खरी खरी Dr Sandip Awasthi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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खरी खरी

वैचारिकी :-

    धार्मिकता,लेखक और हिप्पोक्रेट बुद्धिजीवी

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एक लेखक ,विचारक की धार्मिक दृष्टि भी होती ही है।भले ही बाद में चार अक्षर पढ़कर या स्वार्थवश वह बाहर से नास्तिक हो जाए । मुझे याद है वाराणसी में ,करीब डेढ़ दशक पूर्व, सेवक स्मृति सम्मान लेने गया था। सोच विचार पत्रिका वाले मिश्र बंधु (प्रोफेसर जितेंद्रनाथ मिश्र,नरेंद्र नाथ मिश्र) ने बुलाया था। तब काशीनाथ जी के द्वारा श्रेष्ठ कथाकार सम्मान,वाराणसी की पावन धरा पर मिला था। अभी मोदी जी के वाराणसी में आने की दूर दूर तक आहट तो छोड़ो ,दिल्ली आने की भी खबर नहीं थी। वह गुजरात में खुशहाल मुख्यमंत्री थे,मोटा भाई के साथ। तब प्रातःकाल काशीनाथ जी के घर गया था।काशी का अस्सी की धूम थी। उधर दिल्ली में आदरणीय नमवरसिंह जी से भी मिलना और सीखना होता रहता था। तो मैंने चाय नाश्ते के बाद उन घोर कम्युनिस्ट से एक खास सवाल पूछ डाला। मेरे साथ के तीनों साहित्यकार, दबाब में,लिहाज में चुप थे।बैद्यनाथ मिश्र, मैथिली लेखक,महेंद्र भीष्म,किन्नर विमर्श के भारत में एकमात्र भरोसेमंद और मेहनती साहित्यकार, संजय पंकज,मुजफ्फरपुर के बड़े कवि मित्र तीनों सामान्य बाते कर रहे थे। मैं सबसे युवा था पैंतीस के करीब और पाखी,वागर्थ, हँस, समकालीन भारतीय साहित्य,नया ज्ञानोदय सहित सभी बड़ी पत्रिकाओं में कहानी,लेख, कविताएं प्रकाशित हो रही थी। यह अलग बात है कि दिल्ली के बार बार बुलाने पर भी दिल्ली छूकर वापस आने का नुकसान बहुत हुआ। दरअसल छोटे शहर में रहना,रहना नहीं होता बल्कि आपका कद,सोच,दृष्टि भी सीमित हो जाती है।और शहर छोटा हो या बड़ा वह अपना टैक्स,कर्जा वसूल ही लेता है। भले ही उसे आप घर की जिम्मेदारी, परिवार की देखरेख या कुछ भी नाम दो,पर यह किसके साथ नहीं होते? विश्वनाथ त्रिपाठी,अजीत कुमार,विष्णु खरे , धीरेन्द्र अस्थाना,प्रभाकर श्रोत्रिय,तुलसीराम, श्योराज सिंह बेचैन,ओमप्रकाश वाल्मीकि से लेकर बलराम पीएन,तक अपने गांव ,कस्बों को पहला मौका मिलते ही छोड़कर बड़े शहर में आए और फिर वहां से जोड़ तोड़ करके दिल्ली,मुंबई में स्थापित हो गए।ऊपर से अपने संस्मरण,किताबों में भूलकर भी ग्रामीण परिवेश ,परिवार और जिम्मेदारियों का जिक्र नहीं करते। करते भी हैं तो मुख्य प्रश्नों को टालकर ,इस तरह करते हैं मानो दुनिया जीतने या दुखों के पहाड़ से बचने को निकले थे।

क्या इनका परिवार,माता पिता,घर की जिम्मेदारियां नहीं थीं? यकीनन होंगी पर जो मन को भरमाना,अपनी महत्वकांक्षाओं को पर देना होता है ,वह अपने से तब भी नहीं हुआ और आज भी नहीं होता,जब करीब करीब जिम्मेदारी पूरी हो चुकी हैं।

 तो मैंने काशी जी से पूछ डाला, "भोले बाबा की नगरी में रहते हैं। तो क्या आपके घर में पूजा घर नहीं हैं? "। कुछ देर वह सन्न से रह गए। मेरे तीनों मित्र इधर उधर देखने लगे पर कान और कनखियों से काशी जी को ही देख रहे थे।

अपन ने एक बात बचपन से किताबें पढ़कर और विचारों को गुनकर सीखी की सवाल और जिज्ञासा जितनी जल्दी पूछी जाएगी,उतनी ही वह आगे और रास्ता बनाएगी। फिर कॉलेज में वाद विवाद प्रतियोगिताएं,स्टूडेंट एडिटर आदि से होते हुए हिचक मिट गई थी। किसी से अपन दबे या प्रभावित नहीं होते थे उस वक्त। हां,परिपक्वता के साथ समझ बढ़ी तो दूसरों की मेहनत और हिम्मत भी दिखने लगी।उनका सम्मान बढ़ा।

काशी जी ने कुछ देर बाद जवाब दिया,"बाबा की नगरी है।बाबा हर घर में विराजमान हैं। मेरे यहां भी हैं। " तभी माताजी,चाय नाश्ते की ट्रे ले आईं। हमने प्रणाम किया। "अंदर है पूजा घर " कहकर वह चली गईं।

   अर्थ यह है कि धार्मिकता हमारे जन्म से पूर्व ही निर्धारित कर दी जाती है।फिर बाल्यकाल में वह और मजबूत हो हमें उसमें ढाल देती है,स्वाभाविक है यह क्रिया।पर धन्य है वह जो मंच, लेखन और अब सोशल साइट्स से अपने नास्तिक होने का दिखावा भी करते हैं। और दूसरे की धार्मिकता का मजाक भी बनाते हैं। कम से कम धार्मिक लेखक और साहित्यकार झूठ तो नहीं बोलते,हिप्पोक्रेट तो नहीं। वह और भी हास्यपद लगते हैं जो वाम विचारों के समर्थक बन गए हैं,बिना मार्क्स,एंगल्स आदि को पढ़े ,बस परोक्ष लाभ के लिए, इन लोगों को देखकर। और घर में सुबह शाम नियम से पूजा पाठ,अर्चना,आराधना और श्रद्धा से जन्माष्टमी से लेकर नवरात्रि तक मनाते हैं।

    प्रभु ,सद्बुद्धि दें।

 

डॉ संदीप अवस्थी