अवनि एक अटूट विश्वास - 2 RAAHULL SHARMA द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अवनि एक अटूट विश्वास - 2

आर्यमन, जो अपनी आलीशान दिल्ली की लाइफस्टाइल और बिजनेस मीटिंग्स में व्यस्त रहता था, उसने भी जब अपने माता-पिता के चेहरे पर इतनी खुशी देखी, तो वह मना नहीं कर पाया। 


उसके मन में भी एक जिज्ञासा पैदा हुई कि वह कौन सी लड़की है, जिसने उसके माता-पिता को इतना प्रभावित कर दिया है।



अध्याय ५: आर्यमन का अतीत और टूटा हुआ विश्वास


दिल्ली का कपूर परिवार जब कानपुर के लिए निकल रहा था, तब गाड़ियों के काफिले में सबसे आगे वाली कार में आर्यमन खामोश बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था।


ऊपर से शांत दिखने वाले आर्यमन के भीतर यादों का एक तूफान चल रहा था।


श्रद्धा का विश्वासघात


कुछ साल पहले तक आर्यमन वैसा ही था जैसा उसका भाई सोहन—एकदम सरल, संस्कारी और नशों से कोसों दूर। फिर उसकी जिंदगी में श्रद्धा आई। 


श्रद्धा ने बड़ी चालाकी से आर्यमन के भोलेपन का फायदा उठाया। उसने प्यार का नाटक किया ताकि वह कपूर खानदान के ऐशो-आराम और आर्यमन के रुतबे का इस्तेमाल कर सके।


जब उसका स्वार्थ पूरा हो गया, तो उसने न केवल आर्यमन को चीट (Cheat) किया, बल्कि एक बड़े एक्सीडेंट के बहाने उसे बीच राह में बेसहारा छोड़ दिया।



बदला हुआ आर्यमन


उस धोखे ने आर्यमन की आत्मा पर गहरे घाव कर दिए। जो लड़का कभी मंदिर जाता था, वह अब शराब के नशे में अपनी रातों का गम भुलाने लगा। 


वह जो सबका सम्मान करता था, अब घमंडी और बदमिजाज हो गया था। उसे लगने लगा कि "संस्कार" और "मर्यादा" सिर्फ कमजोर लोगों के लिए होते हैं। 


अब वह एक ऐसा इंसान बन चुका था जिसे हर खूबसूरत चेहरे में फरेब नजर आता था।


कानपुर की यात्रा: एक मजबूरी


आर्यमन कानपुर अपनी मर्जी से नहीं जा रहा था। वह तो सिर्फ अपने माता-पिता के दबाव और सोहन भाई की जिद की वजह से इस 'शादी के नाटक' में शामिल हुआ था। 


उसके मन में अवनि के लिए कोई जगह नहीं थी। वह सोच रहा था— "कानपुर की वह लड़की भी तो वैसी ही होगी, बाहर से संस्कारी और अंदर से लालची। जैसे ही दिल्ली की चकाचौंध देखेगी, अपना असली रूप दिखा देगी।"



नीलम का साथ


आर्यमन की भाभी नीलम, जो खुद मॉडर्न ख्यालों की थी, अनजाने में आर्यमन के इस गुस्से को और हवा दे रही थी। वह बार-बार उसे अहसास दिला रही थी कि कानपुर जाना वक्त की बर्बादी है।


अध्याय ६: रास्ते का ज़हर और नीलम की चालें


दिल्ली से कानपुर तक का रास्ता लंबा था, और उस पूरे सफर में नीलम ने आर्यमन को उकसाने का एक भी मौका नहीं छोड़ा। 


नीलम अपनी महंगी विदेशी परफ्यूम की शीशी खोलते हुए और अपना चेहरा आईने में देखते हुए बोली, "आर्यमन, मुझे तो तुम्हारी फिक्र हो रही है। 


कहाँ हम दिल्ली की पार्टियों और क्लबों में जाने वाले लोग, और कहाँ तुम इस 'धूल और धुएं' वाले शहर की किसी ऐसी लड़की से बंध जाओगे जो शायद ठीक से इंग्लिश भी नहीं बोल पाती होगी।"



नीलम का प्रहार


आर्यमन खामोश था, पर उसके चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। नीलम ने आगे कहा, "देख लेना आर्यमन, वो अवनि सिर्फ नाम की संस्कारी होगी। 


ये छोटे शहर की लड़कियां ना, दिल्ली के रईस लड़कों को फंसाने के लिए ऐसे ही 'भक्ति और संस्कारों' का नाटक करती हैं।


तुम्हारी श्रद्धा ने जो तुम्हारे साथ किया, ये उससे भी बड़ी खिलाड़ी निकलेगी। तुम तो जानते ही हो, ये लोग सिर्फ हमारे खानदान और पैसे की वजह से ये रिश्ता कर रहे हैं।"



आर्यमन का गुस्सा


आर्यमन, जो पहले से ही श्रद्धा के धोखे की आग में जल रहा था, नीलम की बातों से और भी कड़वा हो गया। उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। 


उसे लगने लगा कि भाभी सही कह रही हैं। उसने मन ही मन तय कर लिया कि वह कानपुर पहुँचते ही उस लड़की (अवनि) और उसके परिवार को उनकी औकात दिखा देगा और यह रिश्ता वहीं खत्म कर देगा।



अध्याय ७: हवेली की दहलीज पर टकराव


जैसे ही कपूर खानदान की गाड़ियाँ 'गोयंका हवेली' के विशाल द्वार पर पहुँचीं, नगाड़ों और शंख की आवाज़ से उनका स्वागत हुआ। 


सेठ श्याम सुंदर गोयंका खुद अपने दोनों बेटों के साथ द्वार पर खड़े थे। हवेली को दुल्हन की तरह सजाया गया था।



शाही स्वागत और नीलम का नखरा


सेठ जी ने बड़े प्रेम से आगे बढ़कर आर्यमन के पिता को गले लगाया। लेकिन जैसे ही नीलम गाड़ी से उतरी, उसने अपनी नाक पर रुमाल रख लिया और आसपास की पुरानी दीवारों को नफरत से देखने लगी। 


वह ऊँची आवाज़ में बोली, "ओह गॉड! यहाँ कितनी अजीब सी स्मेल है। और ये पुराने ज़माने की हवेली... यहाँ सांस लेना भी मुश्किल है।"



सेठ जी और उनके परिवार के चेहरे पर एक पल के लिए फीकी मुस्कान आ गई, लेकिन उन्होंने अपनी तहज़ीब नहीं छोड़ी।



अवनि का प्रवेश


तभी हवेली के भारी दरवाजों के बीच से अवनि बाहर आई। उसके हाथ में आरती का थाल था। पीली रेशमी साड़ी, कानों में झुमके और चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक शांति थी जिसे देखकर कोई भी ठहर जाए। उसने झुककर आर्यमन के माता-पिता के पैर छुए।



आर्यमन की कड़वाहट


जब अवनि आरती का थाल लेकर आर्यमन के सामने आई, तो उसकी आँखों में कान्हा जैसी करुणा थी। लेकिन आर्यमन ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। 


नीलम ने पीछे से चुटकी लेते हुए धीमी आवाज़ में कहा, "देखा आर्यमन, शुरू हो गया नाटक! अब ये आरती की थाली से तुम्हें रिझाएगी।"



अवनी आर्यमन की आरती उतारती रही आर्यमन ने एक तरफ भी अवनि की तरफ नहीं देखा और वह इधर-उधर देखता रहा।



अध्याय ८: अवनि का धैर्य और आर्यमन की बेरुखी


अवनि के हाथों में आरती का थाल था, जिसकी लौ थोड़ी सी थरथराई, पर उसका विश्वास अटल था। उसने आर्यमन के उस रूखे व्यवहार और भाभी नीलम के उन कड़वे शब्दों को सुना, फिर भी उसने अपने चेहरे की मुस्कान फीकी नहीं पड़ने दी।



अवनि की शालीनता


अवनि ने बहुत ही सौम्यता से आर्यमन की आरती उतारी। उसने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं और एक पल के लिए आर्यमन की आँखों में देखा—वहाँ उसे कोई 'अमीर घमंडी लड़का' नहीं, बल्कि एक 'घायल और हारा हुआ इंसान' नज़र आया। 


आर्यमन ने तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं और दूसरी दिशा में देखने लगा, जैसे अवनि का वहां होना उसके लिए मायने ही नहीं रखता हो।


उसने ऐसा व्यवहार किया जैसे अवनि कोई इंसान नहीं, बल्कि दीवार पर लगी कोई तस्वीर हो।
और इसके बाद सभी लोग हवेली के अंदर आये।



अध्याय ९: शाही मेहमाननवाजी और आर्यमन की खामोशी


हवेली का शाही ठाठ-बाट


कपूर परिवार को हवेली के उस विशाल बैठक (ड्राइंग रूम) में बिठाया गया, जहाँ ऊंचे झूमर और दीवारों पर लगे पुराने पूर्वजों के चित्र गोयंका परिवार की रईसी और इतिहास की गवाही दे रहे थे।


सेठ जी ने दिल्ली के मेहमानों के लिए कानपुर के सबसे बेहतरीन पकवान मंगवाए थे—गरमा-गरम कचौड़ियाँ, दही-जलेबी, केसरिया दूध और मेवों की बहार।



नीलम, जो हर चीज में कमी निकाल रही थी, हवेली की उस असली चांदी की क्रॉकरी और शाही इंतजाम देख कर अंदर से थोड़ी हैरान तो हुई, पर बाहर से उसने अपना "मॉडर्न" नखरा बरकरार रखा। वह बार-बार अपने महंगे फोन को देख रही थी जैसे उसे वहां बैठने में भी परेशानी हो रही हो।




बातचीत का सिलसिला


सेठ श्याम सुंदर गोयंका ने बड़े प्रेम से आर्यमन के पिता से कहा, "कपूर साहब, हमारे लिए यह सौभाग्य की बात है कि आपने हमारे न्योते को स्वीकार किया।


हम तो पुराने खयालात के लोग हैं, हमारी पूंजी तो बस हमारी यह मर्यादा और हमारे बच्चे ही हैं।"



दोनों परिवारों के बड़े-बुजुर्ग व्यापार और रिश्ते की गहराई पर बातें करने लगे। सोहन (आर्यमन का भाई) ने भी कानपुर की संस्कृति की तारीफ की और माहौल को खुशनुमा बनाने की कोशिश की।



आर्यमन की गहरी खामोशी


लेकिन इस पूरी चहल-पहल के बीच, आर्यमन एक कोने में खामोश बैठा था। उसके सामने काजू-कतली और शाही नाश्ता रखा था, पर उसने एक तिनका तक नहीं उठाया।


उसका चेहरा सपाट था और आँखें हवेली की छत को देख रही थीं, जैसे वह वहां होकर भी वहां नहीं था।



जब भी कोई उससे बात करने की कोशिश करता, वह सिर्फ 'हाँ' या 'ना' में जवाब देता। उसके मन में श्रद्धा का वह धोखा अभी भी एक खंजर की तरह चुभ रहा था। 

उसे लग रहा था कि यह सब सिर्फ एक दिखावा है। वह अपने भीतर के गुस्से को दबाए बैठा था।