अवनि एक अटूट विश्वास - 17 RAAHULL SHARMA द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अवनि एक अटूट विश्वास - 17

माँ: "चलो बेटा, हमारे साथ चलो। अब यहाँ रुकने का मतलब सिर्फ अपनी और बेइज़्ज़ती करवाना है।


हमारी दिल्ली की फ्लाइट का समय हो गया है। हमें इसी वक्त निकलना होगा, वरना हम कहीं के नहीं रहेंगे।"


नीलम भाभी, जो अब तक खामोश थीं, ने धीरे से कहा, "आर्यमन, जो होना था हो गया। अब दिल्ली चलकर देखते हैं कि क्या बचाया जा सकता है..."


आर्यमन ने झटके से अपनी भाभी की तरफ देखा। उसकी आँखों में इतनी नफरत थी कि नीलम भाभी दो कदम पीछे हट गईं।



आर्यमन (सपाट और ठंडी आवाज़ में): "बचाया जा सकता है? क्या बचाओगी भाभी?

जो रिश्ता, जो इज़्ज़त और जो प्यार आपने एक पल में मिट्टी में मिला दिया, उसे दिल्ली जाकर कैसे बचाओगी?

आप सबको दिल्ली जाना है ना? जाइए। आप सबके लिए 'बिज़नेस' और 'घर' खत्म हुआ है, मेरे लिए मेरी 'ज़िंदगी' खत्म हो गई है।"



श्रद्धा ने गाड़ी के अंदर से ही आवाज़ दी, "आर्यमन, कम ऑन! हमें निकलना चाहिए।"


आर्यमन ने गाड़ी की ओर एक हिकारत भरी नज़र डाली और फिर अपने पिता से कहा, "आप लोग जाइए।


मैं आ जाऊँगा। लेकिन याद रखिएगा, आज इस हवेली के गेट से हम सिर्फ़ खाली हाथ नहीं जा रहे, बल्कि अपनी इंसानियत और अपना गौरव भी यहीं छोड़कर जा रहे हैं।"



हवेली के गार्ड्स बड़े ही अपमानजनक तरीके से उन्हें वहां से हटने का इशारा कर रहे थे। भारी मन से, आर्यमन का परिवार अपनी गाड़ियों में बैठने लगा। दिल्ली लौटने का समय हो चुका था,



तभी श्रद्धा अपनी कार से उतरती है और तेज़ी से आर्यमन के पास पहुँचती है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी। 


वह आर्यमन का हाथ पकड़ लेती है और उसे अपनी गाड़ी की ओर खींचने की कोशिश करते हुए कहती है, "चलो आर्यमन, बहुत तमाशा हो गया। अब हमें यहाँ से निकलना होगा, दिल्ली जाने का समय हो चुका है।"



आर्यमन, जो अब तक सुन्न था, बिना किसी विरोध के श्रद्धा का हाथ थाम लेता है। वह इतना टूट चुका था कि उसे अब किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।



उधर, अवनि के कमरे की खिड़की अचानक खुलती है। अवनि, जिसके दिल के किसी कोने में अभी भी यह उम्मीद बाकी थी कि शायद आर्यमन सब कुछ छोड़कर उसे पुकारेगा या अपनी बेगुनाही साबित करेगा, खिड़की के पास आती है। उसे लग रहा था कि शायद अभी भी कुछ बदल सकता है।



लेकिन जैसे ही अवनि की नज़र नीचे पड़ती है, उसकी रूह कांप जाती है। वह देखती है कि जिस आर्यमन के लिए उसने दुनिया से लड़ाई की, वही आर्यमन आज श्रद्धा का हाथ थामे खड़ा है। 


जब वह आर्यमन का हाथ श्रद्धा के हाथ में देखती है, तो अवनि के सब्र का बाँध टूट जाता है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं और वह अंदर से पूरी तरह बिखर जाती है। उसे यकीन हो जाता है कि आर्यमन के लिए उसका प्यार सिर्फ एक भूल थी।



आर्यमन श्रद्धा के साथ गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ जाता है। श्रद्धा जीत की एक मुस्कान के साथ ड्राइवर को चलने का इशारा करती है और दोनों वहां से निकल जाते हैं।



अवनि की माँ, जो खिड़की के पास ही खड़ी अवनि की हालत देख रही थी, यह सब देखकर और भी दुखी हो जाती हैं।


वह अपनी बेटी के टूटते हुए वजूद को देख रही थीं। अवनि ने बिना कुछ कहे धीरे से खिड़की बंद कर ली और कमरे के अंधेरे में खो गई।


कपूर खानदान की गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुई हवेली के गेट से दूर जा रही थीं, और पीछे छोड़ जा रही थीं एक कभी न भरने वाला ज़ख्म।



2 महीने बाद


समय का पहिया घूम चुका था, लेकिन ज़ख्म अभी भी ताज़ा थे। गोयनका विला के भव्य मंदिर में, जहाँ चारों ओर मोगरे की खुशबू फैली थी, अवनि भगवान कृष्ण की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़ी थी।


उसका चेहरा अब पहले से कहीं ज़्यादा गंभीर और शांत हो गया था। आँखों में वह भोलापन तो नहीं था, पर एक नई दृढ़ता ज़रूर थी।


अवनि (मन ही मन): "कान्हा जी, आज पूरे 2 महीने हो गए हैं। मैं खुद को काम में इतना व्यस्त रखती हूँ, हज़ारों फाइलों के बीच अपना दिन गुज़ार देती हूँ ताकि उसे याद न करूँ।


पर मैं उसे जितना भूलना चाहती हूँ, वह उतना ही मेरे ख्वाबों में आता है। 


क्यों उसकी वो यादें मेरा पीछा नहीं छोड़तीं? क्यों आज भी उसका वह हाथ श्रद्धा के हाथ में देखना मुझे उसी पल की तरह तोड़ देता है?"


अवनि की आँखों के कोने गीले हो गए, पर उसने तुरंत उन्हें पोंछ लिया। अब वह कमज़ोर नहीं दिखना चाहती थी।


हवेली के आलीशान हॉल में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। वहाँ दादाजी (सेठ श्याम सुंदर गोयनका) अपनी ऊँची कुर्सी पर विराजमान थे।


उनके पास ही अवनि के पिता, चाचा जी, चाची जी और उनके सगे कजिन भाई-बहन बैठे थे। माहौल काफी गंभीर था। 


अवनि अपनी पूजा समाप्त कर बड़े ही शालीन और राजसी भाव के साथ हॉल में आई। उसकी चाल में अब एक 'बिजनेस टायकून' का आत्मविश्वास झलक रहा था।



जैसे ही अवनि आकर अपनी जगह पर बैठी, दादाजी ने सभी की ओर देखा और फिर अवनि पर अपनी नज़रें टिका दीं। उनकी आवाज़ में वही भारीपन और अधिकार था।



दादाजी: "आज मैंने तुम सबको यहाँ एक बहुत ज़रूरी फैसले के लिए बुलाया है। इन दो महीनों में अवनि ने जिस तरह हमारे बिजनेस को संभाला है, उसने साबित कर दिया कि वह सिर्फ मेरी पोती नहीं, बल्कि गोयनका साम्राज्य की असली वारिस है।"



दादाजी थोड़े रुके और फिर एक फाइल मेज़ पर रखते हुए बोले:


हॉल में चारों ओर छाई खामोशी को तोड़ते हुए दादाजी ने अपनी चाय का कप मेज पर रखा और सबकी ओर एक गहरी नज़र डाली। उनके चेहरे पर इस बार एक संतुष्टि वाला भाव था।



दादाजी (गंभीर और गर्व भरी आवाज़ में): "देखो भाई, मैंने बहुत सोच-समझकर एक फैसला लिया है।


आप सबने कोलकाता की 'राजेश कुमार अग्रवाल फैमिली एंड कंपनी' के बारे में तो सुना ही होगा?


टेक्सटाइल की दुनिया में उनका नाम नहीं, सिक्का चलता है। सालों पुरानी हमारी जान-पहचान है और उनके उसूल भी हमारे जैसे ही पक्के हैं।"


हॉल में बैठे सभी लोग बड़े ध्यान से दादाजी की बात सुन रहे थे। दादाजी आगे बोले:


"उनका इकलौता बेटा है—मयंक अग्रवाल। बहुत ही होनहार और काबिल लड़का है। जितनी छोटी उम्र में उसने अपना कारोबार पूरी दुनिया में फैलाया है,