रामलाल ने अपनी माँ की मृत देह को धीरे से जमीन पर रख दिया।
कुछ क्षण तक वह निःशब्द माँ के चेहरे को देखता रहा। फिर जैसे उसके भीतर वर्षों से दबा हुआ कोई बाँध अचानक टूट गया। वह जोर से दहाड़ मारकर रो पड़ा।
“भैया... मेरे चलते माँ ने हमें छोड़ दिया।”
फिर उसने अपनी भाभी की ओर मुड़कर कहा—
“भाभी माँ के समान होती हैं... तुम मुझे अवश्य माफ करोगी।”
उसकी आवाज काँप रही थी।
फिर वह माँ के निर्जीव चेहरे की ओर देखकर फूट-फूटकर बोला—
“नानकू की माँ... मैंने जिंदगी भर तुझे केवल आँसू दिए। मुझे माफ कर देना।”
चम्पा मुर्मू भी अपने आँसू रोक न सकी। वह रामलाल की पत्नी थी, लेकिन उस क्षण उसे लगा जैसे उसके भीतर वर्षों से जमा कठोरता पिघलकर कहीं बह गई हो। उसका मन किसी कोमल पत्ते की तरह काँप रहा था।
बागुन धीरे-धीरे रामलाल के पास आया और उसके कंधे पर हाथ रखा।
“उठो रामलाल। भाग्य में लिखा हुआ कोई नहीं टाल सकता। मारांग बुरु को यही मंजूर था। जी छोटा मत करो। बाबूजी नहीं हैं तो क्या हुआ... मैं हूँ।”
रामलाल ने सिर उठाया, लेकिन उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
बागुन ने कहा—
“तुझे याद है, माँ ने मुझसे ज्यादा स्नेह तुझे दिया था। पिताजी ने भी मुझसे ज्यादा तुझे पढ़ाया-लिखाया और योग्य बनाया। अब तुझे साबित करना होगा, रामलाल। तू बिरसा का बेटा है और बागुन का भाई है। उठो।”
रामलाल धीरे-धीरे उठा।
उसने सबसे पहले धरती माँ को प्रणाम किया। फिर उस मिट्टी को माथे से लगाया, जहाँ उसकी माँ ने अंतिम साँस ली थी। उसने उस चट्टान की ओर देखा, जहाँ बैठकर बचपन में उसने पहली बार बाँसुरी बजाना सीखा था।
उसकी आँखें फिर भर आईं।
रामलाल ने माँ की देह को अपने कंधे पर उठाया और गाँव की ओर चल पड़ा।
उधर गाँव के लोग बैलगाड़ियों में लकड़ी और पुआल लेकर जंगल की ओर आ रहे थे। नदी के किनारे चिता तैयार की गई।
बागुन ने अपनी माँ को मुखाग्नि दी।
रामलाल चुपचाप एक ओर खड़ा था। उसे अपने जीवन का हर गलत कदम याद आ रहा था। माँ के अंतिम शब्द बार-बार उसके कानों में हथौड़े की तरह पड़ रहे थे—
“बेटा, मैंने तुझे जन्म देते हुए सुख पाया है। तू लोगों को राह दिखाएगा... तू अपने बाप का नाम रोशन करेगा।”
रामलाल की आँखें चिता की अग्नि पर टिकी थीं।
आज उसे लगा जैसे उस अग्नि में केवल उसकी माँ की देह ही नहीं जल रही थी।
उसकी अपनी दुर्बलता जल रही थी।
उसका लोभ जल रहा था।
उसका स्वार्थ जल रहा था।
उसका पुराना जीवन जलकर राख हो रहा था।
उसने उस पवित्र अग्नि को साक्षी माना।
उस दिन रामलाल भीतर से बदल गया।
कुछ दिनों बाद नानकू की माँ चम्पा मुर्मू ने रामलाल में एक और परिवर्तन देखा।
अब वह अक्सर खोया-खोया रहता। कभी भगवान की तस्वीर के सामने घंटों बैठा रहता, कभी तस्वीर को एकटक देखता, मानो मन ही मन उनसे कोई बात कर रहा हो।
एक दिन चम्पा ने पूछ ही लिया—
“नानकू के बाबा, आजकल यूँ तस्वीर को क्यों देखते रहते हो? शराब भी छोड़ दी है। कहीं उसका मन पर कोई असर तो नहीं हुआ?”
रामलाल हल्का-सा मुस्कुराया।
“नहीं चम्पा। एक बात सोचता हूँ।”
“क्या?”
रामलाल कुछ देर तस्वीर को देखता रहा।
“हम भगवान की तस्वीर को घर में आसन देकर क्यों रखते हैं? केवल धूप-अगरबत्ती दिखाने के लिए?”
चम्पा ने सहजता से पूछा—
“तो किसलिए?”
रामलाल ने कहा—
“अगर हम उन्हें सर्वज्ञ मानते हैं, तो उनकी नजर के सामने मैं तुमसे कैसा व्यवहार कर रहा हूँ, परिवार में क्या बातें कर रहा हूँ, दूसरों के बारे में निंदा या चुगली कर रहा हूँ—क्या वे सब नहीं देखते?”
चम्पा चुप रही।
रामलाल ने कहा—
“मनुष्य को ऐसे ही मान के चलना चाहिए जैसे भगवान उसके सामने बैठे हों। तभी तस्वीर हमारे लिए जीवंत है। नहीं तो वह केवल कागज का एक टुकड़ा है।”
चम्पा अपने पति को देखती रह गई।
यह वही रामलाल था, लेकिन अब उसकी आँखों में कुछ और था—एक गहरी जिज्ञासा।
अब वह प्रत्येक चीज को ध्यान से देखने लगा था।
रात को वह मारांग बुरु लुगु बाबा के आसन के सामने घंटों बैठता। कभी आँखें बंद करता, कभी सामने रखी तस्वीर को निहारता।
उसके भीतर प्रश्न उठते रहते—
धर्म क्या है?
मनुष्य क्यों पूजा करता है?
प्रकृति क्या केवल पूजने की वस्तु है या उसकी रक्षा करना भी धर्म है?
अब जब रामलाल स्कूल जाता, रास्ते में मिलने वाले लोगों का हाल-चाल पूछता। किसी के घर बेटी का विवाह हो तो वह पहुँचता। किसी के घर मृत्यु का समाचार मिले तो वहाँ भी जाता। जितना उससे बन पड़ता, वह सहायता करता।
बागुन के बड़े बेटे शंभू को साथ लेकर वह अक्सर संताली काराम-बिनती सुनने जाता। वह समझने का प्रयास करता, लेकिन उसके भीतर कुछ प्रश्न लगातार उठते रहते।
संताली समाज को प्रकृति-पूजक कहा जाता है।
प्रकृति में मिट्टी है, पेड़ हैं, पहाड़ हैं, चट्टानें हैं, जंगल हैं, नदी है, पशु-पक्षी हैं—जीवन का पूरा संसार है।
फिर पूजा में पशुओं की बलि क्यों?
क्या दोनों बातें एक साथ सत्य हो सकती हैं?
एक दिन गाँव में हरि सोरेन के पिता रीठा सोरेन का निधन हो गया।
दसवीं के अवसर पर आँगन में मुर्गे, मुर्गियाँ, बकरों और सूअरों की बलि दी गई। कुछ ही देर में आँगन का दृश्य देखकर रामलाल भीतर तक हिल गया।
वह वहाँ से किसी तरह घर लौटा और आते ही उसे उल्टी होने लगी।
उस रात वह सो नहीं सका।
वह मारांग बुरु के सामने बैठकर रोता रहा।
“मैंने उन निर्दोष प्राणियों को मरते देखा... फिर भी उन्हें रोक नहीं सका।”
उसके मन में एक और विचार उठा—
“पढ़ा-लिखा तो मैं भी हूँ। लेकिन यदि पढ़ाई के बाद भी मनुष्य अपने कर्म को सही-गलत पहचान न सके, तो ऐसी पढ़ाई का क्या लाभ?”
उसके भीतर से आवाज आई—
“पढ़ा-लिखा होना काफी नहीं है, आत्मबोध होना चाहिए।”
उसी रात उसने बड़े भाई बागुन को आवाज दी—
“भैया!”
बागुन उठकर बाहर आया।
“क्या बात है रामलाल?”
रामलाल ने कहा—
“भैया, हम लोग प्रकृति-पूजक हैं। प्रकृति में जितने जीव-जंतु, मिट्टी, पेड़-पौधे, चट्टान, पहाड़ और जंगल हैं, उनकी रक्षा करना और उन्हें बढ़ावा देना हमारा कर्तव्य नहीं होना चाहिए? फिर उनकी हत्या को पूजा का हिस्सा कैसे माना जा सकता है?”
बागुन कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने चिंतित स्वर में कहा—
“रामलाल, लोग तेरी बात नहीं मानेंगे। यह पीढ़ियों से चला आ रहा है। तू खामखा ऐसी बातों पर ध्यान क्यों देता है?”
रामलाल कोई उत्तर दिए बिना लौट आया।
उस रात उसके भीतर एक निर्णय जन्म ले चुका था।
उसे सत्य चाहिए था।
रामलाल कई धर्मगुरुओं के पास गया।
उसने प्रश्न किए।
लेकिन अधिकांश लोगों ने वही कहा—
“यह पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता है।”
रामलाल लौट आता।
उसका मन कहता—
“केवल पुराना होना किसी बात के सत्य होने का प्रमाण कैसे हो सकता है?”
उसके भीतर प्रश्न और गहरा होता गया—
“यदि संताल प्रकृति-पूजक हैं तो हत्या क्यों?”
“माँ की संतानों की बलि क्यों?”
“क्या कोई माँ अपनी ही संतान का रक्त पी सकती है?”
“असंभव... यह सत्य नहीं हो सकता।”
लेकिन उसके प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर उसे कहीं नहीं मिला।
एक दिन वह थका-हारा घर लौट आया।
उसे लगा जैसे इतने लोगों से मिलने के बाद भी उसके हाथ में कुछ नहीं आया।
एक दिन बगल के गाँव में कीर्तन का आयोजन था।
रामलाल भी वहाँ पहुँचा।
कीर्तन समाप्त होने के बाद वह उठने ही वाला था कि तापस मंडल ने उसका परिचय रावण हेंब्रम से कराया।
रावण हेंब्रम देवघर में सह-प्रतिऋत्विक के रूप में कार्य करते थे और अध्यात्म तथा सामाजिक जीवन पर गंभीर चिंतन रखते थे।
रामलाल को जैसे अपने प्रश्नों का कोई नया द्वार दिखाई दिया।
वह उनके सामने बैठ गया।
उसने अपने मन की सारी बातें कह डालीं—
प्रकृति-पूजा...
पशुबलि...
परंपरा...
धर्म...
अंधानुकरण...
और सत्य की उसकी खोज।
रावण हेंब्रम ने उसकी पूरी बात शांत होकर सुनी।
कुछ क्षण मौन रहने के बाद उन्होंने केवल दो शब्द कहे—
“कॉमन सेंस।”
रामलाल उनकी ओर देखने लगा।
रावण हेंब्रम ने धीरे से कहा—
“सारे प्रश्न का एक जवाब है—कॉमन सेंस की वृद्धि। अर्थात् उपस्थित बुद्धि। जब तक मनुष्य के भीतर देखने, सोचने और समझने की क्षमता विकसित नहीं होगी, तब तक विवेक का जागरण कैसे होगा?”
रामलाल चुपचाप सुनता रहा।
रावण ने कहा—
“यह उपदेश से अधिक समझने की चीज है। मीठे के वर्णन से मुँह मीठा नहीं होता। किसी बात को केवल सुन लेने से सत्य का अनुभव नहीं होता। मनुष्य को स्वयं देखना, समझना और परखना पड़ता है।”
रामलाल ने पूछा—
“फिर मुझे क्या करना होगा?”
रावण हेंब्रम ने उसकी ओर देखा।
“अभी थोड़ी देर में सत्संग होगा। मुझे उम्मीद है, वहाँ तुम्हें अपने बहुत-से प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे।”
रामलाल शांत होकर बैठ गया।
उसके भीतर पहली बार ऐसा लग रहा था कि शायद वह जिस सत्य को इतने दिनों से बाहर खोज रहा था, उसकी यात्रा अब भीतर से शुरू होने वाली है।
और वह सत्संग की प्रतीक्षा करने लगा।
जयगुरु🙏🏻🙏🏻🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम
चंद्रा सत्संग केंद्र
बोकारो झारखंड