जयगुरु श्रीमान् 🙏🏻
बांसुरी की वह धुन
भाग द्वितीय — जागरण
रामलाल तेज कदमों से दौड़ता हुआ घने जंगल में जा पहुँचा।
वही जंगल...
जहाँ कभी वह बचपन में बकरियाँ चराया करता था।
वही पहाड़...
वही पेड़...
और वही बड़ी-सी चट्टान, जिस पर बैठकर उसने पहली बार बाँसुरी में सुर भरना सीखा था।
वर्षों बाद उस चट्टान को देखते ही उसके कदम लड़खड़ा गए।
वह वहीं गिर पड़ा।
हाथ-पाँव शिथिल हो गए। साँसें तेज चलने लगीं। उसके मुँह से झाग निकलने लगा और कुछ ही क्षणों में उसकी आँखें बंद हो गईं।
वह बेहोश हो चुका था।
उसके भीतर जैसे वर्षों का संचित दर्द एक साथ उठ खड़ा हुआ था। मानो स्मृतियों की असंख्य गाँठें उसके मस्तिष्क और चेतना को भीतर से खींच रही हों।
उधर गाँव में चातुर मांझी का मन अशांत था।
उन्होंने बागुन की ओर देखकर कहा—
“बागुन, तू पीछे जा। अपने भाई को खोजकर ला।”
बागुन ने अनमने ढंग से मुँह फेर लिया।
“चाचा, वह रोज का नाटक है। थोड़ी देर बाद भूख लगेगी तो खुद लौट आएगा।”
रामलाल की पत्नी ने भी बेरुखी से कहा—
“कुछ नहीं होगा चाचा। यह इसका रोज का तमाशा है।”
चातुर मांझी ने दोनों की ओर देखा।
उनके चेहरे पर चिंता थी।
उन्होंने रामलाल की बूढ़ी माँ की ओर देखा, फिर धीरे से बोले—
“भाभी... वह अब ऐसे नहीं लौटेगा।”
माँ ने काँपती आँखों से उनकी ओर देखा।
चातुर मांझी ने कहा—
“वह जंगल में जरूर कुछ छोड़ आया है।”
इतना कहकर वे उठे और वहाँ से चले गए।
बूढ़ी माँ कुछ क्षण पीढ़े पर बैठी रही।
फिर उसने काँपते हाथों से अपनी लाठी उठाई।
“मेरा बेटा...”
वह धीरे-धीरे जंगल की ओर चल पड़ी।
रामलाल की पत्नी ने झुँझलाकर कहा—
“यह बुढ़िया भी आज जरूर मर जाएगी।”
वह बच्चों के लिए खाना बनाने चली गई।
लेकिन थोड़ी ही देर बाद किसी ने बागुन को आकर बताया—
“तेरी माँ रामलाल को खोजने जंगल की ओर चली गई है।”
बागुन जैसे चौंक पड़ा।
वह तुरंत उठा।
उसकी पत्नी भी उसके पीछे हो ली।
दोनों माँ को खोजने जंगल की ओर दौड़ पड़े।
रामलाल की पत्नी भी कुछ देर बाद बच्चों को लेकर उनके पीछे चल पड़ी।
माँ की यात्रा
सूरज सिर के ऊपर चढ़ चुका था।
तेज धूप और प्यास से बूढ़ी माँ के कदम काँप रहे थे।
लाठी जमीन पर पड़ती—
ठक...
ठक...
ठक...
हर कदम जैसे उसके शरीर से शक्ति खींच रहा था।
लेकिन ममता के आगे शरीर की सारी कमजोरी छोटी पड़ गई थी।
उसकी आँखों के सामने एक-एक करके पुराने दृश्य उभरने लगे।
नंगे पैर स्कूल जाता छोटा-सा रामलाल...
फटे कपड़ों में किताब को सीने से लगाए हुए रामलाल...
भूख लगने पर भी अपने हिस्से का माड़ माँ के लिए छोड़ देता हुआ रामलाल...
और वह रात, जब उसने अपने पति बिरसा से कहा था—
“मैं लाख कष्ट सह लूँगी, लेकिन रामलाल को पढ़ाऊँगी।”
उसके कदम डगमगाए।
उसने आकाश की ओर देखा।
“हे भगवान... मेरे बेटे को कुछ मत करना।”
उसके मन में एक ही विचार था—
“अगर रामलाल को कुछ हो गया तो मैं उसके पिता बिरसा को क्या मुँह दिखाऊँगी?”
पीछे से बागुन चीख रहा था—
“माँ!”
उसकी पत्नी भी पुकार रही थी—
“माँ, रुको!”
रामलाल की पत्नी बच्चों के साथ उनके पीछे-पीछे चली आ रही थी।
लेकिन बूढ़ी माँ किसी की आवाज नहीं सुन रही थी।
उसके लिए इस समय पूरी दुनिया में केवल एक ही व्यक्ति था—
उसका रामलाल।
चट्टान पर
दोपहर ढलने लगी।
रामलाल अभी भी उसी चट्टान पर बेहोश पड़ा था।
अचानक उसके भीतर जैसे कोई हलचल हुई।
उसे लगा वह फिर उसी ऊँचे पेड़ पर बैठा है।
हाथ में वही पुरानी बाँसुरी है।
उँगलियाँ उसी तरह बाँसुरी के छिद्रों पर चल रही हैं।
और वही धुन...
वही राग...
वही बचपन।
वह धुन धीरे-धीरे जंगल में फैल रही थी।
पेड़ झूम रहे थे।
हवा शांत थी।
पक्षी जैसे उस संगीत को सुनने के लिए ठहर गए थे।
तभी अचानक तेज हवा का एक झोंका आया।
पेड़ हिलने लगा।
रामलाल का संतुलन बिगड़ा।
वह नीचे गिरा।
लेकिन इस बार उसे चोट नहीं लगी।
जब उसने आँखें खोलीं तो वह उसी बड़ी चट्टान पर खड़ा था।
उसके सामने प्रकाश से भरे चार दिव्य पुरुष खड़े थे।
रामलाल उन्हें पहचान नहीं पा रहा था, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी श्रद्धा उमड़ रही थी।
उनमें से एक आगे बढ़े।
वही वृद्ध...
वही चेहरा...
वही करुणा से भरी आँखें।
रामलाल के भीतर वर्षों पुरानी स्मृति बिजली की तरह कौंध गई।
“बेटा, तुम बड़े होकर उन्हें रास्ता दिखाना।”
वृद्ध ने उसे अपने पास बुलाया।
रामलाल उनके चरणों में गिर पड़ा।
वृद्ध ने उसे उठाया और अपनी बाँहों में भर लिया।
फिर उसके माथे पर हाथ रखते हुए बोले—
“उठो बेटा।”
रामलाल की आँखों से आँसू बहने लगे।
वृद्ध ने कहा—
“तुम गिर नहीं सकते।”
रामलाल ने काँपते हुए पूछा—
“लेकिन बाबा... मैं तो गिर गया हूँ।”
वृद्ध मुस्कराए।
“मनुष्य गिरकर ही ऊपर उठना सीखता है। यही प्रकृति का शाश्वत नियम है।”
रामलाल शांत होकर सुनता रहा।
“तेरे प्रारब्ध और कर्मों ने तुझे गिराया था। लेकिन गिरना अंत नहीं होता।”
उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“अब उठ।”
कुछ क्षण के लिए वातावरण बिल्कुल शांत हो गया।
फिर वह दिव्य स्वर सुनाई दिया—
“मैं तेरे कंधे पर बैठ। मेरा ही काम तुझसे करवाऊँगा।”
अचानक रामलाल की आँखें खुल गईं।
माँ
उसने स्वयं को उसी चट्टान पर पाया।
लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
न भूख।
न प्यास।
न थकान।
शरीर जैसे हल्का हो गया था।
उसने उठने की कोशिश की।
तभी दूर से एक आवाज उसके कानों में पड़ी—
“रामा... रामा...”
वह आवाज बहुत कमजोर थी।
रामलाल ने पलटकर देखा।
उसकी बूढ़ी माँ लाठी के सहारे खड़ी थी।
उसका चेहरा पसीने से तर था।
आँखों में आँसू थे।
रामलाल दौड़ पड़ा।
“माँ!”
माँ ने उसे देखा।
उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसे वर्षों बाद उसे अपना खोया हुआ बच्चा मिल गया हो।
रामलाल ने माँ को अपनी बाँहों में भर लिया।
“माँ...”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
उसकी साँसें बहुत धीमी हो चुकी थीं।
वह टूटी हुई आवाज में बोली—
“मुझे... अपनी कोख पर पूरा भरोसा था बेटा।”
रामलाल रोने लगा।
माँ ने कहा—
“जब मैंने तुझे जन्म दिया था... मुझे प्रसव की पीड़ा नहीं हुई थी। मुझे तो उस समय भी लगा था... तू किसी बड़े काम के लिए आया है।”
उसने रामलाल के चेहरे को अपने दोनों हाथों से छुआ।
“तू... लोगों का दुःख दूर करेगा।”
रामलाल कुछ बोल नहीं पाया।
माँ की साँस और धीमी हो गई।
“बेटा... अपने बाप का नाम मत डुबाना।”
यह उसके अंतिम शब्द थे।
उसका सिर रामलाल के सीने पर ढुलक गया।
रामलाल स्तब्ध रह गया।
कुछ क्षण तक वह माँ को अपनी बाँहों में लिए बैठा रहा।
न कोई चीख।
न विलाप।
न आँसू।
जैसे उसकी आँखों के भीतर का सारा जल किसी और ही आग में बदल चुका हो।
कुछ दूर खड़े बागुन और उसकी पत्नी भी पत्थर की तरह खड़े थे।
रामलाल की पत्नी के मुँह से भी कोई शब्द नहीं निकला।
जंगल में एक विचित्र शांति थी।
दूर कहीं कोई पक्षी बोला।
हवा ने पेड़ों की पत्तियों को छुआ।
और उसी क्षण...
बहुत दूर पहाड़ों के बीच से बाँसुरी जैसी एक मधुर ध्वनि सुनाई दी।
रामलाल ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
उसकी आँखें अब पहले जैसी नहीं थीं।
उनमें पश्चात्ताप था, लेकिन उससे भी अधिक एक दृढ़ निश्चय।
उसने अपनी माँ के निर्जीव शरीर को धीरे से धरती पर रखा।
फिर उसी चट्टान की ओर देखा, जहाँ कभी उसका बचपन बैठकर बाँसुरी बजाता था।
उसके मन में एक ही वाक्य गूँज रहा था—
“जिसे रास्ता दिखाना था... वह स्वयं रास्ता भूल गया था।”
लेकिन आज...
उसे पहली बार लगा कि शायद रास्ता अभी पूरी तरह खोया नहीं है।
उसके सामने माँ की देह थी।
पीछे टूटा हुआ परिवार।
और सामने वही जंगल...
जहाँ वर्षों पहले किसी ने उसके सिर पर हाथ रखकर उसके जीवन का उद्देश्य बताया था।
रामलाल ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसके भीतर से एक धीमी आवाज उठी—
“बाबा... अब मैं लौट आया हूँ।”