हवेली की सुबह आज कुछ अलग ही रंग लिए हुए थी।
सूरज की सुनहरी किरणें जब सफेद संगमरमर के फर्श पर पड़ रही थीं, तो ऐसा लग रहा था मानो पूरी हवेली किसी उत्सव की तैयारी कर रही हो।
अवनि ने सुबह जल्दी उठकर स्नान किया और कान्हा को भोग लगाकर रसोई में जुट गई। उसने बड़े चाव से गरमा-गरम कचौड़ियाँ और केसरिया जलेबियाँ तैयार की थीं।
नाश्ते की मेज़ और शाही ठाट-बाट
हवेली के डाइनिंग हॉल का दृश्य किसी राजसी दरबार से कम नहीं था। मेज़ पर बिछी रेशमी चादर और उस पर सजे शुद्ध सोने और चांदी के बर्तन अपनी चमक बिखेर रहे थे।
चांदी की नक्काशीदार थालियों में सजी कटोरियाँ और सोने के जग में रखा गंगाजल, कपूर खानदान की रईसी की गवाही दे रहे थे।
तभी आर्यमन सीढ़ियों से नीचे उतरा। नीलम की उम्मीद के उलट, आर्यमन के चेहरे पर न तो गुस्सा था और न ही नफरत।
उसके चेहरे पर एक ऐसी अजीब सी शांति और विनम्रता थी, जिसे देख नीलम का कलेजा धक से रह गया।
आर्यमन का बदला हुआ अंदाज़
आर्यमन मुस्कुराते हुए मेज़ पर आया और सबसे पहले उसने अवनि के माता-पिता के चरण स्पर्श किए। यह देखकर अवनि की आँखों में एक चमक आ गई।
आर्यमन: (अत्यंत मधुर स्वर में) "प्रणाम बाबूजी, प्रणाम माँ। कल रात की थकान के बाद आज सुबह की ये ताज़गी बहुत अच्छी लग रही है।"
अवनि के पिता: "जुग-जुग जियो बेटा। हमें खुशी है कि तुम यहाँ घुल-मिल रहे हो।"
आर्यमन ने फिर अवनि की ओर देखा। अवनि, जो डरी हुई थी कि कल की कड़वाहट आज फिर न दोहराई जाए, आर्यमन की नज़रों में अपने लिए झूठा प्रेम और सम्मान देखकर चकित रह गई।
"अवनि जी, कल मंदिर में जो हुआ उसके लिए मुझे वाकई खेद है।
मैंने सोचा कि क्यों न हम आज का दिन साथ बिताएं?" आर्यमन ने चांदी के गिलास से पानी पीते हुए कहा।
माता-पिता से अनुमति
आर्यमन ने अपने पिता और अवनि के माता-पिता की ओर मुखातिब होकर हाथ जोड़े। उसकी आवाज़ में इतनी मिठास थी कि किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई कि इस शहद के पीछे नीलम का बोया हुआ ज़हर छिपा है।
आर्यमन का प्रस्ताव:
"पिताजी, और बाबूजी... मेरा मानना है कि शादी जैसे पवित्र बंधन में बँधने से पहले, हमें एक-दूसरे के विचारों और पसंद-नापसंद को समझना चाहिए।
अगर आप सबकी आज्ञा हो, तो क्या मैं आज अवनि को कानपुर की कुछ खास जगहों पर ले जा सकता हूँ? हम साथ में कुछ समय बिताएंगे, तो एक-दूसरे को बेहतर जान पाएंगे।"
बड़ों की प्रतिक्रिया:
अवनि की माँ: (भावुक होकर) "इससे अच्छी बात और क्या होगी बेटा! अवनि तो वैसे भी इस शहर को बहुत प्यार करती है, वो तुम्हें सब कुछ अच्छे से दिखाएगी।"
आर्यमन के पिता: "बिल्कुल बेटा, जाओ। हमें तुम पर पूरा भरोसा है।"
षडयंत्र की अगली कड़ी
नीलम एक कोने में खड़ी यह सब देख रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो आर्यमन रात को गुस्से में उबल रहा था, वह इतना विनम्र कैसे हो गया?
पर जब उसकी नज़र आर्यमन की उन आँखों से मिली जो अवनि को देखते समय अचानक बर्फीली हो जाती थीं, तो वह समझ गई— आर्यमन शिकार को जाल में फंसाने के लिए उसे दाना डाल रहा है।
अवनि मासूमियत से मुस्कुरा दी। उसे लगा कि उसकी प्रार्थना सुन ली गई है और आर्यमन का हृदय परिवर्तन हो गया है।
वह नहीं जानती थी कि यह 'बाहर घूमना' उसके चरित्र की परीक्षा और आर्यमन के उस अपमान का हिस्सा था, जो उसने रात के अंधेरे में तय किया था।
चाची का उत्साह और अवनि की तैयारी
चाची ने आगे बढ़कर अवनि के कंधे थपथपाए और बड़े ही लाड़ से चहकते हुए बोलीं:
"अरी ओ लाड़ो! अब खड़ी-खड़ी शर्माती ही रहेगी क्या? जल्दी जा और फटाक से अच्छे से तैयार हो जा। और सुन... आज ऐसे सज-धज के निकलना कि हमारे आर्यमन बाबू बस देखते ही रह जाएं! आखिर कानपुर की बिटिया की सादगी और सुंदरता का जादू भी तो इन्हें पता चलना चाहिए।"
आर्यमन ने यह सुनकर एक फीकी मुस्कान दी, जो ऊपर से तो विनम्र थी, पर उसके भीतर नीलम का बोया हुआ ज़हर उबल रहा था। उसने मन ही मन सोचा, "तैयार तो इसे होना ही चाहिए, क्योंकि आज इसके चेहरे से मासूमियत का नकाब जो उतारना है।"
श्रृंगार और कान्हा का आशीर्वाद
अवनि अपने कमरे में गई। उसने आज वही नीले रंग का रेशमी सूट निकाला जो उसे उसकी माँ ने पिछले जन्मदिन पर दिया था। यह रंग कान्हा के रंग जैसा था, जो उसकी रंगत को और निखार रहा था।
सादगी का जादू: अवनि ने बहुत ज़्यादा दिखावा नहीं किया। उसने अपनी आँखों में हल्का सा काजल लगाया, जो उसकी गहरी और 'निस्वार्थ' आँखों को और भी बड़ा दिखा रहा था।
निशानी: उसने अपने कानों में चांदी के छोटे-छोटे झुमके पहने और माथे पर एक छोटी सी बिंदी सजाई।
चोट का मरहम: अपनी चोटिल उंगली पर बंधी पट्टी को उसने दुपट्टे से थोड़ा ढकने की कोशिश की, ताकि आर्यमन को उसे देखकर बुरा न लगे।
तैयार होकर जब अवनि आईने के सामने खड़ी हुई, तो उसे अपनी चाची की बात याद आई— "आर्यमन देखता ही रह जाए।" उसने मन ही मन प्रार्थना की, "कान्हा, मुझे सुंदर नहीं, बस इतना सच्चा बनाए रखना कि मैं उनके मन के कड़वेपन को मिटा सकूँ।"
हवेली की दहलीज पर
जब अवनि सीढ़ियों से नीचे उतरी, तो पूरा हॉल सन्न रह गया। उसकी सादगी में एक ऐसी चमक थी जो सोने-चांदी के बर्तनों से कहीं ज्यादा कीमती लग रही थी।
आर्यमन की प्रतिक्रिया: आर्यमन जो फोन में व्यस्त होने का नाटक कर रहा था, उसकी नज़रें जैसे ही अवनि पर पड़ीं, वह पल भर के लिए ठिठक गया। नीलम ने जो ज़हर उसके कान में घोला था ("शराब" और "दिखावा" की बातें), वह अवनि की इस सादगी को देखकर एक पल के लिए धुंधलाने लगा। पर उसने तुरंत खुद को संभाला।
नीलम की जलन: दूर खड़ी नीलम ने देखा कि आर्यमन का ध्यान अवनि पर टिक गया है। उसने तुरंत टोकते हुए कहा, "चलो-चलो, देर हो रही है। धूप तेज़ होने से पहले निकल जाओ।"
सफर की शुरुआत
आर्यमन ने अपनी चमचमाती स्पोर्ट्स कार का दरवाज़ा किसी मंझे हुए 'जेंटलमैन' की तरह खोला। अवनि के माता-पिता की आँखों में अपनी बेटी के लिए एक सुनहरा भविष्य चमक रहा था। आर्यमन ने झुककर अवनि के बाबूजी और चाचाजी के पैर छुए, दादी माँ से आशीर्वाद लिया और चेहरे पर एक ऐसी मनमोहक मुस्कान सजाई कि हवेली का हर शख्स उसकी सादगी का कायल हो गया।
"आप फिक्र न करें बाबूजी, अवनि जी मेरे साथ बिल्कुल सुरक्षित हैं। हम बस थोड़ा शहर घूमेंगे ताकि एक-दूसरे की पसंद-नापसंद समझ सकें," आर्यमन की आवाज़ में इतनी मिठास थी कि अवनि भी एक पल के लिए कल की कड़वाहट भूल गई।
गाड़ी जैसे ही हवेली के भारी लोहे के फाटक से बाहर निकली और सड़कों की भीड़ को पीछे छोड़ते हुए शांत हाईवे पर चढ़ी, आर्यमन के चेहरे की वह मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। उसकी आँखों में अब वह कोमलता नहीं, बल्कि एक ठंडी नफरत थी।
वह रहस्यमयी फोन कॉल
आर्यमन ने अपनी जेब से फोन निकाला और एक नंबर डायल किया। अवनि खिड़की से बाहर उड़ते खेतों को देख रही थी, पर आर्यमन की भारी और आदेशात्मक आवाज़ ने उसका ध्यान खींच लिया।
"हेलो! पहुँच गए? सुनो, सारा सामान लेकर उसी पहाड़ी पर मिलो... हाँ, कानपुर की सबसे ऊँची वाली चोटी जहाँ कपल्स जाते हैं। वहीं पर पूरा सेटअप तैयार रखना। कुछ भी कम नहीं होना चाहिए। मैं अगले 15 मिनट में पहुँच रहा हूँ।"
अवनि ने सहमकर आर्यमन की ओर देखा। "आर्यमन जी, कौन सा सामान? और हम पहाड़ी पर क्यों जा रहे हैं? वहाँ तो..."
आर्यमन ने स्टीयरिंग को कसकर पकड़ा और एक तिरछी नज़रों से उसे देखा। "वहाँ शांति है अवनि जी। शोर-शराबे में तो लोग मुखौटे पहनकर घूमते हैं, असली चेहरा तो एकांत में ही दिखता है। आप बोर हो रही थीं न? तो मैंने सोचा आपको वह सब दूँ जो आपको पसंद है।"
पहाड़ी का एकांत और बिछाया गया जाल
गाड़ी ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होती हुई कानपुर की उस मशहूर पहाड़ी के शिखर पर जा रुकी जहाँ से पूरा शहर किसी खिलौने जैसा लग रहा था। वहाँ पहले से ही एक आदमी खड़ा था, जिसने आर्यमन को देखते ही एक बड़ा सा काला बैग थमाया और चुपचाप नीचे की ओर चला गया।
आर्यमन ने गाड़ी से उतरकर एक बड़ी सी चपटी चट्टान पर वह सामान सजाना शुरू किया। अवनि जब बाहर निकली, तो जो उसने देखा उसे देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
पहाड़ी की उस सुनसान चोटी पर, जहाँ से पूरा कानपुर एक धुंधली तस्वीर जैसा दिख रहा था, वहाँ सजी उस चट्टान ने अवनि के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। अवनि की आँखें फटी की फटी रह गईं।
अय्याशी का सामान और अवनि का सन्नाटा
चट्टान पर किसी महँगे बार जैसा नज़ारा था। वहाँ 5-6 विदेशी शराब की बोतलें सजी थीं, जिनकी चमकती हुई कांच की सतह पर सूरज की रोशनी पड़कर अवनि की आँखों को चुभ रही थी। बगल में सोडा की बोतलें, महँगी विदेशी सिगरेट के पैकेट, लाइटर और तरह-तरह के विदेशी नमकीन बिखरे पड़े थे। वह हर सामान वहाँ मौजूद था जो एक 'अय्याश' और बिगड़ी हुई जीवनशैली की पहचान होता है।
अवनि को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। वह कान्हा की भक्त, जिसने कभी सादे पानी के अलावा किसी चीज़ का मोह नहीं किया, आज उसके सामने 'बदचलनी' का पूरा सामान परोस दिया गया था।
आर्यमन की आँखों में नफरत और तिरस्कार की एक ऐसी आग थी, जो अवनि की सादगी को भस्म कर देने पर तुली थी। उसने झटके से बोतल उठाई और किसी शातिर मेज़बान की तरह हाथ फैलाकर उस अय्याशी के सामान की ओर इशारा किया।
आर्यमन का क्रूर निमंत्रण
"आइए अवनि जी! स्वागत है आपका," आर्यमन ने बनावटी उत्साह और ज़हरीले लहजे में कहा। "कम ऑन फास्ट... मूव! आपकी सबसे फेवरेट चीज़ें आपके लिए मैंने यहाँ ऊपर मंगवाई हैं। आखिर हवेली की उन चार दीवारों के अंदर, अपने बाबूजी और उस कान्हा की मूरत के सामने तो आप यह सब कर नहीं सकती थीं। वहाँ तो आपको 'सती-सावित्री' बनकर रहना पड़ता है, है ना?"
उसने एक महँगी विदेशी सिगरेट का पैकेट अवनि की ओर उछाला, जो उसके पैरों के पास जाकर गिरा।
"अब आपको यह शराफत और भक्ति का चोला ओढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है अवनि। मैं उन पुराने ख्यालात के 'खर्राटों' जैसा नहीं हूँ जो सादगी के नाम पर धोखा खा जाए। मैं जानता हूँ कि असली अवनि कौन है—वही, जिसे रात के अंधेरे में जाम और धुएँ की सोहबत पसंद है। आज हम यहाँ खुलकर करेंगे, जो आप करना चाहती हैं।"
अवनि की खामोश चीख
अवनि स्तब्ध खड़ी थी। उसके कानों में आर्यमन के शब्द किसी तेज़ाब की तरह गिर रहे थे। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस व्यक्ति को वह अपना जीवनसाथी मान चुकी थी, वह उसके चरित्र की ऐसी धज्जियाँ उड़ाएगा।
आर्यमन उसके और करीब आया, उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट जैसी थी पर उसमें कड़वाहट भरपूर थी, "क्यों? अब चुप क्यों हो? कल तो बहुत बोल रही थीं कि 'कान्हा ने मुझे भेजा है'। क्या आपके कान्हा ने आपको यह नहीं बताया कि आर्यमन कपूर को बेवकूफ बनाना इतना आसान नहीं है? लीजिये, हाथ बढ़ाइए और साबित कीजिये कि आप कितनी 'आधुनिक' हैं।"
विश्वास की आखिरी डोर
अवनि ने अपनी चोटिल उंगली को कसकर अपनी हथेली में भींच लिया। दर्द उंगली में कम, कलेजे में ज़्यादा हो रहा था।
"आर्यमन जी..." अवनि की आवाज़ लड़खड़ाई, "आप जिस 'चोले' की बात कर रहे हैं, वह मेरा लिबास नहीं, मेरा अस्तित्व है। और ये सामान... यह मेरी पसंद नहीं, बल्कि किसी की नफरत का आईना है जो आपको दिखाया जा रहा है।"
पर आर्यमन पर जैसे खून सवार था। उसने सोडा की बोतल खोली, जिसकी 'फिस' की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी नागिन के फुफकार जैसी लगी।
"बातें मत बनाओ अवनि! पियो इसे, या फिर मान लो कि तुम एक नंबर की जालसाज़ हो जो मेरे परिवार की दौलत पर नज़र गड़ाए बैठी है!"
पहाड़ी की उस वीरान चोटी पर हवाएं अब और तेज़ हो गई थीं, जो अवनि के चेहरे पर गिरते आंसुओं को सुखा रही थीं।
आर्यमन के शब्द किसी ज़हरीले बाण की तरह अवनि के चरित्र को छलनी कर रहे थे।
आर्यमन ने तिरस्कार के साथ अपना हाथ हवा में लहराया और चट्टान पर रखी उन बोतलों की ओर इशारा करते हुए बोला:
विश्वास का अंत और कड़वे शब्द
"क्या हुआ अवनि जी? अगर अकेले यह सब करने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं, या मेरे साथ बैठने में आपको