऐसे व्यक्ति से ही मिल सकते हैं, जिसने संताली संस्कृति को केवल पुस्तकों या सुनी-सुनाई बातों से नहीं, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों से जाना हो।
अचानक उसे लाटू हांसदा के पिता रामेश्वर हांसदा की याद आई।
रामेश्वर हांसदा उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके थे, जहाँ शरीर धीरे-धीरे थकने लगता है और बीते हुए वर्षों की स्मृतियाँ जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाती हैं। लेकिन उम्र ने उनके उत्साह को पूरी तरह नहीं छुआ था। वे आज भी संताली समाज के प्रसिद्ध काराम गुरु के रूप में जाने जाते थे।
अपनी मंडली के साथ वे गाँव-गाँव घूमते, पारंपरिक गीत गाते और लोगों को सृष्टि-तत्त्व, संताली दर्शन तथा कारमू और धारमू की कथाएँ सुनाते थे।
उनके गीतों में पुरखों की स्मृतियाँ बोलती थीं और उनकी कथाओं में पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की गूँज सुनाई देती थी। जब वे अपनी गंभीर और प्रभावशाली आवाज में कोई पारंपरिक गीत छेड़ते, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध होकर रह जाते।
संताली समाज में उनका विशेष सम्मान था।
रामलाल ने मन ही मन सोचा—
‘शायद रामेश्वर काका मेरी जिज्ञासा शांत कर सकें। शायद वे मुझे उन परंपराओं का अर्थ समझा सकें, जिन्हें हम पीढ़ियों से निभाते तो आ रहे हैं, लेकिन उनके पीछे छिपे संदेश को पूरी तरह नहीं जानते।’
यही सोचकर उसने अपने कदम रामेश्वर हांसदा के घर की ओर मोड़ दिए।
परंपरा और आचरण का संघर्ष
रामेश्वर काका के घर की ओर जाने वाले रास्ते में ही उसे लाटू हांसदा मिल गया।
लाटू और रामलाल हमउम्र थे। दोनों की मित्रता बचपन से चली आ रही थी। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता, जब दोनों की मुलाकात न होती हो। सुख-दुःख बाँटने से लेकर गाँव की छोटी-बड़ी घटनाओं पर चर्चा करने तक, दोनों एक-दूसरे के साथी रहे थे।
लाटू अपने पिता के साथ काराम मंडली में जाया करता था। बचपन से ही उसने संताली संस्कृति, बोंगा-बुरू, लुगू बाबा, लुगू आयो और मोड़े तुरुई से जुड़ी अनेक कथाएँ सुनी थीं। सृष्टि और पुरखों की मान्यताओं के विषय में भी उसे काफी जानकारी थी।
लेकिन जीवन की एक विडंबना थी।
लाटू परंपराओं को जानता था, पर उनके मर्म को अपने आचरण में उतारने की आवश्यकता उसने कभी गंभीरता से महसूस नहीं की थी।
वह शराब का आदी हो चुका था। उसका मानना था कि जब संताली धार्मिक परंपराओं में बोंगा-बुरू को हड़िया अर्पित की जाती है, तो संतालों के लिए हड़िया पीना भी आवश्यक है। धीरे-धीरे उसके मन में हड़िया और शराब का सेवन संताली पहचान का प्रमाण बन गया था।
वह इस अंतर को समझने के लिए तैयार नहीं था कि किसी परंपरा में किसी वस्तु का धार्मिक उपयोग होना और प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसका सेवन अनिवार्य होना एक ही बात नहीं है।
जब रामलाल ने ठाकुर जी से दीक्षा ली और हड़िया-दारू छोड़ दी, तो लाटू को यह बात अच्छी नहीं लगी।
उसे लगा कि रामलाल ने किसी दूसरे गुरु की शरण लेकर अपनी संस्कृति से मुँह मोड़ लिया है। उसके लिए यह केवल व्यक्तिगत बदलाव नहीं, बल्कि अपनी परंपरा से दूरी बनाने जैसा था।
रामलाल को सामने देखकर लाटू ने व्यंग्य से पूछा—
“अरे रामलाल! आज इधर कैसे? रास्ता भूल गए क्या?”
रामलाल ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोला।
लाटू ने उसके मौन को उपेक्षा समझा और मुस्कराते हुए दूसरा ताना मारा—
“सुना है, किसी दिकू गुरु की शरण में चले गए हो! हड़िया-दारू भी छोड़ दी? अब तो पूरे संताल भी नहीं रहे!”
वह थोड़ा पास आकर बोला—
“संताल होते तो हड़िया पीते, अपने लोगों के साथ बैठते। अब न परंपरा बची, न समाज से नाता। फिर खुद को संताल किस मुँह से कहते हो?”
रामलाल चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।
लाटू को उसकी चुप्पी खटकने लगी।
“क्या हुआ? दीक्षा लेते ही बोलना भी भूल गए?”
रामलाल ने सहज स्वर में पूछा—
“दादा, मैं काका से मिलने आया हूँ। वे घर पर हैं?”
यह सुनकर लाटू ठहाका मारकर हँस पड़ा।
“काका से मिलने आए हो? अब उन्हें भी दीक्षा दिलाओगे क्या? या अपनी नई समझ का पाठ पढ़ाने आए हो?”
रामलाल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
लाटू का स्वर कुछ और कठोर हो गया।
“हाँ, घर पर हैं। लेकिन तुम्हारे सवालों का जवाब देने लायक ज्ञान उनके पास नहीं है। तुमने दीक्षा ले ली है न? अब किसी से पूछने की जरूरत ही क्या है? और जब तुम संताल रहे ही नहीं, तो संतालों के बीच तुम्हारा काम क्या?”
रामलाल ने उसकी आँखों में देखते हुए शांत स्वर में कहा—
“दादा, दीक्षा लेने से मैं ज्ञानी नहीं बन गया हूँ। मैं तो अभी सीख रहा हूँ। तुम अपने समाज और परंपराओं को मुझसे ज्यादा जानते हो। मैं तो उन्हीं को समझने के लिए काका के पास जा रहा हूँ।”
कुछ पल रुककर उसने पूछा—
“बस एक बात बताओ, दादा। क्या तुमने अभी भी हड़िया-दारू पी रखी है?”
लाटू का चेहरा तन गया।
“मेरा हिसाब लेने वाले तुम कौन होते हो?”
रामलाल ने विनम्रता से उत्तर दिया—
“मैं तुम्हारा हिसाब नहीं ले रहा हूँ, दादा। मैं तो बस समझना चाहता हूँ। क्या हमारे बोंगा-बुरू हमें नशे में डूबे रहना सिखाते हैं? क्या अपनी संस्कृति और पहचान बनाए रखने के लिए नशा करना जरूरी है? अगर कोई हड़िया-दारू छोड़ दे, तो क्या वह अपने पुरखों से दूर हो जाता है?”
लाटू झुँझला उठा।
“बस करो! अपनी किताबों वाली बातें मुझे मत सुनाओ।”
रामलाल ने कुछ क्षण रुककर कहा—
“दादा, मुझे तो लगता है कि मनुष्य के भीतर एक नशा जरूर होना चाहिए, लेकिन वह नशा किसी पेय का नहीं, अपने इष्ट और आदर्श के प्रति समर्पण का होना चाहिए। ऐसा नशा, जो हमें अपने कर्तव्य से विमुख न करे, बल्कि सदाचार, संयम और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ाए।”
लाटू ने तिरस्कार से उसकी ओर देखा।
“दो दिन दीक्षा क्या ले ली, खुद को संत समझने लगे?”
रामलाल के चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी।
“मैं संत नहीं हूँ, दादा। अगर सब कुछ जानता होता, तो आज काका के पास अपनी संस्कृति और पुरखों को समझने के लिए क्यों जाता?”
लाटू ने फिर ताना मारा—
“अब संस्कृति याद आ रही है? गुरु के पीछे जाते समय कहाँ थी तुम्हारी संस्कृति?”
रामलाल ने गहरी साँस ली।
“शायद अपनी संस्कृति को समझने में ही मैंने देर कर दी। लेकिन देर से समझने की कोशिश करना, कभी न समझने से तो बेहतर है।”
फिर उसने अपनी जिज्ञासा सामने रखी—
“दादा, मैंने सुना है कि लुगू बाबा और लुगू आयो से जुड़ी कुछ पूजा-परंपराओं में मांस-मछली, लहसुन और प्याज तक का निषेध माना जाता है। अगर ऐसा है, तो उसके पीछे का भाव भी समझना चाहिए। कोई नियम क्यों बना? उसका उद्देश्य क्या था? क्या उसमें संयम, शुद्धता या जीवन के किसी दूसरे गहरे सिद्धांत का संदेश छिपा है? यह सब जाने बिना केवल नियम दोहराते रहने से हम उसके वास्तविक अर्थ तक कैसे पहुँचेंगे?”
लाटू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“अब तुम मुझे धर्म सिखाओगे?”
रामलाल ने समझाने का प्रयास किया—
“मैं तुम्हें धर्म नहीं सिखा रहा हूँ, दादा। मैं तो स्वयं सीखने आया हूँ।”
“चुप!”
लाटू लगभग गरज उठा।
“हमारे पुरखों ने हमें संस्कृति दी, ज्ञान दिया, समाज दिया। और आज तुम उसी समाज को गलत ठहराने चले हो? अपने पुरखों की परंपराओं पर सवाल उठाते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती?”
वह रामलाल के सामने आकर खड़ा हो गया।
“सुन लो, तुम अब संताल नहीं रहे! समाज में बैठने का हक खो चुके हो। फिर हमारे बीच लौटकर क्यों आते हो?”
रामलाल ने उसकी आँखों में उभरते क्रोध को देखा। वह समझ गया कि इस समय एक और शब्द कहने का अर्थ विवाद को बढ़ाना होगा।
उसने शांत भाव से कहा—
“ठीक है, दादा। ज्ञान और विवेक में तुम मुझसे बड़े हो। मान लिया कि तुम सही हो और मैं गलत। लेकिन मैं काका से मिलने आया हूँ। उनसे मिलकर अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहता हूँ। बस इतना ही।”
लाटू उसे घूरता रहा।
रामलाल बिना कोई उत्तर दिए आगे बढ़ गया।
उसके मन में मित्र के प्रति नाराजगी से अधिक दुःख था। जिस व्यक्ति के साथ उसने बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ बाँटी थीं, आज वही व्यक्ति उसे अपनी संस्कृति से विमुख मान रहा था।
लेकिन रामलाल ने मन ही मन निश्चय किया कि वह अपनी जिज्ञासा को क्रोध या विवाद के कारण दबने नहीं देगा।
अपनी जड़ों को खोजने के लिए कभी-कभी उन प्रश्नों का सामना भी करना पड़ता है, जिनसे समाज असहज हो उठता है।
एक सपना, जो अतीत से जुड़ा था
रामेश्वर हांसदा का आँगन सामने था।
रामलाल भीतर पहुँचा, तो देखा कि एक वृद्ध खाँसते हुए घर से बाहर की ओर आ रहे हैं। चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं। शरीर पहले की अपेक्षा कमजोर हो गया था, लेकिन उनके व्यक्तित्व में वर्षों के अनुभव और सामाजिक प्रतिष्ठा की छाप अब भी दिखाई देती थी।
वे रामेश्वर काका ही थे।
रामलाल बचपन से उन्हें देखता और सुनता आया था। उनकी आवाज, चेहरे की बनावट और बातचीत का अंदाज उसके लिए परिचित था।
रामेश्वर हांसदा ने अपना पूरा जीवन संताली संस्कृति, सृष्टि-तत्त्व, काराम परंपरा तथा कारमू और धारमू की कथाओं को लोगों तक पहुँचाने में बिताया था। उनकी मंडली गाँव-गाँव जाकर पारंपरिक गीतों और कथाओं के माध्यम से लोगों को अपने पुरखों की स्मृतियों से जोड़ती थी।
लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा विरोधाभास भी था, जो रामलाल के मन में अनेक प्रश्न खड़े कर सकता था।
रामेश्वर काका लोगों को बताते थे कि लुगू बाबा और लुगू आयो से जुड़ी कुछ पूजा-परंपराओं में हड़िया-दारू, मांस-मछली, लहसुन और प्याज का निषेध माना जाता है। वे इन नियमों और उनसे जुड़ी मान्यताओं के बारे में लोगों को समझाते थे।
फिर भी अपने लंबे जीवन में वे स्वयं हड़िया-दारू और मांस-मछली का सेवन करते रहे थे।
रामलाल के मन में प्रश्न उठता था—क्या परंपराओं का ज्ञान होना ही पर्याप्त है, या उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारना भी आवश्यक है?
क्या कोई व्यक्ति दूसरों को सही मार्ग दिखाते हुए स्वयं उस मार्ग पर चलने में असफल हो सकता है? यदि ऐसा हो, तो क्या उसके ज्ञान और अनुभव का महत्त्व समाप्त हो जाता है?
या फिर ज्ञान का वास्तविक मूल्य इस बात में छिपा है कि मनुष्य अपने जीवन में उसे कितना उतार पाता है?
इन प्रश्नों के उत्तर रामलाल के पास नहीं थे। वह न तो किसी को दोषी ठहराने आया था, न किसी की मान्यताओं का अपमान करने। वह तो अपनी संस्कृति के मर्म को समझना चाहता था।
लेकिन आज उसके सामने एक ऐसा प्रश्न आने वाला था, जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की थी।
रामलाल को देखते ही रामेश्वर काका के चेहरे पर पहचान और स्नेह की चमक उभर आई।
उन्होंने प्रसन्नता से कहा—
“अरे रामलाल! आखिर आ ही गया बेटा! बहुत अच्छा हुआ। मैं तो तुम्हें याद ही कर रहा था।”
रामलाल ने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया।
“काका, आपके दर्शन करने आया था। आपसे कुछ बातें पूछनी थीं।”
रामेश्वर काका ने उसे स्नेह से देखा, लेकिन अगले ही क्षण उनके चेहरे का भाव बदल गया।
उनकी आँखों में जैसे कोई पुरानी स्मृति उभर आई हो। कुछ पल वे रामलाल को देखते रहे, मानो उसके चेहरे में किसी दूसरे व्यक्ति की छवि खोज रहे हों।
फिर धीमे स्वर में बोले—
“रामलाल, आज रात मैंने एक सपना देखा था।”
रामलाल उनकी ओर देखने लगा।
काका ने आगे कहा—
“सपने में मैंने तेरे पिता को देखा। वह मेरे सामने खड़ा था, लेकिन बहुत दुखी लग रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी। ऐसा लगता था, जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता हो।”
इतना कहकर वे चुप हो गए।
रामलाल के चेहरे पर अचानक गंभीरता छा गई।
अपने पिता का नाम सुनते ही उसके मन में बचपन की अनेक स्मृतियाँ जाग उठीं। पिता से जुड़ी बातें, उनके जीवन के वे प्रसंग जिन्हें वह जानता था, और वे अनगिनत प्रश्न जिनके उत्तर शायद उसे कभी नहीं मिले थे—सब एक साथ उसके मन में उमड़ने लगे।
उसने धीरे से पूछा—
“काका, पिताजी ने सपने में आपसे कुछ कहा था?”
रामेश्वर काका ने सिर हिलाया।
“नहीं बेटा। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन कह नहीं पाया। बस, उसके चेहरे पर गहरा दुःख था। उसकी आँखें जैसे मुझसे कोई उत्तर माँग रही थीं।”
रामलाल की उत्सुकता बढ़ गई।
“काका, क्या आपको याद है कि वह कहाँ खड़ा था? उसके आसपास कुछ और भी दिखाई दिया था?”
रामेश्वर काका ने कुछ देर सोचने के बाद कहा—
“सपने की सारी बातें तो ठीक से याद नहीं हैं। उम्र हो गई है बेटा। बहुत-सी बातें भूलने लगा हूँ। लेकिन उसका चेहरा... उसका उदास चेहरा अब भी मेरी आँखों के सामने घूम रहा है।”
उनकी आवाज में एक अनजानी गंभीरता थी।
रामलाल चुप हो गया।
वह अपनी संस्कृति, अपने पुरखों और अपने जीवन के प्रश्नों का उत्तर खोजने आया था। लेकिन अब उसके सामने एक नया सवाल खड़ा हो गया था।
आखिर उसके पिता सपने में रामेश्वर काका के सामने क्यों आए थे?
क्या यह केवल एक सामान्य सपना था, जिसमें बीती हुई स्मृतियाँ आकार ले लेती हैं? क्या रामेश्वर काका के मन में वर्षों से दबी कोई पुरानी घटना इस सपने का कारण बनी थी? या फिर रामलाल के परिवार के अतीत में कोई ऐसी बात छिपी थी, जिसके बारे में वह अब तक अनजान था?
उसने रामेश्वर काका के चेहरे की ओर देखा। वृद्ध के चेहरे पर उभरी बेचैनी उसे सामान्य नहीं लगी।
आँगन में धीरे-धीरे खामोशी गहराने लगी।
दूर कहीं से किसी पक्षी की आवाज सुनाई दी। हवा के हल्के झोंके से आँगन में लगा पेड़ हिल उठा। लेकिन रामलाल का ध्यान इन सब बातों से हट चुका था।
उसके मन में अब केवल एक ही प्रश्न गूँज रहा था—
क्या उसके पिता के उस सपने का संबंध उसकी अपनी जड़ों से था? क्या अतीत की कोई ऐसी गाँठ थी, जिसे खोले बिना वह अपनी संस्कृति और अपने परिवार के इतिहास को पूरी तरह नहीं समझ सकता था?
रामेश्वर काका ने उसकी ओर देखा, जैसे कुछ और कहना चाहते हों। उनके होंठ हल्के से हिले, लेकिन शब्द बाहर नहीं निकले।
रामलाल प्रतीक्षा करता रहा।
शायद काका के पास कोई ऐसी स्मृति थी, जिसे वर्षों से उन्होंने अपने भीतर दबाकर रखा था।
शायद वह स्मृति रामलाल के जीवन की दिशा बदल सकती थी।
लेकिन उस समय रामेश्वर काका मौन रहे।
और उनके उस मौन में एक अनकहा रहस्य धीरे-धीरे आकार लेने लगा।
क्रमशः,,,,.......