देख रहे हो आर्यमन, कैसे तुम्हें फंसाने के लिए इन लोगों ने पूरा बाजार सजा रखा है? कितने उतावले हैं ये लोग तुम्हें अपना बनाने के लिए।"
अध्याय १०: चाय की चुस्की और कड़वाहट का अहसास
ड्राइंग रूम में बातों का दौर चल रहा था कि तभी सेठ श्याम सुंदर गोयंका की बुलंद आवाज़ गूंजी।
उन्होंने अपनी छोटी बहू (अवनि की चाची) को देखते हुए बड़े लाड़ से कहा, "छोठी बहू! अरे भाई, मेहमान आ गए हैं और हमारी बिटिया अभी तक अंदर ही है? जाओ, अवनि से कहो कि अपने हाथों से अदरक वाली खास चाय बनाकर लाए। मेहमानों का सत्कार घर की लक्ष्मी के हाथों ही होना चाहिए।"
अवनि का प्रवेश
कुछ ही देर में अवनि चांदी की नक्काशीदार ट्रे में चाय के कप लेकर कमरे में दाखिल हुई। उसके चलने की आहट के साथ उसकी पायल की हल्की झंकार पूरे कमरे में सुनाई दे रही थी।
उसने बहुत ही सलीके से सबको चाय दी। जब वह आर्यमन के पास पहुँची, तो उसने महसूस किया कि आर्यमन ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। वह अभी भी अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था।
आर्यमन की बेरुखी
अवनि ने ट्रे आर्यमन के सामने की। आर्यमन ने बिना उसकी आँखों में झाँके, एक झटके में चाय का कप उठा लिया। न तो उसने धन्यवाद कहा और न ही शिष्टाचार का कोई संकेत दिया। उसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त बना रहा।
अवनि की उलझन
अवनि को यह देखकर बहुत बुरा लगा। उसने मन ही मन सोचा, "यह लड़का कैसा है?
जब हम बाहर मिले थे तब भी इसका व्यवहार बहुत अजीब था और अभी भी वही बेरुखी। दादाजी कह रहे थे कि लड़का बहुत संस्कारी है, पर इसके व्यवहार में तो सिर्फ घमंड और अहंकार नज़र आ रहा है।"
अवनि को उस वक्त यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आर्यमन का यह बर्ताव घमंड नहीं, बल्कि उसकी 'सुरक्षा की दीवार' है।
उसे यह नहीं पता था कि दिल्ली की चकाचौंध में श्रद्धा ने इस इंसान के दिल के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। वह देख रही थी एक 'पत्थर', जबकि उसके सामने खड़ा था एक 'घाव खाया हुआ परिंदा'।
नीलम का व्यंग्य
नीलम ने चाय का घूँट भरते हुए धीरे से कहा, "आर्यमन, सुना है यहाँ कानपुर के लोग चाय में शक्कर के साथ-साथ चापलूसी भी घोलते हैं। संभलकर पीना!"
नीलम की यह बात अवनि के कानों में पड़ गई। अवनि ने एक पल के लिए अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी करुणा थी।
उसने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप वहाँ से वापस जाने लगी, पर उसके मन में अब आर्यमन को लेकर ढेरों सवाल उठ खड़े हुए थे।
अध्याय ११: कानपुर दर्शन और व्यापार की धमक
सेठ जी का प्रस्ताव
सेठ श्याम सुंदर गोयंका ने अपनी गद्दी पर थोड़ा और तनकर बैठते हुए, बड़े गर्व के साथ कपूर साहब की आँखों में देखा और बोले, "कपूर साहब, अभी तो आपने सिर्फ हमारी इन दीवारों को देखा है, हमारी हवेली की भाषा समझी है।
पर गोयंका खानदान की असली पहचान तो उसकी मिट्टी और उसके कारोबार में है। मेरा मन है कि कल सुबह हम आपको पूरा कानपुर दिखाएंगे—वे गलियाँ जहाँ से हमारा व्यापार शुरू हुआ और वह शहर जो हमें 'गोयंका' बनाता है।"
कारोबार और कानपुर की शान
सेठ जी ने आगे कहा, "हम आपको अपने ज्वेलरी शोरूम और अपनी फैक्ट्रियां दिखाएंगे। आप भी तो देखें कि जिस शहर से आप रिश्ता जोड़ने आए हैं, वहाँ हमारा नाम किस इज़्ज़त से लिया जाता है।"
कपूर साहब ने बड़े अदब से मुस्कुराते हुए इस बात को मान लिया। उन्हें खुशी थी कि उनका बेटा एक ऐसे साम्राज्य (Empire) से जुड़ने जा रहा है जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं।
आर्यमन की बेरुखी और नीलम की जलन
जब कारोबार देखने की बात हुई, तो आर्यमन ने सिर्फ एक ठंडी आह भरी। उसने मन ही मन सोचा, "पैसा और रसूख दिखा कर शायद ये लोग मुझे प्रभावित करना चाहते हैं।"
वहीं नीलम के चेहरे पर शिकन आ गई। उसने सोचा था कि कानपुर एक छोटा सा कस्बा होगा, लेकिन सेठ जी के दबदबे और उनके 'कारोबार' की बातों ने उसे अंदर ही अंदर जलन महसूस कराई।
उसने आर्यमन के कान में फुसफुसाते हुए कहा, "देख लेना, अपनी पुरानी दुकानें दिखाकर हमें इम्प्रेस करने की कोशिश करेंगे।"
अवनि का मौन संकल्प
अवनि वहीं खड़ी सब सुन रही थी। उसने देखा कि आर्यमन के पिता तो खुश हैं, पर आर्यमन अभी भी एक पत्थर की मूर्ति बना बैठा है।
उसे लगा कि शायद आर्यमन को कानपुर पसंद नहीं आ रहा या वह इस रिश्ते के लिए मजबूर है। पर अवनि के मन में एक संकल्प जागा— "अगर ये कल हमारे साथ जाएंगे, तो मैं इन्हें दिखाऊंगी कि कानपुर सिर्फ ईंटों का शहर नहीं, दिल वालों की बस्ती है। शायद श्री कृष्ण इनके मन की कड़वाहट दूर कर दें।"
अध्याय १२: कानपुर की गलियाँ और आस्था का संगम
सुबह की तैयारी
हवेली में सुबह-सुबह ही चहल-पहल शुरू हो गई। अवनि ने हमेशा की तरह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर कान्हा की पूजा की और केसरिया रंग का एक सादा लेकिन बेहद गरिमामय सूट पहना।
उधर आर्यमन, रात भर ठीक से सो नहीं पाया था। उसने अपनी कड़वाहट को छुपाने के लिए काला चश्मा लगाया और बेदिली से तैयार होकर बाहर आया।
नीलम ने भी अपनी सबसे महंगी डिज़ाइनर ड्रेस पहनी थी, जैसे वह कानपुर की सड़कों पर 'फैशन शो' करने जा रही हो।
सफर की शुरुआत: गंगा के घाट
सेठ श्याम सुंदर गोयंका की देखरेख में गाड़ियों का काफिला सबसे पहले गंगा किनारे पहुँचा।
सुबह की सुनहरी धूप जब गंगा की लहरों पर पड़ रही थी, तो नज़ारा अद्भुत था। सेठ जी ने गर्व से कहा, "कपूर साहब, यह गंगा मैया ही हैं जिन्होंने हमारे पूर्वजों को यहाँ आश्रय दिया। हमारा व्यापार इन्हीं के आशीर्वाद से फला-फूला है।"
अवनि ने घाट पर झुककर प्रणाम किया और गंगा जल के छीटें अपने माथे पर लगाए।
उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। आर्यमन दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसे लगा कि क्या कोई वाकई आज के ज़माने में इतना धार्मिक हो सकता है? या यह भी एक दिखावा है?
कारोबार की धमक: गोयंका ज्वेलर्स
इसके बाद काफिला शहर के सबसे प्रतिष्ठित बाज़ार की ओर बढ़ा, जहाँ 'गोयंका ज्वेलर्स' का मुख्य शोरूम था।
वह शोरूम किसी राजमहल से कम नहीं था। वहाँ काम करने वाले कारीगरों और कर्मचारियों ने जिस तरह हाथ जोड़कर सेठ जी का स्वागत किया, उसने कपूर साहब का दिल जीत लिया।
सेठ जी ने आर्यमन को पास बुलाया और एक पुरानी तिजोरी दिखाई, "बेटा, यह दुकान सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं है, यह हमारा विश्वास है।"
नीलम वहाँ के भारी और बेशकीमती हीरों के हार देखकर दंग रह गई। उसकी जलन अब लालच में बदलने लगी थी।
मंदिर में आमना-सामना
शाम होते-होते सब लोग कानपुर के प्रसिद्ध 'जे.के. मंदिर' पहुँचे। मंदिर की सफेद संगमरमर की दीवारें और वहां की शांति ने आर्यमन के अशांत मन को पहली बार थोड़ा शांत किया।
आरती का समय था। ढोल-नगाड़ों की आवाज़ के बीच अवनि पूरी तल्लीनता से भगवान की स्तुति कर रही थी।
तभी भीड़ के धक्के से अवनि का संतुलन बिगड़ा और वह गिरने ही वाली थी कि अचानक एक हाथ ने उसे थाम लिया। वह हाथ आर्यमन का था।
पहली बार दोनों की नज़रें मिलीं। अवनि की आँखों में कृतज्ञता थी, लेकिन आर्यमन की आँखों में अब भी वही पुरानी चोट और नफरत का साया था।
उसने तुरंत हाथ छोड़ दिया और रूखे स्वर में कहा, "भीड़ में संभल कर चलना चाहिए, यहाँ आपके भगवान बचाने नहीं आएंगे।"
अवनि मुस्कुराई और बहुत ही शांत स्वर में बोली, "वो मुझे बचाने नहीं आए, इसीलिए तो उन्होंने आपको मेरा हाथ थामने के लिए भेजा। आखिर वो सबके भीतर बसे हैं।"
आर्यमन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।
वह बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया, लेकिन अवनि की उस मुस्कान ने उसके दिल की बर्फ को एक पल के लिए पिघला दिया था।